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Published on Feb 13, 2026 Updated 0 Hours ago

भारत को पाकिस्तान को अलग-थलग करने की पुरानी नीति पर फिर से सोचना होगा. लेख से समझें कि कैसे लचीली और शर्त-आधारित रणनीति अपनाकर पड़ोसियों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे जा सकते हैं.

भारत-पाकिस्तान: अब तरीका बदलना होगा

भारत को अपनी क्षेत्रीय रणनीति में बदलाव करते हुए पाकिस्तान को अलग-थलग करने की नीति पर फिर से विचार करना होगा ताकि वह सीमित क्षेत्रीय विवादों में उलझने के बजाय चीन जैसी बड़ी सामरिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों पर अधिक संसाधन, समय और कूटनीतिक ध्यान केंद्रित कर सके.

दिसंबर 2025 में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने चीन के सहयोग से दक्षिण एशिया में एक नए क्षेत्रीय गुट के गठन की संभावना का संकेत दिया. भारत को बाहर रखने का यह संकेत पाकिस्तान की उस दीर्घकालिक नीति को दर्शाता है जिसके तहत वह भारत के अन्य दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के संदर्भ में उसके लिए सामरिक और सुरक्षा चुनौतियां खड़ी करता रहा है. मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए हालिया तनाव के बाद इस रणनीति को और गति मिली है जिससे क्षेत्र में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की दिल्ली की नीति को चुनौती मिली है और उसे अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार के लिए बाध्य होना पड़ रहा है.

भारतीय प्रधानता को पाकिस्तान की निरंतर चुनौती

स्वतंत्रता के बाद से भारत ने स्वाभाविक रूप से पूरे क्षेत्र में अपना कूटनीतिक और सामरिक प्रभाव बढ़ाया जबकि पाकिस्तान ने लगातार इसे चुनौती दी. आज भी, शक्ति संतुलन भारत के पक्ष में होने के बावजूद, पाकिस्तान भारत की क्षेत्रीय प्रधानता को चुनौती देता रहता है. वह अन्य क्षेत्रीय देशों से जुड़ाव बढ़ाकर भारत की सामरिक उपस्थिति और सुरक्षा गणनाओं में व्यवधान डालता है, भारत को क्षेत्रीय परिस्थितियों में उलझाए रखता है और उसके व्यापक वैश्विक लक्ष्यों से ध्यान भटकाता है.

भारत को बाहर रखने का यह संकेत पाकिस्तान की उस दीर्घकालिक नीति को दर्शाता है जिसके तहत वह भारत के अन्य दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के संदर्भ में उसके लिए सामरिक और सुरक्षा चुनौतियां खड़ी करता रहा है.

पाकिस्तान ने 1948 में श्रीलंका और 1960 में नेपाल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित किए. 1950 के दशक में कोलंबो और काठमांडू के साथ उसका जुड़ाव और गहरा हुआ. उसने भारत को साझा खतरे के रूप में प्रस्तुत कर और भारत के द्विपक्षीय मतभेदों का लाभ उठाकर इन संबंधों को बनाए रखा. 1965 में पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान का उपयोग कर तथा चीन और नेपाल के साथ सहयोग करके भारत को सिलीगुड़ी कॉरिडोर से काटने का विचार भी किया था. 1980 के दशक के अंत में उसने श्रीलंका और मालदीव में भारत की सैन्य उपस्थिति पर भी असंतोष जताया था. यह सामरिक दृष्टिकोण 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद चीन पर उसकी बढ़ती निर्भरता से भी पहले का है.

पाकिस्तान लंबे समय से अन्य क्षेत्रीय देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर भारत की सामरिक उपस्थिति और सुरक्षा गणनाओं में व्यवधान डालने की कोशिश करता रहा है. वह द्विपक्षीय सहयोग, रक्षा संपर्क और राजनीतिक संवाद के माध्यम से ऐसा वातावरण बनाता है जिससे भारत क्षेत्रीय मुद्दों में उलझा रहे और उसकी व्यापक रणनीतिक प्राथमिकताओं से ध्यान बंटे. कई बार वह भारत के पड़ोसियों के साथ मतभेदों और संवेदनशील मुद्दों का भी लाभ उठाता है.

दूसरी तरफ, दक्षिण एशियाई देशों ने भी पाकिस्तान के साथ अपने स्वतंत्र और संतुलित संबंध बनाए रखे हैं. इसके पीछे भौगोलिक निकटता, साझा इतिहास, सांस्कृतिक जुड़ाव और भाषाई संबंध जैसे कारण रहे हैं. इन देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों, घरेलू राजनीति और रणनीतिक स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए भारत और पाकिस्तान—दोनों के साथ अलग-अलग स्तर पर रिश्ते विकसित किए हैं. उन्होंने चीन और पश्चिम के साथ पाकिस्तान के संबंधों को व्यापार, विकास और रक्षा साझेदारी बढ़ाने के अवसर के रूप में भी देखा. इससे उन्हें भारत के प्रभाव को संतुलित करने, अपनी स्वायत्तता बढ़ाने और घरेलू राजनीति में राष्ट्रवादी छवि बनाने में मदद मिली. 

व्यवहार में भारत की अलगाव नीति

पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ आतंकवादी हमलों के समर्थन के चलते, नई दिल्ली ने 2016 से उसे अलग-थलग करने की नीति अपनाई. हालांकि दक्षिण एशियाई देशों ने आतंकवाद की निंदा तो की पर पाकिस्तान को अलग करने के प्रश्न पर मतभेद रहे. उनका रुख उनकी घरेलू राजनीति और भारत से संबंधों पर निर्भर रहा. बांग्लादेश, अफगानिस्तान और भूटान भारत के साथ खड़े हुए जबकि नेपाल और श्रीलंका ने पारंपरिक तटस्थता बनाए रखी. मालदीव भी अलग-अलग सरकारों के दौरान भारत से संबंधों में उतार-चढ़ाव के बावजूद तटस्थ रहा.

दक्षिण एशियाई देशों ने भी पाकिस्तान के साथ अपने स्वतंत्र और संतुलित संबंध बनाए रखे हैं. इसके पीछे भौगोलिक निकटता, साझा इतिहास, सांस्कृतिक जुड़ाव और भाषाई संबंध जैसे कारण रहे हैं. इन देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों, घरेलू राजनीति और रणनीतिक स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए भारत और पाकिस्तान—दोनों के साथ अलग-अलग स्तर पर रिश्ते विकसित किए हैं.

2016 के उरी हमले के बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने भारत के साथ मिलकर सार्क शिखर सम्मेलन से हटने का निर्णय लिया. आठ में से चार देशों के न आने से नेपाल, श्रीलंका और मालदीव ने भी सम्मेलन टालने का समर्थन किया, हालांकि उन्होंने बाद में बैठक बुलाने की बात कही. 2019 के पुलवामा हमले और बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद भी ऐसा ही पैटर्न दिखा, बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने भारत का समर्थन किया, जबकि अन्य देशों ने संयम और तनाव कम करने की अपील की.

इस प्रकार, पाकिस्तान को अलग-थलग करने की भारत की कोशिश पूरे क्षेत्रीय समर्थन पर नहीं बल्कि बहुमत के समर्थन पर निर्भर रही. इस दौरान पाकिस्तान ने भी भारत के पड़ोसियों के साथ संबंधों का लाभ उठाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा, चाहे उसकी अपनी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति कमजोर रही हो. उसने हिंद महासागर क्षेत्र में संयुक्त गश्त जैसे प्रस्तावों पर चर्चा की, श्रीलंका और बांग्लादेश से संबंध सुधारने की कोशिश की और क्षेत्र में भारत-विरोधी अभियानों को हवा दी, जैसे मालदीव का इंडिया आउट अभियान और बांग्लादेश में सोशल मीडिया नैरेटिव.

ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान की क्षेत्रीय सक्रियता

अफगानिस्तान (2021), मालदीव (2023) और बांग्लादेश (2024) में शासन परिवर्तन से क्षेत्रीय संतुलन बदला और पाकिस्तान को अवसर मिला. पहलगाम हमले और भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी किसी पड़ोसी देश ने खुलकर भारत का पक्ष नहीं लिया, भले ही आतंकवादी हमलों की निंदा की. 2025 से पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर बांग्लादेश और अफगानिस्तान के साथ त्रिपक्षीय बैठकों सहित क्षेत्रीय सक्रियता बढ़ाई. श्रीलंका को चक्रवात के बाद सहायता दी, रक्षा सहयोग बढ़ाया और मालदीव व बांग्लादेश के साथ सैन्य सौदों की बातचीत शुरू की.

इस सक्रियता के कई कारण हैं- ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत के प्रभाव को संतुलित करना, चीन का प्रभाव, बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन, पाकिस्तान में सैन्य नेतृत्व का केंद्रीकरण, भारत-अफगानिस्तान संबंधों का सामान्यीकरण, अमेरिका की नीति में पाकिस्तान की बढ़ती प्रासंगिकता, और सूचना युद्ध के माध्यम से भारत-विरोधी नैरेटिव.भारत की अलगाव नीति कभी संस्थागत रूप से स्थापित नहीं हुई; यह सरकारों और बहुमत समर्थन पर निर्भर रही. यह मुख्यतः सार्क जैसे मंचों तक सीमित रही जबकि पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंध चलते रहे.

 भारत को अपनी सद्भावना को अपने रणनीतिक हितों से जोड़ना होगा. विकास सहायता, कनेक्टिविटी, ऊर्जा, व्यापार और डिजिटल सहयोग में भारत की क्षमता पाकिस्तान से कहीं अधिक है, फिर भी पड़ोसी देश विकल्प तलाश रहे हैं. क्षेत्र में चीन सहित नई शक्तियों के प्रवेश ने इन देशों को अपने विकल्पों में विविधता लाने और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाने के लिए व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराए हैं. भारत को सार्क के पुनर्जीवन की जिम्मेदारी भी पाकिस्तान पर डालनी होगी- उसी संगठन को पाकिस्तान ने आतंकवाद को बढ़ावा देकर, कश्मीर से संबंधित कदमों का विरोध कर, और मोटर वाहन समझौते का समर्थन करने से इनकार करके निष्क्रिय बना दिया.

प्राथमिक रणनीतिक चुनौती चीन है जिसके लिए दीर्घकालिक संसाधन, ध्यान और नीति-समन्वय की आवश्यकता है. यदि भारत लगातार पाकिस्तान-केंद्रित प्रतिक्रियात्मक नीति में उलझा रहता है तो उसकी व्यापक रणनीतिक ऊर्जा बंटी रहेगी इसलिए आवश्यक है कि भारत पाकिस्तान को अलग-थलग करने की अपनी पुरानी नीति की समीक्षा करें

भारत को अपनी पड़ोसी नीति में अधिक यथार्थवादी और परिणाम-आधारित दृष्टिकोण अपनाते हुए रणनीतिक सौदेबाज़ी की दिशा में आगे बढ़ना होगा. इसका अर्थ यह है कि भारत द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता, विकास सहयोग और सुरक्षा साझेदारी को सीधे तौर पर उसकी वैध सुरक्षा चिंताओं के सम्मान से जोड़ा जाए. भारत के पास वित्तीय सहायता, ऋण सुविधा, अनुदान, रक्षा उपकरण सहयोग, सुरक्षा प्रशिक्षण, श्रम गतिशीलता में रियायत, व्यापार सुविधाएं, सीमा-पार कनेक्टिविटी परियोजनाएं और क्षमता निर्माण जैसे कई प्रभावी साधन हैं. इन साधनों का उपयोग केवल सद्भावना के आधार पर नहीं बल्कि स्पष्ट शर्तों और पारस्परिक उत्तरदायित्व के साथ किया जाना चाहिए. यदि कोई देश भारत की घोषित लाल रेखाओं का उल्लंघन करता है तो सहायता और सहयोग की समीक्षा या रोक भी संभव होनी चाहिए.

बिना औपचारिक सैन्य या राजनीतिक गठबंधन बनाए भी भारत को यह संदेश स्पष्ट रूप से देना होगा कि पाकिस्तान के साथ अत्यधिक निकटता या दिखावटी तटस्थता की भी रणनीतिक लागत हो सकती है. क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, बाजार पहुंच और विकास संसाधनों के मामले में पाकिस्तान, भारत का वास्तविक विकल्प नहीं बन सकता. हालांकि चीन जैसी नई शक्तियों के प्रवेश से पड़ोसी देशों के पास विकल्प बढ़े हैं फिर भी भारत को अपनी शर्तें, प्राथमिकताएं और अपेक्षाएं स्पष्ट रूप से निर्धारित और संप्रेषित करनी होंगी. साथ ही, सार्क के निष्क्रिय होने की जिम्मेदारी भी पाकिस्तान के आचरण पर ही केंद्रित रखनी चाहिए.

पूरे अलगाव की नीति प्रतिकूल साबित हो सकती है क्योंकि क्षेत्रीय देशों के पाकिस्तान से ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध है. इसलिए भारत को अपनी लाल रेखाएं स्पष्ट और लगातार बतानी होंगी. चीन के साथ पाकिस्तान के बढ़ते संबंधों ने भारत की सामरिक चिंताओं को अवश्य बढ़ाया है लेकिन यह पूरी तरह नई स्थिति नहीं है. इतिहास बताता है कि पाकिस्तान ने अक्सर क्षेत्रीय तनाव और संकट की परिस्थितियों का उपयोग भारत पर दबाव बनाने, उसका ध्यान भटकाने और उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं को प्रभावित करने के लिए किया है. आज भी वही पैटर्न अलग रूप में दिखाई देता है जहां चीन-पाकिस्तान सहयोग भारत के लिए एक संयुक्त चुनौती का रूप लेता दिख रहा है.

हालांकि वर्तमान परिदृश्य में भारत की वैश्विक भूमिका, आर्थिक क्षमता और कूटनीतिक पहुंच पहले से कहीं अधिक विस्तृत हो चुकी है. भारत इंडो-पैसिफिक, प्रौद्योगिकी, आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक शासन जैसे बड़े मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है. ऐसे में उसकी प्राथमिक रणनीतिक चुनौती चीन है जिसके लिए दीर्घकालिक संसाधन, ध्यान और नीति-समन्वय की आवश्यकता है. यदि भारत लगातार पाकिस्तान-केंद्रित प्रतिक्रियात्मक नीति में उलझा रहता है तो उसकी व्यापक रणनीतिक ऊर्जा बंटी रहेगी इसलिए आवश्यक है कि भारत पाकिस्तान को अलग-थलग करने की अपनी पुरानी नीति की समीक्षा करें और अधिक लचीली, शर्त-आधारित तथा हित-केंद्रित क्षेत्रीय रणनीति अपनाए ताकि अनावश्यक दबावों के प्रति उसकी संवेदनशीलता कम हो.


आदित्य गौडारा शिवमूर्ति ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.

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Aditya Gowdara Shivamurthy

Aditya Gowdara Shivamurthy

Aditya Gowdara Shivamurthy is an Associate Fellow with the Strategic Studies Programme’s Neighbourhood Studies Initiative.  He focuses on strategic and security-related developments in the South Asian ...

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