Expert Speak Raisina Debates
Published on Feb 13, 2026 Updated 0 Hours ago

दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ है. थाईलैंड में सत्ता का नया समीकरण बना है और इसके मायने भारत के लिए भी अहम हैं. समझिए क्यों यह घटनाक्रम आपके लिए जानना जरूरी है.

थाईलैंड में सत्ता की वापसी: भारत के लिए क्या संकेत?

8 फरवरी को हुए थाईलैंड के आकस्मिक आम चुनाव ने स्पष्ट राजनीतिक आश्चर्य प्रस्तुत किया है जिसमें भूमजाइथाई पार्टी ने अपेक्षाओं से बेहतर प्रदर्शन किया और प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल ने तेजी से जीत का दावा किया. सोमवार, 9 फरवरी तक, लगभग 93 प्रतिशत मतों की गिनती के साथ, यह रूढ़िवादी पार्टी अपने प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे निकल गई और प्रतिनिधि सभा की 500 सीटों में से 194 सीटें हासिल करने का अनुमान लगाया गया, जिससे अनुतिन अगली सरकार गठन प्रक्रिया के केंद्र में मजबूती से स्थापित हो गए. ये परिणाम थाईलैंड की सुधारवादी शक्तियों के लिए झटका हैं. पीपुल्स पार्टी, जो चुनाव पूर्व कई जनमत सर्वेक्षणों में आगे थी, लगभग 116 सीटों के अनुमान के साथ दूसरे स्थान पर रही जबकि फ्यू थाई , जो जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री थाकसिन शिनावात्रा और हाल ही में पद से हटाई गई प्रधानमंत्री पैतोंगतार्न शिनावात्रा से जुड़ी है, लगभग 74 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही.

8 फरवरी को हुए थाईलैंड के आकस्मिक आम चुनाव ने अप्रत्याशित राजनीतिक परिणाम सामने रखे. भूमजाइथाई पार्टी ने अनुमान से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया और तेजी से सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई. इस बढ़त के साथ प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल ने जीत का दावा किया और नई सरकार के गठन की प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका हासिल कर ली. चुनाव परिणामों ने यह संकेत दिया कि मतदाताओं ने इस बार स्थिरता, सुरक्षा और नीतिगत निरंतरता को प्राथमिकता दी. इससे पहले कई सर्वेक्षणों में अन्य दलों को बढ़त दिखाई जा रही थी इसलिए यह नतीजा राजनीतिक रूप से चौंकाने वाला माना गया.

ये परिणाम थाईलैंड की सुधारवादी शक्तियों के लिए झटका हैं. पीपुल्स पार्टी, जो चुनाव पूर्व कई जनमत सर्वेक्षणों में आगे थी, लगभग 116 सीटों के अनुमान के साथ दूसरे स्थान पर रही जबकि फ्यू थाई , जो जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री थाकसिन शिनावात्रा और हाल ही में पद से हटाई गई प्रधानमंत्री पैतोंगतार्न शिनावात्रा से जुड़ी है, लगभग 74 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही.

जीत के बाद गठबंधन वार्ता और कैबिनेट गठन पर प्रतिक्रिया देते हुए अनुतिन ने सावधानी और संतुलन का रुख दिखाया. उन्होंने कहा कि वे अंतिम आधिकारिक परिणाम आने तक किसी भी औपचारिक बातचीत की शुरुआत नहीं करेंगे. उनका मानना है कि पहले सभी दल अपने-अपने स्तर पर सीटों की स्थिति और आंतरिक रणनीति की समीक्षा करेंगे, उसके बाद ही सार्थक बातचीत संभव होगी. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सरकार गठन की प्रक्रिया जल्दबाज़ी में नहीं बल्कि सहमति और स्थिरता को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाई जाएगी. इससे यह संदेश गया कि नई सरकार निरंतरता और प्रशासनिक स्थिरता पर जोर देगी. उन्होंने परिणाम को सभी थाई नागरिकों की जीत बताया और नीतिगत निरंतरता का संकेत देते हुए कहा कि वित्त, विदेश और वाणिज्य मंत्री अपने पदों पर बने रह सकते हैं - जो यह दर्शाता है कि सरकार गठन के नए चरण में अस्थिरता नहीं बल्कि स्थिरता रहेगी.

गठबंधन का गणित

अनुतिन केवल पिछले सितंबर से प्रधानमंत्री पद पर हैं. इससे पहले वे पूर्व प्रधानमंत्री पैतोंगतार्न शिनावात्रा के मंत्रिमंडल में थे जिन्हें कंबोडिया संबंधों के प्रबंधन से जुड़े नैतिकता संबंधी फैसले के बाद पद से हटाया गया था. अविश्वास प्रस्ताव की संभावना का सामना करते हुए अनुतिन ने दिसंबर 2025 में पद संभालने के 100 दिनों के भीतर संसद भंग कर दी और शीघ्र चुनाव घोषित कर दिया. उनके अभियान का मुख्य जोर आर्थिक प्रोत्साहन और राष्ट्रीय सुरक्षा पर था जिसे कंबोडिया सीमा पर हुए घातक संघर्षों से उत्पन्न राष्ट्रवादी भावना से बल मिला.

थाईलैंड के चुनावी नियमों के अनुसार, आधिकारिक परिणाम घोषित होने के बाद 500 सदस्यीय संसद को 15 दिनों के भीतर प्रधानमंत्री का चुनाव करना होता है जिसके लिए कम से कम 251 मतों की आवश्यकता होती है. 25 या अधिक सीटें जीतने वाली पार्टियां पूर्व-प्रस्तुत सूची से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नामित कर सकती हैं. यदि कोई उम्मीदवार बहुमत हासिल नहीं करता तो मतदान के कई दौर होंगे और प्रक्रिया पूरी करने की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं है. आवश्यक समर्थन जुटाने की स्थिति में अनुतिन कुछ ही दिनों में अपने नेतृत्व को मजबूत कर सकते हैं.

अविश्वास प्रस्ताव की संभावना का सामना करते हुए अनुतिन ने दिसंबर 2025 में पद संभालने के 100 दिनों के भीतर संसद भंग कर दी और शीघ्र चुनाव घोषित कर दिया. उनके अभियान का मुख्य जोर आर्थिक प्रोत्साहन और राष्ट्रीय सुरक्षा पर था जिसे कंबोडिया सीमा पर हुए घातक संघर्षों से उत्पन्न राष्ट्रवादी भावना से बल मिला.

भूमजाइथाई से अपेक्षा है कि वह सरकार बनाने के लिए छोटी पार्टियों की ओर रुख करेगी. संभावित सहयोगियों में उपप्रधानमंत्री थम्मनत प्रम्पाओ के नेतृत्व वाली क्ला थाम पार्टी शामिल है जिसे लगभग 58 सीटें मिलने का अनुमान है. पार्टी के मुख्य रणनीतिकार अनुदित नाकोर्नथाप ने कहा कि वे गठबंधन के निमंत्रण की प्रतीक्षा कर रहे हैं और दोनों दल बिना टकराव के साथ काम कर सकते हैं. थाई रुआम थाई पार्टी, जिसके पास 5 सीटें हैं, ने भी समर्थन जताया है.

चार्टर का पुनर्गठन

थाईलैंड में पहली बार मतदाताओं से न केवल प्रतिनिधि सभा के 500 सदस्यों का चुनाव करने को कहा गया बल्कि यह भी पूछा गया कि क्या नए संविधान के मसौदे की प्रक्रिया शुरू की जाए. प्रत्येक मतदाता को तीन मतपत्र दिए गए, दो संसदीय चुनाव के लिए और एक संवैधानिक जनमत संग्रह के लिए. थाईलैंड का आधुनिक राजनीतिक इतिहास सैन्य तख्तापलट, जन आंदोलनों और न्यायिक हस्तक्षेपों के चक्र से चिह्नित रहा है. 1932 से अब तक एक दर्जन से अधिक सफल तख्तापलट हो चुके हैं जिनमें सबसे हालिया 2014 का था. उसी के बाद 2017 का संविधान बना, जो आज भी राजनीति को संरचित और सीमित करता है. इस ढांचे का केंद्र नियुक्त सीनेट है. 2017 के संविधान ने 250 सदस्यीय नियुक्त सीनेट बनाई, जिसे प्रधानमंत्री के चयन में प्रतिनिधि सभा के साथ मतदान का अधिकार दिया गया. इससे निर्वाचित जनादेश पर गैर-निर्वाचित निकाय का प्रभाव संभव हो गया. 2023 के चुनावों के बाद यह स्पष्ट दिखा.

मूव फॉरवर्ड पार्टी, जिसने 2023 में बड़ी जीत दर्ज की थी, को संवैधानिक न्यायालय ने भंग कर दिया क्योंकि उसने दंड संहिता की धारा 112 (लेसे मैजेस्टी कानून) में संशोधन का वादा किया था. यह कानून राजशाही की आलोचना को अपराध मानता है और 15 वर्ष तक की सजा का प्रावधान करता है. मतदाताओं के लगभग दो-तिहाई ने संविधान बदलने के प्रस्ताव का समर्थन किया. इससे नई संसद को बहु-चरणीय मसौदा प्रक्रिया शुरू करने का जनादेश मिला. पीपुल्स पार्टी ने चुनाव अभियान के दौरान धारा 112 को केंद्र में रखने से परहेज किया और आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया - यह वैचारिक बदलाव से अधिक राजनीतिक रणनीति थी.

जनमत संग्रह प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण कदम था क्योंकि पहली बार नागरिकों को सीधे यह अवसर मिला कि वे संवैधानिक सुधार के प्रश्न पर अपनी स्पष्ट राय दर्ज करें. यह केवल एक प्रक्रियात्मक मतदान नहीं था, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था की दिशा पर जनता की भावना का संकेतक भी था. लंबे समय से थाईलैंड की राजनीति सैन्य हस्तक्षेप, न्यायिक दखल और संस्थागत नियंत्रण के बीच संचालित होती रही है, जिसके कारण निर्वाचित सरकारों की स्वायत्तता सीमित रही. ऐसे परिदृश्य में संविधान परिवर्तन के पक्ष में मिला व्यापक समर्थन इस बात को दर्शाता है कि समाज का एक बड़ा वर्ग मौजूदा व्यवस्था में संतुलन और जवाबदेही की नई संरचना चाहता है.

कनेक्टिविटी भारत, थाईलैंड संबंधों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, और इसमें भारत–म्यांमार–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना की केंद्रीय भूमिका है. यह गलियारा भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से भूमि मार्ग के जरिए जोड़ने वाली एकमात्र प्रमुख परियोजना है जो व्यापार, पर्यटन, आपूर्ति श्रृंखला और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ा सकती है लेकिन इस परियोजना की प्रगति और उपयोगिता काफी हद तक म्यांमार की राजनीतिक और सुरक्षा स्थिरता पर निर्भर करती है.

हालांकि इस जनमत संग्रह का परिणाम तुरंत संवैधानिक बदलाव में परिवर्तित नहीं होगा. नई संवैधानिक रूपरेखा तैयार करने की प्रक्रिया बहु-चरणीय, जटिल और समय लेने वाली होगी, जिसमें मसौदा समिति, संसदीय विचार-विमर्श और आगे के जनमत संग्रह जैसे चरण शामिल होंगे. फिर भी, यह मतदान एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश देता है- कि सैन्य-निर्मित ढांचे को लेकर असंतोष मौजूद है और सुधार की मांग अब हाशिये की आवाज नहीं रही. यह लोकतांत्रिक वैधता और संस्थागत संतुलन पर राष्ट्रीय बहस को आगे बढ़ाने का आधार तैयार करता है.

अनुतिन सरकार को चुनावी सफलता के कारण अपेक्षाकृत मजबूत जनादेश मिल सकता है, जो उसे नीतिगत निरंतरता और प्रशासनिक स्थिरता प्रदान करेगा. लेकिन केवल संसदीय बहुमत अपने आप में दीर्घकालिक स्थिरता की गारंटी नहीं है. यदि निर्वाचित नेतृत्व और शक्तिशाली संस्थागत ढांचे - जैसे नियुक्त निकायों और न्यायिक संरचनाओं - के बीच अधिकारों का असंतुलन बना रहता है, तो राजनीतिक तनाव दोबारा उभर सकता है. इसलिए वास्तविक स्थिरता केवल सरकार गठन से नहीं बल्कि संस्थागत सुधार, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संतुलन स्थापित करने से आएगी. जनमत संग्रह ने इस दिशा में बहस का द्वार खोल दिया है पर स्थायी समाधान अभी आगे की राजनीतिक इच्छाशक्ति और सहमति पर निर्भर करेगा.

भारत पर असर

नई दिल्ली समावेशी, बहुध्रुवीय इंडो-पैसिफिक की समर्थक रही है. किसी एक शक्ति पर निर्भर न रहने वाला थाईलैंड इस दृष्टि को मजबूत करता है. स्थिर सरकार दीर्घकालिक पहलों पर निरंतरता सुनिश्चित करती है. सुरक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी तंत्र और साइबर सहयोग में मजबूती की संभावना है. म्यांमार पर थाईलैंड की भूमिका भारत के लिए विशेष महत्व रखती है. उसकी सावधानीपूर्ण, आसियान-केंद्रित नीति भारत के संतुलित दृष्टिकोण से मेल खाती है.

र्यटन और सेवा क्षेत्र में भी संयुक्त पहल से तेज़ वृद्धि संभव है. हालांकि भारत को अपनी अपेक्षाएँ संतुलित रखनी होगी क्योंकि घरेलू स्थिरता पर केंद्रित सरकार के लिए बड़े संरचनात्मक आर्थिक सुधार तुरंत प्राथमिकता नहीं होंगे. इसका असर नीतिगत बदलाव और व्यापार उदारीकरण की रफ्तार पर पड़ सकता है जिससे प्रगति धीरे लेकिन स्थिर रूप से आगे बढ़ेगी.

कनेक्टिविटी भारत–थाईलैंड संबंधों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, और इसमें भारत–म्यांमार–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना की केंद्रीय भूमिका है. यह गलियारा भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से भूमि मार्ग के जरिए जोड़ने वाली एकमात्र प्रमुख परियोजना है जो व्यापार, पर्यटन, आपूर्ति श्रृंखला और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ा सकती है लेकिन इस परियोजना की प्रगति और उपयोगिता काफी हद तक म्यांमार की राजनीतिक और सुरक्षा स्थिरता पर निर्भर करती है. म्यांमार में जारी अस्थिरता के कारण निर्माण, रखरखाव और परिवहन सुरक्षा से जुड़े जोखिम बने हुए हैं जिससे समयसीमा और संचालन क्षमता प्रभावित हो सकती है.

आर्थिक दृष्टि से थाईलैंड, आसियान क्षेत्र में भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है. वित्त वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 19.07 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचा जो बढ़ते आर्थिक जुड़ाव का संकेत है. अप्रैल 2025 में भारत और थाईलैंड ने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया जिससे व्यापार, निवेश, डिजिटल सेवाओं, ऊर्जा और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में सहयोग विस्तार का मार्ग खुला. फिर भी, घरेलू स्थिरता और राजनीतिक संतुलन पर केंद्रित थाई सरकार से व्यापक संरचनात्मक आर्थिक सुधारों की तेज गति की अपेक्षा सीमित रह सकती है. इसका असर व्यापार उदारीकरण और बाज़ार सुधारों की रफ्तार पर पड़ सकता है, जिससे आर्थिक सहयोग क्रमिक लेकिन स्थिर तरीके से आगे बढ़ेगा.

व्यापक इंडो-पैसिफिक परिदृश्य में यह परिणाम दक्षिण-पूर्व एशिया की संतुलन साधने की प्रवृत्ति को दर्शाता है - न पूर्ण संरेखण, न पूर्ण दूरी. आर्थिक दृष्टि से, थाईलैंड भारत के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापार और निवेश साझेदार बना हुआ है. आसियान के भीतर, सिंगापुर, इंडोनेशिया और मलेशिया के बाद थाईलैंड भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. वित्त वर्ष 2025 में द्विपक्षीय व्यापार 19.07 अरब अमेरिकी डॉलर रहा. अप्रैल 2025 में भारत और थाईलैंड ने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी तक उन्नत किया और आर्थिक सहयोग की पूर्ण क्षमता को साकार करने का संकल्प व्यक्त किया. डिजिटल सेवाओं, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि-प्रसंस्करण और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में भारत और थाईलैंड के बीच सहयोग बढ़ाने की अच्छी संभावनाएं मौजूद हैं. तकनीकी साझेदारी, हरित ऊर्जा निवेश और वैल्यू-एडेड कृषि व्यापार दोनों देशों को लाभ पहुंचा सकते हैं. पर्यटन और सेवा क्षेत्र में भी संयुक्त पहल से तेज़ वृद्धि संभव है. हालांकि भारत को अपनी अपेक्षाएँ संतुलित रखनी होगी क्योंकि घरेलू स्थिरता पर केंद्रित सरकार के लिए बड़े संरचनात्मक आर्थिक सुधार तुरंत प्राथमिकता नहीं होंगे. इसका असर नीतिगत बदलाव और व्यापार उदारीकरण की रफ्तार पर पड़ सकता है जिससे प्रगति धीरे लेकिन स्थिर रूप से आगे बढ़ेगी.


श्रीपर्णा बनर्जी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सामरिक अध्ययन कार्यक्रम में एसोसिएट फेलो हैं.

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Sreeparna Banerjee

Sreeparna Banerjee

Sreeparna Banerjee is an Associate Fellow in the Strategic Studies Programme. Her work focuses on the geopolitical and strategic affairs concerning two Southeast Asian countries, namely ...

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