भारत में हवाई यात्रा तेजी से बढ़ रही है लेकिन एविएशन सेक्टर अब भी कई मुश्किलों से घिरा है. महंगा ईंधन, कम मुनाफा और कुछ बड़ी कंपनियों का दबदबा इसकी उड़ान को कमजोर बना रहा है. पढ़िए, क्यों चमकदार दिखने वाला यह सेक्टर अंदर से अब भी कमजोर है.
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भारत का विमानन क्षेत्र पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है लेकिन लगातार सामने आ रही रुकावटें इसकी ऊंचाई की परीक्षा ले रही हैं. दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा विमानन बाजार बनने के बावजूद, यह क्षेत्र आपूर्ति-पक्ष के झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील बना हुआ है. इसमें पश्चिम एशिया के तनावों के कारण एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में उछाल और उड़ानों के बंद होने के जोखिम से लेकर, उड़ान के संशोधित समय (ड्यूटी आवर्स) जैसे कड़े होते परिचालन नियम और बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) की बाधाएं शामिल हैं.
यात्रियों की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन इस विकास गाथा के पीछे पुरानी घाटे की स्थिति, कमजोर बैलेंस शीट और एयरलाइनों के बंद होने का एक लंबा इतिहास छिपा है, जो गहरी संरचनात्मक कमियों को उजागर करता है. साल 2025 तक, भारत में लगभग 9-10 चालू अनुसूचित एयरलाइंस हैं, फिर भी बाजार के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से पर केवल दो एयरलाइनों-'एयर इंडिया ग्रुप' और 'इंडिगो'-का नियंत्रण है, जो प्रभावी रूप से इस क्षेत्र को एक दुविधापूर्ण एकाधिकार के रूप में परिभाषित करता है.
पिछले एक दशक में, भारत की विमानन मांग में सालाना लगभग 10-12 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है. साल 2024 तक उड़ानों का उपयोग करने वाली अनुमानित आबादी लगभग 14.5 प्रतिशत थी, जो इसे वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ते हवाई यात्रा बाजारों में से एक बनाती है. साल 2040 तक यात्री यातायात (पैसेंजर ट्रैफिक) लगभग 1.1 बिलियन (110 करोड़) तक पहुंचने का अनुमान है, और इसी अवधि के दौरान राष्ट्रीय विमानों के बेड़े (fleet) में लगभग छह गुना विस्तार होने की उम्मीद है.
पश्चिम एशिया के तनावों के कारण एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में उछाल और उड़ानों के बंद होने के जोखिम से लेकर, उड़ान के संशोधित समय जैसे कड़े होते परिचालन नियम और बुनियादी ढांचे की बाधाएं शामिल हैं.
विकास के लिहाज से, भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में एविएशन सेक्टर बहुत जरूरी है. यह रोजगार देता है, बाजारों को जोड़ता है, हवाई अड्डों के पास व्यापार बढ़ाता है, पर्यटन को रफ्तार देता है और विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करता है. जैसा कि 2025 तक स्थिति है, भारत में लगभग 9-10 चालू अनुसूचित एयरलाइंस हैं, फिर भी बाजार का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा दो एयरलाइनों-एयर इंडिया ग्रुप और इंडिगो-द्वारा नियंत्रित है.
भारी मांग के बाद भी सीमित बाजार, किराए को लेकर संवेदनशील ग्राहक और बाहरी दबावों के कारण कई भारतीय एयरलाइंस बंद हो चुकी हैं और बाकी मुनाफे के लिए जूझ रही हैं. यहाँ तक कि अपेक्षाकृत सफल और लाभदायक एयरलाइंस भी अपने मार्जिन को बनाए रखने के लिए 'अल्ट्रा-लीन ऑपरेटिंग मॉडल' (बेहद कम खर्च वाले मॉडल) पर निर्भर हैं, जिससे वे मामूली बाहरी झटकों के प्रति भी बेहद संवेदनशील हो जाती हैं. भारतीय विमानन क्षेत्र की स्थिरता और सफलता पूरी तरह से तीन मुख्य कड़ियों-यात्री (मांग), एयरलाइंस (आपूर्ति) और नियामक -के तालमेल पर निर्भर करती है.
भारत और अधिकांश दक्षिण एशिया में, विमानन की मांग आर्थिक विकास के साथ-साथ चलती है. बढ़ती आय, जीवनस्तर में सुधार, और एक नए मध्यम वर्ग के उभरने से सीधे तौर पर हवाई यात्रा की सामर्थ्य और इसका उपयोग बढ़ा है. इस क्षेत्र में हवाई यात्रा की मांग कई कारकों से तय होती है, जिसमें प्रति व्यक्ति आय, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), उड़ानों की आवृत्ति, और जेट ईंधन की कीमतें शामिल हैं, लेकिन आय का प्रभाव संभवतः सबसे निर्णायक कारक बना हुआ है. एक युवा आबादी और 2030 तक घरेलू आय के $35,000 अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद के साथ, भारत का मांग आधार संरचनात्मक रूप से मजबूत है. इस लिहाज से, विमानों के बड़े ऑर्डर और आक्रामक क्षमता विस्तार योजनाएं केवल कयास नहीं हैं. भारतीय विमानन क्षेत्र की स्थिरता और सफलता पूरी तरह से तीन मुख्य कड़ियों-यात्री (मांग), एयरलाइंस (आपूर्ति) और नियामक (regulator)-के तालमेल पर निर्भर करती है.
एक युवा आबादी और 2030 तक घरेलू आय के $35,000 अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद के साथ, भारत का मांग आधार संरचनात्मक रूप से मजबूत है. इस लिहाज से, विमानों के बड़े ऑर्डर और आक्रामक क्षमता विस्तार योजनाएं केवल कयास नहीं हैं.
भारत का विमानन बाजार लगातार कीमत के प्रति संवेदनशील मांग वाले माहौल में काम कर रहा है, जहां औसत आय, सुधार के बावजूद, अपेक्षाकृत कम है. भारतीय यात्री काफी किराया-संवेदनशील हैं, इसलिए वे प्रीमियम सेवाओं के बजाय सस्ती और सीधी उड़ानों (पॉइंट-टू-पॉइंट) को ज्यादा पसंद करते हैं. विभिन्न समूहों में भारत के आय वितरण और व्यक्तिगत स्तर पर विकास-हवाई यात्रा मांग के आपसी संबंध को देखते हुए, मुख्य विमानन मांग आधार शीर्ष 10 प्रतिशत कमाने वालों और मध्य 40 प्रतिशत के हिस्सों में केंद्रित है- भारतीय बाजार की कीमत-संवेदनशीलता के कारण यहाँ बजट एयरलाइंस (LCCs) काफी सफल रही हैं, जबकि फुल-सर्विस एयरलाइंस (FSCs) का टिकना मुश्किल हो गया है. आज एयर इंडिया एकमात्र प्रमुख फुल-सर्विस ऑपरेटर है, जो निजीकरण के बाद भी भारी प्रतिस्पर्धा और कम मुनाफे के कारण वित्तीय दबाव झेल रहा है.
एक औसत भारतीय एयरलाइन के कैश फ्लो स्टेटमेंट (नकद प्रवाह विवरण) में, एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF- विमान ईंधन) सबसे बड़े खर्चों में से एक बना हुआ है. पहले परिचालन लागत (ऑपरेटिंग कॉस्ट) का लगभग 30-40 प्रतिशत हिस्सा ईंधन पर खर्च होता था, लेकिन पश्चिम एशिया के बढ़ते संकट और उसके कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों में आए उछाल के चलते कई विमानन कंपनियों के लिए यह खर्च बढ़कर अब लगभग 50-60 प्रतिशत तक पहुँच गया है. 'फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस' ने एटीएफ (ATF) की कीमतों में सरकारी हस्तक्षेप की मांग की है, और चेतावनी दी है कि लगातार बढ़ रहे लागत के दबाव एयरलाइनों को परिचालन बंद करने की ओर धकेल सकते हैं. हालांकि, यह चुनौती केवल भारत तक सीमित नहीं है. वैश्विक स्तर पर भी एयरलाइंस अपनी लागत के गणित में एक संरचनात्मक बदलाव देख रही हैं, क्योंकि ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव विमानन के अर्थशास्त्र को तेजी से बदल रहा है.
ईंधन की ऊंची लागत और टैक्स, विदेशी रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल (MRO) सेवाओं पर निर्भरता, हवाई अड्डों पर भीड़भाड़, विदेशी मुद्रा (फॉरेक्स) दरों में उतार-चढ़ाव का जोखिम, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) की कमियां, कुशल विमानन कर्मियों की कमी, और हाल ही में पैदा हुए भू-राजनीतिक तनाव-जिसकी वजह से हवाई क्षेत्र बंद हुए और इनपुट लागत में अस्थिरता आई-भारत में यात्री विमानन के आपूर्ति पक्ष को लगातार बाधित कर रहे हैं.
केवल विमानन नीतियों को बदलने से स्थाई सुधार नहीं होगा. इसके लिए भारत के लोगों के खर्च करने के तरीकों में बदलाव आना ज़रूरी है. यह बदलाव तभी संभव है जब देश का आर्थिक विकास लगातार हो, लोगों की आमदनी बढ़े और उनका जीवनस्तर बेहतर हो.
बाजार के मोर्चे पर, भारतीय विमानन उद्योग तेजी से घाटे में चलने वाला उद्योग बनता जा रहा है. इसकी वजह इस क्षेत्र का अल्पाधिकार ढांचा है जिसके कारण नए खिलाड़ियों के लिए टिक पाना मुश्किल है, बजट एयरलाइंस में कड़े किराए और कम मुनाफे की होड़ है, साथ ही रेगुलेटर और ऑपरेटर्स के बीच धुंधली सीमाओं के कारण FDTL (फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिट) जैसे विवाद खड़े होते हैं.
भारत के विमानन क्षेत्र ने विदेशी निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी के साथ-साथ एक उल्लेखनीय विस्तार देखा है. इसे एक अनुकूल निवेश माहौल का समर्थन प्राप्त है, जो निवेशक की श्रेणी के आधार पर 49 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति देता है. साथ ही, हवाई अड्डा बुनियादी ढांचे (एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर), एमआरओ (MRO) सेवाओं और तकनीकी प्रशिक्षण संस्थानों जैसे क्षेत्रों में 100 प्रतिशत विदेशी स्वामित्व की भी मंजूरी है.
फिर भी, यह विकास एक कमजोर बुनियाद पर टिका हुआ है, जिससे एक अत्यधिक संवेदनशील, केंद्रित और वर्चस्ववादी बाजार संरचना पैदा हो रही है. हालांकि, संकट या बाहरी झटकों के समय यह संवेदनशीलता पूरे उद्योग में फैल जाती है, जिससे उपभोक्ता भी प्रभावित होते हैं.
भारतीय विमानन क्षेत्र में बढ़ती आय के कारण यात्रियों की संख्या तो बढ़ेगी, लेकिन इसकी बुनियादी चुनौतियों को ठीक करने के लिए तुरंत कड़े नियमों, सही सुधारों और सरकारी आर्थिक मदद की ज़रूरत है. केवल विमानन नीतियों को बदलने से स्थाई सुधार नहीं होगा. इसके लिए भारत के लोगों के खर्च करने के तरीकों में बदलाव आना ज़रूरी है. यह बदलाव तभी संभव है जब देश का आर्थिक विकास लगातार हो, लोगों की आमदनी बढ़े और उनका जीवनस्तर बेहतर हो.
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Manish Vaidya is a Research Assistant with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. His work centres on research and active engagement in applied economics, with a ...
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