Author : Shoba Suri

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Published on Jan 13, 2026 Updated 0 Hours ago

वायु प्रदूषण सिर्फ़ हमारी सेहत नहीं बल्कि फसलों और उनके पोषण को भी नुकसान पहुंचा रहा है. जानिए कैसे खराब हवा हमारी थाली तक असर डाल रही है और इसे सुधारने के क्या उपाय हो सकते हैं.

थाली में स्मॉग: अगले दशक में क्या खो सकते हैं

हवा का प्रदूषण आमतौर पर एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में देखा गया है जिसका सीधा संबंध सांस और हृदय से जुड़ी बीमारियों व मौतों से है लेकिन अब यह भी साफ़ होता जा रहा है कि इसका असर खेती और पोषण पर भी उतना ही गंभीर है. ज़मीन के पास बनने वाली ओज़ोन (O₃), बारीक कण (PM₂.₅), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ), सल्फ़र डाइऑक्साइड (SO₂) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) पौधों की कार्यप्रणाली, फसल की पैदावार और उनके पोषक तत्वों को नुकसान पहुंचाते हैं. इससे यह स्पष्ट होता है कि हवा की खराब गुणवत्ता सीधे तौर पर खाद्य सुरक्षा और पोषण को प्रभावित करती है. जैसे-जैसे वैश्विक दबाव बढ़ रहे हैं-खासकर उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान होने वाले स्मॉग के समय- फसलों के पोषण पर पड़ने वाले इन छिपे प्रभावों को समझना बहुत ज़रूरी हो गया है.

चित्र 1: कृषि और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करने वाले प्रमुख प्रदूषक

Smog On Our Plates How Air Pollution Strips Food Of Nutrition

स्रोत: Bonface O. Monono et al., Air 2025, Vol 3

गेहूं, चावल और मक्का के लिए चेतावनी

वायु प्रदूषण कई जुड़े हुए तरीकों से पौधों को प्रभावित करता है. ज़मीन के पास बनने वाली ओज़ोन जो NOₓ और VOCs की रासायनिक क्रियाओं से बनती है, पत्तियों के अंदर जाकर ऑक्सीडेटिव तनाव पैदा करती है. इससे क्लोरोप्लास्ट को नुकसान होता है, प्रकाश संश्लेषण कमज़ोर पड़ता है और कार्बन को भोजन में बदलने की प्रक्रिया बाधित होती है. वहीं PM₂.₅ जैसे बारीक कण सूर्य के प्रकाश को बिखेरते और सोख लेते हैं जिससे पौधों को मिलने वाली रोशनी घटती है और फसल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है.

जैसे-जैसे वैश्विक दबाव बढ़ रहे हैं-खासकर उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान होने वाले स्मॉग के समय- फसलों के पोषण पर पड़ने वाले इन छिपे प्रभावों को समझना बहुत ज़रूरी हो गया है.

2025 के एक अध्ययन में, भविष्य की जलवायु स्थितियों को ध्यान में रखते हुए पाया गया कि जंगलों में लगने वाली आग से बढ़ने वाला ओज़ोन प्रदूषण दुनिया भर में मुख्य खाद्य फसलों की पैदावार को काफी कम कर देता है. इससे यह चिंता और गहरी होती है कि बढ़ते तापमान के साथ ओज़ोन का असर खेती पर और ज़्यादा पड़ेगा. अध्ययन बताता है कि शहरों और खेती से होने वाले लगातार उत्सर्जन के अलावा, जलवायु-जनित आग की घटनाएं भी फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले ओज़ोन स्तर को बढ़ाएँगी. आईआईटी खड़गपुर के CORAL संस्थान के शोध के अनुसार, अधिक उत्सर्जन वाले हालात में सदी के मध्य तक ओज़ोन के कारण गेहूं की पैदावार में 20 प्रतिशत तक कमी आ सकती है जबकि चावल और मक्का भी गंभीर रूप से प्रभावित होंगे. यह दिखाता है कि ओज़ोन फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है.

पैदावार में कमी वायु प्रदूषण के असर का केवल एक हिस्सा है. नए शोध बताते हैं कि ओज़ोन (O₃) और बढ़ी हुई कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) फसलों के पोषण स्तर को भी नुकसान पहुँचाती हैं. इसे पोषण का पतला होना कहा जाता है, जिसमें प्रोटीन, ज़िंक और आयरन जैसे ज़रूरी पोषक तत्व घट जाते हैं जबकि कार्बोहाइड्रेट बढ़ जाते हैं. लगभग 60,000 आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन से पता चला है कि मौजूदा CO₂ स्तर के कारण फसलों में पोषण घट रहा है जिससे छिपी हुई भूख का खतरा बढ़ता है.  

पराली धुआँ: खाद्य सुरक्षा के लिए छिपा खतरा

उत्तर भारत में आम पराली जलाने की प्रथा इस बात का उदाहरण है कि खेती से निकलने वाला प्रदूषण खुद खेती को ही नुकसान पहुँचाता है. उभरते हुए शोध से संकेत मिलता है कि ओज़ोन (O₃) और बढ़ी हुई कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) जैसे प्रदूषकों के संपर्क में आने से फसलों की पोषक संरचना बदल जाती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अमोनिया और पराली जलाने से होने वाला कृषि-जनित वायु प्रदूषण हर साल दुनिया भर में 5 लाख से अधिक समय से पहले होने वाली मौतों का कारण बनता है जिनमें अकेले भारत में लगभग 68,000 मौतें शामिल हैं.

शोध के अनुसार, अधिक उत्सर्जन वाले हालात में सदी के मध्य तक ओज़ोन के कारण गेहूं की पैदावार में 20 प्रतिशत तक कमी आ सकती है जबकि चावल और मक्का भी गंभीर रूप से प्रभावित होंगे. यह दिखाता है कि ओज़ोन फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है.

हवा के अलावा, पराली जलाना मिट्टी के सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुंचाता है, कीटों की समस्या बढ़ाता है और पोषक तत्वों की हानि को तेज़ करता है. इससे ऐसे दुष्चक्र बनते हैं जो फसलों की गुणवत्ता और उनकी सहनशीलता दोनों को कमजोर करते हैं.

भारत का उदाहरण दिखाता है कि स्मॉग किस तरह खाद्य प्रणाली पर कई स्तरों पर असर डालता है. उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान अक्सर गंभीर वायु प्रदूषण देखने को मिलता है. हाल के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में PM₂.₅ और वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खतरनाक स्तर से काफी ऊपर पहुंच जाते हैं-यहाँ तक कि सामान्य पराली जलाने के मौसम के बाद भी. इसका कारण परिवहन से निकलने वाला धुआँ, घरेलू ईंधन, औद्योगिक स्रोत और लगातार जारी कृषि अवशेष जलाना है.
हालांकि पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों में पराली जलाने में क्षेत्रीय स्तर पर कमी दर्ज की गई है फिर भी प्रदूषण में अचानक बढ़ोतरी होती रहती है जिससे खेती वाले इलाकों में प्रदूषकों का बोझ बना रहता है. कई नीतियां शहरों की वायु गुणवत्ता पर ध्यान देती हैं लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों से होने वाले उन उत्सर्जनों को पर्याप्त रूप से नहीं सुलझातीं जो सीधे खाद्य उत्पादन से जुड़े हैं. नतीजतन, प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा बिना समाधान के रह जाता है.

भारत अकेला नहीं है

भारत की स्थिति भले ही गंभीर हो लेकिन ऐसे ही प्रमाण दुनिया के अन्य हिस्सों से भी मिलते हैं. चीन में किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि अगर ओज़ोन और PM₂.₅ को कम किया जाए तो प्रमुख खाद्य फसलों की पैदावार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है जिससे कुल कैलोरी उत्पादन बढ़ेगा और खाद्य सुरक्षा मज़बूत होगी.
इसी तरह, अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि पृष्ठभूमि में बढ़ते ओज़ोन स्तर के कारण गेहूं, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों में हर साल लगभग 2.6 अरब अमेरिकी डॉलर का कृषि नुकसान हो रहा है. यह दर्शाता है कि वायु प्रदूषण के प्रति कृषि क्षेत्र की संवेदनशीलता लगभग सार्वभौमिक है.

उपलब्ध प्रमाण साफ़ करते हैं कि वायु गुणवत्ता को खाद्य और पोषण नीतियों का अभिन्न हिस्सा बनाना ज़रूरी है. कृषि नीति भी सकारात्मक भूमिका निभा सकती है. उदाहरण के लिए, ज़ीरो-टिलेज (बिना जुताई) और फसल अवशेष प्रबंधन जैसी तकनीकों को बढ़ावा देने से पराली जलाने से होने वाले उत्सर्जन को कम किया जा सकता है, इससे हवा की गुणवत्ता बेहतर होगी, साथ ही मिट्टी की सेहत और उत्पादकता भी बनी रहेगी.

हमारी थाली में स्मॉग कोई केवल प्रतीकात्मक बात नहीं है बल्कि एक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध वास्तविकता है जिसका सीधा असर फसल की पैदावार, पोषण गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है. वायुमंडलीय विज्ञान, कृषि विज्ञान और वैश्विक अध्ययनों से मिले हालिया प्रमाण बताते हैं कि खराब वायु गुणवत्ता भोजन की मात्रा और गुणवत्ता-दोनों को कमजोर करती है. जैसे-जैसे लगातार स्मॉग की घटनाएं और प्रदूषकों का दीर्घकालिक असर बढ़ रहा है, खासकर भारत जैसे घनी आबादी वाले कृषि क्षेत्रों में, वायु गुणवत्ता, कृषि और पोषण को जोड़ने वाली समग्र नीतियाँ ही स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा की रक्षा कर सकती हैं.


शोबा सूरी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.

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Shoba Suri

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Dr. Shoba Suri is a Senior Fellow with ORFs Health Initiative. Shoba is a nutritionist with experience in community and clinical research. She has worked on nutrition, ...

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