Author : Arpan Tulsyan

Expert Speak India Matters
Published on Dec 13, 2025 Updated 3 Days ago

हर माता-पिता जानना चाहता है कि उसका बच्चा स्कूल में वास्तव में क्या सीख रहा है लेकिन हमारे शिक्षा तंत्र में यह जानकारी अक्सर अदृश्य रहती है. यह लेख बताता है कि सीखने के परिणामों को सार्वजनिक करना किस तरह से इस चुप्पी को तोड़ सकता है.

क्या सच में स्कूल में सीख रहा बच्चा! नतीजे क्यों जरूरी?

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भारत की शिक्षा प्रणाली मुख्य रूप से सिर्फ़ सुविधाओं पर ध्यान देने के हिसाब से बनाई गई है. एक स्कूल की गुणवत्ता का आकलन अक्सर दिखाई देने वाले संकेतों से किया जाता है जैसे कि बुनियादी ढाँचा, व्यवस्थित कक्षाएँ, शिक्षकों की उपलब्धता और उच्च स्तरों के लिए, शायद एक कंप्यूटर लैब भी. हालाँकि ये सुविधाएँ मायने रखती हैं पर वे यह सुनिश्चित नहीं करती हैं कि इससे बच्चे कितनी आसानी से पढ़ सकते हैं या बुनियादी गणित की समस्याओं को हल कर सकते हैं. हालाँकि सीखने का डेटा वार्षिक शिक्षा रिपोर्ट या PARAKH जैसे सर्वेक्षणों के माध्यम से एकत्र किया जाता है जिसे जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर जुटाया जाता है, यह माता-पिता को उनके आस-पास के स्कूलों की गुणवत्ता के बारे में कोई जानकारी नहीं देता है.

  • माता-पिता को बच्चों की वास्तविक सीख की जानकारी नहीं
  • शिक्षा व्यवस्था का फोकस सुविधाओं पर, सीख पर नहीं
  • उपलब्ध डेटा अभिभावकों के लिए उपयोगी नहीं

बोर्ड की परीक्षाएँ, जो स्कूल स्तर पर एकमात्र मानकीकृत परीक्षाएँ हैं, केवल लगभग 20 प्रतिशत स्कूलों को ही कवर करती हैं इसलिए इन परीक्षाओं के आधार पर स्कूल की गुणवत्ता को तय करना संभव नहीं है.

अगर सरकारी और निजी, दोनों तरह के स्कूल हर साल बुनियादी साक्षरता या कक्षा-स्तर की दक्षता की जानकारी खुले तौर पर साझा करें तो सीखने की स्थिति साफ़ दिखाई देगी. इससे अभिभावकों को सवाल पूछने और सही चुनाव करने के लिए ज़रूरी जानकारी मिलेगी.

यदि स्कूल, सरकारी और निजी दोनों, खुले तौर पर बुनियादी साक्षरता या ग्रेड-स्तर की दक्षता को सालाना साझा करते हैं तो यह सीखने को दर्शनीय बना देगा, माता-पिता को प्रश्न पूछने या विकल्प देने के लिए जानकारी प्रदान करेगा. इस तरह की पारदर्शिता एक कट्टरपंथी प्रस्ताव नहीं है बल्कि कई देशों और क्षेत्रों में पहले से ही आम प्रथा है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के साथ  भारत में स्कूली शिक्षा भी इस बदलाव की ओर बढ़ रही है.

 

सीखने से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक करना क्यों ज़रूरी?

भारत की शिक्षा व्यवस्था में कमजोर सीखने के परिणाम लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहे हैं और पिछले कई वर्षों में इसमें खास सुधार नहीं हुआ है. हाल ही में जारी PARAKH (Performance Assessment, Review and Analysis of Knowledge for Holistic Development) के आँकड़ों के अनुसार, कक्षा 3 के 36 प्रतिशत बच्चे साधारण पाठ नहीं पढ़ पाते हैं और 40 प्रतिशत बच्चे बुनियादी गणित के सवाल हल नहीं कर पाते. हालांकि ये आँकड़े सीधे तौर पर तुलना योग्य नहीं हैं फिर भी राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS) 2021 और 2017 के नतीजों से भी पता चलता है कि कम से कम हर तीन में से एक बच्चे में आवश्यक न्यूनतम सीखने की क्षमता नहीं थी.

PARAKH के आँकड़ों के अनुसार, कक्षा 3 के 36 प्रतिशत बच्चे साधारण पाठ नहीं पढ़ पाते हैं और 40 प्रतिशत बच्चे बुनियादी गणित के सवाल हल नहीं कर पाते.

 

शिक्षा पर सरकार और घरेलू खर्च में वृद्धि के बावजूद सीखने के परिणामों का यह रूप देखने को मिलता है. 2021-22 (COVID वर्ष) को छोड़कर, स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग  के लिए आवंटन लगातार बढ़ रहा है.

Strengthening School Accountability In India Through Public Disclosure Of Learning Outcomes

Source: Prepared by the author using PARAKH 2024, NAS 2021, and NAS 2017

Strengthening School Accountability In India Through Public Disclosure Of Learning Outcomes

Source: Rana, Kapur, and Tamang, Foundation for Responsive Governance, 2025

 

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के 80वें दौर का हिस्सा, व्यापक मॉड्यूलर सर्वेक्षण (CMS, 2025) बताता है कि प्रति छात्र औसत घरेलू खर्च ग्रामीण क्षेत्रों में 8,382 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 23,470 रुपये है. सरकारी स्कूल अपेक्षाकृत सस्ते हैं- ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति छात्र 2,639 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 4,128 रुपये खर्च आते हैं. इसके विपरीत, निजी स्कूलों में खर्च काफी अधिक है- ग्रामीण इलाकों में 19,554 रुपये और शहरी इलाकों में 31,782 रुपये तक. निजी कोचिंग पर बढ़ती निर्भरता से खर्च और बढ़ जाता है. माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर लगभग 30 प्रतिशत छात्र ट्यूशन लेते हैं. वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर ट्यूशन का औसत खर्च ग्रामीण क्षेत्रों में 4,584 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 9,950 रुपये है.

कई देशों ने सीखने के नतीजों को सार्वजनिक करने की व्यवस्था लागू की है और इससे उन्हें अच्छे फायदे भी मिले हैं. इनमें यूनाइटेड किंगडम (यूके) की Ofsted की ऑनलाइन रिपोर्टें, ऑस्ट्रेलिया की “माय स्कूल” वेबसाइट, और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की स्कूलों की गुणवत्ता पर आधारित विस्तृत रिपोर्टें शामिल हैं. अमेरिका में भी यह पाया गया है कि “नो चाइल्ड लेफ्ट बिहाइंड” कानून से स्कूलों में औसत शैक्षणिक उपलब्धि बढ़ी है. भारत में भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP, 2020) ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है. इसमें स्टेट स्कूल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (SSSA) बनाने का प्रस्ताव है, जो सभी स्कूलों के लिए एक स्वतंत्र नियामक के रूप में काम करेगी. NEP के सेक्शन 8.5 (c) में बुनियादी मानकों पर न्यूनतम गुणवत्ता तय करने की बात कही गई है, जिसे पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक किया जाएगा ताकि लोगों की निगरानी और जवाबदेही बनी रहे. NEP का सेक्शन 8.7 यह भी बताता है कि स्कूलों और SSSA की वेबसाइटों पर सरकारी और निजी, दोनों तरह के स्कूलों के छात्रों के मूल्यांकन के समग्र परिणाम सार्वजनिक किए जाने चाहिए. इसके अलावा, नीति आयोग ने राज्यों के स्तर पर स्कूल शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक (SEQI) शुरू किया है ताकि सीखने के नतीजों पर ज़ोर दिया जा सके और हर राज्य की मज़बूतियों और कमज़ोरियों को समझा जा सके.


क्या सार्वजनिक प्रकटीकरण काम करते हैं?

सीखने के नतीजों को सार्वजनिक करने के असर को लेकर मिले-जुले सबूत सामने आए हैं. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के एक अध्ययन में पाया गया कि उच्च-आय वाले देशों में जवाबदेही से जुड़े उपायों का शिक्षा के नतीजों पर खास असर नहीं दिखा लेकिन कम और मध्यम आय वाले देशों में इन उपायों से पढ़ाई, गणित और विज्ञान में छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन पर कुछ सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले.

जब शिक्षक अपने छात्रों की सीखने की स्थिति को साफ़ और व्यवस्थित रूप में देखते हैं, तो वे अपनी पढ़ाने की रणनीतियों में बदलाव कर सकते हैं. वहीं, जब प्रधानाचार्य कक्षा-स्तर के रुझान देखते हैं तो वे बेहतर प्रशिक्षण का समर्थन कर सकते हैं या ज़रूरी संसाधनों में निवेश कर सकते हैं.

भारत में राजस्थान में किए गए एक पायलट कार्यक्रम में यह देखा गया कि जब परिवारों को स्कूलों के बीच और स्कूल के भीतर की गुणवत्ता से जुड़ी जानकारी दी गई तो निजी स्कूलों के छात्रों के टेस्ट स्कोर में काफ़ी सुधार हुआ. हालांकि सरकारी स्कूल शिक्षक चयन या संसाधनों के बँटवारे जैसी संरचनात्मक समस्याओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते थे फिर भी इन खुलासों से स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी और अगले शैक्षणिक वर्ष में बेहतर नतीजे देखने को मिले.

उच्च आय वाले देशों के अनुभव यह भी बताते हैं कि कुछ अनचाहे नतीजों से सावधान रहने की ज़रूरत है. उदाहरण के लिए, सार्वजनिक खुलासों से शैक्षणिक अलगाव बढ़ सकता है जहाँ शिक्षक अच्छे प्रदर्शन करने वाले छात्रों को बनाए रखने पर ज़्यादा ध्यान देते हैं या केवल उन्हीं विषयों पर ज़ोर देते हैं जिनकी परीक्षा होती है. कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि जवाबदेही से बचने के लिए स्कूल कमज़ोर प्रदर्शन करने वाले छात्रों को विशेष शिक्षा जैसी श्रेणियों में डाल देते हैं जिन्हें परीक्षाओं से बाहर रखा जाता है.

इसलिए ये मॉडल पूरी तरह परफ़ेक्ट नहीं हैं और भारत को इन्हें बिना सोचे-समझे अपनाने की ज़रूरत नहीं है लेकिन ये यह ज़रूर दिखाते हैं कि स्कूलों को सुधार के लिए प्रोत्साहन देना, अभिभावकों और समुदायों को सीखने की स्थिति की जानकारी देना और व्यापक स्तर पर केवल इनपुट आँकड़ों के पीछे छिपना सिस्टम के लिए मुश्किल बना देता है. इसी वजह से भारत पश्चिमी देशों के अनुभवों से सीख सकता है और उन्हें अपने संदर्भ में ढाल सकता है. इसमें ऐसे निष्पक्ष मूल्यांकन शामिल होने चाहिए जो स्कूलों की निगरानी या बदनाम करने के लिए नहीं बल्कि भरोसा बनाने के लिए हों. सही तरीके से किया गया पारदर्शिता का काम स्कूल की आंतरिक संस्कृति को भी मज़बूत करता है. जब शिक्षक छात्रों की सीखने की प्रोफ़ाइल को साफ़ और व्यवस्थित रूप में देखते हैं, तो वे अपनी पढ़ाने की रणनीतियाँ बेहतर बना सकते हैं. कुल मिलाकर, सीखने के नतीजों को सार्वजनिक करना कम लागत में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, स्कूलों की जवाबदेही बढ़ाने और अभिभावकों को बेहतर चुनाव का अवसर देने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है.

 

भारत के लिए आगे की राह

सीखने के नतीजों को सार्वजनिक करने से कई तरह के जोखिम भी हो सकते हैं. खराब नतीजों के लिए शिक्षकों को दोष दिया जा सकता है, अभिभावक आँकड़ों को गलत समझ सकते हैं और स्कूलों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा हो सकती है जिससे मूल्यांकन में हेरफेर का खतरा भी रहता है. इन चिंताओं को गंभीरता से समझना और दूर करना ज़रूरी है. एक संभावित समाधान यह हो सकता है कि स्कूलों की रैंकिंग बिल्कुल न की जाए. शुरुआत में रिपोर्ट सार्वजनिक करने के बजाय केवल स्कूलों, ब्लॉक अधिकारियों और राज्य स्तर के अधिकारियों के साथ साझा की जा सकती हैं. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी स्कूल की रिपोर्ट यह दिखाती है कि कक्षा 3 के छात्र पढ़ने में कमजोर हैं तो उसके बाद एक जाँच की जानी चाहिए ताकि यह समझा जा सके कि समस्या पढ़ाने के तरीके से जुड़ी है या सिस्टम से और फिर उसी अनुसार सहायता दी जाए. रिपोर्ट में केवल एक साल के अंक दिखाने के बजाय समय के साथ आए बदलाव और प्रगति को दिखाया जाना चाहिए ताकि ध्यान किसी एक साल की रैंक पर नहीं, बल्कि लगातार सुधार की दिशा पर रहे.

इसके अलावा, मूल्यांकन (आकलन) को भी बहुत सोच-समझकर तैयार किया जाना चाहिए. बहुत सीमित दायरे की परीक्षाएँ रटने पर ज़ोर देती हैं. ऐसी व्यापक परीक्षाएँ, जो समझ, तर्क और व्यवहारिक उपयोग को मापती हैं, केवल परीक्षा के लिए पढ़ाने की प्रवृत्ति को कम कर सकती हैं. नतीजों को सटीक रैंक देने के बजाय स्तरों में दिखाया जा सकता है जैसे शुरुआती, विकसित हो रहे या बेहतर परिणामों की रिपोर्टिंग सरल होनी चाहिए और आसानी से समझ आने वाले डैशबोर्ड के रूप में उपलब्ध होनी चाहिए.

सीखने के नतीजों को सार्वजनिक करना कम लागत में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, स्कूलों की जवाबदेही बढ़ाने और अभिभावकों को बेहतर चुनाव का अवसर देने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है.

यह भी ज़रूरी है कि समानता से जुड़े सुरक्षा उपाय बनाए जाएँ और नतीजों की निगरानी लिंग और सामाजिक समूहों के आधार पर की जाए ताकि यह समझा जा सके कि जानकारी सार्वजनिक करने से असमानताएँ बढ़ रही हैं या कम हो रही हैं. इसके साथ ही, सबसे गरीब समुदायों की सेवा करने वाले स्कूलों को अतिरिक्त वित्तीय सहायता और सहयोग देना भी महत्वपूर्ण है. समय-समय पर ऐसे अध्ययन किए जाने चाहिए जो यह परखें कि सार्वजनिक खुलासों का शिक्षकों के मनोबल और अभिभावकों के स्कूल चुनने के फैसलों पर क्या असर पड़ रहा है. इससे भारत उच्च आय वाले देशों में देखी गई सार्वजनिक खुलासों की गलतियों से बच सकेगा.

पूरे देश में लागू करने से पहले, भारत कुछ राज्यों या ज़िलों में चरणबद्ध, स्थिर और सावधानी से लागू किए गए पायलट कार्यक्रमों के ज़रिए स्कूल स्तर पर सार्वजनिक जानकारी साझा करने की शुरुआत कर सकता है. मूल रूप से, स्कूलों द्वारा सीखने के नतीजे सार्वजनिक करने का विचार केवल माप-तौल तक सीमित नहीं है बल्कि इस सोच पर आधारित है कि सीखने से जुड़ा डेटा एक सार्वजनिक संपदा और एक जाँच का साधन है जो बेहतर नतीजों को आगे बढ़ा सकता है और अभिभावकों को गुणवत्ता की माँग करने तथा समझदारी से स्कूल चुनने में मदद कर सकता है. अगर शुरुआत से ही समानता के सुरक्षा उपाय शामिल किए जाएँ .पायलट के ज़रिए परखे और सुधारे गए ऐसे मॉडल भारत को सीखने पर केंद्रित जवाबदेही प्रणाली की ओर एक भरोसेमंद और व्यावहारिक रास्ता दिखा सकते हैं.


अर्पण तुलस्यन, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के सेंटर फ़ॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में सीनियर फ़ेलो हैं.

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