समुद्र अब सिर्फ जहाजों और मछलियों का रास्ता नहीं रह गया है. आज यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक ताकतों में गिना जाता है. पिछले 25 साल में इसकी कीमत दोगुनी हो चुकी है लेकिन इसी तेज रफ्तार ने कई नई कमजोरियां भी उजागर कर दी हैं. सवाल है कि क्या दुनिया इस दौड़ को टिकाऊ बना पाएगी?
Image Source: Pexels
पिछले कुछ वर्षों में समुद्र में कारोबारी गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं. कई मुल्क अब समुद्री कारोबार को तरक्की का नया इंजन मानने लगे हैं. जहाजरानी, मछली कारोबार, ऊर्जा और पर्यटन जैसे बहुत से कारोबार आकार और दायरे में काफी बढ़े हैं. पिछले 25 वर्षों में दुनिया की ब्लू इकॉनमी असली कीमतों के हिसाब से दोगुनी हो गई. 1995 में इसका सकल मूल्य 1.3 ट्रिलियन डॉलर था, जो 2020 तक बढ़कर 2.6 ट्रिलियन डॉलर हो गया. अगर इसे एक अलग मुल्क माना जाए, तो यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होती. इस बढ़त का करीब 75 फीसदी हिस्सा एशिया और प्रशांत इलाके में हुआ, खासकर चीन में.
लेकिन इस तेज बढ़त ने कई कमजोरियां और मुश्किलें भी उजागर की हैं. दुनिया की बाकी चीजों की तरह समुद्री कारोबार भी लगातार नए झटकों और रुकावटों का सामना कर रहे हैं. कोविड के दौरान पर्यटन और समुद्री माल ढुलाई समेत कई गतिविधियां लगभग ठप हो गई थीं. इससे साफ हो गया कि समुद्री सप्लाई चेन कितनी नाजुक है. पश्चिम एशिया संकट और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का भी इन पर खूब असर पड़ा, खास तौर पर एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर. होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले करीब 80 फीसदी तेल और 86 फीसदी एलएनजी की मंजिल एशिया ही थी.
पिछले 25 वर्षों में दुनिया की ब्लू इकॉनमी असली कीमतों के हिसाब से दोगुनी हो गई. 1995 में इसका सकल मूल्य 1.3 ट्रिलियन डॉलर था, जो 2020 तक बढ़कर 2.6 ट्रिलियन डॉलर हो गया. अगर इसे एक अलग मुल्क माना जाए, तो यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होती.
अगर ब्लू इकॉनमी को एक देश मान लिया जाए, तो वह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होती. लेकिन कोविड ने दुनिया को दिखा दिया कि समुद्र पर टिकी वैश्विक सप्लाई चेन कितनी संवेदनशील है. कुछ ही महीनों में जहाज, बंदरगाह और पर्यटन उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो गए थे. इसके बाद पश्चिम एशिया के तनाव ने ऊर्जा और व्यापार को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दीं.
दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि ब्लू इकॉनमी से होने वाले फायदे बराबरी से बांटे जाएं. कई विकासशील मुल्कों के सामने अजीब हालत है. रोजगार, आमदनी और विदेशी मुद्रा के लिए वे समुद्र से जुड़े कारोबार पर बहुत निर्भर हैं, लेकिन उनका हिस्सा बहुत छोटा है. ब्लू इकॉनमी के नए और तेजी से बढ़ते हिस्सों में उनकी मौजूदगी लगभग नहीं के बराबर है. पैसे, तकनीक और भरोसेमंद आंकड़ों की कमी उन्हें आगे बढ़ने से रोकती है. दूसरी तरफ गर्म होता समुद्र, पानी की बिगड़ती गुणवत्ता और बढ़ते प्रदूषण से मछली पकड़ने, पर्यटन और समुद्र किनारे रहने वाले लोगों की कमाई पर असर पड़ रहा है.
ब्लू इकॉनमी से अरबों डॉलर की कमाई हो रही है, लेकिन इसका फायदा सभी तक बराबर नहीं पहुंच रहा. कई गरीब और विकासशील देश समुद्र पर निर्भर तो हैं, मगर कमाई में उनकी हिस्सेदारी बेहद सीमित है. तकनीक, पूंजी और जानकारी की कमी उन्हें नई संभावनाओं से दूर रखती है. दूसरी तरफ जलवायु बदलाव उनकी मुश्किलें और बढ़ा रहा है.
समुद्र में तेल और गैस निकालने, जहाजरानी और बड़े पैमाने पर मछली पकड़ने जैसे कारोबारों पर कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है. इन चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर नियम, ज्यादा पारदर्शिता और छोटे कारोबारियों को सहारा देने वाली नीतियां जरूरी हैं.
एक और मुश्किल यह है कि समुद्र से जुड़े कई बड़े कारोबार कुछ गिनी-चुनी कंपनियों के हाथ में सिमटते जा रहे हैं. समुद्र से जुड़े अहम कारोबारों की टॉप 10 कंपनियां कुल कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा अपने पास रखती हैं, तो टॉप 100 कंपनियां लगभग 60 फीसदी कमाई पर काबिज हैं. समुद्र में तेल और गैस निकालने, जहाजरानी और बड़े पैमाने पर मछली पकड़ने जैसे कारोबारों पर कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है. इन चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर नियम, ज्यादा पारदर्शिता और छोटे कारोबारियों को सहारा देने वाली नीतियां जरूरी हैं.
सबसे बड़ी चुनौती तो पर्यावरण की है. समुद्री दुनिया की सेहत लगातार बिगड़ रही है. 2011 में ही अंदाजा लगाया गया था कि दुनिया के करीब 60 फीसदी बड़े समुद्री सिस्टम या तो खराब हो चुके हैं या उनका इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा हो रहा है. इसके बाद हालात और बिगड़े हैं. बदलती आबोहवा, जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने, प्रदूषण जैसी वजहों से समुद्र पर दबाव बढ़ा है. तापमान अलग बढ़ रहा है, पानी अलग बदल रहा है. ऑक्सीजन घट रही है, जैव विविधता कम हो रही है, समुद्र का लेवल ऊपर उठ रहा है और भीषण मौसम की घटनाएं ज्यादा होने लगी हैं. इसका असर समुद्र पर निर्भर सभी पर पड़ रहा है. समुद्र से कमाई की होड़ जितनी तेज हुई है, उसकी कीमत भी अब साफ दिखाई देने लगी है. जरूरत से ज्यादा दोहन ने उसकी सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचाया है. समुद्री पर्यावरण का बिगड़ना अब सिर्फ वैज्ञानिकों की चिंता नहीं रह गया है. यह खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है.
अब इस बात के पक्के सबूत हैं कि अगर समझदारी से काम चलें तो टिकाऊ समुद्री अर्थव्यवस्था इन समस्याओं का हल भी बन सकती है. समुद्र में खुद को फिर से संभालने और नई जान पैदा करने की ताकत है. जिम्मेदार मत्स्य पालन और समुद्री खेती दुनिया का लगातार पेट भर सकती है. समुद्र में बनने वाली बिजली ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर सकती है. समुद्र किनारे के मैंग्रोव जैसे सिस्टमों को बचाने-बसाने से बदलते मौसम का असर कम हो सकता है, साथ ही जीव-जंतुओं और स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी को भी सहारा मिलेगा.
ब्लू इकॉनमी का भविष्य काफी हद तक उन फैसलों पर टिका है, जो आज लिए जा रहे हैं. अगर पर्यावरण लगातार बिगड़ता रहा और प्रोडक्टिविटी बढ़ाने में पर्याप्त निवेश नहीं हुआ, तो यह अर्थव्यवस्था ठहर सकती है या सिकुड़ भी सकती है. लेकिन अगर कम प्रदूषण वाले और टिकाऊ रास्तों की तरफ तेजी से बढ़ा गया, तो 2050 तक ब्लू इकॉनमी बहुत बड़ी हो सकती है. ऐसे हालात में समुद्री और तटीय पर्यटन का महत्व बना रहेगा, जबकि समुद्र में तेल और गैस का हिस्सा घट जाएगा. इस संभावना को सच करने के लिए चार बड़े मोर्चों पर काम करना होगा.
टिकाऊ ब्लू इकॉनमी आज एक बेहद अहम मोड़ पर है. इसका भविष्य पहले से तय नहीं है और न ही यह अपने आप टिकाऊ बन जाएगी. सही नेतृत्व, सही नीतियों, सही निवेश और दुनिया भर के सहयोग हो तो समुद्र लंबे समय तक खुशहाली का बड़ा जरिया बना रह सकता है.
टिकाऊ ब्लू इकॉनमी आज एक बेहद अहम मोड़ पर है. इसका भविष्य पहले से तय नहीं है और न ही यह अपने आप टिकाऊ बन जाएगी. सही नेतृत्व, सही नीतियों, सही निवेश और दुनिया भर के सहयोग हो तो समुद्र लंबे समय तक खुशहाली का बड़ा जरिया बना रह सकता है. OECD इस बदलाव के सफर में देशों की मदद करने के लिए तैयार है. संस्था के पास ब्लू इकॉनमी, ब्लू फाइनेंस, समुद्री डेटा, नई तकनीक, समुद्री पर्यावरण, मत्स्य पालन आदि से जुड़ा गहरा अनुभव है. एक साझा और एकीकृत नजरिए के जरिए OECD बेहतर नीतियां बनाने, निवेश बढ़ाने और ज्यादा टिकाऊ ब्लू इकॉनमी की तरफ दुनिया को आगे बढ़ने में मदद कर सकता है.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Piera Tortora is Special Advisor to the OECD on sustainable finance, blue economy, and South East Asia engagement. Previously, Piera was the Head of the ...
Read More +