भारत-चीन के साथ न पूरी तरह दूरी बना रहा है, न ही पूरी तरह करीब आ रहा है- वह बीच का एक बेहद सोच-समझकर चुना गया रास्ता अपना रहा है. समझिए कि यह रणनीति व्यापार को बनाए रखते हुए किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचने और आर्थिक जोखिम को संतुलित करने की कोशिश है.
भारत की चीन नीति को सिर्फ दो विकल्पों-सहयोग या टकराव-के रूप में नहीं देखा जाता. भारत एक संतुलित रास्ता अपना रहा है जिसमें जरूरत के अनुसार आर्थिक संबंध बनाए भी रखे जाएं और जोखिम भी कम किए जाए. 2020 में गलवान घाटी की घटना से दोनों देशों के बीच भरोसा कम हुआ और सुरक्षा माहौल सख्त हुआ लेकिन इसके बावजूद एक सच्चाई यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी क्षेत्रीय उत्पादन नेटवर्क से जुड़ी है, जहां चीन की बड़ी भूमिका है. इसलिए भारत कोशिश कर रहा है कि किसी एक देश पर ज्यादा निर्भरता संकट के समय समस्या न बने. साथ ही, संबंध पूरी तरह टूटें भी नहीं, ताकि उद्योग, लागत और रोजगार पर नकारात्मक असर न पड़े. भारत यह भी चाहता है कि संकट के समय किसी एक जगह पर केंद्रित निर्भरता दबाव का साधन न बने और साथ ही ऐसा कोई बड़ा तनाव भी न हो जिससे देश के उद्योग, लागत और रोजगार पर नकारात्मक असर पड़े.
चीन के साथ भारत का द्विपक्षीय वस्तु व्यापार अभी भी बड़ा और असंतुलित है. वित्त वर्ष 2024–25 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार लगभग 127.7 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जिसमें करीब 113.5 अरब डॉलर का आयात और लगभग 14.3 अरब डॉलर का निर्यात शामिल था. इससे लगभग 99.2 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ. चीन भारत के कुल आयात का लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा भी रखता है.
एक सच्चाई यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी क्षेत्रीय उत्पादन नेटवर्क से जुड़ी है, जहां चीन की बड़ी भूमिका है. इसलिए भारत कोशिश कर रहा है कि किसी एक देश पर ज्यादा निर्भरता संकट के समय समस्या न बने. साथ ही, संबंध पूरी तरह टूटें भी नहीं, ताकि उद्योग, लागत और रोजगार पर नकारात्मक असर न पड़े.
ये आँकड़े केवल बड़े पैमाने को ही नहीं दिखाते, बल्कि यह भी बताते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक, मशीनरी, रसायन, नवीकरणीय ऊर्जा और दवाइयों जैसे क्षेत्रों में उत्पादन स्तर पर चीन पर निर्भरता बनी हुई है. इन क्षेत्रों में चीनी मध्यवर्ती वस्तुएँ और पूंजीगत सामान भारतीय औद्योगिक गतिविधियों में गहराई से जुड़े हुए हैं.
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Source: Author’s own, data from India Today/ Ministry of Commerce and Industry, GoI
इस तरह द्विपक्षीय व्यापार घाटा सिर्फ राजनीतिक चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेतक के रूप में अधिक उपयोगी है. आज उत्पादन कई देशों में फैला है, इसलिए केवल द्विपक्षीय व्यापार संतुलन से नहीं, बल्कि देश की पूरी आर्थिक स्थिति से ताकत मापी जाती है . वित्त वर्ष 2024–25 में भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी का लगभग 0.6 प्रतिशत रहा, जो किसी बड़े बाहरी दबाव का संकेत नहीं देता.
अगर व्यापार घाटा लंबे समय तक बहुत बड़ा बना रहता है और ऐसी चीजों पर निर्भरता बढ़ती है जिनका विकल्प जल्दी नहीं मिलता, तो यह देश के लिए आर्थिक जोखिम बन सकता है. समस्या आयात से ज्यादा कुछ खास सामान पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता की है. जब कुछ ही देशों का सप्लाई पर ज्यादा नियंत्रण होता है, तो लाइसेंस में देरी, कड़े नियम या निर्यात रोक जैसे छोटे कदम भी बड़ी परेशानी पैदा कर सकते हैं. इसलिए अब भारत यह देख रहा है कि कौन-सी निर्भरताएँ ज्यादा जोखिम वाली हैं और उनके विकल्प कितनी जल्दी बनाए जा सकते हैं.

Source: Author’s own, data from the Directorate General of Commercial Intelligence and Statistics, Ministry of Commerce and Industry, GoI
अब भारत की नीतियाँ जोखिम कम करने पर ध्यान दे रही हैं. इसमें सबसे जरूरी है देश में क्षमता बढ़ाना. PLI योजना के जरिए सरकार घरेलू उद्योग बढ़ाना, सप्लायर मजबूत करना और देश में ज्यादा उत्पादन करवाना चाहती है . PLI योजना के लागू होने से निवेश भी बढ़ा है. मार्च 2025 तक 12 क्षेत्रों में प्रोत्साहन दिए गए, जिससे लगभग 20.09 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश आकर्षित हुआ और चुनिंदा क्षेत्रों में विनिर्माण क्षमता के विस्तार को मजबूती मिली.
जब कुछ ही देशों का सप्लाई पर ज्यादा नियंत्रण होता है, तो लाइसेंस में देरी, कड़े नियम या निर्यात रोक जैसे छोटे कदम भी बड़ी परेशानी पैदा कर सकते हैं. इसलिए अब भारत यह देख रहा है कि कौन-सी निर्भरताएँ ज्यादा जोखिम वाली हैं और उनके विकल्प कितनी जल्दी बनाए जा सकते हैं.
भारत ने अंतरिम अवधि में बाजार के व्यवहार को प्रभावित करने के लिए नियम-आधारित उपकरणों का भी सहारा लिया है. संवेदनशील क्षेत्रों, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी वस्तुओं में मानक, तकनीकी नियम और अनुपालन आवश्यकताओं को अब प्रवेश नियंत्रण के रूप में अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है. एंटी-डंपिंग और अन्य व्यापार उपाय आयात बढ़ने को रोकते हैं, जबकि रणनीतिक सुरक्षा कदम राष्ट्रीय सुरक्षा वाले क्षेत्रों में लागू होते हैं. इसमें सीमा से लगे देशों की कंपनियों के निवेश की जांच, सरकारी खरीद में प्राथमिकता, दूरसंचार और डिजिटल प्रणालियों के लिए भरोसेमंद स्रोत के सिद्धांत, तथा डेटा-आधारित प्लेटफॉर्म पर कड़ी निगरानी शामिल है.
2020 के बाद का अनुभव दिखाता है कि नीतियों में प्रगति भी हुई है और कुछ संरचनात्मक सीमाएँ भी बनी हुई हैं. जहाँ नियम लागू करना आसान था, भारत ने जल्दी कदम उठाए. इंटरनेट क्षेत्र में बदलाव दिखा, और निवेश में प्रक्रियाएँ सख्त हुईं. कुछ निवेशों को सरकारी मंजूरी प्रक्रिया से गुजारने से स्वामित्व और नियंत्रण की जांच बढ़ी है, जबकि दूरसंचार सुधारों ने बदलाव की लागत के बावजूद भरोसेमंद विक्रेता के सिद्धांत को मजबूत किया है.
विनिर्माण के परिणाम मिश्रित रहे हैं. प्रोत्साहन योजनाओं से कुछ क्षेत्रों में फैक्ट्री क्षमता, निवेश और निर्यात बढ़े हैं, लेकिन कई जरूरी चीजों के लिए बाहर पर निर्भरता अभी भी है. समस्या आयात नहीं, बल्कि कुछ खास सामान पर ज्यादा निर्भरता है, जिससे सप्लाई रुक सकती है.
इसका उद्देश्य उतार-चढ़ाव कम करना, संवाद के रास्ते खुले रखना और आर्थिक मुद्दों को तनाव बढ़ाने का कारण बनने से रोकना है. इसलिए भारत पूरे संबंधों को रीसेट करने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों को संभालते हुए आर्थिक और तकनीकी सुरक्षा उपायों को मजबूत कर रहा है.
इसलिए मुख्य संतुलन स्पष्ट है. जोखिम कम करने की नीति (De-risking) से तुरंत कुछ लागतें बढ़ती हैं, जैसे अधिक नियमों का पालन, सीमित विक्रेता विकल्प और कई बार ऊँची कीमतें. वहीं इसके लाभ लंबे समय में और अनिश्चित परिस्थितियों में दिखाई देते हैं. सबसे बड़ी चुनौती रणनीतिक अवरोध बिंदुओं पर दबाव के जोखिम की है, खासकर वहाँ जहाँ चीन की प्रोसेसिंग और मध्यवर्ती उत्पादन क्षमता उसे अधिक प्रभाव देती है. भारत के लिए यह जोखिम उन क्षेत्रों में ज्यादा है जिन्हें वह तेजी से विकसित करना चाहता है, जैसे स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और उन्नत विनिर्माण, जहाँ महत्वपूर्ण खनिज और प्रोसेस्ड सामग्री आधारभूत भूमिका निभाते हैं.
भारत अपनी आर्थिक मजबूती बढ़ाने के लिए दो तरीकों पर काम कर रहा है. पहला, देश के अंदर जरूरी क्षेत्रों में फैक्ट्री, मशीनरी और कच्चे माल की क्षमता बढ़ाना. दूसरा, दूसरे देशों के साथ साझेदारी करके नए सप्लाई स्रोत बनाना, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम हो. क्योंकि सब कुछ देश में बनाना हमेशा आसान या सस्ता नहीं होता. इसलिए आत्मनिर्भरता का मतलब पूरी तरह अलग होना नहीं है, बल्कि ऐसा सिस्टम बनाना है जिससे संकट के समय भी उत्पादन चलता रहे और भारत अपने फैसले खुद ले सके.
इसी पृष्ठभूमि में 2024–25 में भारत और चीन के संबंधों में जो नरमी दिखी, उसे रणनीतिक सुलह के बजाय व्यावहारिक स्थिरता के रूप में समझना बेहतर है. संबंधों का सामान्य होना अब भी स्थायी और भरोसेमंद सीमा स्थिरता से जुड़ा हुआ है. लेन-देन की लागत कम करने वाले व्यावहारिक कदम-जैसे कई वर्षों के बाद सीधी उड़ानों को फिर से शुरू करना और 1 फरवरी 2026 से दिल्ली-शंघाई नॉन-स्टॉप सेवाओं का पुनः संचालन-इसी तरह की स्थिरता की दिशा में उठाए गए कदम हैं. इसका उद्देश्य उतार-चढ़ाव कम करना, संवाद के रास्ते खुले रखना और आर्थिक मुद्दों को तनाव बढ़ाने का कारण बनने से रोकना है. इसलिए भारत पूरे संबंधों को रीसेट करने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों को संभालते हुए आर्थिक और तकनीकी सुरक्षा उपायों को मजबूत कर रहा है.
अब भारत की चीन नीति का मकसद यह है कि देश अपने फैसले खुद ले सके और आर्थिक जोखिम कम कर सके. इसके लिए भारत अलग-अलग विकल्प और नए सप्लाई स्रोत बना रहा है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम हो. जरूरत पड़ने पर सीमित सहयोग भी जारी रखा जाता है. असली सफलता केवल व्यापार के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि भारत कितनी मजबूत और विविध सप्लाई व्यवस्था बना पाता है.
सौम्या भौमिक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी (सीएनईडी) में फेलो और विश्व अर्थव्यवस्था और स्थिरता की प्रमुख हैं।
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Dr. Soumya Bhowmick is a Fellow at the Centre for New Economic Diplomacy (CNED) at the Observer Research Foundation (ORF). He completed industry- endorsed Ph.D. ...
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