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दो भागों की इस श्रृंखला का उद्देश्य ये पता लगाना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध और तनाव के दौरान दक्षिण एशिया के देशों ने किस तरह की प्रतिक्रिया दी है.
Image Source: Getty
पहलगाम में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों के द्वारा अप्रैल के अंत में 26 नागरिकों की हत्या के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया. इसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान में आतंक के बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के लिए ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत की. कई दौर की तनातनी के बाद अंत में दोनों देश 10 मई 2025 को युद्धविराम के लिए सहमत हो गए. इन सबके बीच दक्षिण एशिया के देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की लेकिन तटस्थता बनाए रखी और तनाव कम करने की अपील करते रहे. तटस्थता के लिए उनकी पसंद में उन तत्वों की गहरी समझ की आवश्यकता है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से इस नीति को प्रभावित किया, विशेष रूप से 1947 और 1999 के बीच भारत-पाकिस्तान के बीच हुए चार युद्धों की पड़ताल करके.
भू-राजनीति: 1947 में भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन ने इस क्षेत्र को बहुत अधिक भौगोलिक और भौतिक विषमताओं के साथ छोड़ दिया. भारत के लिए नेपाल, भूटान और श्रीलंका जैसे देश अपनी स्वाभाविक रक्षा रेखा को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण बन गए जबकि पाकिस्तान ने भविष्य में पश्तूनिस्तान की संभावना को खारिज करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में अपनी स्थिति मज़बूत की. इससे दोनों शक्तियों को लेकर उनके नज़दीकी पड़ोसियों में संदेह पैदा हो गया.
भारत के लिए नेपाल, भूटान और श्रीलंका जैसे देश अपनी स्वाभाविक रक्षा रेखा को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण बन गए जबकि पाकिस्तान ने भविष्य में पश्तूनिस्तान की संभावना को खारिज करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में अपनी स्थिति मज़बूत की. इससे दोनों शक्तियों को लेकर उनके नज़दीकी पड़ोसियों में संदेह पैदा हो गया.
भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी ने इन देशों को अपने नज़दीकी पड़ोसी के द्विपक्षीय दबाव को संतुलित करने का एक अवसर प्रदान किया. पाकिस्तान की परिवर्तनकारी महत्वाकांक्षाओं को नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और बाद में बांग्लादेश ने भारतीय ताकत को व्यस्त रखने और असर को नियंत्रित रखने के एक साधन के रूप में देखा. दूसरी तरफ अफ़ग़ानिस्तान ने यथास्थिति का फायदा उठाया और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ दबाव बनाना शुरू कर दिया. इन रणनीतियों से उन्हें अपने बड़े पड़ोसी पर दबाव डालने (यहां और यहां देखें), अपने अधिकार का इस्तेमाल करने और अंतत: विकास, व्यापार और रक्षा के क्षेत्रों में साझेदारी में विविधता लाने में मदद मिली. फिर भी दक्षिण एशिया के देश भूगोल और आर्थिक वास्तविकताओं के साथ व्यावहारिक बने रहे जिससे उन्हें अपने नज़दीकी पड़ोसी की लक्ष्मण रेखा का सम्मान करने के लिए बाध्य होना पड़ा. इस प्रकार तटस्थता ने उन्हें अपने अधिकार का विस्तार करने के साथ-साथ अपने नज़दीकी पड़ोसियों से लाभ हासिल करने का अवसर भी दिया.
घरेलू राजनीति और राष्ट्रवाद: भारत के इतिहास, आकार, द्विपक्षीय समस्याएं और पड़ोसी देशों के साथ घरेलू राजनीति (राजनीतिक स्थिरता और अल्पसंख्यकों से सलूक पर ज़ोर) एवं बाहरी संबंधों को लेकर लक्ष्मण रेखा खींचने के कारण नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश के राजनीतिक वर्ग को भारत विरोधी भावनाओं को बढ़ावा देने की प्रेरणा मिली. दूसरी तरफ डूरंड रेखा, पश्तून अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार और मुजाहिदीनों को समर्थन ने अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तानी नेतृत्व को लेकर असंतोष पैदा किया है. 1971 के युद्ध में बांग्लादेश में पाकिस्तान की भूमिका और बंगालियों के साथ सलूक ने भी वहां की राजनीति में गहरा ध्रुवीकरण उत्पन्न किया. इसके कारण अवामी लीग ने जहां धर्मनिरपेक्षता को अपनाया और भारत के साथ करीबी रिश्ते बनाए, वहीं दूसरी पार्टियों और संगठनों ने इस्लाम को अपनाया और पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए.
पाकिस्तान और भारत में से किसी के भी साथ निश्चित तौर पर जुड़ने के कारण महत्वपूर्ण सामरिक और घरेलू कीमत को देखते हुए दक्षिण एशिया के देशों और नेताओं ने तटस्थता को तरजीह दी. उन्होंने संकट का इस्तेमाल अपनी स्थिति को मज़बूत करने, द्विपक्षीय मतभेदों को दूर करने और यहां तक कि गठबंधन की जगह तटस्थता और संप्रभुता के लिए अपनी प्राथमिकता को प्रदर्शित करके राष्ट्रवादी साख को बढ़ाने का काम किया है.
विचार: दक्षिण एशियाई देशों ने तटस्थता को प्राथमिकता दी और क्षेत्रीय शांति की वकालत की है. उन्हें उम्मीद है कि ऐसा करने से उनकी आर्थिक समृद्धि और लाभ का मार्ग प्रशस्त हो सकता है. इस बेहद दुश्मनी वाले माहौल में उन्होंने ख़ुद को शांति और क्षेत्रीय एकीकरण के दूत के रूप में देखा है. कई मौक़ों पर अलग-अलग देश भारत और पाकिस्तान के बीच अपनी मर्ज़ी से मध्यस्थता के लिए भी आगे आए. इसके परिणामस्वरूप 70 के दशक तक दक्षिण एशिया की सभी छोटी ताकतों ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) को अपना लिया. वैसे तो NAM आम तौर पर शीत युद्ध की राजनीति से अलग रहता था लेकिन इसने भारत और पाकिस्तान के बीच दक्षिण एशिया की पारंपरिक तटस्थता के लिए भी रास्ता तैयार किया.
वास्तव में 1971 में, जब शीत युद्ध की राजनीति इस क्षेत्र में अपने चरम पर थी, श्रीलंका ने सैन्यीकरण को समाप्त करने और शांति को बढ़ावा देने के लिए हिंद महासागर को एक शांति क्षेत्र बनाने का प्रस्ताव दिया था. 1975 में नेपाल ने आर्थिक विकास पर ध्यान देने और भारत को लेकर अपनी कूटनीतिक गतिविधि बढ़ाने के लिए इसी तरह के शांति क्षेत्र के प्रस्ताव को अपनाया था. उसी समय दक्षिण एशिया के देशों नेपाल, मालदीव और श्रीलंका ने इस क्षेत्र को परमाणु मुक्त करने की वकालत की. 80 के दशक में क्षेत्रीय सहयोग के लिए विचार और आशाएं पनपीं. बांग्लादेश जैसे देशों ने कनेक्टिविटी और आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की आवश्यकता को लेकर भारत और पाकिस्तान को राजी करने की कोशिश की.
जब भारत-पाकिस्तान के बीच पहला युद्ध शुरू हुआ, उस समय दक्षिण एशिया के आधे देशों ने स्वतंत्रता भी नहीं हासिल की थी (तालिका 1). हिमालय में बसे देशों के साथ बातचीत के दौरान भारत ने ब्रिटिश विरासत और समझौतों को जारी रखा. भारत ने नेपाल के साथ एक यथास्थिति समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत 1950 की संधि तक नेपाल के व्यापार और कूटनीति में भारत का दबदबा बना रहा. भूटान की विदेश नीति भारत के द्वारा निर्देशित थी. वहीं घरेलू राजनीति के कारण अफ़ग़ानिस्तान तटस्थ बना रहा. अफ़ग़ानिस्तान की तत्कालीन सरकार को डर था कि भारत के पक्ष में रवैया अपनाने से बग़ावत हो सकती है और धार्मिक भावनाएं भड़क सकती हैं. इसका कारण कश्मीर में भारत के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान के पश्तून कबायली लड़ाकों और पाकिस्तानी सरकार के बीच नज़दीकी तालमेल था. अफ़ग़ानिस्तान ने डूरंड रेखा को स्वीकार नहीं करने और संयुक्त राष्ट्र (UN) में पाकिस्तान के प्रवेश का विरोध करने वाला अकेला देश होने के बावजूद ये तटस्थता दिखाई.
50 के दशक तक श्रीलंका और नेपाल, भारत के साथ अपने संबंधों में विविधता लाने और विषमताओं एवं संधि की बाध्यताओं के कारण अपनी स्वतंत्रता को लेकर मुखर होने के लिए उत्सुक थे. इसी समय पाकिस्तान ने भी भारत के पड़ोसियों तक अपनी पहुंच बढ़ाई. इसके लिए उसने भारत को साझा ख़तरे के तौर पर पेश किया. उसने 1948 में श्रीलंका के साथ और 1960 में नेपाल के साथ संबंधों की शुरुआत की. कई मायनों में 1962 का भारत-चीन युद्ध पड़ोसियों की इस स्वायत्तता की परीक्षा का समय था जब श्रीलंका, नेपाल और यहां तक कि भूटान ने भी तटस्थ रहने को प्राथमिकता दी. इस युद्ध ने दूसरे पड़ोसियों के बारे में भारत के ख़िलाफ़ चीन-पाकिस्तान के संभावित गठजोड़ को लेकर भारत की आशंकाओं को और बढ़ा दिया.
1965 में तनाव बढ़ने के साथ पाकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ दबाव बढ़ाने और चीन एवं नेपाल की मदद से भारत के चिकन नेक (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) को भारत से अलग करने की योजना बनाई. इस आकलन के बावजूद श्रीलंका और नेपाल जैसे दक्षिण एशियाई देश तटस्थ बने रहे. निकटता, आर्थिक निर्भरता और हाल के वर्षों में भारत के साथ संबंधों में सुधार ने ये तय किया. वहीं 1962 के बाद भूटान ने बाकी दुनिया के लिए झरोखे के रूप में भारत का उपयोग करते हुए भारत से अपने संबंधों में धीरे-धीरे विविधता लाने का फैसला किया था. इसने भूटान की रणनीतिक चुप्पी को निर्देशित किया. अफ़ग़ानिस्तान के मामले में पाकिस्तान के साथ पहले से तनाव होने के बावजूद प्रतिक्रिया अस्पष्ट थी. अफ़ग़ानिस्तान ने तटस्थता का इस्तेमाल करके पश्तूनिस्तान के मुद्दे का समाधान तलाशने की कोशिश की. हालांकि प्रस्तावित समाधान पाकिस्तान की सैन्य गतिशीलता के आधार पर स्वायत्तता से आत्मनिर्णय तक बदलता रहा. मालदीव की बात करें तो स्वतंत्रता मिलने के सिर्फ़ दो महीने बाद वो अलग-थलग पड़ा था.
तालिका 1. भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान दक्षिण एशिया के देशों का रवैया
स्रोत: लेखक का संकलन
1971 में पूर्वी पाकिस्तान में शरणार्थी संकट बिगड़ने के साथ श्रीलंका, नेपाल और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देश तटस्थ बने रहे और शरणार्थियों की सुरक्षित वापसी के लिए उन्होंने सामान्य स्थिति की बहाली की अपील की. श्रीलंका और नेपाल इस बात को लेकर चिंतित थे कि पाकिस्तान की टूट से भारत के पक्ष में ताकत के संतुलन में भारी बदलाव आ सकता है जिससे उनका अधिकार और मोल-तोल की क्षमता कमज़ोर होगी. श्रीलंका को इस बात का भी डर था कि पूर्वी पाकिस्तान में अशांति उसके अपने देश में भी अलगाववादियों को प्रेरित कर सकती है और इससे तमिल सवाल को लेकर खुले तौर पर भारत की भागीदारी का उदाहरण भी स्थापित हो सकता है. श्रीलंका ने पूर्वी पाकिस्तान तक सैनिकों को ले जाने के लिए अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने की अनुमति भी पाकिस्तान को दी. इस बीच नेपाल की उम्मीद जगी कि पूर्वी पाकिस्तान भारत से आर्थिक विविधता के लिए एक संभावित विकल्प के रूप में काम कर सकता है. युद्ध की शुरुआत के बाद नेपाल ने 11,000 से ज़्यादा पाकिस्तानी शरणार्थियों को रहने की जगह दी और बाद में उन्हें हवाई जहाज़ से पाकिस्तान भेजा.
श्रीलंका और नेपाल इस बात को लेकर चिंतित थे कि पाकिस्तान की टूट से भारत के पक्ष में ताकत के संतुलन में भारी बदलाव आ सकता है जिससे उनका अधिकार और मोल-तोल की क्षमता कमज़ोर होगी. श्रीलंका को इस बात का भी डर था कि पूर्वी पाकिस्तान में अशांति उसके अपने देश में भी अलगाववादियों को प्रेरित कर सकती है और इससे तमिल सवाल को लेकर खुले तौर पर भारत की भागीदारी का उदाहरण भी स्थापित हो सकता है.
भारत के साथ विकास साझेदारी में बढ़ोतरी के बावजूद अफ़ग़ानिस्तान तटस्थ बना रहा. उसे डर था कि पाकिस्तान की टूट दूसरे अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ ताकत के इस्तेमाल में बढ़ोतरी कर सकती है जिससे उसकी सुरक्षा और व्यापार पर असर पड़ेगा. भूटान ने खुलकर भारत का समर्थन किया. इसकी वजह मानवीय उद्देश्य और स्वतंत्र बांग्लादेश के द्वारा आर्थिक साझेदारी में विविधता लाने की दिशा में मदद करने की उसकी उम्मीद थी. भूटान के भारत समर्थक रुख ने उसे बहुपक्षीय संगठनों (भारत की मदद से) का हिस्सा बनने में भी सहायता की. इस क्षेत्रीय घटनाक्रम से मालदीव अलग-थलग बना रहा.
बांग्लादेश के जन्म ने एक ऐसा ताकत का संतुलन बनाया जो भारत के पक्ष में था. भारतीय संघ में सिक्किम के एकीकरण ने भूटान समेत छोटे पड़ोसियों में नई बेचैनी पैदा की. 80 के दशक में श्रीलंका एवं मालदीव में भारत के ऑपरेशन और नेपाल में नाकाबंदी ने इन चिंताओं को और बढ़ाया. इन कदमों की वजह से इन देशों ने अपनी स्वायत्तता पर ज़ोर देना जारी रखा और शांति (जैसा कि शांति प्रस्तावों के क्षेत्रों में देखा गया) एवं क्षेत्रीय एकीकरण पर अपनी सबसे ज़्यादा ऊर्जा खर्च की. वैसे तो 80 के दशक में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बना रहा और 1998 आते-आते दोनों देशों ने अपने परमाणु हथियारों का परीक्षण किया जिसकी वजह से दक्षिण एशियाई देशों को परमाणु निरस्त्रीकरण और शांति के लिए पुरज़ोर वकालत करने पर मजबूर होना पड़ा. ये स्थिति गुजराल डॉक्ट्रिन के बाद थी जिसमें छोटे पड़ोसियों को गले लगाने और जवाबी कदम के बिना उनके हितों को शामिल करने की कोशिश की गई थी.
आख़िरकार, जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो पड़ोसी देशों ने युद्ध की शुरुआत और युद्ध के पीछे ज़िम्मेदार को लेकर स्पष्ट निर्णय लिए बिना सार्वजनिक रूप से तटस्थ रवैया अपनाया. राजनीति और भू-राजनीति के अलावा इस प्रतिक्रिया में विचारों ने प्रमुख भूमिका निभाई. श्रीलंका को यकीन था कि किसी का पक्ष लेने से क्षेत्रीय एकीकरण और सार्क को झटका लगेगा; भूटान ने रणनीतिक चुप्पी बनाए रखी और मालदीव ने सार्वजनिक बयान देने से इनकार कर दिया क्योंकि उसने कुछ ही समय पहले सार्क की अध्यक्षता की थी. पाकिस्तान के साथ अपने ख़राब इतिहास के बावजूद बांग्लादेश का अवामी लीग तटस्थ बना रहा और दोनों देशों से नियंत्रण रेखा (LoC) का सम्मान करने की अपील की. उस समय अफ़ग़ानिस्तान, जो 80 के दशक से पाकिस्तान की रणनीतिक गहराई के अधीन रहा, तालिबान के शासन में आ गया था. वैसे तो तालिबान ने कूटनीतिक और भौतिक समर्थन के बदले पाकिस्तान को उसके आतंकी इकोसिस्टम में मदद करना जारी रखा लेकिन किसी भी तरह का सार्वजनिक बयान देने से उसने परहेज़ किया. वो शायद भारत के साथ बातचीत करने, संबंधों में विविधता लाने और भारत के तालिबान विरोधी दृष्टिकोण को शांत करने का संकेत दे रहा था.
भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी ने 20वीं सदी के दूसरे हिस्से में काफी हद तक क्षेत्रीय व्यवस्था को निर्धारित किया है. इस अवधि के दौरान दक्षिण एशिया के देशों ने भू-राजनीति, घरेलू राजनीति एवं राष्ट्रवाद और शांति एवं एकीकरण के विचारों की वजह से ज़्यादातर समय तटस्थता बनाए रखी.
भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी ने 20वीं सदी के दूसरे हिस्से में काफी हद तक क्षेत्रीय व्यवस्था को निर्धारित किया है. इस अवधि के दौरान दक्षिण एशिया के देशों ने भू-राजनीति, घरेलू राजनीति एवं राष्ट्रवाद और शांति एवं एकीकरण के विचारों की वजह से ज़्यादातर समय तटस्थता बनाए रखी. इस श्रृंखला का अगला लेख इन तत्वों में बदलाव और निरंतरता की समीक्षा करेगा और ये भी बताएगा कि पिछले दशक के दौरान उन्होंने अपनी नीतियों को किस तरह तय किया है.
आदित्य गोदारा शिवामूर्ति ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.
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Aditya Gowdara Shivamurthy is an Associate Fellow with the Strategic Studies Programme’s Neighbourhood Studies Initiative. He focuses on strategic and security-related developments in the South Asian ...
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