दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का रास्ता होर्मुज़ से गुजरता है इसलिए यहां का तनाव पूरी दुनिया पर असर डाल सकता है. इस संकट के पीछे के कारण और इसके वैश्विक प्रभाव समझिए इस आर्टिकल में.
दशकों से अफ्रीका में विकास की कहानी सहायता, रियायती वित्तीय व्यवस्थाओं और ऋण स्थिरता की भाषा में बताई जाती रही है. बहुपक्षीय मंचों में होने वाली चर्चाएँ आज भी राजकोषीय गुंजाइश, ऋण पुनर्गठन ढाँचों और अगली तरलता सहायता पर केंद्रित रहती हैं लेकिन यही दृष्टिकोण स्वयं समस्या को उजागर करता है. यदि महाद्वीप का भविष्य इस बात से तय होता रहेगा कि वह बाहरी वित्तीय प्रवाहों का प्रबंधन कितनी अच्छी तरह करता है, तो वह संरचनात्मक रूप से प्रतिक्रियात्मक ही बना रहेगा.
साल 2026 की शुरुआत में होर्मुज़ एक बार फिर भू-राजनीतिक जोखिम और आर्थिक व्यवधान का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है. 2 मार्च 2026 को ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित इस संकरे समुद्री मार्ग को जिसके माध्यम से प्रतिदिन विश्व के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस का परिवहन होता है, व्यावसायिक जहाजों के लिए प्रभावी रूप से बंद घोषित कर दिया और किसी भी जहाज पर हमला करने की धमकी दी जो इस मार्ग से गुजरने की कोशिश करेगा. यह कदम ईरान द्वारा अब तक अपनाया गया सबसे स्पष्ट और आक्रामक समुद्री रुख माना जा रहा है जो इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव और ईरान पर किए गए समन्वित हमलों के बाद सामने आया है.
2 मार्च 2026 को ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित इस संकरे समुद्री मार्ग को जिसके माध्यम से प्रतिदिन विश्व के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस का परिवहन होता है, व्यावसायिक जहाजों के लिए प्रभावी रूप से बंद घोषित कर दिया और किसी भी जहाज पर हमला करने की धमकी दी जो इस मार्ग से गुजरने की कोशिश करेगा.
इस बढ़ते तनाव का तत्काल प्रभाव समुद्री परिवहन पर पड़ा है. अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकर कंपनियां और कंटेनर ऑपरेटर जोखिम बढ़ने के कारण बुकिंग रोक रहे हैं और इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की यात्राएं रद्द कर रहे हैं. इसके साथ ही बीमा कंपनियां भी कवरेज वापस ले रही हैं, जिससे होर्मुज़ के रास्ते व्यापार करना व्यावसायिक रूप से कठिन हो गया है. अनुमान है कि वैश्विक कंटेनर बेड़े का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज़ के पास फँस गया है, जो यह दिखाता है कि भू-राजनीतिक संकट कितनी तेजी से वैश्विक लॉजिस्टिक्स को प्रभावित कर सकता है.
हालांकि सबसे तात्कालिक असर ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ा है लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की आपसी जुड़ाव के कारण इसके प्रभाव इससे कहीं अधिक व्यापक हैं. इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों को भी झकझोर दिया है. ईरान की चेतावनी के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आया और ब्रेंट क्रूड लगभग 8.6 प्रतिशत बढ़ गया. यह वृद्धि बाजार की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया और संभावित आपूर्ति कमी दोनों को दर्शाती है. व्यापारी इस बात की भी आशंका जता रहे हैं कि यदि यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बाधित होता है तो एशिया, यूरोप और अन्य क्षेत्रों को ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.
साथ ही विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज़ में थोड़े समय के लिए भी रुकावट आने से परिवहन, उद्योग और ऊर्जा क्षेत्रों में लागत बढ़ सकती है. शिपिंग विश्लेषण रिपोर्टों के अनुसार एशिया की ओर जाने वाले बड़े तेल टैंकरों के लिए माल ढुलाई दरों में तेज़ वृद्धि हुई है. इसके अलावा बीमा प्रीमियम में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि ने वैश्विक व्यापार लागत को और बढ़ा दिया है.
होर्मुज़ जलडमरूमध्य का रणनीतिक महत्व अत्यंत बड़ा है. अपने सबसे संकरे बिंदु पर इसकी चौड़ाई लगभग 33 किलोमीटर है और यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक है. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, क़तर और ईरान जैसे देशों से निकलने वाला तेल, गैस और पेट्रोकेमिकल निर्यात इसी मार्ग से होकर वैश्विक बाजारों तक पहुँचता है. इसलिए इस मार्ग का बंद होना केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है. समुद्री माल ढुलाई दरों में, विशेष रूप से तेल टैंकरों के लिए, भारी वृद्धि देखी गई है.
ईरान की चेतावनी के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आया और ब्रेंट क्रूड लगभग 8.6 प्रतिशत बढ़ गया. यह वृद्धि बाजार की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया और संभावित आपूर्ति कमी दोनों को दर्शाती है. व्यापारी इस बात की भी आशंका जता रहे हैं कि यदि यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बाधित होता है तो एशिया, यूरोप और अन्य क्षेत्रों को ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.
व्यावहारिक स्तर पर शिपिंग कंपनियाँ और बंदरगाह इस संकट से निपटने के लिए नए रास्ते तलाश रहे हैं. कुछ कंपनियाँ अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा मार्ग अपनाने पर विचार कर रही हैं, जबकि कुछ अन्य खाड़ी क्षेत्र से बचने के लिए वैकल्पिक ट्रांस-शिपमेंट विकल्प ढूँढ रही हैं. हालांकि इन विकल्पों के साथ लंबी यात्रा, अधिक ईंधन खर्च और अन्य बंदरगाहों पर भीड़ जैसी समस्याएँ जुड़ी हुई हैं. इसका प्रभाव वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, डिलीवरी समय और उपभोक्ता कीमतों पर पड़ सकता है.
ऊर्जा निर्यात का एक संकरे समुद्री मार्ग पर केंद्रित होना यह दिखाता है कि क्षेत्रीय संघर्ष कैसे तुरंत वैश्विक आर्थिक संकट में बदल सकता है. यह संकट वैश्विक व्यापार प्रणाली की कई मूलभूत कमजोरियों को उजागर करता है. समुद्री चोकपॉइंट केवल व्यापार के मार्ग नहीं हैं, बल्कि वे संभावित जोखिम क्षेत्र भी हैं जिनसे सरकारों और कंपनियों को निपटना पड़ता है. यही कारण है कि भविष्य में ऊर्जा विविधीकरण, समुद्री सुरक्षा और वैकल्पिक व्यापार मार्गों की योजना पर अधिक ध्यान दिया जाएगा.भारत की स्थिति इस भू-राजनीतिक और आर्थिक संबंध को स्पष्ट रूप से दर्शाती है. अनुमान है कि भारत के लगभग आधे मासिक तेल आयात होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते से आते हैं. टैंकरों की आवाजाही रुकने और आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने के कारण भारत सरकार ने भारतीय जहाजों को अत्यधिक सावधानी बरतने की सलाह दी है. इसी तरह चीन, जो दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है, भी इस संकट से प्रभावित हो सकता है. यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो रिफाइनरियों का उत्पादन कम हो सकता है और निर्यात प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है.
यूरोपीय संघ में भी ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव जीवन-यापन की लागत को बढ़ा सकता है और आर्थिक नीति को जटिल बना सकता है. जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश, जो ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं, ऐसे व्यवधानों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं. तेल और गैस की आपूर्ति में देरी होने पर उन्हें अपने भंडार का उपयोग करना पड़ सकता है, जिससे उत्पादन लागत और महंगाई बढ़ सकती है.
यह वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए एक बड़ी परीक्षा है. यह संकट यह भी दिखाता है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था कितनी परस्पर जुड़ी हुई और संवेदनशील है, तथा ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए मजबूत और दूरदर्शी नीतियों की आवश्यकता है.
इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि समुद्री चोकपॉइंट का जोखिम बड़े आयातक देशों की आर्थिक स्थिरता को सीधे प्रभावित करता है. होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संघर्ष, जोखिम मूल्य निर्धारण और आपूर्ति श्रृंखला के तंत्र का यह मेल दिखाता है कि क्षेत्रीय संघर्ष कितनी तेजी से वैश्विक आर्थिक तनाव में बदल सकता है. यह स्थिति संकट प्रबंधन के साथ-साथ दीर्घकालिक लचीलापन विकसित करने की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है, जिसमें वैकल्पिक व्यापार मार्ग, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और समुद्री सुरक्षा सहयोग शामिल हैं.
मध्य पूर्व में चल रहा यह संकट पिछले कई दशकों में सबसे गंभीर माना जा रहा है. युद्ध के मैदान से परे यह वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए एक बड़ी परीक्षा है. यह संकट यह भी दिखाता है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था कितनी परस्पर जुड़ी हुई और संवेदनशील है, तथा ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए मजबूत और दूरदर्शी नीतियों की आवश्यकता है.
प्रतनाश्री बसु ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
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Pratnashree Basu is an Associate Fellow with the Strategic Studies Programme. She covers the Indo-Pacific region, with a focus on Japan’s role in the region. ...
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