किसी भी वायरस से लड़ाई सिर्फ दवा नहीं बल्कि विज्ञान पर भरोसे से भी जीती जाती है. समझिए कैसे गलत जानकारी रोकथाम को कमजोर कर देती है और क्यों इलाज होने के बावजूद लोग अफवाहों के चलते भ्रम का शिकार हो जाते हैं.
यह निबंध विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026: साझा ज़ोखिम के युग में विज्ञान के साथ खड़े रहना नामक श्रृंखला का हिस्सा है.
2018 से भारत समय-समय पर घातक निपाह वायरस (NiV) के प्रकोप का सामना कर रहा है, हाल ही में इस वर्ष फरवरी में पश्चिम बंगाल में इसका मामला सामने आया. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा इसे प्राथमिकता वाले रोगजनक के रूप में चिन्हित किया गया है. NiV, ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जो वैश्विक स्वास्थ्य और बीमारियों से निपटने में मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की परस्पर जुड़ाव को रेखांकित करता है.
चूंकि इसके लिए कोई लाइसेंस प्राप्त टीका या उपचार उपलब्ध नहीं है, इसलिए mRNA वैक्सीन अनुसंधान में प्रगति एक आशाजनक रास्ता प्रस्तुत करती है. इसमें महामारी की तैयारी और नवाचारों के लिए गठबंधन (CEPI) और भारत की जेनोवा बायो फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड द्वारा mRNA वैक्सीन विकसित करने के प्रयास शामिल हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा इसे प्राथमिकता वाले रोगजनक के रूप में चिन्हित किया गया है. NiV, ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जो वैश्विक स्वास्थ्य और बीमारियों से निपटने में मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की परस्पर जुड़ाव को रेखांकित करता है.
हालांकि, केवल वैज्ञानिक प्रगति पर्याप्त नहीं है. जब डब्ल्यूएचओ इस वर्ष ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ को ‘स्वास्थ्य के लिए एक साथ. विज्ञान के साथ खड़े रहें’ थीम के साथ मना रहा है, यह समझने का मौका है कि चुनौती सिर्फ चिकित्सा उपाय नहीं, बल्कि विज्ञान पर भरोसा और उसकी स्वीकृति भी है.
वैक्सीन हिचकिचाहट, जो वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है, तेजी से विकसित हो रही सूचना अर्थव्यवस्था के कारण और बढ़ गई है. गलत जानकारी टीकों की सुरक्षा और प्रभावशीलता पर संदेह पैदा करती है और ऐसे माहौल में पनपती है जहाँ सोशल मीडिया सही और गलत दोनों प्रकार की जानकारी को तेजी से फैलाता है.
कोविड-19 महामारी के दौरान, WHO ने इस सूचना की अधिकता को ‘इन्फोडेमिक’ कहा. मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के शोध के अनुसार, सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी सही जानकारी की तुलना में तेजी से फैलती है, खासकर जब वह डर जैसी भावनाओं को उकसाती है. किसी विश्वसनीय स्रोत से बार-बार मिलने वाली गलत जानकारी लोगों के विश्वास को मजबूत कर सकती है और उसके प्रसार को बढ़ा सकती है.
एंटी-वैक्सीन नैरेटिव इस व्यवस्था का उपयोग करते हुए साजिश सिद्धांतों को बढ़ावा देते हैं, शोध को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करते हैं और साक्ष्य-आधारित विज्ञान को खारिज करने वाली आवाजों को बढ़ाते हैं. गलत जानकारी जनमत को प्रभावित करती है और टीकों की सुरक्षा को लेकर डर पैदा करती है.
उदाहरण के लिए, यह दावा कि COVID-19 के mRNA टीके ‘टर्बो कैंसर’ (तेजी से फैलने वाले कैंसर) का कारण बनते हैं, बिना किसी वैज्ञानिक आधार के भी सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से फैल गया.
इसका असर दुनिया भर में टीकाकरण से रोकी जा सकने वाली बीमारियों के दोबारा फैलने के रूप में दिखाई दे रहा है. अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के देशों में खसरे के बढ़ते मामलों से यह स्पष्ट है कि टीकाकरण में कमी कैसे तेजी से प्रकोप को जन्म दे सकती है और ‘हर्ड इम्युनिटी’ (सामूहिक प्रतिरक्षा) को कमजोर कर सकती है.
पोस्ट-ट्रुथ दुनिया में, जहाँ वस्तुनिष्ठ तथ्यों का प्रभाव कम होता जा रहा है और भावनाओं व व्यक्तिगत विश्वासों पर आधारित बातें ज्यादा प्रभावी होती हैं, वहाँ संदेह और भ्रम पैदा होते हैं. इससे सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है, विज्ञान पर भरोसा घटता है और गलत सूचना सामाजिक रूप से स्वीकार्य हो जाती है. इसका असर दुनिया भर में टीकाकरण से रोकी जा सकने वाली बीमारियों के दोबारा फैलने के रूप में दिखाई दे रहा है. अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के देशों में खसरे के बढ़ते मामलों से यह स्पष्ट है कि टीकाकरण में कमी कैसे तेजी से प्रकोप को जन्म दे सकती है और ‘हर्ड इम्युनिटी’ (सामूहिक प्रतिरक्षा) को कमजोर कर सकती है.
यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि इससे गंभीर खसरा संक्रमण के मामलों में वृद्धि हो सकती है, जिससे चिकित्सा समुदाय भी चिंतित है. खसरे की एक जटिलता-सबेक्यूट स्क्लेरोजिंग पेनेन्सेफ्लाइटिस (SSPE)-जो आमतौर पर संक्रमण के एक वर्ष बाद दिखाई देती है, विकलांगता, लकवा और अक्सर मृत्यु का कारण बन सकती है.यह प्रवृत्ति दिखाती है कि गलत सूचना सीधे तौर पर गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों में बदल सकती है.
वैक्सीन हिचकिचाहट विज्ञान के राजनीतिकरण के कारण और जटिल हो जाती है. इसमें विज्ञान की स्वाभाविक अनिश्चितताओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है ताकि स्थापित वैज्ञानिक सहमति को कमजोर किया जा सके. अमेरिका में COVID-19 महामारी के दौरान टीकों को राजनीतिक पहचान से जोड़ दिया गया. लोगों ने टीकों को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रिया दी-कुछ ने मना किया, कुछ झिझके और कुछ ने तुरंत टीका लगाया. राजनीति के प्रभाव से लोग गलत जानकारी पर ज्यादा भरोसा करने लगे और उसका फैलाव बढ़ गया.
यदि इसके पीछे मजबूत वैज्ञानिक आधार या समीक्षा न हो, तो इससे बच्चों में संक्रमण और अस्पताल में भर्ती होने के मामलों में वृद्धि का खतरा है. हालांकि एक संघीय न्यायाधीश ने इन प्रयासों को रोक दिया है, फिर भी ये बदलाव दिखाते हैं कि ऐसी नीतियां विज्ञान पर विश्वास को कमजोर कर सकती हैं.
यह प्रवृत्ति अब अमेरिका के बाल टीकाकरण कार्यक्रम में भी दिखाई दे रही है. हाल के प्रयासों में रोटावायरस, मेनिन्जाइटिस और हेपेटाइटिस A व B के टीकों को ‘नियमित टीकाकरण’ से हटाकर ‘साझा चिकित्सीय निर्णय’ (shared clinical decision-making) के तहत लाने की कोशिश की गई है, जिसमें मरीज या अभिभावक और डॉक्टर मिलकर टीकाकरण के जोखिम और लाभ पर चर्चा करते हैं. यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव है. यदि इसके पीछे मजबूत वैज्ञानिक आधार या समीक्षा न हो, तो इससे बच्चों में संक्रमण और अस्पताल में भर्ती होने के मामलों में वृद्धि का खतरा है. हालांकि एक संघीय न्यायाधीश ने इन प्रयासों को रोक दिया है, फिर भी ये बदलाव दिखाते हैं कि ऐसी नीतियां विज्ञान पर विश्वास को कमजोर कर सकती हैं.
mRNA वैक्सीन तकनीक का विकास वैज्ञानिक प्रगति और जन-विश्वास के बीच तनाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है. अगस्त 2025 में, अमेरिका के स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग (HHS) ने mRNA वैक्सीन अनुसंधान के लिए निर्धारित फंडिंग को अचानक समाप्त कर दिया. इसमें बायोमेडिकल एडवांस्ड रिसर्च एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (BARDA) द्वारा दिए गए 22 अनुबंधों को रद्द करना शामिल था, जिनकी कुल कीमत 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी.
इन कटौतियों के गंभीर स्वास्थ्य और आर्थिक परिणाम हो सकते हैं, क्योंकि अनुमान है कि mRNA टीके हर साल लगभग 75 बिलियन डॉलर की आर्थिक हानि को रोकते हैं. महामारी की तैयारी के अलावा, mRNA प्लेटफॉर्म कैंसर जैसी बीमारियों के उपचार में भी क्रांतिकारी संभावनाएं रखते हैं, इसलिए इसमें निवेश बेहद महत्वपूर्ण है. इस निर्णय को टीकों की प्रभावशीलता और सुरक्षा को लेकर चिंताओं के आधार पर सही ठहराया गया, हालांकि इन दावों के समर्थन में उपयोग किए गए अध्ययन मुख्य रूप से इन-विट्रो (प्रयोगशाला आधारित) हैं, जो वास्तविक क्लीनिकल परिणामों को पूरी तरह नहीं दर्शाते.
mRNA COVID-19 टीकों को अचानक मौत से जोड़ने के दावे फैलने से वैज्ञानिक जांच बढ़ी. वर्तमान अध्ययनों में COVID टीकों को इसका कारण नहीं माना गया है. कुछ मामलों में टीकाकरण के बाद मायोकार्डिटिस (हृदय की सूजन) के दुर्लभ मामले सामने आए हैं, लेकिन शोध बताता है कि COVID-19 संक्रमण के बाद यह जोखिम अधिक होता है. इसके अलावा, टीके से होने वाली सूजन केवल mRNA प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य टीकों में भी हो सकती है, हालांकि इस पर कम ध्यान दिया जाता है.
सामुदायिक स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों में भरोसेमंद संचारकों को शामिल करना आवश्यक है, ताकि जानकारी विश्वसनीय और प्रासंगिक बने. समग्र रूप से, ये सभी उपाय मिलकर गलत सूचना के तंत्र का सीधे सामना करते हैं, एक अधिक जागरूक समाज बनाते हैं और विज्ञान में विश्वास को मजबूत करते हैं.
अब ये चिंताएँ नियामक संस्थाओं तक भी पहुंच गई हैं. Moderna की mRNA आधारित फ्लू वैक्सीन (m1010) तब चर्चा में आई जब अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने शुरुआत में इसके आवेदन की समीक्षा करने से इनकार कर दिया. हालांकि बाद में FDA ने समीक्षा के लिए सहमति दे दी है और इस वर्ष अगस्त तक निर्णय की उम्मीद है. Moderna m1083 वैक्सीन पर आगे बढ़ने से पहले फैसले का इंतजार कर रही है. mRNA फंडिंग को लेकर अनिश्चितता वैक्सीन नवाचार और स्वास्थ्य प्रभावों पर सवाल खड़े कर रही है.
WHO का स्ट्रैटेजिक एडवाइजरी ग्रुप ऑफ एक्सपर्ट्स (SAGE) यह सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार है कि टीकाकरण नीतियाँ साक्ष्य-आधारित निर्णयों पर आधारित हों. वैक्सीन से जुड़ी गलत जानकारी से निपटने के लिए दीर्घकालिक विश्वास-निर्माण पर आधारित वैज्ञानिक सशक्तिकरण की दिशा में बदलाव जरूरी है. इसमें स्पष्ट और प्रभावी विज्ञान संचार शामिल है, जो झूठे दावों का जवाब सटीक और प्रमाण-आधारित जानकारी से देता है.
‘प्री-बंकिंग’-यानी गलत जानकारी के संपर्क में आने से पहले चेतावनी देना-उसके प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है. गलत सूचना को कई तरीकों से खंडित किया जा सकता है, जैसे मिथक और तथ्य की तुलना, केवल तथ्यों पर आधारित संदेश, या तथ्यों के बीच मिथकों को रखकर समझाना (‘सैंडविच’ तकनीक). हालांकि कुछ अध्ययनों में यह संकेत मिलता है कि सुधारात्मक संदेश कभी-कभी उल्टा असर डाल सकते हैं, लेकिन यह मान लेना कि सच झूठ से कभी नहीं जीत सकता, एक निराशावादी सोच है जो जन-स्वास्थ्य संचार के लिए हानिकारक है.
नीति निर्माण में वैज्ञानिक विशेषज्ञता को साक्ष्य-आधारित उपायों के माध्यम से मजबूत किया जाना चाहिए. औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा के माध्यम से विज्ञान साक्षरता को मजबूत करना लोगों को विज्ञान के लाभ बेहतर ढंग से समझने और सही निर्णय लेने में मदद कर सकता है. सामुदायिक स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों में भरोसेमंद संचारकों को शामिल करना आवश्यक है, ताकि जानकारी विश्वसनीय और प्रासंगिक बने. समग्र रूप से, ये सभी उपाय मिलकर गलत सूचना के तंत्र का सीधे सामना करते हैं, एक अधिक जागरूक समाज बनाते हैं और विज्ञान में विश्वास को मजबूत करते हैं.
वैक्सीन हिचकिचाहट केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक चुनौती है. निपाह जैसे खतरे दिखाते हैं कि सफलता जन-विश्वास पर निर्भर है. पोस्ट-ट्रुथ दौर में गलत जानकारी के बीच, विज्ञान पर भरोसा बढ़ाने के लिए संचार, शिक्षा और सहभागिता जरूरी है, ताकि समाज सुरक्षित रह सके.
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Lakshmy is an Associate Fellow with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. Her work focuses on the intersection of biotechnology, health, and international relations, with a ...
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