क्या अमेरिका और भारत मौजूदा हालत में टैरिफ से आगे बढ़कर अपने मेल-मिलाप के सामरिक तर्क को फिर से ज़िंदा कर सकते हैं?
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भू-राजनीति में दोस्ती की ज़ुबान अक्सर, ताक़त के दांव-पेंच को पर्दे के पीछे छुपा देती है.
पिछले महीने अमेरिका ने रूस से लगातार कच्चा तेल ख़रीदने का हवाला देकर अपने यहां आने वाले भारत के सामानों पर 50 प्रतिशत की भारी दर से व्यापार कर (टैरिफ) लगा दिया था. ये टैरिफ 27 अगस्त 2025 से लागू हो गईं. अमेरिका जो आम तौर पर अपने कूटनीतिक संकेतों को लेकर बहुत सतर्क रहता है, उसने इस क़दम को ‘रूस पर दोहरा दबाव बनाने के लिए आवश्यक क़दम’ बताकर जायज़ ठहराया. हालांकि, पर्यवेक्षकों की नज़र में तो ये मामला बिल्कुल साफ़ था कि अमेरिका ने ये क़दम रूस या फिर चीन पर दबाव बनाने के लिए नहीं, बल्कि ख़ुद भारत को दबाव में लाने के लिए किया था.
भारत को लंबे वक़्त से अमेरिका अपना ‘सामरिक साझीदार’ और चीन के विस्तारवाद के मुक़ाबले में खड़ी मज़बूत दीवार बताता रहा है. लेकिन, अब भारत उसकी एक दंडात्मक आर्थिक कार्रवाई के निशाने पर है. ये पल हैरान करने वाले हैं. मामला न केवल व्यापार नीति का है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में आ रहे बदलावों की गहरी दरार का भी संकेत देते हैं.
टैरिफ का ये हालिया मामला हमें 1930 के स्मूट-हॉली टैरिफ एक्ट की याद दिलाता था. इस क़ानून ने अमेरिका द्वारा आयात किए जाने वाले 20 हज़ार सामानों पर व्यापार कर बढ़ा दिया था. उस वक़्त अमेरिका का इरादा अपने घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना था; अमेरिका के इस क़दम के जवाब में दूसरे देशों ने भी उस पर टैरिफ थोप दिया था, जिससे महामंदी का संकट और गहरा हो गया था.
रूस का तेल ख़रीदने के मामले में भारत इस मामले में अकेला नहीं है. चीन उससे कहीं ज़्यादा मात्रा में रूस से तेल ख़रीदता है. लेकिन, चीन के उलट भारत को अभी भी कमज़ोर किरदार के तौर पर देखा जाता है. भारत में रूस के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन रोमन बाबुश्किन के शब्दों में कहें तो, भारत पर दबाव बनाने का अमेरिका का फ़ैसला ‘अन्यायोचित और इकतरफ़ा’ है. फिर भी ये क़दम अमेरिका की लंबे समय से चली आ रही परंपरा की ही नई कड़ी है: जिसके तहत आर्थिक हथियारों को विदेश नीति के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है.
टैरिफ का ये हालिया मामला हमें 1930 के स्मूट-हॉली टैरिफ एक्ट की याद दिलाता था. इस क़ानून ने अमेरिका द्वारा आयात किए जाने वाले 20 हज़ार सामानों पर व्यापार कर बढ़ा दिया था. उस वक़्त अमेरिका का इरादा अपने घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना था; अमेरिका के इस क़दम के जवाब में दूसरे देशों ने भी उस पर टैरिफ थोप दिया था, जिससे महामंदी का संकट और गहरा हो गया था. आज टैरिफ के वार को भू-राजनीतिक दांव कहकर जायज़ ठहाराया जा रहा है. हालांकि, जोखिम वैसा ही बना हुआ है: इसके ऐसे नतीजे देखने को मिल सकते हैं, जिनका हिसाब नहीं लगाया गया और इससे गठबंधनो में दरारें आने का भी अंदेशा है.
आर्थिक रूप से देखा जाए तो ये सबसे कम असरदार नीतिगत क़दम माने जाते हैं. जैसा कि विश्व बैंक के एक पूर्व अर्थशास्त्री ने एक बार कहा था कि, ‘टैरिफ अपने देश के ग्राहकों पर लगाए गए टैक्स हैं, जिन्हें किसी और के नाम पर थोपा जाता है.’
परिभाषा की बात करें, तो टैरिफ आयातों पर लगने वाले कर होते हैं. ट्रंप ने भारत पर जो 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है, इसका बोझ पूरी तरह से भारत के निर्यातकों कोर ही नहीं उठाना पड़ेगा—आख़िर में इसकी चोट अमेरिका के आयातकों, वितरकों और ग्राहकों पर भी पड़ेगी. इससे चीज़ों के दाम बढ़ेंगे. भारत के कपड़ा, दवा, IT सेवाएं और गाड़ियों के कल-पुर्ज़े जैसी चीज़ें—जो अमेरिका को भारत के 38 अरब डॉलर के आयात में योगदान देने वाले मुख्य सामान हैं—उनको इस टैरिफ का झटका पहले लगेगा.
भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ की नीति, जो आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की बात करती है, उससे अमेरिका में बहुत से लोग पहले से ही भौंहें सिकोड़ रहे हैं. रत के नियामक संस्थानों की बढ़ती सक्रियता को भी अमेरिका में एक तबक़ा, स्वदेशी को बढ़ावा देने की नीति का ही विस्तार मानता है.
2014 में भारत कुल निर्यात में अमेरिका का हिस्सा लगभग 32 फ़ीसद था. इस वक़्त भारत, अमेरिका से 43 अरब डॉलर का सामान ख़रीदता है और भारत से व्यापार में अमेरिका को 45 अरब डॉलर का घाटा हो रहा है. इतना भारी टैरिफ लगने के बाद भारत के उद्यमियों के लिए अमेरिका के बाज़ार तक पहुंच कम होने का विकल्प तलाशना दुश्वार होगा.
टैरिफ को केवल यूक्रेन मसले से जोड़कर देखने का मतलब बड़ी सामरिक तस्वीर की अनदेखी करना होगा.
भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ की नीति, जो आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की बात करती है, उससे अमेरिका में बहुत से लोग पहले से ही भौंहें सिकोड़ रहे हैं. रत के नियामक संस्थानों की बढ़ती सक्रियता को भी अमेरिका में एक तबक़ा, स्वदेशी को बढ़ावा देने की नीति का ही विस्तार मानता है. हाल के दिनों में भारत ने बिग टेक और अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनियों पर सख़्ती से नियम लागू किए हैं. अमेरिका की दवा कंपनियां, डिजिटल सेवाएं और ख़ुदरा कारोबार की बड़ी कंपनियों को भारत में विनियमन की नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
फिर मामला राजनीति का भी है. संरक्षणवादी नीतियां अमेरिका के दोनों दलों के बीच लोकप्रिय है. टैरिफ को घरेलू राजनीतिक संकेत का ज़रिया मान लिया गया है, जिससे विदेश में अमेरिका की ताक़त का संदेश जाता है, तो घरेलू तबक़े को ख़ुश किया जाता है.
इस बीच, भारत के यूक्रेन मसले पर खुलकर पश्चिम के ख़ेमे में खड़े होने से इनकार करने, संयुक्त राष्ट्र में लाए गए प्रस्तावों के दौरान गैरहाज़िर रहने और ऊर्जा बाज़ार में लगातार रूस से संबंध बनाए रखने से अमेरिका के नीति निर्माताओं में खीझ पैदा हुई है. एक वक़्त में भारत की जिस सामरिक स्वायत्तता की तारीफ़ की जाती थी, अब वही, तनाव की वजह बन रही है.
इस खेल में कोई स्पष्ट विजेता तो नहीं दिख रहा है. हो सकता है कि कुछ अमेरिकी निर्माताओं को भारत के प्रतिद्वंदियों की तुलना में फ़ौरी राहत मिल सकती है. लेकिन, ज़्यादातर ग्राहकों के लिए भारत के आयातों- फिर चाहे वो जेनेरिक दवाएं हों, कपड़े या फिर सॉफ्टवेयर- उनकी क़ीमत बढ़ेगी. भारत के निर्यातकों, ख़ास तौर से टेक्सटाइल और आईटी के लिए नुक़सान बहुत अधिक होगा, और जहां तक भारत और अमेरिका के रिश्तों का सवाल है, तो उसमें भरोसे का अभाव हो जाएगा.
अमेरिका के उकसावे के बावजूद, भारत उकसावे में नहीं फँसा, कम से कम अब तक तो नहीं. ये उल्लेखनीय है कि इस वक़्त रूस, भारत के कुल तेल आयात के 40 फ़ीसद यानी लगभग 25 करोड़ टन सालाना की आपूर्ति करता है. ऊर्जा सुरक्षा कोई विवेकाधीन संबंध नहीं होता और दांव पर बहुत कुछ लगा है. भारत का व्यापार घाटा इस वक़्त 60 अरब डॉलर के आस-पास है. ऐसे में सस्ता तेल व्यापक आर्थिक दृष्टि से आवश्यक है.
सवाल तो ये है कि क्या भारत और अमेरिका इस हाथ ले, उस हाथ दे वाली राजनीति से ऊपर उठकर उस सामरिक तर्क को स्वीकार करेंगे, जो अब तक उनके मेल-मिलाप का आधार रहा था: यानी ज़्यादा टुकड़ों में बंटी दुनिया में लोकतांत्रिक देशों को साझा सोच तैयार करनी होगी.
हालांकि, भारत को ये भी पता है कि आर्थिक रूप से पूरी तरह रूस पर निर्भर करना भी अव्यवहारिक है. अमेरिका अभी भी भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार और तकनीक, निवेश और रक्षा उपकरणों का प्रमुख स्रोत है. इस वक़्त दोनों देशों के बीच अमेरिका से GE के जेट इंजन के एक अरब डॉलर के सौदे की बात चल रही है. ये इंजन भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम में काम आएंगे. इसी से दोनों देशों के रिश्तों की जटिलता उजागर हो जाती है.
ये सवाल बना हुआ है कि भारत को किस तरह अमेरिका को जवाब देना चाहिए? ज़ाहिर है जवाबी टैरिफ लगाना या जैसे को तैसा वाली कूटनीति तो नहीं चलेगी. इसके बजाय भारत लंबी रेस पर दांव लगा सकता है:
आसियान, अफ्रीका और यूरोपीय संघ के साथ मज़बूत संबंध विकसित करके निर्यात के ठिकानों में विविधता लाए.
रूपए और रूबल में व्यापार का विस्तार करे और ऐसी वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्थाएं विकसित करे, जो डॉलर पर कम निर्भर हों.
घरेलू सुधार करके भारत अपने आपको वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में चीन के बेहतर विकल्प के तौर पर पेश करे.
हिंद प्रशांत आर्थिक रूप-रेखा (IPEF) जैसे व्यापारिक गठबंधनों को मज़बूत करे और उन बहुपक्षीय मंचों से दोबारा जुड़े, जहां अब तक भारत हाशिए पर ही रहा है.
इतिहास इसकी मिसाल पेश करता है. 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में जब भारत को मदद देने से मना कर दिया गया था और परमाणु नीति को लेकर दबाव बनाया जा रहा था, तो भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाज़े खोले, नए गठबंधन बनाए और अधिक सहनशील बनकर उभरा. कई बार विपरीत हालात भी परिवर्तन का कारण बनते हैं.
असल सवाल ये नहीं है कि टैरिफ से नुक़सान होगा. यक़ीनन उनका दुष्प्रभाव तो होगा ही. सवाल तो ये है कि क्या भारत और अमेरिका इस हाथ ले, उस हाथ दे वाली राजनीति से ऊपर उठकर उस सामरिक तर्क को स्वीकार करेंगे, जो अब तक उनके मेल-मिलाप का आधार रहा था: यानी ज़्यादा टुकड़ों में बंटी दुनिया में लोकतांत्रिक देशों को साझा सोच तैयार करनी होगी.
जैसा कि राजनीति वैज्ञानिक जोसेफ नाई ने एक बार कहा था, ‘ताक़त न केवल दबाव बनाने की क्षमता है, बल्कि आकर्षित करने की भी है.’ दोनों देशों को समझना होगा कि दांव पर कितना कुछ लगा है.
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With over four decades at the forefront of public service and international corporate strategic advisory, Mr. Shamim is a distinguished expert in fiscal policy, trade ...
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