Author : Purnendra Jain

Expert Speak Raisina Debates
Published on Nov 07, 2025 Updated 0 Hours ago

जापान की सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक ही महिला आवाज़ सुनाई दे रही है साने ताकाइची की, जिसने सदी पुरानी राजनीति की दीवारों को हिला दिया है. लेकिन सवाल ये है क्या यह बदलाव इतिहास बनाएगा या बस एक चमकदार शुरुआत बनकर रह जाएगा?

जश्न के बाद सियासत का असली चेहरा—कैसे संभालेंगी ताकाइची?

जापान की नई प्रधानमंत्री साने ताकाइची  ने 21 अक्टूबर 2025 को पद संभाला और इसी के साथ वह देश के 140 साल के संवैधानिक इतिहास में पहली महिला प्रधानमंत्री बन गईं. हालांकि उनका कार्यकाल एक सकारात्मक माहौल और लोकप्रियता के साथ शुरू हुआ है लेकिन आगे की राह चुनौतियों से भरी दिख रही है, खास तौर पर घरेलू मोर्चे पर. 

  • प्रधानमंत्री बनते ही ताकाइची की लोकप्रियता 74 प्रतिशत तक पहुंच गई — हाल के वर्षों में किसी भी नए प्रधानमंत्री के लिए रिकॉर्ड स्तर.

  • ताकाइची की शुरुआती विदेश नीति सक्रिय रही — ASEAN, APEC सम्मेलनों और ट्रंप, शी जिनपिंग, ली जे-म्युंग व नरेंद्र मोदी से बातचीत के साथ उन्होंने वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज की.

ताकाइची ने पार्टी के भीतर हुए कड़े मुकाबले में जीत हासिल कर नेतृत्व संभाला. उन्होंने इससे पहले दो बार प्रधानमंत्री पद के लिए कोशिश की थी लेकिन सफल नहीं हो पाई थीं.

इस बार स्थिति पहले से अलग थी क्योंकि इशिबा के कार्यकाल में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) ने संसद के दोनों सदनों में बहुमत खो दिया था. पहले जहां पार्टी का नेता अपने आप प्रधानमंत्री बन जाता था, अब ताकाइची को यह पद पाने के लिए गठबंधन और समर्थन जुटाना पड़ा.

पुराने साथी से दूरी, नया गठबंधन

उनकी पुरानी सहयोगी पार्टी कोमेतो (Komeito) ने ताकाइची के कड़े राष्ट्रवादी और रूढ़िवादी रुख के कारण 26 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया. कोमेतो का मानना था कि ताकाइची के नेतृत्व में उनकी पार्टी की नीतिगत भूमिका कमजोर पड़ जाएगी. इसके बाद ताकाइची ने विपक्षी दल जापान इनोवेशन पार्टी (Ishin) के साथ समझौता किया, जिसने सरकार को बाहर से समर्थन देने पर सहमति जताई. हालांकि दोनों दलों के पास पूर्ण बहुमत नहीं था लेकिन कुछ स्वतंत्र सांसदों के समर्थन से ताकाइची ने सरकार बना ली और इतिहास रच दिया.

शुरुआती लोकप्रियता

प्रधानमंत्री बनते ही ताकाइची की लोकप्रियता आसमान छूने लगी. कई सर्वेक्षणों में उनकी समर्थन दर 74 प्रतिशत तक पहुंच गई जो हाल के वर्षों में किसी भी नए प्रधानमंत्री के लिए रिकॉर्ड है. लोगों को उनसे उम्मीद है कि वे अर्थव्यवस्था, महंगाई, सामाजिक सुरक्षा और प्रवासियों से जुड़ी चिंताओं पर ठोस कदम उठाएंगी.

इसके अलावा पद संभालने के कुछ ही दिनों में ताकाइची ने विदेश नीति में सक्रियता दिखाते हुए ASEAN शिखर सम्मेलन (मलेशिया) में हिस्सा लिया और वहां ऑस्ट्रेलिया व फिलीपींस के नेताओं से मुलाकात की.
इसके बाद वे तुरंत टोक्यो लौटीं, जहां उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का स्वागत किया. 

आमतौर पर जापानी प्रधानमंत्री वॉशिंगटन जाकर अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलते हैं लेकिन इस बार उल्टा हुआ—ट्रम्प खुद टोक्यो आए थे. दोनों नेताओं ने मुलाकात को "जापान-अमेरिका गठबंधन के नए स्वर्ण युग" की शुरुआत बताया. ताकाइची और ट्रम्प के बीच व्यक्तिगत तालमेल भी दिखाई दिया—दोनों ने एक-दूसरे को पहले नाम से संबोधित किया.

भारत पड़ोसी देशों से संबंध

इसके बाद ताकाइची ने दक्षिण कोरिया में APEC सम्मेलन में हिस्सा लिया और वहां दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से अलग-अलग मुलाकात की. जहां कोरिया और चीन, ताकाइची के राष्ट्रवादी रुख और यासुकुनी श्राइन की उनकी यात्राओं से असहज हैं, वहीं मुलाकातों का माहौल सकारात्मक बताया गया.
शी जिनपिंग से हुई बातचीत में दोनों नेताओं ने कहा कि संवाद और सहयोग जारी रहेगा, हालांकि ताकाइची ने चीन के पूर्वी चीन सागर में बढ़ती सैन्य गतिविधियों और सेंकाकू द्वीपों पर तनाव का मुद्दा भी उठाया.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ताकाइची की अब तक आमने-सामने मुलाकात नहीं हुई है लेकिन टेलीफोन पर दोनों नेताओं ने "मुक्त और खुले इंडो-पैसिफिक" के लिए मिलकर काम करने पर सहमति जताई. 

चुनौतियों भरा भविष्य

हालांकि ताकाइची की शुरुआत बेहद उत्साहजनक रही है लेकिन उनके सामने कई घरेलू चुनौतियाँ हैं जैसे कि अर्थव्यवस्था, महंगाई, टैक्स, सामाजिक सुरक्षा और विदेशी नागरिकों से जुड़ी नीतियाँ. उनकी सरकार अकेली पार्टी पर आधारित है और कानून पारित करने के लिए उन्हें विपक्षी दलों के सहयोग की जरूरत होगी. उनकी सहयोगी पार्टी Ishin भी अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहती है जैसे कि टोक्यो के साथ ओसाका को "दूसरी राजधानी" बनाना, सांसदों की संख्या घटाना और टैक्स कम करना.

ऐसे में अगर ताकाइची लोकप्रिय बनी रहती हैं और नीतिगत सफलता दिखाती हैं तो वे 2028 से पहले अचानक चुनाव बुला सकती हैं. अब सबकी निगाहें इस पर हैं कि क्या वह अपने गुरु शिंजो आबे की तरह लंबे समय तक स्थिर नेतृत्व दे पाएंगी  या फिर जापान की राजनीति में एक और "रिवॉल्विंग डोर" प्रधानमंत्री बन जाएंगी.


(पुर्णेंद्र जैन, यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडेलेड (University of Adelaide) के एशियन स्टडीज़ विभाग में एमेरिटस प्रोफेसर हैं.)

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