Author : Chaitanya Giri

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Published on Apr 09, 2026 Updated 5 Days ago

पूर्वोत्तर के जंगल अब हाई-टेक युद्धक्षेत्र बनते जा रहे हैं जहाँ ड्रोन और सैटेलाइट तकनीक संघर्ष का नया चेहरा हैं. हाल ही में राष्ट्रीय जांच एजेंसी की कार्रवाई में सात विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी ने उजागर किया कि विद्रोही समूहों को आधुनिक तकनीकी समर्थन मिल रहा है, जिसके जवाब में भारतीय सशस्त्र बल अपनी एंटी-ड्रोन और निगरानी क्षमताएँ तेजी से मजबूत कर रहे हैं- जानिए कैसे.

आसमान से नजर, जंगल में जंग: पूर्वोत्तर में नया खतरा

हाल के एक घटनाक्रम में, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने सात विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया, जिनमें एक संयुक्त राज्य अमेरिका का नागरिक और छह यूक्रेन के नागरिक शामिल हैं. इन पर भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों में साजिश रचने और सहयोग करने का आरोप है. इन्हें गैरकानूनी गतिविधियां अधिनियम की धारा 18 के तहत पकड़ा गया. NIA के अनुसार, ये लोग यूरोप से अवैध रूप से ड्रोन मंगाकर उन्हें म्यांमार और भारत के मिजोरम में सक्रिय सशस्त्र समूहों को देने, साथ ही हथियार, लॉजिस्टिक सहायता और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने में शामिल थे. यह गिरफ्तारी एक बड़ी आतंकवाद-रोधी कार्रवाई है, साथ ही भारतीय सशस्त्र बलों ने पूर्वोत्तर और सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी सिग्नल इंटेलिजेंस और एंटी-ड्रोन क्षमताएँ भी बढ़ाई हैं.

जंगल युद्ध और बढ़ता ड्रोन युद्धक्षेत्र

जंगलों में युद्ध-चाहे समशीतोष्ण, पतझड़ी, उष्णकटिबंधीय वर्षावन या तटीय दलदली क्षेत्र हों, भारत की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. जैसे-जैसे भारतीय सशस्त्र बल एकीकृत थिएटर कमांड की ओर बढ़ रहे हैं, दोनों प्रस्तावित लैंड कमांड्स को जंगल क्षेत्रों में संचालन के लिए तैयार रहना होगा. यहाँ दो बड़ी चुनौतियां हैं. पहली, पारंपरिक सेनाओं के साथ तालमेल और संतुलन बनाना; दूसरी, प्रॉक्सी के रूप में छिपे समूहों, आतंकवादी और विद्रोही संगठनों को मिल रही तकनीकी मदद और बाहरी शक्तियों के समर्थन से निपटना. इन चुनौतियों का मुकाबला करना भारतीय ड्रोन बलों के लिए अहम होगा, जिसकी घोषणा एकीकृत रक्षा स्टाफ द्वारा जारी ‘डिफेंस फोर्सेज विजन 47‘ में की गई है.

ड्रोन तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है ताकि जैमिंग, स्पूफिंग और नेटवर्क की कमी जैसी समस्याओं को दूर किया जा सके. खासकर घने जंगलों में कनेक्टिविटी बड़ी चुनौती होती है, जहाँ सामान्य ड्रोन ठीक से काम नहीं कर पाते. ऐसे में ‘टेदर्ड ड्रोन’ एक बेहतर समाधान बनकर सामने आए हैं

भारतीय सशस्त्र बल अब एंटी-ड्रोन तकनीकों की एक व्यापक श्रृंखला का उपयोग कर रहे हैं. सॉफ्ट-किल तरीकों में सैटेलाइट नेविगेशन और रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नल को जाम और स्पूफ करना शामिल है. हार्ड-किल तकनीकों में 30–300 किलोवाट तक की डायरेक्टेड-एनर्जी हथियार शामिल हैं, जो 3–20 किमी तक ड्रोन को निशाना बना सकते हैं. स्वॉर्म ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन को रोकने के लिए काइनेटिक इंटरसेप्शन का भी उपयोग किया जा रहा है. SAKSHAM, Akashteer और D4 System जैसे सिस्टम सेंसर, थर्मल इमेजिंग, नाविक, रडार और इन्फ्रारेड ट्रैकिंग के जरिए काम करते हैं और सॉफ्ट व हार्ड दोनों विकल्पों का उपयोग करते हैं. सीमा क्षेत्रों में अब एंटी-ड्रोन वाहनों में जैमर, मल्टी-गन सिस्टम और नेट-आधारित इंटरसेप्शन भी शामिल हैं.

यूक्रेन से मिले ऑपरेशनल सबक

2022 के बाद, इंडो-दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में रुचि रखने वाली बाहरी शक्तियाँ यूक्रेन के युद्धक्षेत्र से सीखे गए अनुभव, प्रशिक्षित ऑपरेटिव और उन्नत हथियार तकनीक लेकर आई हैं. उनका उद्देश्य इस क्षेत्र को एक ‘पैनॉप्टिकॉन’-यानी निगरानी केंद्र-बनाना है. ड्रोन तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है ताकि जैमिंग, स्पूफिंग और नेटवर्क की कमी जैसी समस्याओं को दूर किया जा सके. खासकर घने जंगलों में कनेक्टिविटी बड़ी चुनौती होती है, जहाँ सामान्य ड्रोन ठीक से काम नहीं कर पाते. ऐसे में ‘टेदर्ड ड्रोन’ एक बेहतर समाधान बनकर सामने आए हैं. ये केबल के जरिए जुड़े होते हैं, जिससे सिग्नल मजबूत रहता है. साथ ही, ड्रोन और स्पेस तकनीक के मेल में स्टारलिंक जैसी सेवाएँ अहम भूमिका निभा रही हैं, जो कनेक्टिविटी को और मजबूत बनाती हैं.

उदाहरण के तौर पर, यूक्रेन के कुपियान्स्क–क्रेमिन्ना सेक्टर के सेरेब्रियांस्की जंगल में ऑप्टिकल-फाइबर (टेदर्ड) ड्रोन का सफल उपयोग हुआ, जो सामान्य ड्रोन की तुलना में अधिक प्रभावी साबित हुए. ये ड्रोन RF हस्तक्षेप से सुरक्षित रहते हैं क्योंकि उनका सीधा कनेक्शन स्टारलिंक टर्मिनल से होता है. टेदर्ड ड्रोन का उपयोग South America के अपराध-प्रभावित जंगलों, सोमालिया और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में आतंकवाद-रोधी अभियानों तथा म्यांमारr के आंतरिक संघर्ष में किया गया है. म्यांमार में इन्हें जंगल की ऊपरी परत (कैनोपी) पर तैनात किया जाता है, जहाँ ये थर्मल संकेतों के आधार पर सैनिक गतिविधियों का पता लगाते हैं और लगातार निगरानी (ISR) करते हैं. ये वाहन की बैटरी से चलते हैं और ऊपर की ऊँचाई पर सिग्नल बेहतर तरीके से मिलते हैं.

यह 20–40 वॉट बिजली में चलता है, जबकि पुराने टर्मिनल 75–100 वॉट लेते हैं. इसे साधारण पावर बैंक या DC आउटपुट से चलाया जा सकता है. यह तेज डेटा स्पीड, AI तकनीक और तेज सेटअप के साथ ISR ऑपरेशन को और प्रभावी बनाता है.

टेदर्ड ड्रोन सिग्नल लॉस के मामले में सामान्य (अनटेदर्ड) ड्रोन से बेहतर होते हैं. ये 24 घंटे से अधिक समय तक उड़ सकते हैं, ज्यादा वजन उठा सकते हैं और जरूरत के अनुसार लगातार काम कर सकते हैं. साथ ही, ये जंगल में चुपचाप काम करते हैं. इनका मुख्य जोखिम केवल पेड़ों में फँसने का होता है, जिसे केबल-डिटैचमेंट तकनीक से कम किया जा रहा है.

हाल ही में स्टारलिंक का छोटा संस्करण स्टारलिंक मिनी विकसित किया गया है, जिसे ड्रोन पर लगाया जा सकता है. यह 20–40 वॉट बिजली में चलता है, जबकि पुराने टर्मिनल 75–100 वॉट लेते हैं. इसे साधारण पावर बैंक या DC आउटपुट से चलाया जा सकता है. यह तेज डेटा स्पीड, AI तकनीक और तेज सेटअप के साथ ISR ऑपरेशन को और प्रभावी बनाता है.

स्टारलिंक, विद्रोह और उभरता निगरानी तंत्र  

स्टारलिंक म्यांमार में बिना आधिकारिक लाइसेंस के काम कर रहा है, जो उसके अपने नियमों के खिलाफ है. आमतौर पर ऐसी सेवाओं को किसी देश में काम करने के लिए सरकारी अनुमति लेनी होती है, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं हुआ है. इसके साथ ही, स्टारलिंक सख्त जियो-फेंसिंग भी लागू नहीं करता, यानी यह यह तय नहीं करता कि उसकी सेवा किन क्षेत्रों में सीमित रहे. इसका फायदा यह होता है कि जहाँ सरकार का नियंत्रण कम है, वहाँ भी इसकी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा आसानी से इस्तेमाल की जा सकती है.

भारत के पूर्वी थिएटर कमांड और ड्रोन बलों को अपनी सीमाओं पर ऐसे हालात के लिए तैयार रहना होगा, जहाँ विद्रोही और आतंकी समूह आधुनिक ड्रोन और स्पेस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं.

इसी वजह से, बाहरी समर्थन पाने वाले जातीय सशस्त्र समूह और विद्रोही संगठन इस कनेक्टिविटी का उपयोग कर रहे हैं. इससे उन्हें बेहतर संचार, समन्वय और संचालन में मदद मिलती है. ऐसे हालात में यह तकनीक केवल इंटरनेट सेवा नहीं रह जाती, बल्कि संघर्ष क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साधन बन जाती है. हाल के वर्षों में, स्टारलिंक टर्मिनल थाईलैंड और बांग्लादेश के रास्ते तस्करी कर म्यांमार लाए गए हैं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क और आतंकी समूह शामिल रहे हैं.

अराकान सेना, जो अब रखाइन राज्य के बड़े हिस्से को नियंत्रित करता है, इन टर्मिनलों को टैक्स के रूप में देखता है-यानी यह विद्रोही शासन द्वारा दी जा रही एक सेवा बन गई है, जो सरकारी टेलीकॉम व्यवस्था से अलग है. इससे धीरे-धीरे स्वतंत्र सैटेलाइट संचार व्यवस्था विकसित हो रही है, खासकर उन इलाकों में जो सरकार के नियंत्रण से बाहर हैं और जहाँ बाहरी समर्थन मौजूद है.

इस तरह के ‘निगरानी तंत्र’ (पैनॉप्टिकॉन) के उभरने से भारत के लिए जरूरी हो जाता है कि वह आतंकवाद-रोधी, विद्रोह-रोधी और जंगल युद्ध की तैयारी को और मजबूत करे. भारत के पूर्वी थिएटर कमांड और ड्रोन बलों को अपनी सीमाओं पर ऐसे हालात के लिए तैयार रहना होगा, जहाँ विद्रोही और आतंकी समूह आधुनिक ड्रोन और स्पेस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं.


चैतन्य गिरि ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, स्ट्रेटेजी एंड टेक्नोलॉजी में फेलो हैं.
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Chaitanya Giri

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Dr. Chaitanya Giri is a Fellow at ORF’s Centre for Security, Strategy and Technology. His work focuses on India’s space ecosystem and its interlinkages with ...

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