Author : Srijan Shukla

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jun 01, 2026 Updated 4 Hours ago

दुनिया की अर्थव्यवस्था काफी हद तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसलों पर टिकी होती है. ऐसे में फेड में बढ़ता राजनीतिक दखल और नेतृत्व बदलाव अब सिर्फ अमेरिका नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है. पढ़ें, आखिर क्यों फेड में हो रहे बदलावों को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है.

क्या डॉलर की ताकत पर पड़ने वाला है असर?

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लोकतांत्रिक या गैर-लोकतांत्रिक देशों में जब सरकार (कार्यपालिका या विधायिका) कोई कड़ा फैसला ले लेती है, तो बाकी संवैधानिक संस्थाओं को नतमस्तक होना ही पड़ता है. वे चाहकर भी सरकार के सामने टिक नहीं पाते. इस पूरी व्यवस्था में केवल केंद्रीय बैंक ही एक ऐसा इकलौता संस्थान है, जो सरकार के सामने झुकने से इनकार करने और उसे चुनौती देने का दम रखता है. 

दुनिया भर के वित्तीय प्रेस में, किसी नए केंद्रीय बैंकर की नियुक्ति को मशहूर हस्तियों जैसी मीडिया सुर्खियां मिलती हैं. इसका एक हालिया उदाहरण ह्यून सोंग शिन की नियुक्ति थी, जिन्होंने बैंक ऑफ कोरिया का नेतृत्व करने के लिए 'बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स' (BIS) को छोड़ दिया था. 

पॉवेल से वॉर्श तक- एक राजनीतिक बदलाव  

संयुक्त राज्य अमेरिका (US) के फेडरल रिजर्व, जो दुनिया का सबसे प्रमुख केंद्रीय बैंक और दुनिया की मुख्य मुद्रा, डॉलर, का प्रबंधक है - में चल रहा नेतृत्व परिवर्तन इस बात पर प्रकाश डालने में मदद करता है कि दांव पर क्या लगा है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष पद पर जेरोम पॉवेल की जगह केविन वॉर्श के आने से बैंक की आजादी और साख पर बहस छिड़ गई है. पॉवेल ने व्हाइट हाउस की एक जांच पर चिंता जताते हुए कहा कि बैंक पर ऐसे कानूनी और राजनीतिक हमलों से बिना किसी बाहरी दबाव के सही आर्थिक फैसले लेने की बैंक की क्षमता खतरे में पड़ती है. 

एक फेड नवीनीकरण परियोजना के दौरान धन के कथित दुरुपयोग की व्हाइट हाउस जांच का हवाला देते हुए, निवर्तमान फेड अध्यक्ष ने कहा, ‘मेरी चिंता फेड पर होने वाले कानूनी हमलों को लेकर है, जो राजनीतिक कारकों की परवाह किए बिना मौद्रिक नीति संचालित करने की हमारी क्षमता के लिए खतरा पैदा करते हैं.’

ब्याज दरें तय करने वाली अमेरिकी संस्था, फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC)  की अपनी आखिरी बैठक के बाद, पॉवेल ने घोषणा की कि वे स्थापित परंपरा को तोड़ेंगे और अनिश्चित काल के लिए फेड गवर्नर के रूप में काम करना जारी रखेंगे. एक फेड नवीनीकरण परियोजना के दौरान धन के कथित दुरुपयोग की व्हाइट हाउस जांच का हवाला देते हुए, निवर्तमान फेड अध्यक्ष ने कहा, ‘मेरी चिंता फेड पर होने वाले कानूनी हमलों को लेकर है, जो राजनीतिक कारकों की परवाह किए बिना मौद्रिक नीति संचालित करने की हमारी क्षमता के लिए खतरा पैदा करते हैं.’

पॉवेल 1948 में मैरिनर एक्लेस के बाद ऐसा करने वाले पहले फेड अध्यक्ष होंगे. एक्लेस ने अध्यक्ष के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद तीन और वर्षों तक गवर्नर के रूप में काम करना जारी रखा था. उस समय, युद्ध के बाद की अमेरिकी आर्थिक नीति और वैश्विक ब्रेटन वुड्स विनिमय दर प्रणाली दोनों ही अपने शुरुआती दौर में थी.

हालांकि वॉर्श वैश्विक केंद्रीय बैंकिंग समुदाय के एक लंबे समय से सदस्य रहे हैं और केविन वॉर्श को भले ही कई बैंकरों का समर्थन मिला हो, लेकिन उनकी नियुक्ति पूरी तरह से राजनीतिक थी. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उन्हें खास तौर पर इसलिए चुना क्योंकि वे ब्याज दरों को कम करने के सबसे बड़े समर्थक माने जाते थे, जिसके कारण उन पर सवाल उठ रहे हैं. हाल ही में अमेरिकी सीनेट से उन्हें मिली मंजूरी उनके विवादास्पद स्वभाव को उजागर करती है. यह दशकों में फेड अध्यक्ष के लिए हुआ सबसे कड़ा मुकाबला था, जिसमें केवल एक डेमोक्रेट ने उनका समर्थन किया.

मुख्य चिंताएं मौद्रिक नीति पर उनके विचारों को लेकर हैं, जो एक पूर्व फेड गवर्नर और एक निवेश बैंकर दोनों के रूप में राजनीतिक सुविधा के आधार पर बदलते रहे हैं. उदाहरण के लिए, वॉर्श ने 2010 में ब्याज दरें बढ़ाने की वकालत की थी, जब अमेरिका अभी भी 2008 के संकट के प्रभाव से उबर रहा था. अधिक व्यापक रूप से कहें तो, जब भी रिपब्लिकन सत्ता में होते थे, वे दरें घटाने का समर्थन करते थे, और इसके विपरीत (जब विपक्ष सत्ता में होता था तो दरें बढ़ाने का).

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उन्हें खास तौर पर इसलिए चुना क्योंकि वे ब्याज दरों को कम करने के सबसे बड़े समर्थक माने जाते थे, जिसके कारण उन पर सवाल उठ रहे हैं. हाल ही में अमेरिकी सीनेट से उन्हें मिली मंजूरी उनके विवादास्पद स्वभाव को उजागर करती है.

ट्रम्प द्वारा उनकी नियुक्ति के बाद से, वॉर्श के विचारों में काफी नरमी आई है और वे मौद्रिक नीति पर फेड की औसत राय के करीब दिखाई देते हैं. व्यावहारिक रूप से देखें तो, एफओएमसी (FOMC) में उनके पास बारह वोटों में से केवल एक ही वोट है. फेड अध्यक्ष के रूप में, वॉर्श के पास एजेंडा तय करने की जबरदस्त शक्तियां होंगी; ऐसे में अन्य एफओएमसी सदस्यों के साथ उनका टकराव होना पूरी तरह से संभव है. जिस दिन वॉर्श को सीनेट की मंजूरी मिली, उसी दिन अमेरिका ने 2022 के यूक्रेन युद्ध के ऊर्जा संकट के बाद से अपनी सबसे अधिक थोक मुद्रास्फीति दर्ज की. इस मुद्रास्फीति के माहौल में,   की भारी नाराजगी के बावजूद, वॉर्श के लिए ब्याज दरें कम करना मुश्किल होगा, जिससे ट्रेजरी (वित्त मंत्रालय) और व्हाइट हाउस के साथ उनका जल्द ही टकराव का रास्ता बनने की संभावना बढ़ जाएगी.

आसान पैसे के दौर का अंत?

वर्तमान स्थिति के परे, पॉवेल का पद पर बने रहने का फैसला अमेरिकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में आ रहे दो बड़े ढांचागत बदलावों को दिखाता है. पहला वह व्यवस्था परिवर्तन है जिसे ट्रम्प फेड में लाना चाहते थे. दूसरा है 'ग्रेट मॉडरेशन' और संभवतः 'सेक्युलर स्टैग्नेशन' (दीर्घकालिक मंदी) के युगों का अंत, जिसके परिणामस्वरूप 1980 के दशक के अंत से 2007 तक एक स्थिर वैश्विक अर्थव्यवस्था बनी रही, और उसके बाद वैश्विक स्तर पर बचत की अधिकता तथा कम ब्याज दरों व कम मुद्रास्फीति का माहौल रहा. कोविड-पश्चात का युग धीरे-धीरे एक नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है.

इस नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के चार तत्व हैं:

पहला, कम से कम विकसित देशों में, आसान धन और कम मुद्रास्फीति दोनों का युग अब समाप्त होता दिख रहा है. फेड अपनी अर्थव्यवस्था को जिस तरह से प्रबंधित करता है, वह मुख्य रूप से मांग, मुद्रास्फीति, और पूंजी व इक्विटी प्रवाह में बदलाव के माध्यम से पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है. उदाहरण के लिए, बैंक ऑफ इंग्लैंड (BoE) की बाहरी सदस्य मेगन ग्रीन के अनुसार, फेड की नीति और अमेरिकी श्रम बाजार की स्थिति दोनों ही इस बात के प्रमुख चर हैं कि बैंक ऑफ इंग्लैंड अपनी मौद्रिक नीति कैसे तय करता है. इसी तरह, 2013 में फेड के 'टेपर टेंट्रम' (आसान मौद्रिक नीति को धीरे-धीरे वापस लेना) के दौरान, भारत सहित कई उभरते बाजारों से बड़े पैमाने पर पूंजी का बहिर्वाह हुआ था.

आगे चलकर, इस बात का जोखिम बढ़ रहा है कि अमेरिकी सरकार पूरी तरह से इनका राजनीतिकरण कर सकती है, और इन स्वैप समझौतों को राजनीतिक रियायतों या शर्तों से जोड़ सकती है. नए अध्यक्ष वॉर्श पर अपनी निष्पक्षता साबित करने का भारी दबाव है.

दूसरा, और इसी से जुड़ा हुआ, जैसा कि टीएस लोम्बार्ड के डारियो पर्किन्स बताते हैं कि महामारी के बाद से युद्ध और व्यापारिक तनाव जैसे भू-राजनीतिक कारणों से दुनिया भर में सप्लाई चेन बार-बार टूट रही है. इन झटकों की वजह से महंगाई कम नहीं हो पा रही है. नतीजा यह है कि केंद्रीय बैंकों को मजबूरन ब्याज दरें बढ़ानी पड़ रही हैं और वे सिर्फ बिगड़ते हालात को संभालने में ही उलझे हुए हैं. 

तीसरा, जैसा कि अदिति सहस्त्रबुद्धे की पुस्तक 'बैंकर्स ट्रस्ट' (Bankers' Trust) दर्शाती है, केंद्रीय बैंकरों के बीच करीबी संबंधों और सहज समन्वय ने वैश्विक वित्तीय संकट के दुष्प्रभावों को संभालने में एक अग्रणी भूमिका निभाई थी. अब जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में संकट की आशंका काफी अधिक बनी रहती है, दुनिया भर के केंद्रीय बैंकरों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे अपने वास्तविक नेता, यानी फेड अध्यक्ष को एक स्वतंत्र फैसला लेने वाले इंसान के रूप में देखें.

'फाइनेंशियल टाइम्स' के एक हालिया कॉलम में गिलियन टेट लिखती हैं, ‘भू-अर्थशास्त्र के बढ़ते प्रभाव और ट्रम्प के मनमौजी स्वभाव को देखते हुए, क्या अन्य सरकारें किसी वित्तीय संकट के समय अब भी वाशिंगटन के निर्देशों का पालन करेंगी. यह खतरनाक रूप से अस्पष्ट है.’ 

अंततः, फेड ने संकट के समय एक स्थिरता लाने वाले उपकरण के रूप में प्रमुख वैश्विक केंद्रीय बैंकों के साथ विदेशी मुद्रा स्वैप का लंबे समय से उपयोग किया है. आगे चलकर, इस बात का जोखिम बढ़ रहा है कि अमेरिकी सरकार पूरी तरह से इनका राजनीतिकरण कर सकती है, और इन स्वैप समझौतों को राजनीतिक रियायतों या शर्तों से जोड़ सकती है. नए अध्यक्ष वॉर्श पर अपनी निष्पक्षता साबित करने का भारी दबाव है. इस बीच, पूर्व अध्यक्ष पॉवेल भी वहीं मौजूद रहकर एक चतुर विशेषज्ञ की तरह उन पर करीब से नज़र रखेंगे.


सृजन शुक्ला सेंटर फॉर इकोनॉमी एंड ग्रोथ प्रोग्राम और फोरम टीम के एसोसिएट फेलो हैं.
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