समंदर अब सिर्फ पानी नहीं बल्कि रोजगार, स्टार्टअप्स और नई तकनीक का बड़ा खजाना बनता जा रहा है. ब्लू इकॉनमी में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और समुद्री कारोबारों की नई लहर कैसे बदल रही है दुनिया, पढ़िए.
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ब्लू इकॉनमी समुद्री संसाधनों का टिकाऊ इस्तेमाल है. यूनाइटेड नेशंस ट्रेड एंड डेवलपमेंट के 2023 का अनुमान है कि समुद्र हर साल दुनिया की अर्थव्यवस्था में करीब 2.2 ट्रिलियन अमेरिकन डॉलर का योगदान देते हैं. उम्मीद है कि 2030 तक यह 3 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो जाएगा और 4 करोड़ नौकरियां पैदा करेगा. स्टार्टअप्स अब ब्लू इकॉनमी के कई सेक्टरों में अहम भूमिका निभा रहे हैं. इनमें सस्टेनेबल एक्वाकल्चर, कोस्टल बायोटेक्नोलॉजी, टूरिज्म और मरीन रिन्यूएबल एनर्जी शामिल हैं. यह तेजी से बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम वैल्यू एडिशन, इनोवेशन और रोजगार के नए मौके बना रहा है.
ब्लू इकॉनमी तेजी से दुनिया की नई आर्थिक ताकत बन रही है. समुद्री संसाधनों के टिकाऊ इस्तेमाल से रोजगार, इनोवेशन और कारोबार के नए रास्ते खुल रहे हैं. भारत में ब्लू इकॉनमी का जीडीपी में करीब 4 फीसदी योगदान है और इसका बाजार तेजी से बढ़ रहा है.
1000 ओशन स्टार्टअप्स जैसी पहलों का मकसद 2030 तक समुद्र आधारित कम से कम 1,000 बड़े स्टार्टअप्स को आगे बढ़ाना है. समुद्री तकनीक और ब्लू इकॉनमी स्टार्टअप्स में बढ़ता निवेश (2025 में 728 मिलियन डॉलर) बताता है कि ब्लू इकॉनमी को मुख्यधारा में लाने के लिए रणनीतिक स्तर पर काम हो रहा है. यूरोप में ब्लू इकॉनमी के 159 फंड्स हैं, जिनकी कुल रकम 14 बिलियन यूरो से ज्यादा है. भारत में ब्लू इकॉनमी का जीडीपी में करीब 4 फीसदी का योगदान है, और मार्केट 13.2 बिलियन डॉलर की है. भारत का ब्लू इकॉनमी स्टार्टअप इकोसिस्टम अभी शुरुआती दौर में है. दुनिया भर के देशों को ब्लू इकॉनमी स्टार्टअप्स में अभी और तरक्की करनी होगी.
स्टार्टअप्स ब्लू इकॉनमी को नई और बेहतर दिशा की तरफ ले जा रहे हैं. वे मरीन-डिराइव्ड बायोप्रोडक्ट्स, बायोफार्मास्यूटिकल्स, बायोफ्यूल्स, रिन्यूएबल एनर्जी और सस्टेनेबल एक्वाकल्चर जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं. स्वीडन की कंपनी ईको वेव पावर समुद्री लहरों से बिजली पैदा करती है. नॉर्वे की ब्लूआई रोबोटिक्स समुद्र की खोज और मॉनिटरिंग के लिए अंडरवाटर रोबोटिक्स तैयार कर रही है. तंजानिया के जांजीबार में समुद्री शैवाल फार्मिंग करीब 30,000 लोगों को रोजगार देती है, जिनमें 80 फीसदी महिलाएं हैं.
समुद्री संसाधनों से जुड़े नए कारोबारों में निवेश लगातार बढ़ रहा है. खासतौर पर सीवीड यानी समुद्री शैवाल से जुड़े उद्योगों ने निवेशकों का ध्यान खींचा है. फूड, कॉस्मेटिक, बायोप्लास्टिक और ग्रीन फ्यूल जैसे क्षेत्रों में इसके बढ़ते इस्तेमाल ने ब्लू इकॉनमी को बड़ा वैश्विक बाजार बना दिया है.
इसमें तरक्की तेज हुई तो निवेशकों आदि की दिलचस्पी भी बढ़ी. इसके चलते ग्लोबल समुद्री शैवाल मार्केट 2021 में 17 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया. इसका इस्तेमाल भोजन, बायोफ्यूल्स, कॉस्मेटिक और बायोप्लास्टिक में हो रहा है. जैसे-जैसे यह सेक्टर बढ़ रहा है, संसाधनों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भी रोकना होगा.
संभावनाएं होने के बावजूद ब्लू इकॉनमी स्टार्टअप्स अभी भी अधिकतर अनौपचारिक और कम कीमत वाले काम ही कर रहे हैं. इसे दूर करने के लिए सरकार ने कई पहलें की है. मसलन, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) का मकसद मत्स्य इंफ्रास्ट्रक्चर को मॉडर्न बनाना, उत्पादन बढ़ाना और वैल्यू चेन को मजबूत करना है. वहीं सागरमाला कोस्टल इकॉनमी को मजबूत करने का काम करता है. डीप ओशन मिशन और स्टार्टअप इंडिया जैसी पहलें नवाचार, रिसर्च और उद्यमिता को बढ़ावा देती हैं.
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, सागरमाला, डीप ओशन मिशन और स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाएं ब्लू इकॉनमी को संगठित और आधुनिक बनाने की कोशिश कर रही हैं. महाराष्ट्र में समुद्री शैवाल फार्मिंग से जुड़े पायलट प्रोजेक्ट्स ने तटीय इलाकों में आय बढ़ाने के अच्छे नतीजे दिए हैं.
इसके चलते महाराष्ट्र में समुद्री शैवाल फार्मिंग के पायलट प्रोजेक्ट्स ने 45 दिन के प्रोडक्शन साइकल के साथ कोस्टल इलाकों की आय में 30 फीसदी तक बढ़ोतरी की है. काउंसिल फॉर साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च-सेंट्रल साल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (CSIR-CSMCRI) जैसी संस्थाओं के साथ सहयोग से समुद्री शैवाल-आधारित उत्पादन को बड़े पैमाने पर बढ़ाने में मदद मिली है.
कई कोस्टल इलाकों में महिलाएं पूरी वैल्यू चेन में सक्रिय रोल में हैं. दुनिया भर में फिशरीज और एक्वाकल्चर सेक्टर में महिलाओं की हिस्सेदारी 21 फीसदी है. छोटे पैमाने की फिशरीज में कुल रोजगार में 47 फीसदी महिलाएं हैं, तो उनकी पकड़ी गई मछलियां हर साल ग्लोबल इकॉनमी में करीब 5.6 बिलियन डॉलर का योगदान देती हैं.
उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में महिलाओं के सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स मछली पालन और मार्केटिंग नेटवर्क के जरिए नए कारोबार खड़े कर रहे हैं. अध्ययनों से पता चलता है कि ब्लू इकॉनमी में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से सिर्फ आर्थिक तरक्की ही नहीं होती, बल्कि तटीय समुदाय भी ज्यादा मजबूत बनते हैं.
महिलाएं इनोवेशन को भी आगे बढ़ा रही हैं. दुनिया भर में करीब 40 फीसदी ग्लोबल सीवीड स्टार्टअप्स महिलाएं चला रही हैं. चेल्सा ब्रिगांटी, जूलिया मार्श और स्वे इनोवेशन की लोलीवेयर जैसी कंपनियां समुद्री शैवाल से सिंगल-यूज प्लास्टिक का विकल्प बनाती हैं. उत्तर प्रदेश में ब्लू रिवॉल्यूशन और मिशन शक्ति जैसी पहलें छोटे पैमाने के मछली पालन को मुनाफे वाले कारोबार में बदल रही हैं. विजयनगरम में महिलाओं की अगुवाई वाले सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स नए मार्केटिंग नेटवर्क अपना रहे हैं. अध्ययन बताते हैं कि ब्लू इकॉनमी में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व बढ़ाने से आर्थिक तरक्की से लेकर समुदायों की मजबूती बढ़ सकती है.
कर्ज कम मिलने और क्षमता की कमी के अलावा छोटे कारोबारों कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरण व क्लाइमेट से जुड़े खतरे भी अनिश्चितता बढ़ाते हैं. ये चुनौतियां महिलाओं के लिए और भी गंभीर हैं, जहां 50 फीसदी से ज्यादा महिला उद्यमियों ने पर्याप्त फाइनेंशियल एक्सेस न होने की बात कही है. महिलाएं अब भी संस्थागत, सामाजिक और सांस्कृतिक रुकावटों का सामना कर रही हैं. इसके अलावा कई उद्यमियों के पास सामाजिक सुरक्षा तंत्र भी नहीं होते, यानी वे ज्यादा असुरक्षित हो जाते हैं.
उत्तर प्रदेश में ब्लू रिवॉल्यूशन और मिशन शक्ति जैसी पहलें छोटे पैमाने के मछली पालन को मुनाफे वाले कारोबार में बदल रही हैं. विजयनगरम में महिलाओं की अगुवाई वाले सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स नए मार्केटिंग नेटवर्क अपना रहे हैं. अध्ययन बताते हैं कि ब्लू इकॉनमी में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व बढ़ाने से आर्थिक तरक्की से लेकर समुदायों की मजबूती बढ़ सकती है.
ब्लू इकॉनमी में उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए इन चीजों को प्राथमिकता देनी चाहिए-
1- ब्लू एक्शन फंड, ग्रीन क्लाइमेट फंड, ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी स्मॉल ग्रांट्स प्रोग्राम और सेशेल्स ब्लू ग्रांट्स फंड जैसी पहलें दिखाती हैं कि जलवायु से जुड़े फंड्स और रियायती कर्ज ब्लू इकॉनमी कारोबारों को सपोर्ट दे सकते हैं. भारत में पीएम मत्स्य संपदा योजना के तहत भी फंडिंग और ग्रांट्स दी जाती हैं.
2- इंडोनेशिया में समुद्री शैवाल की नवाचार पहलें और तमिलनाडु में अम्माची लैब्स समुद्री शैवाल फार्मिंग से लेकर बिजनेस मॉडल्स और मार्केटिंग की ट्रेनिंग देती हैं. अब स्कूलों और टेक्निकल यूनिवर्सिटीज के पाठ्यक्रम में ब्लू इकॉनमी शामिल करना और छात्रों की भागीदारी बढ़ाना जरूरी है.
3- स्टार्टअप्स पर नीति बनाने से पहले हर तरह का डेटा होना चाहिए. कई अफ्रीकी और प्रशांत देशों में फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन के जेंडर-आधारित फिशरीज डेटा ने पॉलिसी बनाने वालों की काफी मदद की है. भारतीय नेशनल फिशरीज सेंसस भी कई तरह के डेटा इकट्ठा कर रहा है.
4- सभी स्तरों पर फैसले लेने में सबकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए इन्क्लूसिव गवर्नेंस स्ट्रक्चर जरूरी है. फिजी में लोकल फिशरीज गवर्नेंस की महिला कमेटियों इसका बेहतर नमूना सामने रखा है. केरल में मछुआरा महिलाओं की कोऑपरेटिव्स को राज्य फिशरीज डिपार्टमेंट और तटीय रोजगार योजनाओं से जोड़ने से महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और बाजार में सुधार हुआ है.
5- सर्टिफिकेशन, ब्रांडिंग और विशेषज्ञ मार्गदर्शन के जरिए ग्लोबल मार्केट्स तक पहुंच में मदद दी जाए. तमिलनाडु के कोस्टल इलाकों में समुद्री शैवाल किसानों को बाजार तक अधिक पहुंच पाने में मदद दी गई.
6- जोखिमों से सुरक्षा के लिए उद्यमियों को मदद चाहिए. आपदा सहायता योजनाएं और बीमा समुद्री कारोबारों में काम करने वाली महिलाओं को सुरक्षा देते हैं. केरल में भी स्वयं सहायता समूह मत्स्यफेड जैसी योजनाओं के जरिए स्थिर मासिक आय और व्यवसायों को मजबूत करने में मदद देते हैं.
ब्लू इकॉनमी से जुड़े कारोबारों में जोखिम भी काफी हैं, इसलिए उद्यमियों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देना जरूरी माना जा रहा है. बीमा योजनाएं, आपदा सहायता और स्वयं सहायता समूह तटीय इलाकों में काम करने वाले लोगों, खासकर महिलाओं, को स्थिर आय और कारोबार मजबूत करने में मदद दे रहे हैं.
ब्लू इकॉनमी तेजी से बढ़ रही है. मजबूत और सबको साथ लेकर चलने वाली ब्लू इकॉनमी बनाने के लिए उद्यमियों को पर्याप्त पहुंच देनी होगी, साथ ही महिलाओं को उद्यमिता और फैसले लेने वाले रोल में आगे लाना होगा.
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Dr Poornima V B is an Associate Fellow at ORF. Her work focuses on blue economy, marine circularity, and sustainable resource policy. She has contributed ...
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