Author : Arezo Kohistany

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Published on Nov 24, 2025 Updated 0 Hours ago

दुनिया अब अर्थ यानी पैसे से चलती है. बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से मदद लेनी पड़ती है लेकिन बड़ी महाशक्तियों ने इन वित्तीय संस्थानों को अपनी नीतियां आगे बढ़ाने का माध्यम बना दिया है. ऐसे में नए अंतर्राष्ट्रीय बैंकों की ज़रूरत महसूस हो रही है जो विकासशील देशों को आसान शर्तों पर ऋण मुहैया करा सकें. एनडीएफसी भी इस दिशा में एक कदम है.

विकास के लिए फंड नहीं है? पैसा चाहिए तो NDFC के पास आइये.

वैश्विक विकास प्रणाली के साथ अब ये दिक्कत हो गई है कि इसमें मौजूदा आर्थिक वास्तविकताओं प्रतिबिंबित नहीं होती. 20वीं सदी में जो संस्थाएं बनीं, वो ये मानती हैं विकास पश्चिमी उदारता का एक रूप है, पश्चिमी देशों की कृपा से ही विकास हो रहा है. हकीक़त ये है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं भी अब वैश्विक विकास, बुनियादी ढांचे की मांग और तकनीकी परिवर्तन को रफ्तार दे रही हैं. इसके बावजूद, ऐसे देशों को विकास की संरचना में भागीदार के बजाए विदेशी मदद से चलने वाले देशों के रूप में देखा जाता था लेकिन अब ये संरचनात्मक बेमेल टिकाऊ नहीं रह गया है. अकेले ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, चीन और भारत) और इसके सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था को 12 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा की बुनियादी ढांचे की ज़रूरतों का सामना करना पड़ रहा है. इसमें लॉजिस्टिक, अक्षय ऊर्जा, डिजिटल सिस्टम, जल और खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाएं शामिल हैं. 

  • वैश्विक विकास प्रणाली आज की आर्थिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती.
  • पुरानी संस्थाएँ मानती रहीं कि विकास पश्चिमी उदारता पर निर्भर है.
  • उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अभी तक भागीदार नहीं, मदद-निर्भर देश माना गया—अब यह मॉडल टिकाऊ नहीं.

 इन देशों के विकास के लिए बहुपक्षीय विकास बैंकों को बड़े पैमाने पर पूंजी जुटानी चाहिए थी लेकिन वो बहुत धीमी गति से काम कर रहे हैं. इसकी वजह ये है कि बहुपक्षीय विकास बैंकों की प्रक्रियाओं में विकसित देशों से मिलने वाली मदद ज्यादा जबकि निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित है. यहां तक कि न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) भी इसी समस्या से जूझ रहा है. अपनी स्थापना के बाद से, एनडीबी ने सिर्फ 22.4 अरब डॉलर का ही निवेश किया है, और 15% से भी कम फंड निजी क्षेत्र की परियोजनाओं में गया है. इसका नतीजा ये हुआ कि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं की ज़रूरतों और मौजूदा संस्थानों की क्षमता के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है.

“अकेले ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, चीन और भारत) और इसके सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था को 12 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा की बुनियादी ढांचे की ज़रूरतों का सामना करना पड़ रहा है.”



एनडीएफसी जैसी संस्थाओं की ज़रूरत क्यों?

ऐसे में वित्तीय मदद के लिए एक नया दृष्टिकोण समय की मांग है. एक ऐसा नज़रिया जो विकास को परोपकारी कार्य के बजाय एक व्यावसायिक उद्यम के रूप में देखे. भारत पहले ही ये दिखा चुका है कि इस तरह का दृष्टिकोण कितना प्रभावशाली हो सकता है. भारत का वित्तीय समावेशन अभियान काफ़ी सफल हुआ. भारत ने मात्र 1 डॉलर के साथ 10 करोड़ से ज़्यादा नागरिकों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में एकीकृत किया. ये अभियान इसलिए सफल हुआ, क्योंकि सार्वजनिक नीति, तकनीक और बाज़ार प्रोत्साहन ने समावेशन को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए एक साथ काम किया. सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के परिणाम भी इसलिए सकारात्मक रहे, क्योंकि बाज़ार भी उनके अनुरूप बढ़े. यही सिद्धांत ब्रिक्स और न्यू डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (एनडीएफसी) की स्थापना के प्रस्ताव का आधार है.

न्यू डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन को एक ऐसी संस्था के रूप में प्रस्तावित किया गया है, जिसे भारत और संयुक्त अरब अमीरात में स्थापित किया जा सकता है, बशर्ते अगर दोनों सरकारें इस विचार को आगे बढ़ाना चाहें. एनडीएफसी कानूनी रूप से न्यू डेवलपमेंट बैंक से जुड़ा होगा, लेकिन काम करने के तरीके के रूप से स्वतंत्र होगा. ये कॉर्पोरेशन, अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) और विश्व बैंक के बीच संबंधों को प्रतिबिंबित करेगा. इसका उद्देश्य संस्थागत पूंजी जुटाना और निवेश-तैयार परियोजना पाइपलाइनों का निर्माण करना होगा. इसका फायदा ये होगा कि उभरते बाज़ारों में विकास को बाधित करने वाले निजी क्षेत्र के वित्तपोषण की कमी को दूर किया जा सकेगा.

“अपनी स्थापना के बाद से, एनडीबी ने सिर्फ 22.4 अरब डॉलर का ही निवेश किया है, और 15% से भी कम फंड निजी क्षेत्र की परियोजनाओं में गया है.”

एनडीएफसी का मुख्य वित्तीय ढांचा हाइब्रिड पूंजी पर आधारित होगा. ऐसा इसलिए है, क्योंकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं में व्यवहार्य अवसरों की कमी नहीं है. समस्या बस ये है कि, उन्हें कड़े राजनीतिक, नियामक और विदेशी मुद्रा ज़ोखिमों का सामना करना पड़ता है. इन ख़तरों को वाणिज्यिक निवेशक अकेले नहीं झेल सकते. हाइब्रिड पूंजी इन ज़ोखिमों को पूंजी संरचना में वितरित करती है, जहां एक संप्रभु देश या परोपकार में मिली आर्थिक मदद शुरुआती चरण की अनिश्चितता को अवशोषित करती है, मेज़ानाइन लेयर्स दूसरे स्तर के ज़ोखिमों को वहन करती हैं. ऋण और इक्विटी के बीच के स्तर को मेज़ानाइन लेयर्स कहते हैं जबकि सीनियर ट्रेंच से दीर्घकालिक निवेशकों को आकर्षित किया जाता है. सीनियर ट्रेंच यानी वरिष्ठ किश्तें एक संयुक्त ऋण प्रतिभूति का सबसे कम जोखिम वाला हिस्सा है. इसमें अंतर्निहित परिसंपत्तियों से पुनर्भुगतान के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होती है. अगर इसे सही तरीके से व्यवस्थित किया जाए तो, एक डॉलर की उत्प्रेरक पूंजी 10 डॉलर के वाणिज्यिक निवेश को जुटा सकती है. ऐसा करने से, उन परियोजनाओं को भी व्यवहार्य निवेश में बदला जा सकता है, जिन्हें आम तौर पर बैंकों से मदद नहीं मिलती.

संयुक्त अरब अमीरात ऐसी संस्था की स्थापना के लिए एक स्वाभाविक आधार है, क्योंकि उसका फाइनेंस इकोसिस्टम हाइब्रिड-कैपिटल तर्क पर आधारित है. यूएई में ऐसे वैश्विक बाज़ार हैं, जहां संप्रभु फंड और वाणिज्यिक निवेशक लगातार मिलकर निवेश करते हैं. यही वजह है कि अबू धाबी वैश्विक बाज़ार एक अग्रणी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय केंद्र बन गया है. संयुक्त अरब अमीरात ने अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (आईआरईएनए) जैसी वैश्विक संस्थाओं की मेज़बानी और विस्तार करने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है. यूएई की भौगोलिक स्थिति भी इसके पक्ष में जाती है. एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व को रणनीतिक रूप से जोड़ने वाला इसका स्थान, एनडीएफसी के कनेक्टिविटी-केंद्रित इरादों के अनुरूप है.

“अगर इसे सही तरीके से व्यस्थित किया जाए तो, एक डॉलर की उत्प्रेरक पूंजी 10 डॉलर के वाणिज्यिक निवेश को जुटा सकती है.”

संयुक्त अरब अमीरात अगर वित्तीय क्षमताएं मुहैया कराता है, तो भारत पूरक क्षमताएं प्रदान करता है. भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. भारत के पास विशाल बुनियादी ढांचे की मांग को गहन तकनीकी क्षमता और मापनीय निवेश माध्यमों को डिज़ाइन करने का अनुभव है. अबू धाबी निवेश प्राधिकरण ने सह-निवेश प्लेटफार्मों के लिए एक मानक स्थापित किया है. उसने एक अरब डॉलर की प्रतिबद्धता द्वारा समर्थित राष्ट्रीय निवेश और बुनियादी ढांचा कोष की स्थापना की है. भारत की सार्वजनिक-निजी भागीदारी ने भी नवीकरणीय ऊर्जा, हवाई अड्डों, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण वैश्विक पूंजी आकर्षित की है. भारत-यूएई साझेदारी ने भी ठोस नतीजे दिए हैं. इसमें व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सीईपीए) के तहत 100 अरब डॉलर से अधिक का द्विपक्षीय व्यापार समझौता शामिल है. इसके अलावा, 3 अरब डॉलर तक की प्रतिबद्धताओं वाला हिंदुस्तान इन्फ्रालॉग प्लेटफ़ॉर्म, और भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों के साथ एडीएनओसी की ऊर्जा-सुरक्षा साझेदारी शामिल है. ये ट्रैक रिकॉर्ड एनडीएफसी के लिए एक विश्वसनीय आधार प्रदान करता है.

 
एनडीएफसी की वित्तीय संरचना कैसी होगी?

एनडीएफसी 10 अरब डॉलर की पेड-इन-इक्विटी के साथ शुरू हो सकता है. इसमें यूएई 30 और भारत 20 प्रतिशत का योगदान देंगे. बाकी 50 प्रतिशत अन्य एनडीबी और ब्रिक्स+ सदस्यों से हासिल किया जा सकता है. ये पूंजी आधार AA-रेंज क्रेडिट रेटिंग को सहारा देगा. लचीलापन बनाए रखने के लिए ये संस्था, आईएफसी और आईडीबी निवेश की तरह 2 से 3 गुना के ऋण-से-इक्विटी अनुपात के साथ काम करेगी. इसकी वित्तपोषण रणनीति में प्रमुख आरक्षित मुद्राओं में मध्यम अवधि के नोट और विदेशी करेंसी ज़ोखिम को कम करने के लिए प्राथमिकता वाले बाज़ारों में स्थानीय मुद्रा शामिल होगी. राजकोषीय संचालन में परिसंपत्ति-देयता प्रबंधन, हेजिंग, लिक्विडिटी बफर, प्रतिदेय पूंजी और ज़ोखिम हस्तांतरण साझेदारी पर ज़ोर दिया जाएगा. एनडीएफसी की ये संरचना, निवेशकों का भरोसा मज़बूत करेगी, और पसंदीदा ऋणदाता का दर्जा सुनिश्चित करेगी.

 

एनडीएफसी निजी क्षेत्र की उन परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करेगा, जो बाज़ारों का निर्माण करती है और उन्हें जोड़ती है. इसके साधनों में ऋण, इक्विटी, गारंटी, ज़ोखिम सहभागिता, बीमा और पुनर्बीमा सुविधाएं, प्रतिभूतिकरण और सह-निवेश प्लेटफ़ॉर्म शामिल होंगे. शुरू में इसका फोकस भारत-मध्य पूर्व-अफ्रीका कॉरिडोर होगा. यहां लॉजिस्टिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा, जल प्रणालियां और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता दी जाएगी. क्षमता निर्माण के साथ एनडीएफसी के काम का विस्तार लैटिन अमेरिका और अन्य क्षेत्रों में भी किया जा सकता है. इन देशों में भी परियोजना की व्यवहार्यता के लिए हाइब्रिड-पूंजी समाधान की ज़रूरत है. 

“एनडीएफसी निजी क्षेत्र की उन परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करेगा, जो बाज़ारों का निर्माण करती है और उन्हें जोड़ती है.”

एनडीएफसी का परिचालन मॉडल एक आधुनिक वित्तीय संस्थान की तरह होगा, जो पारंपरिक विकास नौकरशाही से अलग होगा. ऋण के मूल्यांकन, उचित सतर्कता, दस्तावेज़ीकरण और निगरानी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मदद करेगा. डिजिटल प्लेटफॉर्म पूरे निवेश चक्र में वास्तविक समय पारदर्शिता और मानकीकरण को सक्षम करेंगे. इसका उद्देश्य परियोजना की तैयारी और क्रियान्वयन में तेज़ी लाना होगा, जिससे बड़े पैमाने पर पूंजी का संचार हो सके.

 
एनडीएफसी में ब्रिक्स की महत्वपूर्ण भूमिका क्यों?

अगर ब्रिक्स के सभी नेताओं का समर्थन मिले, तो एनडीएफसी कम समय में ही स्वीकृति से लेकर संचालन तक पहुंच सकता है, ठीक उसी तरह जैसे एशियाई बुनियादी ढांचा निवेश बैंक (एआईआईबी) को शुरू हुए दो साल हो गए हैं. यूएई और भारत में उसी गति को दोहराने की क्षमता और तालमेल है. एनडीएफसी जैसी नई संस्था का निर्माण, मौजूदा विकास वित्त संस्थाओं की संरचनात्मक सीमाओं से बचता है. ये शुरुआत से ही रफ्तार, तकनीक-सक्षम कार्यान्वयन और निजी क्षेत्र के निवेशकों के साथ वास्तविक तालमेल के लिए एक ऐसा मंच तैयार करना संभव बनाता है. जो विकास को गति प्रदान करे. इसका उद्देश्य दोहराव नहीं, बल्कि ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करने के इच्छुक दीर्घकालिक पूंजी के लिए एक पसंदीदा साझेदार प्रदान करना है. एनडीएफसी की स्थापना इस बात का संकेत देगी कि ब्रिक्स अपनी रणनीतिक ज़रूरतों के लिए संस्थाओं का डिज़ाइन तैयार कर सकता है. इसके लिए, वो परोपकार के रूप में मिलने वाली आर्थिक मदद की बजाए व्यावसायिक तर्क के माध्यम से विकास को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है.


अरेज़ो कोहिस्तानी अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम में इंवेस्टमेंट अफसर हैं. ये लेख मूल रूप से ओआरएफ मिडिल ईस्ट में छपा है.

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Arezo Kohistany

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Arezo Kohistany was with the International Finance Corporation (IFC) from 2012 to 2025, where she worked across Advisory Services, Treasury Client Solutions, and as an ...

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