क्या अमेरिका और दक्षिण कोरिया के मजबूत माने जाने वाले गठबंधन में दरार आ रही है? 25 प्रतिशत टैरिफ, 350 अरब डॉलर के निवेश समझौते में देरी और बढ़ते राजनीतिक विवादों के बीच यह सवाल अहम हो गया है- जानें पूरा मामला.
28 जनवरी 2026 को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण कोरिया पर टैरिफ का एलान किया. उन्होंने टैरिफ लगाने का कारण अक्टूबर 2025 के व्यापार समझौते को विधायी मंजूरी मिलने में हो रही देरी को बताया. इस समझौते के तहत दक्षिण कोरिया ने अमेरिका में 350 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था. ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि पारस्परिक और अतिरिक्त टैरिफ को फिर से लागू करते हुए दरों को 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया. ये अतिरिक्त टैरिफ दक्षिण कोरिया के ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, लकड़ी और अन्य वस्तुओं पर लगेगा. ट्रंप की घोषणा हाल के घटनाक्रमों, विशेष रूप से धीमी विधायी मंजूरी प्रक्रिया के बाद आई है. इतना ही नहीं, अमेरिकी व्यवसायों को प्रभावित करने वाली कार्रवाइयों को लेकर दक्षिण कोरिया के उदासीन रवैये से ट्रंप प्रशासन में निराशा भी बढ़ रही है. टैरिफ बढ़ाने के ऐलान के बाद, अमेरिका-दक्षिण कोरिया द्विपक्षीय संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण हो गए हैं. इस कार्रवाई से दक्षिण कोरिया में अमेरिका के छवि बदल रही है. अब तक अमेरिका को दोस्त देश माना जाता था, लेकिन शायद आगे ऐसा ना हो.
ट्रंप टैरिफ की घोषणा ने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्यंग प्रशासन पर काफी दबाव डाल दिया है. हालांकि, मौजूदा गतिरोध साउथ कोरिया के अपने फैसलों, विशेष रूप से प्रशासन के उदासीन रवैये को दर्शाती हैं. दक्षिण कोरिया-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी और मुख्य विपक्षी दल पीपुल्स पावर पार्टी के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है. विपक्ष को इस समझौते की तकनीकी बारीकियों और देश की वित्तीय जिम्मेदारियों को लेकर कुछ आपत्तियां हैं. ये असहमति दो मुद्दों के कारण पैदा हुई है. पहला, क्या व्यापार समझौते को समझौता ज्ञापन यानी मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग माना जाना चाहिए या संधि, और क्या इसके लिए राष्ट्रीय सभा की मंजूरी आवश्यक है? दूसरा, कोरियाई खजाने पर बोझ डालने वाले 350 अरब डॉलर के निवेश पैकेज के मद्देनजर, समीक्षा और मंजूरी प्रक्रिया की अनुमानित लागत. एक मोटे अनुमान के मुताबिक इस समझौते से हर कोरियाई नागरिक पर 6,854 डॉलर का बोझ पड़ेगा. इसीलिए ली जे-म्यंग प्रशासन ने सावधानी वाला रुख़ अपनाते हुए विधेयकों को पारित करने का लंबा रास्ता चुना. इन बाधाओं के कारण, दक्षिण कोरिया और अमेरिका के बीच रणनीतिक निवेश प्रबंधन पर विशेष अधिनियम के इस प्रस्तावित विधेयक को पारित होने में उम्मीद से ज़्यादा समय लग गया है.
अमेरिकी व्यवसायों को प्रभावित करने वाली कार्रवाइयों को लेकर दक्षिण कोरिया के उदासीन रवैये से ट्रंप प्रशासन में निराशा भी बढ़ रही है. टैरिफ बढ़ाने के ऐलान के बाद, अमेरिका-दक्षिण कोरिया द्विपक्षीय संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण हो गए हैं. इस कार्रवाई से दक्षिण कोरिया में अमेरिका के छवि बदल रही है.
हालांकि, ट्रंप की हालिया टैरिफ घोषणा ने कोरिया में उन प्रक्रियाओं को गति दी है, जो पहले धीमी थीं. अब इन पर तुरंत कार्रवाई करने के लिए मज़बूर होना पड़ा है. फिर से अतिरिक्त टैरिफ लगने से ली प्रशासन को विपक्ष के साथ सहयोग करने के लिए बाध्य किया है. सरकार की कोशिश है कि समीक्षा प्रक्रिया को तेज़ी से पूरा किया जाए, और फरवरी के अंत तक विधेयक पारित किया जा सके. समझौते को मंजूरी को लेकर अभी भी गंभीर मतभेद बने हुए हैं. राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद, उम्मीद है कि ये समझौता जल्द ही नेशनल असेंबली से पास हो जाएगा. हालांकि, इस घटनाक्रम ने व्यापारिक तनाव को उजागर करने के साथ-साथ अमेरिका-दक्षिण कोरिया गठबंधन की स्थिरता को लेकर भी चिंताएं बढ़ा दी हैं.
टैरिफ के समय और तरीके को लेकर सवाल
टैरिफ को विदेश नीति के टूल के तौर पर इस्तेमाल करने के ट्रंप प्रशासन के जुनून के अलावा, ये पूरा घटनाक्रम तीन महत्वपूर्ण चिंताओं को सामने लगाता है. समय, रणनीति और इसमें इस्तेमाल किए गए उपकरण. पहली चिंता टैरिफ संबंधी फैसले के समय को लेकर है. कुछ ही दिन पहले वाशिंगटन डीसी में दक्षिण कोरिया के प्रधानमंत्री किम मिन-सेओक और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बीच बैठक हुई, उसके कुछ ही दिन बाद अमेरिका ने टैरिफ बढ़ा दिया. इससे पता चलता है कि दो उच्चस्तरीय नेताओं के बीच बैठकों के बावजूद दोनों देशों में एक-दूसरे की चिंताओं को लेकर समझ की कमी बनी हुई हैं. बड़े नेताओं के अलावा, दोनों देशों के विदेश और उद्योग मंत्री भी मिलते रहते हैं, फिर भी बातचीत में कोई ठोस सफलता नहीं मिली. ये दोनों पक्षों के बीच संचार की खामी को उजागर करता है. यहां तक कि प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति की बैठक के तुरंत बाद स्थापित हेल्पलाइन भी इस मुद्दे को सुलझाने में कोई खास भूमिका नहीं निभा सकी.
ये असहमति दो मुद्दों के कारण पैदा हुई है. पहला, क्या व्यापार समझौते को समझौता ज्ञापन यानी मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग माना जाना चाहिए या संधि, और क्या इसके लिए राष्ट्रीय सभा की मंजूरी आवश्यक है? दूसरा, कोरियाई खजाने पर बोझ डालने वाले 350 अरब डॉलर के निवेश पैकेज के मद्देनजर, समीक्षा और मंजूरी प्रक्रिया की अनुमानित लागत.
दूसरा मुद्दा रणनीति से जुड़ा है. दक्षिण कोरिया पर दबाव बनाने के लिए टैरिफ का इस्तेमाल करना एक स्पष्ट राजनीतिक संकेत देता है. कूपैंग मामले और नेटवर्क कानून के लागू होने के बाद टैरिफ लागू होना कई सवाल खड़े करता है. इससे ये ज़ाहिर होता है कि ट्रंप प्रशासन रियायतें हासिल करने या असहमति को अपने हिसाब से सुलझाने के लिए टैरिफ को एक शक्तिशाली हथियार मानता है. हालांकि, इस तरीके को दक्षिण कोरिया के आंतरिक मामलों में दखलंदाज़ी के तौर पर देखा जा सकता है, और इससे विरोध भी भड़क सकता है. इस पूरे घटनाक्रम ने दक्षिण कोरिया की राजनीतिक रणनीति की कमियों को भी उजागर किया है. ली प्रशासन की समझौते को 'ट्रंप-प्रूफ' बनाने में असमर्थता ये दिखाती है कि उसकी तुष्टीकरण नीति से कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है. अमेरिका में भारी पैमाने पर निवेश करने का वादा करने के बावजूद, दक्षिण कोरिया को ट्रंप प्रशासन ने अतिरिक्त समय नहीं दिया.
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा हर कीमत पर अपनी बात मनवाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे उपकरणों से संबंधित है. द्विपक्षीय व्यापार मुद्दों को हल करने के लिए बार-बार टैरिफ का उपयोग दोनों देशों के बीच दशकों से विकसित हो रहे भरोसे को कमज़ोर करता है. ये समझौते को लेकर ट्रंप प्रशासन की प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाता है, जिसमें स्पष्ट रूप से आकस्मिक स्थितियों को ध्यान में रखा गया है. उदाहरण के लिए, समझौते में कहा गया है कि "अगर ऐसा प्रतीत होता है कि समझौता ज्ञापन में किए गए वादों को पूरा करने से बाजार में अस्थिरता पैदा हो सकती है" तो अमेरिका ऐसे अनुरोध खुले मन से विचार करेगा. सहयोगी देश की चिंताओं को नज़रअंदाज़ करना और रणनीति के तौर पर अमेरिका द्वारा अतिवादी रुख अपनाने से कोरिया के लोगों में थोड़ी नाराज़गी है. दक्षिण कोरिया अपनी तरफ से अमेरिका में निवेश करने के रास्ते तलाश रहा है. इस सबके बीच दोनों देशों के बीच चल रही अंतहीन टैरिफ वार्ता अनिश्चितता और अस्थिरता पैदा कर रही है. इससे व्यापारिक और सुरक्षा संबंध भी प्रभावित हो रहे हैं.
टैरिफ को दोबारा लागू करने के ट्रंप के फैसले को अलग-थलग करके देखने की बजाए ली प्रशासन के हालिया फैसलों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. कोरिया ने हाल ही में संशोधित सूचना एवं संचार नेटवर्क अधिनियम पारित किया. इसके बाद कूपैंग के ख़िलाफ की गई कार्रवाई ने दक्षिण कोरिया के प्रति ट्रंप प्रशासन की नाराज़गी को और बढ़ा दिया है. ट्रंप प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से इस कानून के लागू होने और कूपैंग की जांच, दोनों पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की. वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दक्षिण कोरिया के प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान अमेरिकी तकनीकी कंपनियों पर जुर्माना लगाने के ख़िलाफ चेतावनी दी. यहां तक कि कोरिया स्थित अमेरिकी दूतावास ने भी विज्ञान-सूचना और संचार प्रौद्योगिकी मंत्री को चिट्ठी लिखकर कोरियाई सरकार द्वारा उठाए गए हालिया कदमों पर असंतोष व्यक्त किया. अमेरिका इसे अक्टूबर 2025 के पूर्व हुए समझौते का उल्लंघन मानता है. चिट्ठी में अमेरिकी कंपनियों और उनके अधिकारियों के ख़िलाफ भेदभाव को रोकने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया, जिन्हें "डिजिटल सेवाओं से संबंधित कानूनों और नीतियों के संदर्भ में गैरज़रूरी बाधाओं का सामना करना पड़ता है. इसमें नेटवर्क उपयोग शुल्क और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म नियम शामिल हैं."
दक्षिण कोरिया पर अपनी नीतियों को अमेरिका के अनुरूप ढालने का दबाव डाला जा रहा है. सहयोगियों के साथ मनमर्जी और अतिवादी दृष्टिकोण अपनाकर संबंध स्थापित करने से गठबंधन में गंभीर दरारें पैदा हो जाती हैं. इससे दक्षिण कोरिया में अमेरिका से दूरी बनाकर आर्थिक और सैन्य सहयोग का विविधीकरण करने की वकालत करने वाली आवाज़ों को ताकत मिलती है.
शुरुआत में ही संकेत मिल गए थे कि दक्षिण कोरिया द्वारा अमेरिकी कंपनियों के ख़िलाफ की जा रही कार्रवाइयों से अमेरिका नाखुश है. उदाहरण के लिए, कूपैंग मामले के मद्देनजर, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने दक्षिण कोरिया की अपनी यात्रा रद्द कर दी. ये अमेरिकी कंपनियों के प्रति सियोल के रवैये को लेकर वाशिंगटन की बढ़ती असंतुष्टि का पहला संकेत था. इसी तरह, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की चेतावनियों को दक्षिण कोरिया ने नज़रअंदाज़ कर दिया गया. दक्षिण कोरिया ने व्यापार समझौते की स्पष्ट सफलता पर भरोसा करते हुए अमेरिका से आ रहे संकेतों को गलत समझा. इससे ये स्पष्ट होता है कि ट्रंप प्रशासन के साथ संबंध स्थापित करने का पुराना तरीका अब कारगर नहीं रहा. अमेरिका से स्थिर और लगातार सहयोग पाने के लिए, सियोल को ट्रंप प्रशासन को गहराई से समझना होगा. अमेरिका के साथ संबंध स्थापित करने के लिए एक संशोधित ढांचा तैयार करना होगा.
इसके अलावा, अमेरिका के राजनीतिक माहौल में हो रहे बदलावों को समझने में दक्षिण कोरिया धीमी गति से काम कर रहा है. ये भी अमेरिकी की नाराज़गी की एक वजह है. अमेरिका-दक्षिण कोरिया संबंधों पर निर्णय लेने की शक्ति तेजी से व्हाइट हाउस यानी राष्ट्रपति में केंद्रित हो रही है. इससे गठबंधन के राजनीतिकरण और निजी व्यावसायिक हितों के प्रभाव का ख़तरा बढ़ रहा है. हालांकि, पिछली सरकारों को भी नीतिगत मुद्दों पर मतभेदों का सामना करना पड़ा था, लेकिन उनका अन्य क्षेत्रों पर व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा, न ही उनका इस्तेमाल सहयोगियों पर दबाव बनाने के लिए किया गया. ट्रंप प्रशासन के तहत, दक्षिण कोरिया का अमेरिका के साथ जुड़ाव अपने साझेदारों के राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा हितों के प्रति बढ़ती उपेक्षा को दिखाता है.
इस सबके बावजूद, ये कहना होगा कि ट्रंप जिस तरह एकतरफा कदम उठआते हैं, उससे अमेरिका की दीर्घकालिक विश्वसनीयता और भरोसे को ठेस पहुंचती है. इससे रक्षा और सुरक्षा साझेदारी के राजनीतिकरण को लेकर चिंताएं भी बढ़ जाती हैं. दक्षिण कोरिया पर अपनी नीतियों को अमेरिका के अनुरूप ढालने का दबाव डाला जा रहा है. सहयोगियों के साथ मनमर्जी और अतिवादी दृष्टिकोण अपनाकर संबंध स्थापित करने से गठबंधन में गंभीर दरारें पैदा हो जाती हैं. इससे दक्षिण कोरिया में अमेरिका से दूरी बनाकर आर्थिक और सैन्य सहयोग का विविधीकरण करने की वकालत करने वाली आवाज़ों को ताकत मिलती है. इनका कहना है कि दक्षिण कोरिया को भी कनाडा और यूरोप से प्रेरणा लेकर आत्मनिर्भर होने पर ज़ोर देना चाहिए. अब तक, दक्षिण कोरिया और जापान समेत कई अन्य देशों ने काफ़ी हद तक अमेरिका को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी दे रखी है. अगर ट्रंप इसी तरह मनमाने फैसले लेते रहे तो गठबंधन में दरार पैदा हो सकती है.
अभिषेक शर्मा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में जूनियर फेलो हैं.
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Abhishek Sharma is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. His research focuses on the Indo-Pacific regional security and geopolitical developments with a special ...
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