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डेंगू अब भारत में सिर्फ मौसमी बीमारी नहीं रह गया है. साथ ही अब ये उन इलाकों तक फैल गया है जो पहले सुरक्षित माने जाते थे. ज़रूरत है कि अब देश अपनी मच्छर निगरानी प्रणाली को मज़बूत करें ताकि डेंगू को समय रहते रोका जा सके.
भारत में डेंगू बीमारी ना सिर्फ आम होती जा रही है बल्कि अब उन क्षेत्रों में भी फैल रही है जो पहले इसके प्रकोप से अछूते थे. ये बीमारी डेंगू वायरस (DENV) से संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलता है. एडीज़ एल्बोपिक्टस और एडीज़ एजिप्टी इस वायरस के मुख्य वाहक हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, 2025 तक भारत दुनिया के 30 सबसे ज़्यादा डेंगू प्रभावित देशों में शामिल हो जाएगा. ग्रामीण, अर्ध-शहरी और शहरी इलाकों में डेंगू के प्रकोप को रोकने की निगरानी प्रणाली स्थापित तो की गई है लेकिन इसके फैलने की रफ़्तार इतनी ज़्यादा है कि सारी प्रणालियां नाकाफ़ी साबित हो रही हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, 2025 तक भारत दुनिया के 30 सबसे ज़्यादा डेंगू प्रभावित देशों में शामिल हो जाएगा.
डेंगू के इलाज के लिए अभी तक कोई विशिष्ट दवा उपलब्ध नहीं है. फिलहाल बाज़ार में डेंगू की रोकथाम के लिए दो ही ऐसी वैक्सीन हैं जिन्हें लाइसेंस मिला हुआ है. ये वैक्सीन हैं CYD-TDV (डेंगवैक्सिया) और TAK-003 (क्यूडेंगा).
डेंगू के इलाज के लिए अभी तक कोई विशिष्ट दवा उपलब्ध नहीं है. फिलहाल बाज़ार में डेंगू की रोकथाम के लिए दो ही ऐसी वैक्सीन हैं जिन्हें लाइसेंस मिला हुआ है. ये वैक्सीन हैं CYD-TDV (डेंगवैक्सिया) और TAK-003 (क्यूडेंगा). विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ)ने अप्रैल 2018 में इन्हें लेकर संशोधित दिशानिर्देश जारी किए थे, इनके मुताबिक डेंगवैक्सिया का इस्तेमाल सिर्फ सीरोपॉज़िटिव व्यक्तियों पर ही किया जा सकता है. सीरोपॉजिटिव व्यक्ति उन्हें कहा जाता है, जिसके खून के सीरम (रक्त का एक पीला तरल भाग) में किसी बीमारी (जैसे कोविड-19 या एचआईवी)के लिए एंटीबॉडी मौजूद होते हैं. वहीं बात अगर क्यूडेंगा वैक्सीन की करें तो डब्ल्यूएचओ ने इसका इस्तेमाल 6-16 साल की उम्र वाले बच्चों पर करने की सिफारिश की है. भारत की पहली स्वदेशी डेंगू वैक्सीन यानी डेंगीऑल, तीसरे चरण के परीक्षण में है. विशिष्ट दवाओं का अभाव और वैक्सीन की सीमित पहुंच डेंगू की रोकथाम में बहुत बड़ी बाधा है. ऐसे में इस बीमारी पर नियंत्रण के लिए कीटविज्ञान संबंधी निगरानी अब भी एक प्रभावी रास्ता है. भारत की एकीकृत वेक्टर प्रबंधन (आईवीएम) रणनीति में इसे डेंगू नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है. हालांकि, कुछ राज्यों में मज़बूत ढांचा होने के बावजूद, ये कार्यक्रम अब भी संसाधनों की कमी से जूझ रहा है. विभिन्न एजेंसियों के बीच सामंजस्य नहीं है, व्यवस्थाएं एकीकृत नहीं हैं. कीटविज्ञान संबंधी निगरानी में तालमेल का अभाव और स्वास्थ्य कर्मियों की कमियां बड़ी बाधा बनी हुई हैं. इसने डेंगू की रोकथाम के लिए ज़रूरी शुरुआती पहचान और समय पर इलाज करने के तंत्र को कमज़ोर कर दिया है. डेंगू के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं, ये नए क्षेत्रों में फैल रहा है. ऐसे में कीटविज्ञान संबंधी निगरानी को मज़बूत करना भारत की डेंगू निवारक रणनीति का केंद्रबिंदु बन गया है.
कीटविज्ञान निगरानी, डेंगू के प्रकोप की भविष्यवाणी करने के लिए आंकड़े उपलब्ध कराती है और उन्हें रोकने में मदद कर सकती है. जब हम कीटविज्ञान निगरानी की बात करते हैं तो इसमें पारंपरिक लार्वा सर्वेक्षणों से लेकर उन्नत तकनीकों और मॉलिक्यूलर टूल्स शामिल हैं. लार्वा और प्यूपा सर्वेक्षण आसान, कम लागत वाले और विभिन्न परिवेशों में किए जा सकने वाले होते हैं. यही बातें इसे भारत में निगरानी प्रणाली का आधार बनाते हैं लेकिन इसकी कुछ सीमाएं हैं. ये सर्वेक्षण वयस्क मच्छरों की आबादी और वास्तविक डेंगू संक्रमण ज़ोखिम के बारे में सिर्फ अप्रत्यक्ष और सीमित जानकारी ही उपलब्ध कराते हैं.
सीमित मानव संसाधन, अपर्याप्त कीटविज्ञान विशेषज्ञता और खराब क्षेत्रीय तालमेल से निगरानी की क्षमता कमज़ोर होती है. इस तरह देखा जाए तो, भारत में कीटविज्ञान निगरानी के लिए संस्थागत ढांचा और दिशानिर्देश कागज़ पर तो मज़बूत दिखाई देते हैं लेकिन ज़मीन पर क्रियान्वयन में कमी है.
इसकी तुलना में, वयस्क मच्छरों को पकड़ने और कीटनाशक प्रतिरोध परीक्षण जैसी उन्नत निगरानी तकनीकें ज़्यादा स्पष्ट और प्रत्यक्ष आंकड़े मुहैया कराती हैं. ये तरीके रोग पर रोकथाम की रणनीतियों की जानकारी देते हैं. इनसे कीटनाशकों की प्रभावशीलता की निगरानी की जा सकती है. मॉलिक्यूलर ज़ेनोमॉनिटरिंग जैसे उभरते उपकरण जंगली मच्छरों की आबादी में अर्बोवायरस का जल्द पता लगाने में मदद करते हैं और भविष्य में होने वाले प्रकोपों का पूर्वानुमान प्रदान करते हैं. फिर भी, उच्च लागत और ढांचागत सीमाओं की वजह से इन उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल ज्यादातर शोध करने वाली प्रयोगशालाओं तक ही सीमित रहता है. रोग की जांच करने वाले संगठनों और अस्पतालों तक ये तकनीकें नहीं पहुंच पाती.
भारत में, राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीवीबीडीसी) वो संस्था है, जिसके तहत संक्रामक बीमारी रोकने वाले सारे कार्यक्रम चलाए जाते हैं. वेक्टर जनित रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए ये संस्था एक व्यापक राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीबीडीसीपी) का संचालन करती है. कीट विज्ञान संबंधी निगरानी के लिए, एनसीवीबीडीसी नीतियां, दिशानिर्देश, ट्रेनिंग मॉड्यूल और निरीक्षण के मानक तैयार करता है. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) कीट विज्ञान संबंधी शोध और महामारी विज्ञान से जुड़े अनुसंधान में मदद करती है. राष्ट्रीय नीति को राज्यों के स्वास्थ्य विभाग परिचालन संबंधी योजनाओं में ढालते हैं. फिर इसके सफल कार्यान्वयन के लिए शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के साथ समन्वय किया जाता है. इस निगरानी को लागू करने की मुख्य जिम्मेदारी नगरपालिकाओं/नगर निगमों की होती है. इन योजनाओं को अक्सर स्वास्थ्य विभागों और मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा दीदियों) द्वारा संचालित किया जाता है. इसके अलावा स्कूलों में जागरूकता अभियान भी चलाए जाते हैं. उदाहरण के लिए, आईसीएमआर पुडुचेरी का “डेंगू कनेक्ट ऐप” और ड्रीम्स प्रोजेक्ट, ऐसे ही अभियान हैं. सामाजिक जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी से इन स्वास्थ्य पहलों के सफल होने की संभावना ज़्यादा होती है.
स्पष्ट दिशानिर्देशों और व्यवस्थित ढांचे के बावजूद कीटविज्ञान संबंधी निगरानी सफल नहीं हो पाती है. इसकी वजह ये है कि साल भर निगरानी बनाए रखने के बजाए ये संस्थाएं तभी सक्रिय होती हैं, जब रोग का प्रकोप होता है. सरकारी विशेषज्ञों के साथ की गई बातचीत से कुछ नए तथ्य सामने आए हैं. इनसे पता चलता है कि कुछ राज्य स्वास्थ्य विभागों और उनकी प्रयोगशालाओं का राष्ट्रीय केंद्रों के साथ सही समन्वय नहीं है. इस नकारात्मक परिणाम नगर पालिकाओं और स्थानीय स्वास्थ्य प्रणालियों पर दिखता है, जो इस श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी है. तालमेल की कमी से वेक्टर नियंत्रण और आंकड़ों को साझा करने की कोशिशें अधूरी रह जाती हैं. सीमित मानव संसाधन, अपर्याप्त कीटविज्ञान विशेषज्ञता और खराब क्षेत्रीय तालमेल से निगरानी की क्षमता कमज़ोर होती है. इस तरह देखा जाए तो, भारत में कीटविज्ञान निगरानी के लिए संस्थागत ढांचा और दिशानिर्देश कागज़ पर तो मज़बूत दिखाई देते हैं लेकिन ज़मीन पर क्रियान्वयन में कमी है. डेंगू का ज़्यादातर प्रकोप बाढ़ से प्रेरित है, यानी बाढ़ के बाद प्रभावित इलाकों में रुके हुए पानी में डेंगू के मच्छर पलते हैं. ओडिशा और राजस्थान में किए गए अध्ययनों से एडीज़ मच्छरों में कीटनाशक प्रतिरोध का पता चला है. कीटनाशक छिड़काव/फॉगिंग में निगरानी और निरीक्षण की भारी कमी है. कीटनाशकों के छिड़काव को वेक्टर जनित बीमारियों के नियंत्रण के लिए एक अच्छी रणनीति माना जाता है.
तालिका-1: भारत के कुछ क्षेत्रों में प्रारंभिक चेतावनी और डेंगू वायरस की पहचान के लिए कीट विज्ञान निगरानी के माध्यम से उत्पन्न हालिया सबूतों का सारांश
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Location and date of study |
Major Findings |
Evidence Generated |
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In this survey, Aedes aegypti accounted for approximately. 64 percent of mosquitoes in water-holding containers. |
Very high vector density; urgent need for targeted vector control and mapping of high-risk zones. |
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All larval indices (HI, CI, BI) peaked in July-August. Breeding is highest in plastic containers (39.26 percent), then earthen pots (20.09 percent) and coolers (17.80 percent). |
Emphasised that domestic containers, especially plastic ones, are key breeding sites; timing of interventions pre-monsoon/monsoon is critical. |
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In this survey, Aedes albopictus comprised approximately 85 percent of the total Aedes specimens collected. |
Suggested shift in species composition, which requires a change in vector control strategies. |
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Study found high Stegomyia indices; multiple mosquito breeding habitats, including flower pots, fridge trays, plastic barrels, and rubber tyres. |
Provided strong evidence of dengue virus in vector pools from domestic/ peri-domestic environments. |
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Study of dengue epidemiology and molecular characterisation of Ae. Aedes aegypti and Ae. albopictus found both vectors had the DENV virus. |
Indicated that newer regions are becoming dengue-endemic; surveillance needs to expand into these regions. |
लेख के साथ दी गई फोटो से स्पष्ट हो रहा है कि, हाल ही में सामुदायिक स्तर पर कई अध्ययन किए गए. इन अध्ययनों से पूर्वानुमानित कीट विज्ञान की क्षमता दिखी लेकिन इनमें ज़्यादा सफलता इसलिए नहीं मिली. इसकी वजह ये रही कि समन्वित की बजाए अलग-थलग कोशिशें की गईं.
नीतिगत स्तर पर, एनसीवीबीडीसी, राज्य स्वास्थ्य विभागों, स्थानीय स्वास्थ्य प्रणालियों और नगर निकायों के बीच एकीकरण के लिए नियमित बैठकें होनी चाहिए. संयुक्त निगरानी और कीटविज्ञान संबंधी डेटा दर्ज करने के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय मंच के निर्माण किया जाना चाहिए.
तालिका- 1 के एक अध्ययन से एडीज़ एल्बोपिक्टस मच्छर के बढ़ते प्रसार का संकेत मिलता है. ये इस प्रजातियों में बदलाव को दिखाता है और डेंगू नियंत्रण प्रयासों को जटिल बनाता है. ये मच्छर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पनपता है, जहां घर के अंदर छिड़काव जैसे तरीकों का कम प्रभाव पड़ता है. मिज़ोरम में, डेंगू का प्रसार विकेन्द्रीकृत और समुदाय-संचालित निगरानी प्रणालियों के महत्व को दिखाता है. दिल्ली और बेंगलुरु जैसे प्रमुख शहरों में मच्छरों के घरेलू प्रजनन के उच्च स्तर सामने आया है. वेक्टर घनत्व और डेंगू की घटनाओं में सबसे ज़्यादा वृद्धि, आमतौर पर जुलाई और अगस्त के बीच देखा जाता है. ये दिखाता है कि अगर डेंगू पर नियंत्रण पाना है तो मॉनसून सीज़न शुरू होने से पहले ही इसके लिए तैयारियां कर लेनी चाहिए. इसलिए, ये अध्ययन पूरे साल रोग पर नियंत्रण की रणनीतियों की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं.
इस कार्यक्रम में एक बड़ी तकनीकी सीमा ये है कि अभी तक कोई एकीकृत राष्ट्रव्यापी कीटविज्ञान डेटा प्लेटफ़ॉर्म नहीं है. राज्य-स्तरीय विशेषज्ञों और बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक मानव संसाधन की कमी में प्रशिक्षित कीटविज्ञानियों का ना होना भी शामिल है. राज्य स्तर पर स्वास्थ्य विभागों में नौकरी आजकल संविदा यानी कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर दी जा रही है, प्रोत्साहन भी कम दिए जाते हैं, इसलिए कीटविज्ञान की पढ़ाई को लेकर उत्साह कम है. इन सभी समस्याओं का नतीजा ये होता है कि आधे-अधूरे आंकड़े, देरी से प्रतिक्रिया, गलत पूर्वानुमान और समय पर कार्रवाई करने से चूक जाते हैं. भारत में, कीटविज्ञान संबंधी निगरानी आम तौर पर तभी की जाती है, जब बाढ़ या दूसरी जलवायु संबंधी आपदाओं की वजह से डेंगू का प्रकोप फैल चुका होता है. रोग की रोकथाम के बजाए इलाज पर ही ध्यान दिया जाता है.
डेंगू पर नियंत्रण पाने के लिए भारत की कीटविज्ञान निगरानी को मज़बूत करने, समन्वित प्रणालीगत सुधारों और इस कार्यक्रम के संचालन का आधुनिकीकरण करने की ज़रूरत है. नीतिगत स्तर पर, एनसीवीबीडीसी, राज्य स्वास्थ्य विभागों, स्थानीय स्वास्थ्य प्रणालियों और नगर निकायों के बीच एकीकरण के लिए नियमित बैठकें होनी चाहिए. संयुक्त निगरानी और कीटविज्ञान संबंधी डेटा दर्ज करने के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय मंच के निर्माण किया जाना चाहिए. इसे संस्थागत रूप देकर ही राज्यों के बीच रीयल टाइम डेटा साझाकरण और मानकीकरण को सुनिश्चित किया जा सकेगा. चूंकि आईएचआईपी (आईडीएसपी का एक हिस्से) में सिर्फ डेंगू के मामलों के आंकड़े ही पेश किए जाते हैं. संविदा वाले कर्मचारियों की जगह स्वास्थ्य विभागों को पर्याप्त वित्तीय मदद देना और कीटविज्ञानी पद पर स्थायी नौकरी दिया जाना ज़रूरी है. इसके अलावा डेंगू नियंत्रण के लिए नीतिगत ज़ोर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों पर होना चाहिए. बीमारी का प्रकोप होने के बाद ही कार्रवाई करने की बजाय लगातार साल भर निगरानी पर ध्यान देना चाहिए.
संचालन के स्तर पर भी, उन्नत निगरानी उपकरणों, कीटनाशक प्रतिरोध परीक्षण और मॉलिक्यूलर ज़ेनोमॉनिटरिंग पर ज़ोर देना होगा. नियमित प्रशिक्षण के माध्यम से स्थानीय क्षमता निर्माण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. 97.79 प्रतिशत सटीकता दर वाले आईओटी (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) के साथ ओविट्रैप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे प्रशिक्षित कर्मियों या प्रयोगशाला सुविधाओं की आवश्यकता नहीं पड़ती. हवाई सर्वेक्षण, भू-स्थानिक विश्लेषण, प्रजनन स्थलों (विशेषकर दुर्गम क्षेत्रों में) में कीटनाशकों का छिड़काव किया जाना चाहिए. उच्च जोखिम वाले प्रजनन जलाशयों की निगरानी के लिए ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. फिलीपींस ऐसा कर चुका है, उसके उदाहरण से सबक लिया जा सकता है. जनवरी से मई तक यानी मानसून से पहले की महीने में लार्वा निगरानी का नियमित कार्यक्रम सुनिश्चित किया जाना चाहिए क्योंकि एडीज़ मच्छर के अंडे सूखने के बाद भी जीवित रह सकते हैं. उच्च, मध्यम और निम्न-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में एक हफ्ते या दो हफ्ते में निगरानी की जानी चाहिए क्योंकि गर्मी वाले महीनों में मच्छरों की आबादी तेज़ी से बढ़ती है. मच्छरों की आबादी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए कीटनाशक प्रतिरोध की निगरानी और साक्ष्य-आधारित फॉगिंग आवश्यक है. जैविक मच्छर नियंत्रण के लिए स्व-लिंगीय एडीज़ प्रजातियों के विकास और मापन से ब्राज़ील में जंगली मच्छरों की आबादी को 96 प्रतिशत तक प्रभावी ढंग से कम किया गया है. एडीज़ मच्छरों के उत्पन्न होने के स्रोत पर ही उन्हें कम करने की कार्रवाई इस अभियान को मज़बूत कर सकती है, जैसा कि पुडुचेरी में देखा गया है. इसके अलावा, ब्राज़ील के VITEC की तरह, कीटविज्ञान और महामारी विज्ञान संबंधी आंकड़ों की एकीकृत निगरानी प्रणालियों के कार्यान्वयन की आवश्यकता है. कीटविज्ञान संबंधी निगरानी के सूचकांकों के आंकड़ों को साझा करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी डेटा प्लेटफ़ॉर्म विकसित करना समय की मांग है. एकीकृत नीति समन्वय, तकनीकी नवाचार और समुदाय-संचालित रोकथाम के माध्यम से कीटविज्ञान निगरानी को आधुनिक बनाना ज़रूरी है. भारत में अगर डेंगू पर नियंत्रण पाना है तो राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर एकीकृत नीति और उस पर बेहतर समन्वय के ज़रिए ही ऐसा हो सकता है.
दामिनी बिसेन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.
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Damini Bisen is an Intern under the Health Initiative, Observer Research Foundation, New Delhi ...
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