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Published on Apr 14, 2026 Updated 1 Days ago

कभी-कभी किसान को मुफ्त बिजली तो मिलती है लेकिन वह समय पर नहीं मिलती. कभी रात भर इंतज़ार तो कभी अनिश्चित आपूर्ति. इसी समस्या का समाधान बन रहा है डे-टाइम पावर और भरोसेमंद बिजली सुधार. समझिए डे-टाइम पावर क्या है और यह बदलाव क्यों इतना महत्वपूर्ण है.

दिन में बिजली = असली सुधार? समझिए पूरा खेल

भारत के बिजली क्षेत्र में एक बड़ी समस्या छिपी हुई है. बिजली कंपनियाँ जितना बिल बनाती हैं, किसान जितना भुगतान करते हैं और सरकार जितनी सब्सिडी देती है, इनके बीच का पैसा ‘कृषि हानि’ में चला जाता है. इसमें असली नुकसान, चोरी, खराब व्यवस्था और पारदर्शिता की कमी शामिल हो सकती है. यह खामोशी तब तक संभालने योग्य थी जब बिजली नीति समय-समय पर मिलने वाले बेलआउट (आर्थिक राहत पैकेज) पर निर्भर रह सकती थी. लेकिन नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण, बढ़ते वित्तीय दबाव और विश्वसनीय बिजली की बढ़ती मांग के दौर में यह अब संभव नहीं है. 

भारत में बदलाव सिर्फ बिजली बनाने तक नहीं, बल्कि लोगों तक सही तरीके से पहुँचाने पर निर्भर है. इसका आसान समाधान यह है कि किसानों को दिन में तय समय पर भरोसेमंद बिजली मिले. यही सबसे सरल और असरदार सुधार है, जिसे सरकार और लोग दोनों आसानी से अपना सकते हैं.

2017–18 से 2022–23 के बीच भारत की वितरण कंपनियों पर वित्तीय दबाव गंभीर बना रहा. पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन की 2022–23 की रिपोर्ट के अनुसार, DISCOMs का कुल घाटा बढ़कर 57,223 करोड़ रुपये हो गया. यही कारण है कि कृषि बिजली अब केवल कल्याणकारी मुद्दा नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक समस्या बन गई है. यह DISCOMs की बैलेंस शीट को प्रभावित करती है, और वही बैलेंस शीट नेटवर्क निवेश को तय करती है. बिजली के तार और सिस्टम में किया गया निवेश ही तय करता है कि हमें बिजली कितनी ठीक और लगातार मिलेगी, उद्योग कितने मजबूत होंगे और नई ऊर्जा अपनाना कितना सस्ता या महंगा होगा. भारत में बदलाव सिर्फ बिजली बनाने तक नहीं, बल्कि लोगों तक सही तरीके से पहुँचाने पर निर्भर है. इसका आसान समाधान यह है कि किसानों को दिन में तय समय पर भरोसेमंद बिजली मिले. यही सबसे सरल और असरदार सुधार है, जिसे सरकार और लोग दोनों आसानी से अपना सकते हैं.

महाराष्ट्र का सौर मॉडल

महाराष्ट्र ने कृषि फीडरों के सौरिकीकरण (solarisation) के माध्यम से इस दिशा का एक स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है. ‘मुख्यमंत्री सौर कृषि वाहिनी योजना 2.0’ के तहत राज्य ने शुरुआत में 2025 तक लगभग 7,000 मेगावाट विकेंद्रीकृत सौर क्षमता के माध्यम से 30% कृषि फीडरों को सौर ऊर्जा से जोड़ने का लक्ष्य रखा था. सितंबर 2024 के सरकारी निर्णय के अनुसार इस लक्ष्य को बढ़ाकर 16,000 मेगावाट कर दिया गया, ताकि 100% कृषि पंप उपभोक्ताओं को दिन में बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके. इसका तर्क सरल है: दिन में, फीडर के नजदीक बिजली उपलब्ध कराना-कम सब्सिडी बोझ और बेहतर सेवा गुणवत्ता के साथ.

व्यवहार में मुफ्त बिजली का अर्थ अक्सर अनुपयोगी बिजली होता है. यह अंतर महत्वपूर्ण है. सब्सिडी को राजनीतिक रूप से लाभ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है

वास्तव में किसान वर्तमान व्यवस्था को ‘मुफ्त बिजली’ के रूप में अनुभव नहीं करते. उनके लिए यह अनियमित आपूर्ति, खराब पंप, जले हुए ट्रांसफॉर्मर और रातभर बिजली का इंतजार करने की मजबूरी है. व्यवहार में मुफ्त बिजली का अर्थ अक्सर अनुपयोगी बिजली होता है. यह अंतर महत्वपूर्ण है. सब्सिडी को राजनीतिक रूप से लाभ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन किसानों के लिए यह अनिश्चितता का प्रतीक है, न कि सुविधा का. सिंचाई की योजना ठीक से नहीं बन पाती-कभी अधिक पानी दिया जाता है, तो कभी कम. मरम्मत का खर्च किसानों को खुद उठाना पड़ता है, भले ही टैरिफ सब्सिडी वाला हो. ऐसी स्थिति में केवल मीटरिंग या कीमत सुधार पर आधारित सुधार सफल नहीं हो सकते. सुधार तभी सफल होगा जब उसे विश्वसनीय सेवा के रूप में प्रस्तुत किया जाए.

दिन में बिजली आपूर्ति का महत्व हमेशा से रहा है, लेकिन अब यह पहले की तुलना में अधिक व्यवहारिक हो गया है. सौर ऊर्जा ने इस व्यवस्था को आर्थिक रूप से संभव बना दिया है, क्योंकि सबसे सस्ती नई बिजली उत्पादन तकनीक अब कृषि पंपिंग के प्राकृतिक समय (दिन) से मेल खाती है.

किसान अनिश्चित बिजली से बेहतर तय समय पर मिलने वाली सीमित बिजली को ज्यादा पसंद करते हैं. अगर बिजली तय समय पर, सही वोल्टेज के साथ मिले, तो यह मुफ्त लेकिन अनियमित बिजली से ज्यादा उपयोगी होती है. इससे मोटर कम खराब होती है, ट्रांसफॉर्मर पर कम दबाव पड़ता है और किसान आसानी से सिंचाई की योजना बना लेते हैं. इससे एक साफ व्यवस्था बनती है, जिससे बिजली कंपनियों की जिम्मेदारी तय होती है. पहले भी दिन में बिजली जरूरी थी, लेकिन अब सौर ऊर्जा से यह आसान हो गया है. साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ने से फीडर स्तर पर पारदर्शिता की कमी ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है. खराब मीटरिंग, अनियंत्रित लोड और सही अंतर न समझ पाने से बिजली प्रबंधन पर असर पड़ रहा है, और वित्तीय दबाव भी सुधार की जरूरत बढ़ा रहा है.

भारत सरकार ने भी ‘रीवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम (RDSS)’ के तहत फीडर पृथक्करण को बढ़ावा देकर इसी दिशा में कदम बढ़ाया है. फरवरी 2025 तक इस योजना के अंतर्गत 40,509 करोड़ रुपये के कार्य स्वीकृत किए जा चुके थे, जिनमें 31,119 फीडर शामिल हैं. यह एक महत्वपूर्ण संकेत है कि जो सुधार पहले राजनीतिक रूप से कठिन माना जाता था, वह अब संचालन की दृष्टि से व्यावहारिक, वित्तीय रूप से आकर्षक और तकनीकी रूप से संभव बन चुका है.

बिजली सुधार ही भूजल सुधार है

एक महत्वपूर्ण सच यह भी है, जिसे बिजली क्षेत्र की बहसों में अक्सर नजरअंदाज किया जाता है-बिजली सुधार दरअसल दूसरे तरीके से भूजल सुधार ही है. भारत के कई हिस्सों में सब्सिडी वाली और बिना मीटर की कृषि बिजली ने भूजल निकालने की सीमांत लागत लगभग शून्य कर दी है. इसका परिणाम अनुमानित ही रहा है: जलभंडार (aquifers) तेजी से खत्म हुए हैं और फसल पैटर्न पानी-गहन फसलों की ओर शिफ्ट हो गया है. इस प्रकार बिजली नीति चुपचाप जल नीति बन गई है, हालांकि राज्य इसे शायद ही स्वीकार करता है.

पंजाब इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब के 20 में से 19 जिले अतिदोहनश्रेणी में आते हैं. यह केवल जल संकट का आंकड़ा नहीं है, बल्कि बिजली व्यवस्था का भी संकेत है-क्योंकि यही बिजली व्यवस्था इस अत्यधिक पंपिंग को बढ़ावा देती है. डे-टाइम बिजली आपूर्ति (दिन में बिजली) का समाधान अपने आप में भूजल संकट को खत्म नहीं करता, लेकिन यह संचालन की अनुशासन प्रणाली को बदल देता है. यह किसानों को रात भर पंप चलाने की प्रवृत्ति से दूर करता है और अनियोजित दोहन की बजाय निर्धारित समय पर सिंचाई की ओर प्रेरित करता है. यह किसानों की व्यावहारिक सोच के अनुरूप है. जल-संकट वाले राज्यों में यह एक बड़ा राजनीतिक और पर्यावरणीय लाभ है. इस प्रकार दिन में बिजली आपूर्ति जल सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है.

दिन में भरोसेमंद बिजली

कृषि के लिए दिन में भरोसेमंद बिजली देना एक-एक कदम में किया जाने वाला काम है. पहला कदम है तैयारी-अलग फीडर बनाना, ट्रांसफॉर्मर ठीक करना, सही वोल्टेज रखना और मीटर लगाना ताकि बिजली की मात्रा मापी जा सके. दूसरा कदम है भरोसा बनाना-तय समय पर बिजली देना, उसका शेड्यूल पहले से बताना और खासकर सिंचाई के समय शिकायतों को जल्दी ठीक करना.

सुधार तभी वास्तविक बनता है जब किसान बिजली कंपनी को एक अनुबंधित सेवा प्रदाता के रूप में अनुभव करता है, न कि एक अनिश्चित व्यवस्था के रूप में.

सुधार तभी वास्तविक बनता है जब किसान बिजली कंपनी को एक अनुबंधित सेवा प्रदाता के रूप में अनुभव करता है, न कि एक अनिश्चित व्यवस्था के रूप में. इसके बाद ही तीसरा चरण-डिजिटल अनुकूलन (remote switching, pump controllers, automation आदि)-वास्तव में उपयोगी होता है. भारत में अक्सर बुनियादी ढांचा सुधार इसलिए विफल हो जाता है क्योंकि डिजिटल परिवर्तन की घोषणा पहले कर दी जाती है, जबकि आधारभूत संरचना तैयार नहीं होती.

जब कृषि बिजली सब्सिडी की लागत को DISCOM की मुख्य बैलेंस शीट से अलग (ring-fence) कर दिया जाता है, तो कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति अधिक स्पष्ट और संभावित रूप से मजबूत हो जाती है. इसके लिए संस्थागत ढांचे की आवश्यकता होती है. न्यूनतम सुधार के रूप में DISCOM के भीतर कृषि वितरण को अलग से परिभाषित करना चाहिए-अलग लेखांकन, ऑडिटेड सब्सिडी दावे, फीडर-स्तरीय रिपोर्टिंग और आपूर्ति की गुणवत्ता व समय से जुड़े प्रदर्शन मानक. इससे सब्सिडी पारदर्शी, सीमित और नियंत्रित बन जाती है.

बड़े राज्यों में फीडर सोलराइजेशन और ग्रामीण नेटवर्क सुधार के लिए एक विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) बनाना आवश्यक हो सकता है, जो खरीद, कार्यान्वयन और पूंजी जुटाने का काम DISCOM की कमजोर बैलेंस शीट से अलग होकर करे. इससे निवेश सुरक्षित रहेगा और कृषि बिजली आपूर्ति प्राथमिकता बन सकेगी. जब सब्सिडी की लागत अलग कर दी जाती है, तो DISCOM एक व्यावसायिक रूप से अनुशासित संस्था के रूप में काम कर सकता है, जो भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता की बिजली प्रदान करे-वे उपभोक्ता जो वर्तमान में कृषि क्रॉस-सब्सिडी का भार उठा रहे हैं.

व्यापक लाभ और राजनीतिक आयाम

इसके व्यापक लाभ भी होंगे. उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में मार्च 2023 तक लगभग 47.56 लाख कृषि पंप संचालित थे, जो कृषि बिजली की विशाल मांग को दर्शाता है. इतने बड़े स्तर पर बिजली आपूर्ति को अपारदर्शी रखना पूरी बिजली अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है. उद्योग और वाणिज्यिक उपभोक्ता उच्च टैरिफ के रूप में इसका बोझ उठाते हैं, जबकि DISCOM कमजोर नकदी प्रवाह और कम निवेश से जूझता है.

बिजली सुधार अक्सर नीति घोषणा के स्तर पर विफल नहीं होता; यह तब विफल होता है जब कृषि बिजली को अनौपचारिक राजनीतिक व्यवस्था से हटाकर एक निगरानी योग्य सेवा दायित्व में बदलना पड़ता है. यह वह क्षण होता है जब फीडर शेड्यूल का पालन करना पड़ता है, सब्सिडी दावे मापी गई आपूर्ति पर आधारित होते हैं, और स्थानीय राजनीति को अनियमित हस्तक्षेप छोड़ना पड़ता है.

अब समय है कि अनिश्चितता नहीं, बल्कि भरोसेमंद बिजली को बढ़ावा दिया जाए.

अनुभव बताता है कि इसी समय सुधार धीमा पड़ जाता है. जब तक यह सिर्फ योजना या घोषणा रहता है, लोग इसका समर्थन करते हैं. लेकिन जैसे ही जिम्मेदारी तय होती है और काम पारदर्शी बनता है, लोग हिचकिचाने लगते हैं.

गुजरात की ‘ज्योतिग्राम योजना’ और महाराष्ट्र की ‘मुख्यमंत्री सौर कृषि वाहिनी योजना’ यह दिखाती हैं कि यह केवल सैद्धांतिक विचार नहीं, बल्कि व्यवहारिक और राजनीतिक रूप से संभव मॉडल है. जब किसानों को भरोसेमंद बिजली, साफ व्यवस्था और तय सेवा मिलती है, तो सुधार लंबे समय तक चलता है और लोग उसे आसानी से स्वीकार कर लेते हैं.

डे-टाइम पावर कॉम्पैक्ट: नया नीति ढांचा

कृषि बिजली सुधार सिर्फ तकनीकी मामला नहीं है, यह भारत के औद्योगिक भविष्य से भी जुड़ा है. यह उद्योगों की प्रतिस्पर्धा, डिजिटल ढांचे और डेटा सेंटर जैसी जरूरतों को प्रभावित करता है, जिन्हें लगातार अच्छी बिजली चाहिए. कमजोर DISCOM यह भरोसा नहीं दे पाते. इसलिए डे-टाइम पावर कॉम्पैक्ट को सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक समझौता मानना चाहिए. इसमें किसान अनियमित और असीमित बिजली की आदत छोड़ता है और सरकार पारदर्शिता लाती है. इससे सब्सिडी साफ और सीमित होती है, आर्थिक स्थिति सुधरती है और पानी बचाने में मदद मिलती है. अब समय है कि अनिश्चितता नहीं, बल्कि भरोसेमंद बिजली को बढ़ावा दिया जाए.

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