-
CENTRES
Progammes & Centres
Location
यूक्रेन युद्ध ने रूस की ड्रोन नीति बदल दी है. पहले केवल निगरानी के लिए, अब ड्रोन हमले और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में भी इस्तेमाल हो रहे हैं. अब ये युद्ध जीतने की रूस की सबसे अहम तकनीकी ताकत बन गए हैं.
रूस और यूक्रेन में युद्ध शुरू होने के बाद से मॉस्को की ड्रोन नीति में भारी बदलाव देखने को मिल रहा है. रूस के लिए ड्रोन अब उसकी युद्ध रणनीति का मुख्य हिस्सा बन गया है, जबकि पहले यह सहायक युद्ध नीति के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. पहले वह भारी टोही मानवरहित हवाई यान (UAV) उपयोग करता था, वह भी बहुत सीमित मात्रा में, लेकिन अब उसने अपने ड्रोन बेड़े को कई स्तरों तक बढ़ा लिया है और कई महत्वपूर्ण कामों में वह अपने ड्रोन का इस्तेमाल करने लगा है, फिर चाहे वह खुफ़िया, निगरानी और टोही (ISR) जैसे पारंपरिक काम हों या फिर रणनीतिक हमले करने, युद्ध के मैदान में क्षति पहुंचाने और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) के रूप में. युद्ध क्षेत्र के बदलते समीकरण, तकनीकी नवाचारों और युद्ध के दौरान महसूस हुई ऑपरेशनल ज़रूरतों के आधार पर यह बदलाव किया गया है. इस लेख में यही बताया गया है कि किस तरह यूक्रेन में रूस ने अपनी ड्रोन नीति में बड़े पैमाने पर बदलाव किया है.
रूस ने अपने ड्रोन कार्यक्रम की शुरुआत 1960 के दशक में की थी और शुरुआत हुई टोही UVV यानी ड्रोन से. हालांकि, 2008 के जॉर्जियाई युद्ध में सामने आई कमियों के बाद उसने अपने ड्रोन कार्यक्रम पर काफ़ी ज़्यादा ध्यान देना शुरू किया, क्योंकि इस युद्ध से उसके ड्रोन बेड़े की गुणवत्ता और कमियों के साथ-साथ उसकी सीमित ऑपरेशनल क्षमताओं का भी पता चला था.
“इसके अलावा, रूस के ड्रोन भंडार में टोही ड्रोन थे, जो वज़नी थे, पर लड़ने में सक्षम नहीं थे.”
इसके बाद, रूस ने अपने ड्रोन शस्त्रागार को बढ़ाने का फ़ैसला किया और इसके लिए भारी मात्रा में निवेश करना शुरू किया, फिर चाहे वे स्वदेशी रहे हों और आयातित. (देखें तालिका 1)
तालिका 1 - रूस के ड्रोन बेड़े का विकास (2008-2022)
स्रोत- लेखकों द्वारा विभिन्न स्रोतों से संकलित
रूस ने पूर्वी यूक्रेन (2014) और सीरिया (2015) में अपने UAV तैनात किए, जिससे उसे युद्ध-क्षेत्र का महत्वपूर्ण अनुभव मिला. हालांकि, कुछ ढांचागत सीमाएं भी दिखीं. सबसे पहले, विशिष्ट UAV स्क्वाड्रनों को बनाने के बावजूद, ड्रोन का उपयोग किस तरह किया जाए, इसको लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं बन सकी थी. इसके अलावा, रूस के ड्रोन भंडार में टोही ड्रोन थे, जो वज़नी थे, पर लड़ने में सक्षम नहीं थे. वे आत्मघाती भी नहीं थे. इसके अलावा, उसका अपना औद्योगिक क्षेत्र ड्रोन उत्पादन के लिए तैयार नहीं था और यूरोप, अमेरिका, इज़रायल, जापान व अन्य देशों से आयातित घटकों पर बहुत अधिक निर्भर था.
“ड्रोन गिरने से हो रहे नुकसान, बढ़ रहे ख़र्च और शस्त्रागार में सटीक-निर्देशित मिसाइलों की कमी के कारण रूस ने ईरानी शाहेद ड्रोनों का उपयोग करना शुरू किया.”
इसका मतलब यह था कि यूक्रेन पर अपने पूर्ण हमले से पहले, रूस के पास ड्रोन पारिस्थितिकी तंत्र तो था, लेकिन उसकी क्षमता बहुत सीमित थी. उसके पास युद्ध के शुरू होने के समय मज़बूत ISR क्षमताएं (खुफ़िया, निगरानी और टोही क्षमताएं) थीं, लेकिन लड़ाकू ड्रोनों का भंडार सीमित था. मॉस्को यह मानकर चल रहा था कि ड्रोन उसके अभियान में केवल सहायक भूमिका निभाएंगे, हालांकि बाद में जब युद्ध ने अपनी दिशा बदली, तो मॉस्को की सोच भी बदल गई.
रूस ने यह सोचकर यूक्रेन के साथ युद्ध की शुरुआत की थी कि उसे ज़ल्द ही निर्णायक जीत मिल जाएगी. उसके भंडार में भले ही ड्रोन की संख्या बहुत सीमित थी, लेकिन उसका यह मानना था कि सीरिया में जिस तरह के उसके अनुभव रहे, जहां उसने बमुश्किल 70 ड्रोन का भी उपयोग नहीं किया था, यूक्रेन युद्ध में भी ड्रोन की बहुत ज़्यादा ज़रूरत नहीं पड़ेगी. मगर यह युद्ध ज़ल्द और निर्णायक रूप से ख़त्म होने वाले संघर्ष की जगह एक लंबे समय तक चलने वाली जंग में बदल गया. रूस ने शुरुआत में UAV का इस्तेमाल इसलिए किया, क्योंकि उसे लगा था कि मध्यम दूरी के ISR प्लेटफॉर्मों और अंदरूनी इलाकों तक हमला करने की क्षमताओं के कारण उसे हवाई युद्ध में बढ़त मिल जाएगी. मगर यूक्रेन ने इंसानी कंधे से दागे जाने वाले ‘मैन-पोर्टल एयर डिफेंस सिस्टम’ (MANPADS) के साथ उसका जमकर मुक़ाबला किया और उसने बड़े रूसी ISR ड्रोन को ख़त्म करना शुरू किया. रूसी कमान, कंट्रोल और कम्युनिकेशन (C3) प्रणाली की ढांचागत ख़ामियों और निर्णय लेने की अत्यधिक केंद्रीकृत क्षमता के कारण, इस ज़वाबी हमले के अनुकूल खुद को ढालने में रूस तुरंत पूरी तरह से सक्रिय नहीं था. इतना ही नहीं, इस स्थिति ने रूस के सामने छोटे ड्रोनों की कमी को भी उजागर किया, जिसमें उसने पर्याप्त निवेश नहीं किया था. छोटे ड्रोनों की भरपायी के लिए, रूस के सैनिक DJI क्वाडकॉप्टरों पर काफ़ी अधिक निर्भर रहने लगे. 2022 के मध्य तक रूस को महसूस हुआ कि उसे UAV को लेकर अपनी सोच बदलकर उसे संतुलित बनाना चाहिए, क्योंकि ड्रोन युद्ध के अनुकूल ढल सकने वाले एक चुस्त दुश्मन से उसका सामना हो रहा था. नतीजतन, मॉस्को ने अपना ध्यान कम लागत वाले ड्रोनों पर लगाना शुरू कर दिया, जिसके नुक़सान से उसे बहुत ज़्यादा आर्थिक हानि नहीं होनी थी.
ड्रोन गिरने से हो रहे नुकसान, बढ़ रहे ख़र्च और शस्त्रागार में सटीक-निर्देशित मिसाइलों की कमी के कारण रूस ने ईरानी शाहेद ड्रोनों का उपयोग करना शुरू किया. शाहेद आत्मघाती ड्रोन है, जो दुश्मन के इलाके में काफ़ी अंदर तक हमला करने में सक्षम है. यह ड्रोन एक तरह से उड़ने वाला हथियार है, जो हमला करने से पहले अपने लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर मंडरा सकता है. ईरान के शाहेद-131 और शाहेद-136 को घरेलू स्तर पर गेरान-1 और गेरान-2 के रूप में तैयार किया गया. जैसे-जैसे मध्यम-ऊंचाई वाले लंबी अवधि वाले (MALE) ड्रोन अपनी निहित ख़ामियों के कारण अपना महत्व खोते गए, इन कम लागत वाले ड्रोनों (जिन पर क़रीब 20,000 अमेरिकी डॉलर का ख़र्च आता है) ने कम ख़र्चीले हमले की राह तैयार की. हमला करने के लिए शाहेद ड्रोनों को समन्वित रूप से एक साथ लॉन्च किया गया, जिससे यूक्रेनी वायु रक्षा प्रणाली क़रीब-क़रीब चरमरा गई और महंगे ज़वाबी उपाय अपनाने के लिए उसे मजबूर होना पड़ा. इन ड्रोनों का इस्तेमाल यूक्रेन के महत्वपूर्ण ठिकानों व बुनियादी ढांचों पर हमला करने के लिए भी किया गया. यह रूस की युद्ध नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत था, क्योंकि अब वह टोही ड्रोन के बजाय बड़े पैमाने पर हमला करने में सक्षम ड्रोन की ओर बढ़ चला था.
“2023 तक रूस का ड्रोन युद्ध फिर से संतुलित हो गया था और फ़र्स्ट पर्सन व्यू FPV ड्रोन की शुरुआत होने के साथ-साथ वह एक नए दौर में प्रवेश कर गया था.”
2023 तक रूस का ड्रोन युद्ध फिर से संतुलित हो गया था और फ़र्स्ट पर्सन व्यू FPV ड्रोन की शुरुआत होने के साथ-साथ वह एक नए दौर में प्रवेश कर गया था. FPV ड्रोन पर कैमरे लगे होते हैं, जिससे वह लाइव वीडियो का प्रसारण करता है. इससे ज़मीन पर काम कर रहे ऑपरेटर को फ़र्स्ट पर्सन POV, यानी लक्ष्यों को सीधे देखने का मौका मिलता है. FPV ने युद्ध क्षेत्र में निगरानी के एक नए स्तर की शुरुआत की और हर जगह पहुंच सकने का एहसास दिलाया. हालांकि, शुरुआत में इनको पैदल सेना को सहायता देने, माइन गिराने जैसे ISR उद्देश्यों के लिए तैनात किया गया था, लेकिन बाद में इन ड्रोनों का इस्तेमाल विस्फोटक पेलोड गिराने के लिए किया जाने लगा. चूंकि रूस के उद्योगों ने इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर दिया, इसलिए इससे मॉस्को को काफ़ी मज़बूती मिली. युद्ध में कार्रवाई के लिहाज से रूस ने बदलाव करते हुए ड्रोन हमले करने वाली एक यूनिट बनाई, जिससे एक संगठित ड्रोन परिस्थिति तैयार हुई, जो विभिन्न क्षेत्रों में तुरंत शामिल हो सकने में सक्षम थी. लड़ाकू ड्रोनों के उत्पादन और विकास को प्राथमिकता दी गई, जिस कारण रूस ने स्वदेशी लैंसेट और KUB LA ड्रोनों के उत्पादन को तेज़ी से आगे बढ़ाया और अलबुगा विशेष आर्थिक क्षेत्र में शाहेद ड्रोनों का स्थानीय स्तर पर उत्पादन शुरू कर दिया.
युद्ध के तीसरे वर्ष तक, ड्रोनों को एआई तकनीकों से लैस किया जाने लगा. यूक्रेन ने चूंकि अपनी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं में सुधार किए थे, इसलिए रूस को अधिक स्मार्ट, एआई संचालित ड्रोन विकसित करने के लिए आगे बढ़ना पड़ा, जो वायु रक्षा प्रणाली को चकमा दे सकते थे और लक्ष्य को कहीं अधिक सटीक तरीके से पहचान कर सकने में सक्षम थे. यह अर्द्ध-स्वायत्त और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के रूप में ड्रोन युद्ध की ओर बढ़ने का स्पष्ट संकेत था. साल 2024 तक रूसी UAV ने ISR की परिभाषा पूरी तरह से बदल दी, क्योंकि उसकी दृश्यता और रेंज में काफ़ी सुधार हुआ था. मॉस्को ने रेडियो डिटेक्टरों से लैस सुपरकैम टोही ड्रोन का उत्पादन भी शुरू कर दिया, जो ख़तरों को भांपकर बचाव की कार्रवाई कर सकने में सक्षम होते हैं. इतना ही नहीं, तकनीक को उन्नत बनाते हुए ड्रोनों में जैमर और मशीन-विज़न कैमरे भी लगाए गए.
“ड्रोन युद्ध अब रूस के सैन्य सिद्धांत में पूरी तरह से शामिल हो गया है.”
ड्रोन युद्ध अब रूस के सैन्य सिद्धांत में पूरी तरह से शामिल हो गया है. मॉस्को ने इसके लिए एक ख़ास विभाग बनाया है, जो इस बात पर नज़र बनाए रखता है कि ड्रोन का किस तरह युद्ध में इस्तेमाल किया जाए. यह सब विशिष्ट ड्रोन इकाई रूबिकॉन आदि के गठन के बाद हुआ है, जो यूक्रेन द्वारा रूसी क्षेत्र कुर्स्क में किए गए सैन्य अभियान के ज़वाब में मॉस्को द्वारा की गई कार्रवाई में ख़ासा महत्वपूर्ण साबित हुई थी. सामरिक रूप से, रूस अब पहली पंक्ति तक यूक्रेनी आपूर्ति को बाधित करने की सोच रहा है. मॉस्को ने यूक्रेन के भीतर 40 किलोमीटर का एक इंटरडिक्शन जोन (निषेध क्षेत्र) बना लिया है, जिससे यूक्रेनी सैनिकों को पर्याप्त मात्रा में रसद नहीं मिल पा रही है. वह इसलिए इस तरह का क्षेत्र बनाने में सफल हो रहा है, क्योंकि वह अब बड़े पैमाने पर हमले कर रहा है और लगभग 700 ड्रोन हर हमले में भेज रहा है, वह भी FPV ड्रोन.
साफ है, साधारण टोही ड्रोन से लेकर AI से चलने वाले स्ट्राइक सिस्टम, FPV ड्रोन स्वार्म्स तक का सफर रूस ने इस युद्ध में पूरा किया है. इतना ही नहीं, लगातार गोलीबारी और बड़े पैमाने पर संसाधनों का इस्तेमाल करना यही बताता है कि कैसे आज की युद्ध-कला किफायती, स्केलेबल और स्वायत्त तकनीकों में ढलने लगी है. यह युद्ध अब अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. ऐसे में, रूस की ड्रोन नीति उस गति का संकेत है, जिस तेज़ी से इंसानी सेनाओं को मानवरहित और एट्रिशनल युद्ध (दुश्मन के संसाधनों को ख़त्म करना और उनका मनोबल तोड़ना) वाले दौर में खुद को तैयार करना है.
(कार्तिक बोम्माकांति ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में वरिष्ठ फेलो हैं)
(मोहम्मद मुस्ताफ़ा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं)
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Kartik is a Senior Fellow with the Strategic Studies Programme. He is currently working on issues related to land warfare and armies, especially the India ...
Read More +
Mohammad Mustafa is a Research Intern at the Observer Research Foundation. ...
Read More +