बर्फ़ से ढका आर्कटिक, जिसे कभी शांति का क्षेत्र माना जाता था, अब बढ़ती भू-राजनीति, जलवायु संकट और नए वैश्विक खिलाड़ियों के बीच बहुध्रुवीय प्रतिस्पर्धा का मैदान बन गया है. लेख के जरिए समझिए कि क्यों इसकी सुरक्षा और स्थिरता अब केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए निर्णायक बन गई है.
आर्कटिक क्षेत्र तेज़ी से उभरती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का नया मोर्चा बन गया है. रूस–यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद, आर्कटिक-जिसे पहले बढ़ती सुरक्षा प्रतिस्पर्धा से रणनीतिक रूप से सुरक्षित क्षेत्र माना जाता था-अब विभिन्न गुटों के बीच प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बन गया है. हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा डेनमार्क के अधीन क्षेत्र ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की इच्छा जताने से क्षेत्र का सुरक्षा परिदृश्य और जटिल हो गया है. चीन स्वयं को निकट-आर्कटिक राज्य बताता है और रूस के साथ सहयोग बढ़ा रहा है; इससे स्पष्ट है कि बीजिंग क्षेत्र की शासन व्यवस्था को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाने की स्थिति बना रहा है. इन घटनाक्रमों के संदर्भ में, वैश्विक जलवायु संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण आर्कटिक में सुरक्षा और स्थिरता का भविष्य कैसा दिखता है?
कमज़ोर पड़ती आर्कटिक विशिष्टता
1987 में मुरमैन्स्क में दिए गए अपने भाषण में, पूर्व सोवियत संघ (USSR) के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव ने घोषणा की थी कि आर्कटिक क्षेत्र को ‘शांति का क्षेत्र’ बने रहना चाहिए. इससे ‘आर्कटिक विशिष्टता’ (Arctic exceptionalism) की अवधारणा उभरी, जो आर्कटिक को भू-राजनीतिक तनाव और सुरक्षा प्रतिस्पर्धा से मुक्त मानती है. यद्यपि यह विचार औपचारिक सिद्धांत में नहीं बदला, फिर भी इसने इस बात पर ज़ोर दिया कि आर्कटिक क्यों विशिष्ट है और उसकी स्थिरता बनाए रखना क्यों आवश्यक है.
हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा डेनमार्क के अधीन क्षेत्र ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की इच्छा जताने से क्षेत्र का सुरक्षा परिदृश्य और जटिल हो गया है. चीन स्वयं को निकट-आर्कटिक राज्य बताता है और रूस के साथ सहयोग बढ़ा रहा है; इससे स्पष्ट है कि बीजिंग क्षेत्र की शासन व्यवस्था को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाने की स्थिति बना रहा है.
आर्कटिक वर्तमान में अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है. महाशक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा उसके सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर रही है, वहीं जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न जोखिमों के कारण बर्फ के पिघलने की गति बढ़ी है. इसका वैश्विक पर्यावरण संतुलन पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है. अनुमान बताते हैं कि पर्माफ्रॉस्ट के क्षरण और समुद्री बर्फ के पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ेगा, मौसम प्रणालियाँ बदलेंगी और मानसून के पैटर्न प्रभावित होंगे. इससे वैश्विक जलवायु संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है और विशेषकर तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन और आजीविका पर प्रतिकूल असर पड़ेगा. इसके अतिरिक्त, प्राकृतिक संसाधनों और दुर्लभ खनिजों तक पहुँच की होड़ ने क्षेत्र में प्रभाव और यहाँ तक कि नियंत्रण स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा को और तेज़ कर दिया है.
आर्कटिक परिषद-जिसमें आठ आर्कटिक देश (अमेरिका, रूस, कनाडा, फ़िनलैंड, नॉर्वे, डेनमार्क, स्वीडन और आइसलैंड) शामिल हैं-लंबे समय से क्षेत्रीय सहयोग और शासन का प्रमुख मंच रही है. हालांकि, रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद इस समूह के भीतर प्रारंभिक व्यवधान उत्पन्न हुआ. फ़िनलैंड और स्वीडन के नाटो में शामिल होने के बाद, परिषद में अब रूस और सात नाटो देश हैं जिससे सहयोग की गुंजाइश सीमित हो गई है. ट्रंप की ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने की रुचि ने स्थिति को और जटिल बनाया है और आर्कटिक परिषद के गैर-रूसी गुट में भी विभाजन बढ़ाया है. चीन ने रूस के साथ नौसैनिक अभ्यास कर और सहयोग बढ़ाकर आर्कटिक में अपनी रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश की है. चीन की ‘पोलर सिल्क रूट’ पहल, जिसके तहत वह आर्कटिक के रास्ते एशिया और यूरोप को जोड़ने वाले समुद्री मार्ग विकसित करना चाहता है, इस संभावना को और बढ़ाती है कि चीन क्षेत्र का एक प्रमुख खिलाड़ी बन सकता है. ये सभी संकेत देते हैं कि आर्कटिक शासन का मार्गदर्शक रहा ‘आर्कटिक विशिष्टता’ का विचार अब कमजोर पड़ चुका है और क्षेत्रीय सहयोग पहले से अधिक विखंडित हो गया है.
आर्कटिक में नए देशों और गुटों की बढ़ती मौजूदगी से यह सवाल उठ रहा है कि आगे चलकर वहाँ की व्यवस्था कैसी बनेगी. अलग-अलग देशों के अपने हित और लक्ष्य हैं इसलिए आर्कटिक की व्यवस्था अब बहुध्रुवीय यानी कई ताकतों के प्रभाव वाली दिख रही है. पहला, रूस आर्कटिक परिषद में पहले जैसा प्रभाव नहीं रख पा रहा और अपने हित बचाने के लिए नए साझेदार खोज रहा है. दूसरा, अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी पहुँच मजबूत करना चाहता है, क्योंकि उसे लगता है कि इस क्षेत्र में रूस की गतिविधियां बढ़ रही हैं और इससे उसकी सुरक्षा पर असर पड़ सकता है. तीसरा, नॉर्डिक देश और कनाडा चाहते हैं कि क्षेत्र में संतुलन बना रहे, इसलिए वे कूटनीतिक तरीके से रूस और अमेरिका दोनों की बढ़ती रणनीतिक गतिविधियों पर सवाल उठा रहे हैं. चौथा, चीन रूस के साथ सहयोग बढ़ाकर पिघलती बर्फ से उभरते नए व्यापार मार्गों का लाभ उठाने के लिए आर्कटिक में अधिक भागीदारी चाहता है. अंततः गैर-आर्कटिक देश-जो भौगोलिक रूप से इस क्षेत्र का हिस्सा नहीं हैं-भी नए हितधारक के रूप में उभर रहे हैं. आर्कटिक की वैश्विक जलवायु संतुलन में भूमिका, विशाल संसाधन और संभावित नए व्यापार मार्ग कई गैर-आर्कटिक देशों को भी इस क्षेत्र की ओर आकर्षित कर रहे हैं.
नए खिलाड़ियों की बढ़ती रुचि के बीच यह संतुलन बनाना ज़रूरी है कि नए अवसरों का लाभ पर्यावरणीय संतुलन की कीमत पर न उठाया जाए. आर्कटिक देशों के लिए ‘आर्कटिक विशिष्टता’ की कमजोर पड़ती अवधारणा यह संकेत है कि आर्कटिक और गैर-आर्कटिक का द्विभाजन अब पुराना हो चुका है क्योंकि आर्कटिक में होने वाले बदलाव पूरी दुनिया के भविष्य को प्रभावित करते हैं.
आर्कटिक शासन की जटिल और विखंडित स्थिति को देखते हुए, क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता का भविष्य अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है. आर्कटिक व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए बड़े स्तर पर पुनर्विचार आवश्यक है. नए खिलाड़ियों की बढ़ती रुचि के बीच यह संतुलन बनाना ज़रूरी है कि नए अवसरों का लाभ पर्यावरणीय संतुलन की कीमत पर न उठाया जाए. आर्कटिक देशों के लिए ‘आर्कटिक विशिष्टता’ की कमजोर पड़ती अवधारणा यह संकेत है कि आर्कटिक और गैर-आर्कटिक का द्विभाजन अब पुराना हो चुका है क्योंकि आर्कटिक में होने वाले बदलाव पूरी दुनिया के भविष्य को प्रभावित करते हैं. आर्कटिक की सुरक्षा और स्थिरता का भविष्य भले ही अनिश्चित दिखे, पर यह वैश्विक हितधारकों के लिए चेतावनी है कि क्षेत्र में व्यवस्था बनाए रखने के लिए व्यापक रणनीतियां बनाई जाए.
सायंतन हलदर ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.
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Sayantan Haldar is an Associate Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. At ORF, Sayantan’s work is focused on Maritime Studies. He is interested in questions on ...
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