Author : Arpan Tulsyan

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Published on Apr 22, 2026 Updated 1 Days ago

आज सवाल सिर्फ “कितना स्क्रीन-टाइम?” का नहीं है बल्कि “स्क्रीन पर क्या और कैसे?” का है- यही तय करेगा कि बच्चा सीख रहा है या सिर्फ समय गंवा रहा है. जानिए कैसे अगर स्क्रीन को किताब, खेल और नींद के साथ संतुलन में रखा जाए तो वही मोबाइल बच्चों का सबसे बड़ा शिक्षक बन सकता है.

क्लासरूम अब जेब में है- फायदा या फंदा?

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भारत की मध्यम आयु 28 वर्ष है और इसकी 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र की है. अनुमान है कि 2055 तक भारत दुनिया का सबसे युवा देश बना रहेगा. इसकी युवा और बड़ी जनसंख्या हमेशा एक महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ के रूप में देखी जाती है, हालांकि हमें खुद-ब-खुद जनसांख्यिकी का लाभ नहीं मिलेगा. यह मानव-पूंजी की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, जो बचपन से ही आकार लेने लगती है- स्कूली शिक्षा के दौरान, जो अब तेज़ी से डिजिटल होती जा रही है.

पिछले दस साल में भारत डिजिटल की तरफ़ तेज़ी से बढ़ा है. देश में इंटरनेट उपयोगकर्ता की कुल संख्या 2014 में 25 करोड़ थी, जो सितंबर 2025 तक 1.02 अरब हो गई. इनमें से 50 करोड़ लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं. सस्ते स्मार्टफ़ोन और किफ़ायती डाटा ने भारत को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफ़ोन बाज़ार बना दिया है. यहां लगभग 75 करोड़ स्मार्टफ़ोन हाथों में हैं. प्रति उपयोगकर्ता औसत मासिक डाटा ख़पत भी काफ़ी बढ़ा है, लगभग 399 गुना.

छात्रों के लिए इसका अर्थ है, शैक्षिक सामग्रियों तक अधिक पहुंच, रुकावटों के दौरान भी पठन-पाठन और ज्ञान के नए रूपों से परिचय. हालांकि, इस बदलाव ने मानव-पूंजी में एक नया पहलू भी जोड़ दिया है- डिजिटल जुड़ाव की तीव्रता और प्रकृति. ASER के 2024 के सर्वेक्षण से पता चलता है कि लगभग 82.2 प्रतिशत किशोर (14-16 वर्ष) स्मार्टफ़ोन का उपयोग करना जानते हैं, पर सिर्फ़ 57 प्रतिशत इसका उपयोग शैक्षिण कामों में करते हैं. 76 प्रतिशत इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से सोशल मीडिया के लिए करते हैं.

अनुमान है कि 2055 तक भारत दुनिया का सबसे युवा देश बना रहेगा. इसकी युवा और बड़ी जनसंख्या हमेशा एक महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ के रूप में देखी जाती है, हालांकि हमें खुद-ब-खुद जनसांख्यिकी का लाभ नहीं मिलेगा. यह मानव-पूंजी की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, जो बचपन से ही आकार लेने लगती है, स्कूली शिक्षा के दौरान, जो अब तेज़ी से डिजिटल होती जा रही है.

कई अध्ययन यह भी बताते हैं कि बच्चों में स्क्रीन-टाइम बढ़ गया है. नेशनल काउंसिल ऑफ सीबीएसई स्कूल्स (NCCS) का अध्ययन कहता है कि देश में लगभग 74 प्रतिशत छात्र हर रोज़ दो घंटे से अधिक समय गैर-शैक्षणिक कामों के लिए स्मार्टफ़ोन पर बिताते हैं, जिनमें से लगभग 21 प्रतिशत प्रतिदिन चार घंटे से अधिक का समय ख़र्च करते हैं. शहरी क्षेत्रों के 49 प्रतिशत माता-पिता मानते हैं कि उनके बच्चे हर रोज़ तीन घंटे से अधिक समय सोशल मीडिया, वीडियो, ओटीटी और ऑनलाइन गेम में बिताते हैं. पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे भी रोज़ाना औसतन 2.22 घंटे ख़र्च करते हैं, जो भारतीय बाल रोग अकादमी (IAP) द्वारा अनुशंसित एक घंटे प्रतिदिन से काफ़ी अधिक है.

इन सबसे बच्चों पर कई तरह के गलत प्रभाव पड़ते हैं. जैसे-

संज्ञात्मक-प्रभाव: एकाग्रता में कमी, समझने की क्षमता का कमज़ोर होना, याद रखने की क्षमता घट जाना.

स्वास्थ्य-संबंधी प्रभाव: पोस्चर संबंधी बदलाव, दृष्टि दोष, नींद में कमी, शारीरिक गतिविधियों में गिरावट और मोटापे का ख़तरा.

व्यवहार-संबंधी बदलाव: तनाव और चिंता बढ़ना, गुस्सा आना, अपने शरीर को लेकर धारणा ख़राब होना और सामाजिक-भावनात्मक कौशल विकास में कमी.

समय-संबंधी प्रभाव: पढ़ने, घरेलू काम और सामाजिक मेल-जोल के लिए वक़्त न मिलना.

इसीलिए, डिजिटल पहुंच से शैक्षिक लाभ तो मिल रहा है, लेकिन इसकी कुछ अन्य सच्चाइयां भी सामने आ रही हैं. यही कारण है कि अब डिजिटल उपकरणों तक पहुंच सुनिश्चित करने की ही नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने की नीतिगत चुनौती है कि इनसे बच्चों में सीखने की समझ कमज़ोर होने के बजाय मज़बूत बने.

स्क्रीन-टाइम से लेकर सुरक्षा तक

छात्रों और डिजिटल प्रौद्योगिकी को लेकर भारत की नीतिगत सोच में बड़ा बदलाव आया है. अब डिजिटल प्रौद्योगिकी के सतर्क इस्तेमाल और बाल संरक्षण सुनिश्चित करने पर अधिक ज़ोर दिया जाने लगा है. इतना ही नहीं, राज्य अब बच्चों के डिजिटल जीवन को मानसिक स्वास्थ्य, सुरक्षा, अधिकारों और प्लेटफॉर्म संचालन संबंधी दिशा-निर्देशों की नज़र से देखने लगे हैं.

शहरी क्षेत्रों के 49 प्रतिशत माता-पिता मानते हैं कि उनके बच्चे हर रोज़ तीन घंटे से अधिक समय सोशल मीडिया, वीडियो, ओटीटी और ऑनलाइन गेम में बिताते हैं. पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे भी रोज़ाना औसतन 2.22 घंटे ख़र्च करते हैं, जो भारतीय बाल रोग अकादमी (IAP) द्वारा अनुशंसित एक घंटे प्रतिदिन से काफ़ी अधिक है.

पुराने नीतिगत ढांचों में भी इसकी झलक दिखती है. जैसे- डिजिटल शिक्षा के लिए 2020 में जारी PRAGYATA (प्रज्ञाता) दिशा-निर्देश भले मौजूदा शैक्षिक ढांचे के अनुसार बनाया गया है, लेकिन इसमें छात्रों की भलाई, सुरक्षा, अभिभावकों की निगरानी और उम्र के अनुसार स्क्रीन-टाइम से जुड़े मुद्दों को भी शामिल किया गया है. इसी तरह, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में शिक्षा की पहुंच, नवाचार और गुणवत्ता में प्रौद्योगिकी की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई है, पर इसमें ‘संभावित जोखिमों और ख़तरों’ की चर्चा भी की गई है. विशेष रूप से छात्रों में डिवाइस की लत जैसे मुद्दों पर अध्ययन करने की सिफ़ारिश यह करती है.

साल 2022 में, IAP ने अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला था कि बहुत कम उम्र से और ज़्यादा समय तक स्क्रीन देखने से बच्चे हानिकारक रूप से प्रभावित होते हैं. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में पहली बार ‘डिजिटल लत’ पर एक खंड शामिल किया गया, जिसमें स्क्रीन-टाइम को कम करने के लिए कई उपायों की सिफ़ारिश की गई, जैसे- डिफॉल्ट सेटिंग में उम्र की सीमा तय करना, स्कूलों में डिजिटल स्वास्थ्य पाठ्यक्रम और अनिवार्य शारीरिक गतिविधियां, प्रौद्योगिकी मुक्त-क्षेत्र बनाना, जागरूकता कार्यक्रम, अभिभावकों के लिए कार्यशालाएं आदि.

बाल अधिकारों और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले संस्थानों ने इस ओर ध्यान देना शुरू कर दिया है. राज्यों में भी इसको लेकर नीतियां बनाई जा रही हैं. महाराष्ट्र ने नाबालिगों पर सोशल मीडिया के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए एक विशेष कार्यबल बनाया है, जबकि कर्नाटक छोटे बच्चों के लिए मोबाइल और सोशल मीडिया के उपयोग पर सख़्त नियम बनाने जा रहा है. डिजिटल उपयोग को लेकर इन नीतिगत प्रयासों की ज़रूरत है, विशेष रूप से जब देश की मानव-पूंजी ख़तरे में हो.

डिजिटल शिक्षा: अवसर, जोखिम और समाधान  

देश में शिक्षा की पहुंच बढ़ने के बावजूद सीखने के परिणामों, रोज़गार-क्षमता और कौशल विकास को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं, जिस कारण मानव-पूंजी को लेकर चुनौतियां कायम हैं. यदि डिजिटल व्यवस्था इसे और कमज़ोर करती है, तो चुनौतियां गंभीर हो सकती हैं. बच्चों की शिक्षा पर शुरू से ही ध्यान न दिया जाए, तो देश की उत्पादकता, आय और आर्थिक विकास पर गहरा असर पड़ सकता है. इससे ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के फलने-फूलने की संभावना कमज़ोर पड़ने लगती है. इसलिए, इसके समाधान के लिए एक संतुलित नीतिगत नज़रिया की ज़रूरत है, जो छात्रों की डिजिटल पहुंच को मानव-पूंजी से जोड़कर देखे. इसके लिए कुछ सुझाव इस प्रकार हैं.

यदि डिजिटल व्यवस्था इसे और कमज़ोर करती है, तो चुनौतियां गंभीर हो सकती हैं. बच्चों की शिक्षा पर शुरू से ही ध्यान न दिया जाए, तो देश की उत्पादकता, आय और आर्थिक विकास पर गहरा असर पड़ सकता है. इससे ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के फलने-फूलने की संभावना कमज़ोर पड़ने लगती है.

  • स्कूलों में डिजिटल उपकरणों के उपयोग, स्क्रीन-टाइम और शिक्षा के साथ उसके तालमेल को लेकर स्पष्ट नियम बनने चाहिए, पर बच्चों में ध्यान बढ़ाने वाले तरीकों पर अधिक ज़ोर देना चाहिए. बच्चों में ध्यान की स्थिति, स्क्रीन-टाइम और उनके डिजिटल व्यवहार को मापने की व्यवस्था भी शिक्षा निगरानी तंत्र में होनी चाहिए.

  • शिक्षकों को न सिर्फ़ डिजिटल उपकरणों के उपयोग, बल्कि इसको लेकर भी प्रशिक्षण दिया जाए कि डिजिटल कक्षाओं में बच्चों का ध्यान बना रहे. डिजिटल उपकरणों के अधिक इस्तेमाल को पहचानने और उस अनुरूप शिक्षण रणनीति बनाने की कला भी उनको सिखानी चाहिए.

  • OECD और UNICEF जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन अभिभावकों के हस्तक्षेप को सबसे प्रभावी उपाय मानते हैं, इसलिए घर पर डिजिटल दिनचर्या को निर्देशित करने, सोने से पहले स्क्रीन का उपयोग न करने और विद्यालयों (अभिभावक-शिक्षक मीटिंग), आंगनबाड़ियों व डिजिटल साक्षरता अभियानों के माध्यम से उपयोग-संबंधी जागरूकता बढ़ाने के लिए सरकार को राष्ट्रीय अभियान चलाने चाहिए.

  • यह जांचने की ज़रूरत भी बढ़ रही है कि डिजिटल मंच छात्रों के व्यवहार को किस तरह प्रभावित करते हैं, विशेषकर ऑटोप्ले, नोटिफिकेशन और टारगेटेड रिकमेंडेशन के ज़रिये. इन मंचों को बच्चों की सोच के हिसाब से विकसित और डिजाइन करने के मानक बनाने चाहिए, ताकि वे अपने शैक्षिक लक्ष्यों के साथ उनको जोड़ सकें.

  • और आखिरी बात, छात्रों के स्क्रीन-टाइम, डिजिटल उपयोग के पैटर्न, नींद और स्वास्थ्य पर असर, सीखने की समझ पर प्रभाव जैसे मामलों पर राष्ट्रीय स्तर की निगरानी होनी चाहिए.

अब हमें यह तय करना ही होगा कि छात्रों की डिजिटल सहभागिता उद्देश्यपूर्ण, ढांचागत और सीखने की समझ के अनुसार विकसित हो.


अर्पण तुलस्यान ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में सीनियर फेलो हैं.

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