Author : Sohini Bose

Expert Speak Raisina Debates
Published on Feb 05, 2026 Updated 0 Hours ago

बांग्लादेश चीन और अमेरिका के बीच रणनीतिक टकराव के केंद्र में है. पढ़ें कि आगामी चुनाव और भू-राजनीतिक खेल देश की स्वायत्तता और विकास पर कैसे असर डाल सकते हैं.

अमेरिका बनाम चीन: बांग्लादेश कैसे संतुलन बना रहा है

12 फ़रवरी को होने वाले बांग्लादेश के आगामी चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं. देश में तनाव न केवल प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के बीच बल्कि उसके प्रमुख द्विपक्षीय साझेदारों के बीच भी साफ़ महसूस किया जा रहा है. बांग्लादेश में अमेरिकी दूत के रूप में नियुक्त होने के कुछ ही दिनों बाद ब्रेंट क्रिस्टेंसेन ने दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती मौजूदगी और बीजिंग के साथ निकटता बढ़ाने की स्थिति में ढाका को हो सकने वाले जोखिमों पर चिंता जताई. इसके जवाब में बीजिंग ने इन टिप्पणियों को गैर-जिम्मेदाराना और निराधार बताते हुए वाशिंगटन से अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति अधिक सजग रहने और ऐसे कदम उठाने का आग्रह किया जो बांग्लादेश की स्थिरता के अनुकूल हों.

बंगाल की खाड़ी के शीर्ष पर स्थित बांग्लादेश. इस समुद्री क्षेत्र की उन शिपिंग लेनों पर नज़र रखता है जो ऊर्जा और अन्य महत्वपूर्ण संसाधनों के व्यापार के लिए बेहद अहम हैं. इस कारण यह देश इस समुद्र में उपस्थिति बनाए रखने और नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए एक रणनीतिक आधार प्रदान करता है. बांग्लादेश के पास बंगाल की खाड़ी में पर्याप्त हाइड्रोकार्बन भंडार भी हैं. ऐसे भविष्य में जहाँ ऊर्जा संसाधनों को लेकर अनिश्चितता बढ़ती जा रही है. बांग्लादेश की एक रणनीतिक साझेदार के रूप में संभावनाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती हैं. दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक स्थलीय सेतु के रूप में इसकी भौगोलिक स्थिति. इसकी विशाल युवा आबादी और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था ने इसे निवेश के एक आकर्षक गंतव्य के रूप में और मज़बूत किया है. चीन और अमेरिका-दोनों ही-बांग्लादेश के सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय साझेदारों में शामिल हैं और देश के विकास में उनकी गहरी हिस्सेदारी है.

चीन का पश्चिमी समुद्री प्रवेश द्वार

चीन के लिए बांग्लादेश उसके स्थल-रुद्ध पश्चिमी प्रांतों-युन्नान और तिब्बत-तक समुद्री पहुँच प्रदान कर सकता है जिससे बीजिंग अपनी तथाकथित ‘मलक्का दुविधा’ को कम कर सके. यह शब्द 2003 में चीन के पूर्व प्रधानमंत्री हू जिंताओ ने गढ़ा था. जो मलक्का जलडमरूमध्य के प्रति चीन की उस चिंता को दर्शाता है. जहाँ से उसके लगभग 80 प्रतिशत व्यापार-जिसमें ऊर्जा आयात भी शामिल हैं-का प्रवाह होता है. इन आपूर्ति मार्गों की सुरक्षित आवाजाही विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है लेकिन यह संकरा मार्ग राज्य और गैर-राज्य-दोनों ही प्रकार के कारकों से बाधित होने के जोखिम से घिरा रहता है. यही कारण है कि चीन बंगाल की खाड़ी में सक्रिय उपस्थिति बनाए रखने और बांग्लादेश तथा म्यांमार जैसे तटीय देशों के साथ साझेदारी कर वैकल्पिक मार्ग विकसित करने का इच्छुक है. इसका प्रमुख उदाहरण चीन–म्यांमार तेल और गैस पाइपलाइन प्रणाली है. जो म्यांमार के पश्चिमी तट पर क्यौकफ्यू से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस चीन के युन्नान प्रांत तक पहुँचाती है और मलक्का जलडमरूमध्य को दरकिनार करते हुए बीजिंग को एक वैकल्पिक रास्ता देती है.

बांग्लादेश में अमेरिकी दूत के रूप में नियुक्त होने के कुछ ही दिनों बाद ब्रेंट क्रिस्टेंसेन ने दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती मौजूदगी और बीजिंग के साथ निकटता बढ़ाने की स्थिति में ढाका को हो सकने वाले जोखिमों पर चिंता जताई. इसके जवाब में बीजिंग ने इन टिप्पणियों को गैर-जिम्मेदाराना और निराधार बताते हुए वाशिंगटन से अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति अधिक सजग रहने और ऐसे कदम उठाने का आग्रह किया जो बांग्लादेश की स्थिरता के अनुकूल हों.

इसी संदर्भ में. बांग्लादेश चीन की प्रमुख विकास परियोजना-बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI)-का एक महत्वपूर्ण सहभागी है. जिसके तहत चीन पूरे देश में बड़े पैमाने पर अवसंरचना निर्माण और वित्तपोषण में लगा हुआ है. इसके साथ ही. बांग्लादेश के लिए चीन का सबसे बड़ा आयात स्रोत होना. दोनों देशों के मज़बूत द्विपक्षीय संबंधों को उसके विकास और आर्थिक स्थिरता के लिए अनिवार्य बनाता है.

बंगाल की खाड़ी में अमेरिका का रणनीतिक आधार

अमेरिका भी ढाका की वृद्धि और समृद्धि में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. दक्षिण एशिया पर अमेरिका के नए सिरे से बढ़े ध्यान. “स्वतंत्र और मुक्त” इंडो-पैसिफिक ढांचे की परिकल्पना और 2018 में क्वाड के पुनरुद्धार के साथ. बांग्लादेश को वाशिंगटन में अधिक महत्व मिला. चीन के लगातार अधिक मुखर होते उभार के बीच. बांग्लादेश अमेरिका के लिए हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी बनाए रखने का एक रणनीतिक आधार बनकर उभरा है. बांग्लादेश दक्षिण एशिया में अमेरिकी सहायता प्राप्त करने वाले तीसरे सबसे बड़े देश के रूप में भी रहा है. और उसके सख्त आतंकवाद-रोधी उपायों ने उसे आतंकवाद के ख़िलाफ़ अमेरिका की लड़ाई में एक अहम साझेदार बनाया है. अमेरिका बांग्लादेश का सबसे महत्वपूर्ण निर्यात बाज़ार बना हुआ है. जबकि आयात स्रोत के रूप में उसकी भूमिका अपेक्षाकृत सीमित है.

बदलते रिश्ते

पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के नेतृत्व वाली सरकार ने चीन और अमेरिका सहित प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों में ‘संतुलित कूटनीति’ को प्राथमिकता दी थी. लेकिन उनके कार्यकाल के अंतिम चरण में. बीजिंग के साथ ढाका की बढ़ती नज़दीकी के कारण वाशिंगटन के साथ रिश्ते तनावपूर्ण होते चले गए. हालाँकि बांग्लादेश ने एक तटस्थ शब्दावली वाला इंडो-पैसिफिक आउटलुक जारी किया. जो मोटे तौर पर अमेरिकी इंडो-पैसिफिक अवधारणा से मेल खाता था. फिर भी उसने अमेरिकी इंडो-पैसिफिक रणनीति में शामिल होने से परहेज़ किया. क्योंकि उसमें चीन-विरोधी संकेत स्पष्ट थे. शुरुआत में हसीना ने अमेरिकी चिंताओं को शांत करने की कोशिश की. लेकिन जनवरी 2024 के चुनाव से पहले वीज़ा प्रतिबंधों और अन्य कदमों के साथ संबंध लगातार बिगड़ते चले गए.

दूसरी ओर. बीजिंग ने अमेरिकी दबाव का सामना करने में हसीना को चीन के समर्थन का भरोसा दिलाया. इससे पहले. चीन के बांग्लादेश स्थित राजदूत ने चेतावनी दी थी कि यदि ढाका क्वाड में शामिल हुआ तो द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुँचेगा-यह बयान उस समय आया था जब चीन ने बांग्लादेश को आपातकालीन कोविड-19 टीके उपलब्ध कराए थे. इसके बावजूद. बांग्लादेश ने चीन की सहायता को स्वीकार करते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति निर्णय लेने की स्वायत्तता पर दृढ़ता से ज़ोर देकर कूटनीतिक कुशलता का परिचय दिया. इसके बाद से चीन ने बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखी है. लेकिन व्यापार. निवेश और द्विपक्षीय सहयोग को लगातार गहराता गया है. इसके बाद के वर्षों में. बांग्लादेश–चीन संबंध और भी मज़बूत हुए हैं-यहाँ तक कि पूर्व अवामी लीग सरकार के दौर से भी अधिक-क्योंकि मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने कई रणनीतिक फैसलों में बीजिंग को प्राथमिकता दी है.

अंतरिम सरकार ने दोनों साझेदारों के साथ संबंध मज़बूत करने की कोशिश की है. लेकिन यह एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसे जल्द ही एक निर्वाचित सरकार द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा. आने वाली सरकार से अपेक्षा है कि वह जनता की पसंद का अधिक प्रतिनिधित्व करेगी.

अमेरिकी भू-राजनीतिक विश्लेषक रॉबर्ट कैपलान ने एक बार कहा था. “अमेरिका के विपरीत. चीन विश्व मामलों में किसी मिशनरी दृष्टिकोण के साथ नहीं आता. उसके पास कोई ऐसी विचारधारा या शासन प्रणाली नहीं है जिसे वह फैलाना चाहता हो. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैतिक प्रगति अमेरिका का लक्ष्य है. चीन का नहीं.” वास्तव में. अगस्त 2024 में शेख़ हसीना के सत्ता से हटने और अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में मोहम्मद यूनुस के आने के बावजूद. चीन–बांग्लादेश संबंधों में कोई बड़ा व्यवधान नहीं आया. इसके उलट. यूनुस के नेतृत्व में ये रिश्ते और अधिक मज़बूत हुए हैं-यहाँ तक कि अवामी लीग सरकार के समय से भी अधिक.

हालाँकि यह उम्मीद की जा रही थी कि मुख्य सलाहकार का पूर्व बाइडन प्रशासन के साथ करीबी तालमेल ढाका–वाशिंगटन संबंधों को सुधारने में मदद करेगा. लेकिन 2025 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत ने एक बार फिर अनिश्चितता बढ़ा दी. ऐसे में यदि बांग्लादेश चीन के बहुत अधिक क़रीब जाता है और अमेरिका को बंगाल की खाड़ी में आवश्यक रणनीतिक आधार से वंचित करता है. तो वाशिंगटन का रुख़ और अधिक टकरावपूर्ण हो सकता है.

इसके बावजूद. यूनुस अमेरिका के साथ साझेदारी के लिए खुले रहे हैं. क्योंकि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था. रोज़गार. प्रतिस्पर्धात्मकता और समग्र आर्थिक प्रदर्शन को आगे बढ़ाने में वाशिंगटन की भूमिका अहम है. ट्रंप प्रशासन द्वारा सभी विदेशी सहायता अस्थायी रूप से रोके जाने के कुछ ही दिनों बाद. यूनुस ने अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस के पुत्र एलेक्स सोरोस से मुलाक़ात कर अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण से जुड़े सुधारों पर चर्चा की. दोनों देशों ने अमेरिकी निर्यात को बढ़ाने और मौजूदा व्यापार असंतुलन को दूर करने के उपायों पर भी बातचीत की है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार. अमेरिका क्वाड के ‘पोर्ट्स ऑफ़ द फ़्यूचर पार्टनरशिप’ के तहत बांग्लादेश में एक बंदरगाह बनाने का इच्छुक है. इस दिशा में उसने प्रमुख हितधारकों के साथ प्रारंभिक बैठक की है और ठोस प्रस्ताव आगे बढ़ाने से पहले एक व्यापक व्यवहार्यता अध्ययन किए जाने की संभावना है.

आगे का रास्ता

हालांकि अंतरिम सरकार ने दोनों साझेदारों के साथ संबंध मज़बूत करने की कोशिश की है. लेकिन यह एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसे जल्द ही एक निर्वाचित सरकार द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा. आने वाली सरकार से अपेक्षा है कि वह जनता की पसंद का अधिक प्रतिनिधित्व करेगी. ऐतिहासिक रूप से, चीन और अमेरिका-दोनों के ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के साथ अच्छे संबंध रहे हैं. और वर्तमान में दोनों ही आगामी चुनाव की प्रमुख दावेदार पार्टियों में से एक. जमात-ए-इस्लामी के साथ भी अपने संबंध गहरे करने के इच्छुक हैं. जैसे-जैसे चुनावी नतीजों को लेकर अटकलें बढ़ रही हैं. दोनों शक्तियां अपने-अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए बांग्लादेश में अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रही. इन भू-राजनीतिक खींचतान के बीच. बांग्लादेश के लिए यह ज़रूरी है कि वह चुनाव के दौरान और उसके बाद भी अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखें.


सोहिनी बोस ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.

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