Author : Sauradeep Bag

Published on Jul 11, 2025 Updated 0 Hours ago

एक तरफ अमेरिका डॉलर के वैश्विक दबदबे को मज़बूत करने के लिए स्टेबलकॉइन्स को बढ़ावा दे रहा है, वहीं दूसरी ओर यूरोप अपनी मौद्रिक संप्रभुता की रक्षा के लिए डिजिटल यूरो पर ज़बरदस्त तरीक़े से ध्यान केंद्रित कर रहा है. इस होड़ से पता चलता है कि आने वाले दिनों में डिजिटल करेंसी को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव किस कदर बढ़ने वाला है.

डिजिटल यूरो और स्टेबलकॉइन्स: अमेरिका और यूरोप के बीच खुला एक नया आर्थिक मोर्चा!

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यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) की अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड ने एक बार फिर ज़ल्द से ज़ल्द डिजिटल यूरो को लॉन्च करने पर ज़ोर देते हुए यूरोपीय संसद से इस दिशा में तत्काल क़दम उठाने और क़ानून पास करने का आग्रह किया है. क्रिस्टीन लेगार्ड का यह बयान तब आया है, जब पूरी दुनिया में भू-राजनीतिक उथल-पुथल तेज़ होती जा रही है और अमेरिका अपना दबदबा क़ायम करने के लिए लगातार हाथ-पैर मार रहा है. ज़ाहिर है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के स्टेबलकॉइन्स के समर्थन वाले कार्यकारी आदेश के बाद लेगार्ड का यह आह्वान काफ़ी अहम हो जाता है. लेगार्ड के मुताबिक़ सेटबलकॉइन्स से यूरोपीय संघ (EU) की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है और EU की मौद्रिक संप्रभुता भी संकट में पड़ सकती है.

यूरोपीय संघ के चुनाव पिछले साल हुए थे और तब डिजिटल यूरो से जुड़े विधेयक को पारित करने को लेकर वहां ज़्यादा कुछ विवाद नहीं था. लेकिन जैसे-जैसे वहां की राजनीति बदलती गई, तो डिजिटल यूरो का मुद्दा भी काफ़ी पेचीदा होता चला गया. डिजिटल यूरो को लेकर यूरोपीय देशों में एकमत नहीं होने की वजह से इससे जुड़े विधेयक को यूरोपीय संसद की समिति के समक्ष भेज दिया गया था और तब से यह विधेयक वहीं फंसा हुआ है. कुल मिलाकर फिलहाल डिजिटल यूरो को लेकर यूरोपीय संघ में कोई ज़ल्दबाज़ी या सक्रियता नहीं दिखाई दे रही है, जिस वजह से इस महत्वपूर्ण वक़्त में इसके लागू होने में और देरी होने की आशंका पैदा हो गई है.

डिजिटल यूरो का भविष्य

यूरोपीय सेंट्रल बैंक की अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड ने इस बात को लेकर भी अपनी चिंता ज़ाहिर है कि बैंकों में जो भी धनराशि जमा है उसे संभावित रूप से लोग व्यापक स्तर पर स्टेबलकॉइन्स में स्थानांतरित कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि इससे सिर्फ़ तकनीक़ी दिक़्क़तें ही पैदा नहीं होंगी, बल्कि इससे भी ज़्यादा बड़ी परेशानियां सामने आएंगी और यह यूरोपीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय तंत्र की नींव भी हिला सकता है. उनका कहना है कि इस तरह के परिवर्तन से मौद्रिक नीति की संचरण प्रक्रिया पर असर पड़ेगा, क्योंकि केंद्रीय बैंक द्वारा लिए गए मौद्रिक नीतिगत निर्णयों का प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और इसी से निर्धारित होता है कि ब्याज दर क्या होगी, मुद्रास्फ़ीति कितनी होगी. यानी इस बदलाव से कहीं न कहीं केंद्रीय बैंक को आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में भी परेशानी झेलनी पड़ेगी. इसके अलावा, लेगार्ड ने वित्तीय बाज़ारों में नवाचार की भूमिका को माना और मौद्रिक संप्रभुता यानी मुद्रा जारी करने और उसे नियंत्रित करने की क्षमता को बरक़रार रखने के लिए सशक्त विनियामक तंत्र के महत्व पर भी बल दिया. इस लिहाज़ से देखा जाए तो यूरोपियन यूनियन का मार्केट्स इन क्रिप्टो-एसेट्स रेगुलेशन (MiCA) बेहद कारगर हैं और यह निर्धारित करता है कि यूरोपीय संघ के भीतर विदेशी स्टेबलकॉइन्स का कितना फैलाव होगा और किस सीमा तक प्रभाव होगा. लेगार्ड ने कहा कि ईयू का MiCA क़ानून यूरोज़ोन की मौद्रिक अखंडता यानी यूरोपीय संघ की मुद्रा को संरक्षण प्रदान करने का शुरुआती सुरक्षा कवच है, जिसमें डिजिटल यूरो को एक सहयोगी उपकरण या साधन के रूप में पेश किया गया है, ताकि विदेशी मुद्रा के दबाव के सामने ईयू की वित्तीय संप्रभुता को सुनिश्चित किया जा सके.

लेगार्ड के मुताबिक़ सेटबलकॉइन्स से यूरोपीय संघ (EU) की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है और EU की मौद्रिक संप्रभुता भी संकट में पड़ सकती है.

डिजिटल यूरो के बारे में लोगों की राय से यह पता चलता है कि वास्तव में वित्तीय लेनदेन के दौरान वे किन बातों को तवज्जो देते हैं और क्या चाहते हैं. YouGov की ओर से हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ ऐसे देशों में जहां परंपरागत रूप से नकद लेनदेन को प्रमुखता दी जाती है, वहां भी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) के लिए लोगों का समर्थन अभूतपूर्व तरीक़े से बढ़ रहा है. इस विरोधाभास से ज़ाहिर होता है कि बहुत से लोग CBDC को ग़लत नहीं मानते हैं, बल्कि आज के दौर के हिसाब से उसे वित्तीय भुगतान का एक बेहतर विकल्प मानते हैं. सर्वेक्षण में यह भी सामने आया है कि ऑनलाइन शॉपिंग के दौरान डिजिटल यूरो प्राथमिक विकल्प बनकर उभरा है, यानी इसका इस्तेमाल सबसे अधिक हो रहा है. जबकि स्टोर्स या दुकानों से ख़रीदारी के दौरान भी डिजिटल यूरो के उपयोग में बढ़ोतरी हुई है और ऑनलाइन शॉपिंग की तुलना में बस थोड़ा ही पीछे हैं. यह दिखाता है कि डिजिटल यूरो के उपयोग को लेकर लोगों की सोच और व्यवहार में व्यापक परिवर्तन आ रहा है. जिस प्रकार से भू-राजनीति में दबदबा रखने वाले देश और उत्पादन व वितरण जैसी तमाम आर्थिक गतिविधियों में प्रौद्योगिकी के उपयोग में महारत रखने वाली ताक़तें आपस में एकजुट हो रही हैं, उनमें डिजिटल यूरो का भविष्य कई बातों पर निर्भर करेगा. यानी डिजिटल यूरो के भविष्य के निर्धारण में न सिर्फ़ तकनीक़ी इंफ्रास्ट्रक्चर अपनी अहम भूमिका निभाएगा, बल्कि इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की मज़बूती भी बेहद महत्वपूर्ण होगी. इसके साथ ही आम लोगों के स्तर पर इसे कितना समर्थन मिलता है, इससे भी डिजिटल यूरो का भविष्य तय होगा.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डिजिटल वित्तीय प्रौद्योगिकी में अमेरिकी नेतृत्व को मज़बूत करने के बारे में जो कार्यकारी आदेश जारी किया है, उसके एक प्रावधान में "अमेरिकी डॉलर की संप्रभुता को बढ़ावा देने और उसकी रक्षा करने" की रणनीतिक प्राथमिकता को ख़ासी तवज्जो दी गई है. विशेष रूप से इसमें वैश्विक स्तर पर डॉलर-समर्थित स्टेबलकॉइन्स को आगे बढ़ाने की बात कही गई है और उसके लिए क़ानूनी क़दम उठाने की बात भी कही गई है. यूरोपीय सेंट्रल बैंक के कार्यकारी बोर्ड के सदस्य पिएरो सिपोलोन ने इसके जवाब में CBDC के रूप में डिजिटल यूरो को विकसित करने और बगैर समय गंवाए उसे कार्यान्वित करने पर ज़ोर दिया है. उन्होंने यह भी कहा है कि यूरोपीय संसद के नीति निर्माताओं को डिजिटल यूरो से जुड़े विधेयक को ज़ल्द पारित करने के लिए क़दम उठाने चाहिए. सिपोलोन ने यह भी कहा है कि जिस प्रकार से अमेरिकी डॉलर पर आधारित डिजिटल करेंसी स्टेबलकॉइन्स की पूरी दुनिया में धाक बढ़ती जा रही है, वह कहीं न कहीं यूरो की मौद्रिक संप्रभुता के सामने एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है. इस चुनौती ने साबित किया है कि वर्तमान में यूरोपीय देशों को अपनी एक मज़बूत यूरोपीय डिजिटल करेंसी की सख्त ज़रूरत है. यानी मौज़ूदा वैश्वित वित्तीय वातावरण में एक ऐसी यूरोपीय डिजिटल करेंसी की आवश्यकता है, जो न केवल यूरोज़ोन की स्वायत्तता को संरक्षित करने में सक्षम हो, बल्कि बाहरी डिजिटल मुद्राओं के सामने एक रणनीतिक उपकरण बन सके.

तेज़ी से बदलता घटनाक्रम

हाल ही में यूरोपीय संघ के वित्त मंत्रियों की बैठक हुई थी. इस बैठक के बाद यूरोग्रुप के अध्यक्ष पास्कल डोनोहो ने डिजिटल यूरो यानी यूरोपीय संघ के प्रस्तावित CBDC से जुड़ी क़ानूनी कोशिशों को फिर से शुरू करने और उन्हें गति देने का ऐलान किया था. ज़ाहिर है कि वर्ष 2024 में यूरोपीय संसद के चुनावों की वजह से डिजिटल यूरो से संबंधित विधेयक को पारित कराने की कोशिशों में देरी हुई थी.

YouGov की ओर से हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ ऐसे देशों में जहां परंपरागत रूप से नकद लेनदेन को प्रमुखता दी जाती है, वहां भी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) के लिए लोगों का समर्थन अभूतपूर्व तरीक़े से बढ़ रहा है. इस विरोधाभास से ज़ाहिर होता है कि बहुत से लोग CBDC को ग़लत नहीं मानते हैं, बल्कि आज के दौर के हिसाब से उसे वित्तीय भुगतान का एक बेहतर विकल्प मानते हैं.

देखा जाए तो डिजिटल यूरो को लाने के पीछे यूरोपियन सेंट्रल बैंक की मंशा एक ऐसी डिजिटल करेंसी को अमल में लाने की थी, जिसका रिटेल यानी खुदरा दुकानों और स्टोर्स में धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाए और आम लोगों को एक सुरक्षित व सुगम डिजिटल मुद्रा का विकल्प मिल सके. इसके साथ ही, संस्थागत वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूती देने और उसके विस्तार के मकसद से होलसेल CBDC (wCBDC) के विकास में भी दिलचस्पी बढ़ रही है. ख़ास तौर पर बैंकों के बीच निपटान यानी भुगतान के सेटेलमेंट और सीमा पार लेनदेन में सुगमता के लिए भी थोक सीबीडीसी को फायदेमंद बताया जा रहा है. ECB और 64 वित्तीय संस्थानों के एक संघ ने वर्ष 2024 में होलसेल सेटेलमेंट प्रक्रियाओं के लिए डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी (DLT) की व्यवहारिकता को परखने के लिए कई क़दम उठाए थे और इसे गहराई से जांचा गया था. इन परीक्षणओं के बाद जो चीज़ें सामने आई थीं, उन्हीं के आधार पर वर्ष 2025 की शुरुआत में ECB ने थोक निपटान की सुविधा के लिए एक अंतरिम फ्रेमवर्क शुरू करने का ऐलान किया था. इसका रणनीतिक मकसद दीर्घकाल में निर्बाध रूप से चलने वाले होलसेल CBDC को लागू करना है.

हाल ही में जो भी भू-राजनीतिक घटनाएं हुई हैं, उनके मद्देनज़र अब डिजिटल यूरो को वास्तविकता बनाने में देरी नहीं होनी चाहिए, यानी इसे तत्काल लागू किए जाने की ज़रूरत है. ऐसा करना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि ट्रंप प्रशासन की ओर से अमेरिका डॉलर पर आधारित क्रिप्टोकरेंसी स्टेबलकॉइन्स को वैश्विक स्तर पर अपनाने और फैलाने पर ख़ासा ज़ोर दिया जा रहा है और इसके ज़रिए कहीं न कहीं अमेरिकी डॉलर के वैश्विक दबदबे को मज़बूती के साथ स्थापित करने की कोशिश की जा रही है. ऐसे में डिजिटल यूरो को लेकर यूरोपीय संसद में जो भी रुकावटें उन्हें तत्काल दूर करना बेहद आवश्यक हो गया है. डिजिटल यूरो को तकनीक़ी आधुनिकीकरण के मकसद से लागू करने से भी ज़्यादा बड़ी बात यह है कि रणनीतिक तौर पर इस पहल को ज़ल्द से ज़ल्द पूरा किया जाए. दुनिया में आर्थिक मोर्चेबंदी तेज़ी से बढ़ रही है और ऐसे में यूरोपीय संघ की मौद्रिक और वित्तीय स्वतंत्रता को सशक्त करने के लिहाज़ से भी डिजिटल यूरो की पहल को मज़बूती से आगे बढ़ाना बेहद आवश्यक है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से अप्रैल 2025 में नए टैरिफ लगाए जाने के बाद से यूरोपीय संघ में घरेलू स्तर पर संचालित डिजिटल भुगतान प्रणालियों को विकसित करने के उसके इरादों को मज़बूती मिली है, जिससे तीसरे देश के पेमेंट प्लेटफॉर्म पर उसकी निर्भरता कम हो गई है. कुल मिलाकर धीरे-धीरे डिजिटल यूरो को न केवल यूरोपीय संघ की आर्थिक संप्रभुता की रक्षा के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह पेश किया जा रहा है, बल्कि इसे वैश्विक वित्तीय प्रणाली में ईयू की स्थिति को मज़बूत करने के लिए एक सक्रीय वित्तीय साधन के रूप में भी प्रस्तुत किया जा रहा है.

यूरोपीय संघ का जो मार्केट इन क्रिप्टो एसेट्स रेगुलेशन (MiCA) है, वो विदेशी डिजिटल मुद्राओं को रोकने का काम करता है. इस क़ानून के तहत जहां विदेशी क्रिप्टोकरेंसी और स्टेबलकॉइन्स को जारी करने और उनके प्रसार पर प्रतिबंध का प्रावधान है, वहीं मौद्रिक संप्रभुता पर ख़तरा पैदा होने पर नियामक अधिकारियों को दख़ल देने का अधिकार भी मिलता है. इन ख़तरों में सबसे प्रमुख यूरोप के बाहर की कंपनियों ख़ास तौर पर वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी कंपनियों पर यूरोप के रिटेल पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर की निर्भरता है. ECB के मुताबिक़ रिटेल पेमेंट में वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी फर्मों पर अत्यधिक निर्भरता यूरोप की वित्तीय स्वायत्तता के लिए एक गंभीर रणनीतिक ख़तरा है.

अमेरिकी नज़रिया

ट्रम्प प्रशासन ने रणनीति के तहत काफ़ी सोच-समझ कर स्टेबलकॉइन्स की शुरुआत की है. इतना ही नहीं इसे सरकारी-निजी सहयोग वाले वित्तीय उपकरण के तौर पर पेश किया गया है. अमेरिकी स्टेबलकॉइन्स न केवल वित्तीय नवाचार को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं, बल्कि साथ ही साथ अमेरिकी डॉलर की वैश्विक भूमिका को भी सशक्त करने की ताक़त रखते हैं. यूरोपियन यूनियन ने स्टेबलकॉइन्स को अपनी वित्तीय प्रणाली के लिए बड़ा ख़तरा माना है और इसको लेकर बेहद सतर्क रुख़ अख़्तियार किया है. ख़ास तौर पर ईयू ने अपनी मौद्रिक संप्रभुता और नियामक जवाबदेही के लिहाज़ से स्टेबलकॉइन्स को बेहद ख़तरनाक माना है. ECB की ओर से डिजिटल यूरो को ज़ल्द से ज़ल्द हक़ीक़त बनाने की जो कोशिशों की जा रही हैं, उनके पीछे यह सोच एक मुख्य कारण है.

अब डिजिटल यूरो को वास्तविकता बनाने में देरी नहीं होनी चाहिए, यानी इसे तत्काल लागू किए जाने की ज़रूरत है. ऐसा करना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि ट्रंप प्रशासन की ओर से अमेरिका डॉलर पर आधारित क्रिप्टोकरेंसी स्टेबलकॉइन्स को वैश्विक स्तर पर अपनाने और फैलाने पर ख़ासा ज़ोर दिया जा रहा है और इसके ज़रिए कहीं न कहीं अमेरिकी डॉलर के वैश्विक दबदबे को मज़बूती के साथ स्थापित करने की कोशिश की जा रही है.

यूरोपीय सेंट्रल बैंक के लिए डिजिटल यूरो न केवल वित्तीय लेनदेन के क्षेत्र में हो रहे तकनीक़ी विकास में उसकी अपनी सशक्त दावेदारी है, बल्कि यूरोप में रिटेल पेमेंट्स यानी खुदरा भुगतान में अपना प्रभुत्व जमाने के मकसद से उठाया गया एक नीतिगत क़दम भी है. उम्मीद है कि जब डिजिटल यूरो को यूरोपीय बाज़ारों में लागू कर दिया जाएगा, तो वहां रिटेल स्टोर्स पर रोज़मर्रा के लेनदेन में इस्तेमाल किए जाने वाले निजी सेक्टर के स्टेबलकॉइन्स का उपयोग कम से कम होगा. ज़ाहिर है कि ईसीबी डिजिटल यूरो को सरकारी-निजी भागीदारी के रूप में भी देखता है, जो कि दूसरी डिजिटल करेंसी की तुलना में एक अहम संस्थागत अंतर है. इसके अलावा, डिजिटल यूरो में वाणिज्यिक बैंकों की भागीदारी को संभावित रूप से अनिवार्य किया जाएगा, यानी ये डिजिटल करेंसी बाज़ार द्वारा संचालित नहीं होगी. यह दिखाता है कि यूरोपीय संघ में डिजिटल यूरो के रूप में जो डिजिटल वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किए जाने की कोशिश की जा रही है, वो अपेक्षाकृत ज़्यादा केंद्रीकृत होगी, यानी सरकारी नियंत्रण में होगी. ज़ाहिर है कि ईसीबी का मानना है कि मौद्रिक स्थिरिता और मौद्रिक संप्रभुता को निजी सेक्टर के हवाले नहीं किया जा सकता है.

हाल ही में अमेरिका में हुए घटनाक्रमों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि प्रमुख व्यापारिक गतिविधियों में स्टेबलकॉइन्स का उपयोग तेज़ी से बढ़ा है और लेनदेन में इसका एकीकरण भी तेज़ हुआ है. उदाहरण के तौर पर अमेरिका में ऑनलाइन बिजनेस प्लेटफॉर्म शॉपिफ़ाई ने अपने व्यापारियों को कॉइनबेस और स्ट्राइप के साथ साझेदारी के ज़रिए स्टेबलकॉइन्स में भुगतान स्वीकार करने की मंज़ूरी दी है. इतना ही नहीं, अमेरिका में स्टेबलकॉइन्स के उपयोग को बहुत सरल बनाया गया है. जैसे कि अगर, ऑनलाइन बिजनेस प्लेटफॉर्म पर मौज़ूद व्यापारी अपनी स्थानीय फीएट करेंसी में भुगतान का निपटान करना चाहते हैं, तो उन्हें कोई कार्रवाई करने की ज़रूरत नहीं है, हालांकि अमेरिकी डॉलर में निपटान चाहने वालों के लिए ऐसा नहीं है. इसके अलावा, स्मार्ट अनुबंध-आधारित "ई-कॉमर्स पेमेंट प्रोटोकॉल" का विकास भी इसकी एक विशेषता है. इस पेमेंट प्रोटोकॉल का मकसद ब्लॉकचेन-आधारित फ्रेमवर्क के अंदर परंपरागत दो-चरणों वाली कार्ड भुगतान प्रक्रिया यानी पहले अनुमति और फिर कैप्चर यानी ग्राहक के अकाउंट से मर्चेंट के अकाउंट में पैसों का ट्रांसफर को अपनाना है.

सिर्फ़ इसी ऑनलाइन बिजनेस प्लेटफॉर्म ने स्टेबलकॉइन्स के साथ एकीकरण नहीं किया है, बल्कि वहां एप्पल, Airbnb, गूगल और X समेत तमाम प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियां भी अपनी भुगतान प्रणालियों में स्टेबलकॉइन्स के साथ एकीकरण की संभावनाओं को तलाश रही हैं. कहा जा सकता है कि स्टेबलकॉइन्स के इस्तेमाल की यह कोशिशें भले हीं शुरुआती चरण में हों, लेकिन इनसे व्यापक स्तर पर बदलाव का संकेत ज़रूर मिलता है. कहने का मतलब है कि स्टेबलकॉइन्स को अब एक विशेष वित्तीय साधन के रूप में ही नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे आधुनिक डिजिटल वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर में एक व्यावहारिक विकल्प भी माना जाने लगा है.

देखा जाए तो स्टेबलकॉइन्स और डिजिटल करेंसी के उपयोग को लेकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग दृष्टिकोण है. एक तरफ अमेरिका है, जहां बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां स्टेबलकॉइन्स का खुलकर इस्तेमाल कर रही हैं और इसके लिए अपनी व्यापारिक गतिविधियों में नए-नए तरीक़ों को अपना रही हैं. वहीं दूसरी ओर यूरोपीय संघ है, जो अपनी मौद्रिक संप्रभुता और वित्तीय स्थिरता या कहें कि अर्थव्यवस्था पर इससे पड़ने वाले ख़तरों से निपटने के लिए नियम-क़ानून बनाने पर ही ज़्यादा फोकस कर रहा है. इस तरह के विरोधाभासों से साफ चलता है कि बाज़ार द्वारा संचालित नवाचारों यानी डिजिटल करेंसी के रूपों और सरकार के नियंत्रण वाली डिजिटल वित्तीय प्रणाली के बीच बुनियादी तौर पर कितना अंतर है और कितनी खींचतान है. इससे स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में दोनों नज़रियों के बीच यह अंतर और विरोधाभास ही कहीं न कहीं डिजिटल फाइनेंशियल इकोसिस्टम की गतिशीलता और इससे जुड़े वैश्विक नियामक फ्रेमवर्क की दशा और दिशा तय करेंगे.


सौरादीप बाग ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं

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Sauradeep Bag

Sauradeep Bag

Sauradeep is an Associate Fellow at the Centre for Security, Strategy, and Technology at the Observer Research Foundation. His experience spans the startup ecosystem, impact ...

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