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Published on Jan 14, 2026 Updated 1 Days ago

दक्षिण कोरिया में घटती जन्म दर और बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी से गहराती कौशल कमी अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रही है. यह लेख बताता है कि सियोल विदेशी- खासकर कुशल- श्रमिकों को समाधान क्यों मान रहा है और नीतिगत उलझनें इस राह को कैसे कठिन बनाती हैं.

सियोल की आर्थिक चुनौतीः क्यों चाहिए विदेशी पेशेवर?

दक्षिण कोरिया लंबे समय से कम जन्म दर और तेज़ी से बूढ़ी होती आबादी की समस्या से जूझ रहा है. इसके कारण अलग-अलग क्षेत्रों की कई उद्योगों में श्रमिकों की गंभीर कमी पैदा हो गई है. इसी वजह से सियोल अब विदेशी श्रमिकों को आकर्षित करने के लिए अधिक आक्रामक नीति अपना रहा है. अब तक दक्षिण कोरिया का ध्यान मुख्य रूप से अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों पर रहा है लेकिन हाल के रुझान बताते हैं कि अब कुशल पेशेवरों की ओर झुकाव बढ़ रहा है. इससे संकेत मिलता है कि उच्च तकनीक उद्योग भी इन जनसांख्यिकीय चुनौतियों का असर महसूस करने लगे हैं. इसी संदर्भ में यह लेख दक्षिण कोरिया में विदेशी श्रमिकों से जुड़ी बदलती नीतियों और उनसे पैदा हो रही चुनौतियों को सरल रूप में समझाता है.

श्रम पर बढ़ता जोर

दक्षिण कोरिया के आर्थिक विकास की कहानी और उसकी कम जन्म दर व वृद्ध होती आबादी से जुड़ी मुश्किलें अच्छी तरह जानी जाती हैं. हालिया अनुमानों के अनुसार, यदि बहुत कम जन्म दर बनी रही तो 2050 के दशक में देश को नकारात्मक आर्थिक वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है. इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि पर्याप्त मानव संसाधन के बिना अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ सकती है. इसी कारण सरकार ने लंबे समय से चली आ रही जनसांख्यिकीय समस्याओं से निपटने के लिए 88.5 ट्रिलियन वॉन खर्च करने की मंज़ूरी दी है. हालांकि, अतीत में ऐसे प्रयासों से सीमित ही सफलता मिली है इसलिए अब विदेशी श्रमिकों को आकर्षित करना दक्षिण कोरिया की प्राथमिकता बन गया है.

अब तक दक्षिण कोरिया का ध्यान मुख्य रूप से अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों पर रहा है लेकिन हाल के रुझान बताते हैं कि अब कुशल पेशेवरों की ओर झुकाव बढ़ रहा है. इससे संकेत मिलता है कि उच्च तकनीक उद्योग भी इन जनसांख्यिकीय चुनौतियों का असर महसूस करने लगे हैं.

पारंपरिक रूप से दक्षिण कोरिया ने कम-कुशल श्रमिकों को आकर्षित करने पर ध्यान दिया है, खासकर विनिर्माण, कृषि और मत्स्य जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले छोटे और मध्यम उद्यमों (एसएमई) के लिए. ये उद्यम देश की कुल कंपनियों का 99.9 प्रतिशत है लेकिन इन्हें श्रमिकों की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है. इसका कारण केवल जनसांख्यिकीय बदलाव ही नहीं बल्कि बड़ी कंपनियों की तुलना में कम वेतन भी है. इसी पृष्ठभूमि में 2004 में दक्षिण कोरिया और छह एशियाई देशों के बीच शुरू की गई रोजगार परमिट प्रणाली (ईपीएस) देश की अर्थव्यवस्था के लिए अहम रही है. अब 17 देशों तक फैल चुकी यह व्यवस्था सरकार-से-सरकार के बीच चलने वाला अस्थायी रोजगार कार्यक्रम है जो गरीब एशियाई देशों से कम-कुशल श्रमिकों को गैर-पेशेवर क्षेत्रों में काम करने के लिए दक्षिण कोरिया लाने में मदद करता है. वर्ष 2024 में, कोविड-19 महामारी के बाद पहली बार, अकुशल श्रमिकों की संख्या स्थिर हुई है. इसके साथ ही अब सरकार का ध्यान अधिक कुशल पेशेवरों को आकर्षित करने की ओर बढ़ रहा है.

तालिका 1: दक्षिण कोरिया में क्षेत्रवार अस्थायी विदेशी कामगार (2024-2026)

South Korea Turns To Immigration To Fix Its Skills Gap

Source: Compiled by author. OECD, The Chosun Biz

कुशल श्रमिकों की बढ़ती मांग

दक्षिण कोरिया ने विदेशों से कुशल पेशेवरों को आकर्षित करने के लिए कई लक्षित नीतियाँ लागू की हैं. इनमें खास क्षेत्रों के लिए विदेशी विशेषज्ञों की भर्ती और स्थानीय विश्वविद्यालयों से पढ़ाई पूरी करने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों को रोजगार देना शामिल है. ये नीतियाँ कुशल श्रमिकों को कार्यबल में शामिल करने की सरकार की मंशा तो दिखाती हैं लेकिन घरेलू नियमों में तालमेल की कमी, जटिल वीज़ा प्रक्रिया और नीतियों के कमजोर क्रियान्वयन से गंभीर चुनौतियां बनी हुई है.

दक्षिण कोरिया में अब अधिक कंपनियाँ विदेशी कर्मचारियों को रखने के लिए तैयार हैं, खासकर ई-7 वीज़ा के ज़रिये. वर्ष 2025 में सरकार ने सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी, बैटरी और डिस्प्ले जैसे क्षेत्रों में विदेशी प्रतिभा को आकर्षित करने के लिए ‘टॉप-टियर वीज़ा’ शुरू किया, जिसमें आगे चलकर रोबोटिक्स और रक्षा क्षेत्र भी जोड़े जाएंगे. कुशल श्रमिकों की यह मांग केवल 2025 तक सीमित नहीं है. 2023 में ई-7 वीज़ा की संख्या में अचानक बढ़ोतरी दर्ज की गई जो 2,000 से बढ़कर 35,000 हो गई. इससे साफ़ हो गया कि श्रमिकों की कमी अब केवल अकुशल क्षेत्रों तक सीमित नहीं रही बल्कि आईटी, प्रबंधन, वित्त और अन्य तकनीकी क्षेत्रों सहित पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है.

ऐसे कार्यक्रम यह दिखाते हैं कि कई मंत्रालय मिलकर एक साझा लक्ष्य की दिशा में काम कर रहे हैं. इसके बावजूद नीतियों में बिखराव के कारण कई अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी नहीं ढूंढ पाते और अपने देश लौटने को मजबूर हो जाते हैं.

हालांकि, सख्त वीज़ा शर्तें और जटिल आवेदन प्रक्रिया इस राह में बड़ी बाधा हैं. कंपनियों को विदेशी कर्मचारी रखने के लिए व्यवसाय लाइसेंस, पंजीकरण प्रमाणपत्र और विदेशी श्रमिक की आवश्यकता का प्रमाण देना पड़ता है. इसके अलावा, कार्य अनुभव, भाषा ज्ञान और न्यूनतम आय जैसी शर्तें भी प्रक्रिया को कठिन बना देती हैं. तय वेतन मानकों के साथ ये नियम खासकर छोटे और मध्यम उद्यमों तथा स्टार्टअप्स को विदेशी प्रतिभा रखने से हतोत्साहित करते हैं.

इसी समस्या से निपटने और स्टार्टअप क्षेत्र में प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने 2016 में ‘के-स्टार्टअप ग्रैंड चैलेंज’ शुरू किया. इसके तहत बसने में सहायता, वीज़ा और कंपनी पंजीकरण जैसी सुविधाएं दी जाती हैं. इसकी सफलता को देखते हुए सरकार अगले वर्ष विदेशी छात्रों के लिए विशेष स्टार्ट-अप ट्रैक शुरू करने की योजना बना रही है. ऐसे कार्यक्रम यह दिखाते हैं कि कई मंत्रालय मिलकर एक साझा लक्ष्य की दिशा में काम कर रहे हैं. इसके बावजूद नीतियों में बिखराव के कारण कई अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी नहीं ढूंढ पाते और अपने देश लौटने को मजबूर हो जाते हैं. डी-10 जॉब-सीकिंग वीज़ा, ई-7 वर्क वीज़ा और एफ-2-7 दीर्घकालिक निवास वीज़ा के बीच तालमेल की कमी इस समस्या को और बढ़ाती है.

विदेशों से भर्ती के अलावा, दक्षिण कोरिया का उच्च शिक्षा क्षेत्र भी कुशल प्रतिभा को आकर्षित करने में अहम भूमिका निभाता है. हाल के वर्षों में कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं. पहली बार विदेशी स्नातकों में रोजगार दर 30 प्रतिशत तक पहुँची जो पिछले वर्ष की तुलना में 11.7 प्रतिशत अधिक है. साथ ही, देश ने 3 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्रों का लक्ष्य तय समय से दो साल पहले ही हासिल कर लिया. इससे कार्यबल की कमी कम करने की संभावना बढ़ी है.

फिर भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं. अंतरराष्ट्रीय छात्रों में केवल 19 प्रतिशत ही विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) विषयों में पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 55 प्रतिशत है. इसके अलावा, शिक्षा और रोजगार नीतियों के बीच तालमेल की कमी के कारण विदेशी छात्रों को लंबे समय तक रोक पाना मुश्किल हो रहा है. आय सीमा, शैक्षणिक योग्यता और भाषा से जुड़ी शर्तें भी उन्हें आगे बढ़ने से रोकती हैं. जैसे-जैसे दक्षिण कोरिया अधिक कुशल प्रतिभा को आकर्षित करने की दिशा में अपनी रणनीति बदल रहा है, उसे नीति और क्रियान्वयन के बीच की खाई को पहचानना और पाटना होगा.

नीतियों में तालमेल की ज़रूरत

दक्षिण कोरिया में विदेशी श्रमिकों को कार्यस्थल पर अपने अधिकारों और सुविधाओं को लेकर काफी अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है. वीज़ा नियमों और क़ानूनी ढांचे-जैसे आव्रजन अधिनियम, श्रम मानक अधिनियम और विदेशी श्रमिकों के रोजगार से जुड़ा क़ानून की जटिल व्यवस्था के कारण अंतरराष्ट्रीय कर्मचारियों को अक्सर यह साफ़ समझ नहीं होती कि उनके अधिकार क्या हैं. उदाहरण के तौर पर, विदेशी श्रमिकों के रोजगार से जुड़े क़ानून में उनके परिवारों को मिलने वाली सुविधाओं का कोई प्रावधान नहीं है जबकि ‘टॉप-टियर वीज़ा’ विदेशी पेशेवरों को आकर्षित करने के लिए उन्हें और उनके परिवार दोनों को निवास और आव्रजन से जुड़ी सुविधाएँ देता है. यह अंतर सरकारी एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी को दिखाता है और विदेशी श्रमिकों में लंबे समय तक देश में रहने को लेकर असमंजस और चिंता पैदा करता है.

सियोल को ठोस सुधारों की ज़रूरत है, जैसे अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए शिक्षा और भर्ती नीतियों को जोड़ना, पढ़ाई और काम को जोड़ने वाले एकीकृत वीज़ा रास्तों पर विचार करना, और विदेशी श्रमिकों से जुड़े श्रम क़ानूनों में सुधार करना.

इसी तरह, भले ही श्रम क़ानून भेदभाव से सुरक्षा का दावा करते हों लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनका पालन हमेशा समान रूप से नहीं होता. व्यवहार में कई विदेशी श्रमिकों को अपने कोरियाई सहकर्मियों से कम वेतन, खराब रहने की स्थिति और वेतन भुगतान में देरी-और कुछ मामलों में वेतन न मिलने-जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

देश की जनसांख्यिकीय चुनौतियों को देखते हुए, श्रम आव्रजन दक्षिण कोरिया के लिए आर्थिक विकास बनाए रखने का एक अहम विकल्प बन गया है. विदेशी श्रमिकों के लिए लक्षित वीज़ा, अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए छात्रवृत्तियाँ और कुशल पेशेवरों के लिए सिफारिश प्रणालियाँ मौजूद हैं लेकिन इनकी अपनी सीमाएँ हैं जो प्रतिभाओं को लंबे समय तक देश में रोकने में बाधा बनती हैं.

इन चुनौतियों को और गंभीर बनाता है प्रभावी श्रम क़ानूनों और नीतियों की कमी, जो विदेशी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा कर सकें और उन्हें सुरक्षा का भरोसा दे सकें. ऐसे में सियोल को ठोस सुधारों की ज़रूरत है, जैसे अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए शिक्षा और भर्ती नीतियों को जोड़ना, पढ़ाई और काम को जोड़ने वाले एकीकृत वीज़ा रास्तों पर विचार करना, और विदेशी श्रमिकों से जुड़े श्रम क़ानूनों में सुधार करना. ऐसे कदम लंबे समय तक श्रमिकों को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं.


अभिषेक शर्मा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में जूनियर फेलो हैं.

श्रेया मिश्रा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.

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Authors

Abhishek Sharma

Abhishek Sharma

Abhishek Sharma is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. His research focuses on the Indo-Pacific regional security and geopolitical developments with a special ...

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Shreya Mishra

Shreya Mishra

Shreya Mishra is a Research Intern at the Observer Research Foundation. ...

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