साने ताकाइची के ताइवान संबंधी बयान के बाद जापान-चीन रिश्तों में बढ़ता तनाव और क्षेत्रीय सुरक्षा की चुनौतियां सामने आई हैं. इसके राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक असर जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें.
ताकाइची के ताइवान पर पहले दिए गए बयानों ने चुनाव अभियान में विदेश नीति को एक प्रमुख मुद्दा बना दिया है जिससे चीन के साथ तनाव बढ़ा है और कड़ी सुरक्षा नीति का संकेत मिला है. साने ताकाइची ने प्रधानमंत्री बनने के सिर्फ तीन महीने बाद ही 8 फरवरी को अचानक चुनाव कराने की घोषणा कर दी. इस फैसले का मुख्य उद्देश्य अपने नीतिगत कार्यक्रमों के लिए जनता से सीधा समर्थन प्राप्त करना और जापान की संसद के निचले सदन में अपनी पार्टी, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) की स्थिति को और मजबूत बनाना है. अचानक चुनाव बुलाकर वे यह दिखाना चाहती हैं कि सरकार के फैसलों के पीछे जनता का भरोसा और जनादेश मौजूद है.
इस चुनाव अभियान में सबसे अधिक जोर घरेलू आर्थिक मुद्दों पर दिया जा रहा है. लोगों की रोज़मर्रा की समस्याएँ-जैसे बढ़ती महंगाई, टैक्स में राहत, वेतन बढ़ोतरी, सरकारी सब्सिडी और सामाजिक कल्याण योजनाएँ-मुख्य चर्चा का विषय हैं. आम नागरिकों के खर्च का बोझ कम करना और आय बढ़ाने के उपायों को पार्टी प्रमुख वादों के रूप में पेश कर रही है. हालांकि ध्यान आर्थिक मुद्दों पर है लेकिन विदेश नीति और कूटनीति को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है. एलडीपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में विदेश नीति को पाँच प्रमुख स्तंभों में शामिल किया है.
साने ताकाइची ने प्रधानमंत्री बनने के सिर्फ तीन महीने बाद ही 8 फरवरी को अचानक चुनाव कराने की घोषणा कर दी. इस फैसले का मुख्य उद्देश्य अपने नीतिगत कार्यक्रमों के लिए जनता से सीधा समर्थन प्राप्त करना और जापान की संसद के निचले सदन में अपनी पार्टी, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थिति को और मजबूत बनाना है.
घोषणापत्र जारी करते समय एलडीपी की पॉलिसी रिसर्च काउंसिल के अध्यक्ष ताकायुकी कोबायाशी ने कहा कि बल प्रयोग करके यथास्थिति बदलने के प्रयास जैसे जटिल संकट अब दुनिया भर में सामान्य हो गए हैं. उन्होंने कहा कि जापान एक ऐसी व्यवस्था बनाएगा जो नए दौर की चुनौतियों का जवाब दे सके और “अंत तक अपनी रक्षा” कर सके. परंपरागत रूप से एलडीपी के चुनावी घोषणापत्रों में ताइवान का सीधा उल्लेख नहीं होता था. लेकिन इस बार यह परंपरा टूटी है और घोषणापत्र में साफ लिखा है कि ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता महत्वपूर्ण है.
ताइवान का मुद्दा ताकाइची के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया. पिछले साल प्रतिनिधि सभा की बजट समिति की बैठक में विपक्षी दल के वरिष्ठ नेता कात्सुया ओकादा ने उनसे 2024 के एलडीपी नेतृत्व चुनाव के दौरान दिए गए उनके बयान पर सवाल किया. उस समय ताकाइची ने कहा था कि यदि चीन ताइवान की नौसैनिक नाकेबंदी करता है, तो यह जापान के लिए “अस्तित्व के लिए खतरे” वाली स्थिति हो सकती है. प्रधानमंत्री के रूप में अपने शुरुआती जवाब में उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति का निर्णय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.
लेकिन आगे दबाव पड़ने पर ताकाइची ने कहा कि यदि चीन ताइवान के खिलाफ सैन्य बल का उपयोग करता है, जैसे नौसैनिक नाकेबंदी, तो यह संभवतः जापान के अस्तित्व के लिए खतरा माना जाएगा और जापान को जवाब देना पड़ेगा. इसका मतलब यह था कि जापान सैन्य प्रतिक्रिया दे सकता है और 2016 के शांति एवं सुरक्षा कानून के तहत सामूहिक सुरक्षा प्रावधान लागू कर सकता है. बाद में जापानी अधिकारियों ने कहा कि उनका बयान बिना तैयारी के दिया गया था. टोक्यो का आधिकारिक रुख हमेशा यही रहा है कि ताइवान मुद्दे का समाधान शांतिपूर्ण संवाद से होना चाहिए. फिर भी, एक प्रधानमंत्री के बयान को “अनौपचारिक” बताकर अलग करना मुश्किल साबित हुआ और सफाई देर से आई.
चीन ने कड़ी निंदा की और जापान के सैन्यवाद और औपनिवेशिक इतिहास का हवाला देते हुए टोक्यो पर आक्रामकता का आरोप लगाया. ताकाइची ने बाद में माना कि उनका बयान “सरकार की स्थापित नीति से आगे” था, क्योंकि पहले किसी जापानी प्रधानमंत्री ने ताइवान को लेकर संभावित सैन्य संघर्ष को “अस्तित्व के लिए खतरा” नहीं कहा था. फिर भी उन्होंने अपना बयान वापस नहीं लिया.
आगे दबाव पड़ने पर ताकाइची ने कहा कि यदि चीन ताइवान के खिलाफ सैन्य बल का उपयोग करता है, जैसे नौसैनिक नाकेबंदी, तो यह संभवतः जापान के अस्तित्व के लिए खतरा माना जाएगा और जापान को जवाब देना पड़ेगा. इसका मतलब यह था कि जापान सैन्य प्रतिक्रिया दे सकता है और 2016 के शांति एवं सुरक्षा कानून के तहत सामूहिक सुरक्षा प्रावधान लागू कर सकता है.
जापान के नियंत्रण वाले सेनकाकू द्वीप (चीन में दियाओयू) पर चीन का दावा और ऐतिहासिक विवाद पूर्वी चीन सागर में अस्थिरता बनाए रखते हैं. यह अक्सर विमान गश्त और चीनी जहाज़ों के जापानी जलक्षेत्र में प्रवेश से दिखता है. हालांकि ताकाइची ऐसा बयान देने वाली पहली प्रधानमंत्री हैं, एलडीपी के वरिष्ठ नेता पहले भी ऐसा कह चुके हैं. 2021 में तत्कालीन उप प्रधानमंत्री तारो आसो ने कहा था कि “यदि ताइवान में बड़ी समस्या होती है, तो यह जापान के अस्तित्व के लिए खतरे से जुड़ी हो सकती है.” तब भी चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी. ताकाइची के ताइवान संबंधी बयानों से पहले से तनावपूर्ण जापान–चीन संबंध और खराब हुए हैं. बीजिंग ने जवाबी कदम उठाए, जिनमें जापानी समुद्री खाद्य आयात पर रोक और कुछ उड़ानों व शिपिंग सेवाओं का निलंबन शामिल है. जापान में बचे अंतिम दो पांडा भी चीन लौट गए, जिससे 1972 से चल रही “पांडा कूटनीति” समाप्त हो गई.
ताइवान चीन के लिए सबसे संवेदनशील रणनीतिक मुद्दा है, लेकिन अन्य संरचनात्मक कारण भी तनाव बढ़ाते हैं. सेनकाकू द्वीप विवाद और ऐतिहासिक शिकायतें पूर्वी चीन सागर में अस्थिरता बनाए रखती हैं. सरकारी और सोशल मीडिया में ओकिनावा के पुराने रयुक्यू साम्राज्य के इतिहास को उभारकर अलगाववादी चर्चा को बढ़ावा देने की कोशिश की जाती है और वहाँ अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के खिलाफ स्थानीय विरोध का फायदा उठाया जाता है. इससे तनाव का गैर-सैन्य पहलू भी जुड़ता है.
जापान की भौगोलिक स्थिति भी उसकी कमजोरी है. योनागुनी ताइवान से सिर्फ 111 किलोमीटर दूर है और ओकिनावा में जापान में मौजूद अधिकांश अमेरिकी सेना तैनात है. चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच जापान और अमेरिका ने दक्षिण-पश्चिमी द्वीपों में अपनी सैन्य तैयारी बढ़ाई है. चीन राजनीतिक दबाव भी बढ़ा रहा है और सरकारी सूचना माध्यमों का उपयोग कर रहा है. ओकिनावा की पहचान और इतिहास को लेकर चलाए जा रहे प्रचार से टोक्यो और स्थानीय जनता के बीच दूरी पैदा करने की कोशिश होती है. बढ़ते सुरक्षा जोखिम और जापान–अमेरिका सुरक्षा संधि के तहत अमेरिकी सेना की भूमिका के बावजूद, ओकिनावा के निवासियों की चिंताओं पर टोक्यो और वॉशिंगटन ने सीमित ध्यान दिया है. चीन इस असंतोष का उपयोग रणनीतिक लाभ के लिए करता है.
सरकार मानती है कि पुराने ढांचे और नीतियाँ अब बदलती परिस्थितियों के लिए पर्याप्त नहीं हैं इसलिए नई रणनीति में रक्षा तैयारी, सैन्य क्षमता, सहयोगी देशों के साथ तालमेल और सीमा सुरक्षा पर ज्यादा जोर दिया जाएगा. कुल मिलाकर, यह कदम बताता है कि जापान अपनी सुरक्षा नीति को तेजी से बदलती क्षेत्रीय स्थिति के अनुसार ढाल रहा है.
ताकाइची का ताइवान पर कड़ा रुख घरेलू राजनीति में लोकप्रिय रहा है. जनमत सर्वेक्षण बताते हैं कि जापान में ताइवान के समर्थन में भावना मजबूत है-74 प्रतिशत लोग ताइवान जलडमरूमध्य में सक्रिय जुड़ाव के पक्ष में हैं. एक सर्वे में 44.4 प्रतिशत लोगों ने चीन के प्रति उनके कड़े रुख का समर्थन किया, जबकि 21.8 प्रतिशत ने विरोध किया. चुनाव नजदीक आते समय उनकी कुल स्वीकृति रेटिंग ऊँची बनी हुई है. अलग-अलग सर्वेक्षणों में यह 59 प्रतिशत से लगभग 70 प्रतिशत तक है. इससे संकेत मिलता है कि वे दूसरी बार सरकार बना सकती हैं.
आने वाले महीनों में ताइवान और चीन से जुड़े मुद्दों पर क्षेत्रीय और घरेलू स्तर पर करीबी नजर रखी जाएगी. अमेरिका जापान की सुरक्षा के अधिकार का समर्थन करता है, लेकिन भारत सहित क्षेत्रीय साझेदारों ने सीधी प्रतिक्रिया कम दी है. भारत ने संतुलित और सावधान रुख अपनाया है-जापान के साथ साझेदारी मजबूत रखते हुए ताकाइची के ताइवान संबंधी बयानों का न तो खुला समर्थन किया है, न आलोचना. यह हिंद-प्रशांत में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को दिखाता है.
ताकाइची ने 2026 के दूसरे भाग में नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और रक्षा नीति दस्तावेज जारी करने की योजना घोषित की है. आमतौर पर ऐसे बड़े सुरक्षा दस्तावेज कई सालों के अंतराल पर बदले जाते हैं, लेकिन इस बार दिसंबर 2022 में हुए पिछले अपडेट के सिर्फ चार साल के भीतर ही दोबारा बदलाव की तैयारी हो रही है. यह दिखाता है कि जापान अपने सुरक्षा माहौल को लेकर पहले से ज्यादा सतर्क और गंभीर हो गया है.
इसके पीछे मुख्य कारण चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां, ताइवान को लेकर तनाव और पूरे क्षेत्र में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियां हैं. सरकार मानती है कि पुराने ढांचे और नीतियाँ अब बदलती परिस्थितियों के लिए पर्याप्त नहीं हैं इसलिए नई रणनीति में रक्षा तैयारी, सैन्य क्षमता, सहयोगी देशों के साथ तालमेल और सीमा सुरक्षा पर ज्यादा जोर दिया जाएगा. कुल मिलाकर, यह कदम बताता है कि जापान अपनी सुरक्षा नीति को तेजी से बदलती क्षेत्रीय स्थिति के अनुसार ढाल रहा है.
पूर्णेंद्र जैन एडिलेड विश्वविद्यालय के एशियाई अध्ययन विभाग में एमेरिटस प्रोफेसर हैं.
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Purnendra Jain is Emeritus Professor in the Department of Asian Studies at the University of Adelaide. Recipient of the Japanese Emperors Order of the Rising ...
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