Author : Rachel Rizzo

Expert Speak Raisina Debates
Published on Dec 10, 2025 Updated 0 Hours ago

ट्रंप प्रशासन की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति अब संक्षिप्त लेकिन तीक्ष्ण है जिसमें चीन और सांस्कृतिक चुनौतियों पर सख़्त रुख अपनाया गया है, पश्चिमी गोलार्ध को प्राथमिकता दी गई है और भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में स्पष्ट स्थान मिला है.

अमेरिका की नई सुरक्षा नीति: भारत की जगह क्या है?

ट्रंप प्रशासन ने आखिरकार अपनी बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस) जारी कर दी. अपने लगभग एक साल के कार्यकाल के बाद, ट्रंप ने शुक्रवार, 5 दिसंबर को 2025 को ये रणनीति जारी करते हुए अमेरिकी नीति की दिशा तय की. दिसंबर 2017 में जारी पहले कार्यकाल की एनएसएस की तुलना में, यह नया दस्तावेज़ काफ़ी छोटा है. तब एनएसएस में 55 पेज़ था, अब 20 पन्ने हैं. यह रणनीति MAGA (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) पर आधारित है, और "अमेरिका फ़र्स्ट" प्राथमिकताओं पर बहुत ज़्यादा केंद्रित है. यही वजह है कि ये नीति अमेरिका द्वारा अपने मूल राष्ट्रीय हितों के रूप में परिभाषित दायरे को काफ़ी सीमित कर देती है. ट्रंप और उनकी टीम ने जानबूझकर पूर्ववर्ती प्रशासनों के एनएसएस दस्तावेज़ों के व्यापक दायरे से बचने की कोशिश की है, यहां तक कि इसमें ट्रंप के पिछले कार्यकाल की भी बहुत कम छाप दिख रही है. इसके बजाय, वे अमेरिका के मूल हितों के एक संकीर्ण समूह पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जिसके बारे में उनका तर्क है कि इससे "यह सुनिश्चित होगा कि, अमेरिका मानव इतिहास का सबसे महान और सबसे सफल राष्ट्र बना रहे, और पृथ्वी पर स्वतंत्रता का घर बना रहे". इस लेख में अमेरिका की नई सुरक्षा रणनीति के महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं.

  • नई एनएसएस संक्षिप्त-तीक्ष्ण, चीन-सांस्कृतिक चुनौतियों पर सख़्त, वेस्टर्न हेमिस्फेयर प्राथमिक; भारत को स्पष्ट रणनीतिक स्थान।
  • नई एनएसएस MAGA और ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ प्राथमिकताओं पर केंद्रित।
  • लेख में नई अमेरिकी सुरक्षा रणनीति के प्रमुख बिंदु प्रस्तुत हैं।

सामरिकता के साथ संयम पर ज़ोर?

एनएसएस का तर्क है कि शीत युद्ध के ख़ात्मे बाद से, "अमेरिकी विदेश नीति के अभिजात वर्ग ने खुद को यह विश्वास दिला लिया था कि, पूरी दुनिया पर स्थायी अमेरिकी प्रभुत्व हमारे देश के सर्वोत्तम हित में है." इसके अलावा, "अभिजात्य वर्ग ने अमेरिका की हमेशा के लिए वैश्विक बोझ उठाने की इच्छा का गलत आकलन किया. अमेरिका दुनिया की सुरक्षा को बोझ उठाते रहे, लेकिन अमेरिकी लोगों ने इसका राष्ट्रीय हित से कोई संबंध नहीं देखा." हालांकि, दस्तावेज़ यह भी कहता है कि वो "यथार्थवादी हुए बिना यथार्थवादी" है, और "शांतिप्रिय" हुए बिना भी संयमित है. दस्तावेज़ में कहा गया है कि, अमेरिका को अपने महत्वपूर्ण हितों की परिभाषा को सीमित करना चाहिए. ये संयम-उन्मुख विदेश नीति के समर्थकों का एक मुख्य सिद्धांत है. हालांकि, कैरिबियन द्वीपों में तथाकथित ड्रग बोट पर अमेरिकी हमलों और ईरान के परमाणु संवर्धन स्थलों पर बमबारी जैसे फैसलों को देखते हुए, ऐसा लगता है कि संयम की घोषित नीति और अब तक के वास्तविक नीतिगत फैसलों के बीच हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और वाली स्थिति है. 

“दस्तावेज़ में कहा गया है कि, अमेरिका को अपने महत्वपूर्ण हितों की परिभाषा को सीमित करना चाहिए।”

राष्ट्रीय सुरक्षा के रूप में सांस्कृतिक युद्ध


नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और ट्रंप के पहले की एनएसएस के बीच एक प्रमुख अंतर तथाकथित सांस्कृतिक युद्धों का उदय और अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए "पारंपरिक" अमेरिकी मूल्यों के कथित क्षरण का ख़तरा है. ट्रंप की नई सुरक्षा रणनीति अमेरिका के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को "पुनर्स्थापित" और "पुनर्जीवित" करने पर ज़ोर देते हैं. इसमें "स्वस्थ बच्चों का पालन-पोषण करने वाले पारंपरिक परिवारों" का समर्थन करने के महत्व की बात कही गई है. अमेरिका के पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों पर ट्रंप का फोकस मेक अमेरिका ग्रेट अगेन आंदोलन के युवा वैंकिस्ट नव-दक्षिणपंथी धड़े के बीच तेज़ी से लोकप्रिय होता जा रहा है. ये अब व्यापक MAGA एजेंडे में प्रमुखता से दिखाई देता है. "विनाशकारी प्रचार", "प्रभावकारी अभियान" और "DEI" डाइवर्सिटी, इक्विटी, इन्क्लूज़न जैसे ख़तरों का उल्लेख हालांकि, स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण नहीं है, लेकिन परोक्ष रूप से ये इस विश्वास को दर्शाता है कि डेमोक्रेटिक पार्टी अमेरिका की सांस्कृतिक नींव के क्षरण में, उसे कमज़ोर करने में योगदान देती है.


पश्चिमी गोलार्ध को सर्वोच्च प्राथमिकता

राष्ट्रपति ओबामा और बाइडेन का कार्यकाल हो या ट्रंप का पहला प्रशासन, इन सबने एशिया में पुनर्संतुलन पर ज़ोर दिया. लेकिन ट्रंप के दूसरे प्रशासन में पश्चिमी गोलार्ध की नए सिरे से संरचना पर फोकस रहेगा. ट्रंप की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में पश्चिमी गोलार्ध सर्वोच्च क्षेत्रीय प्राथमिकता के रूप में उभर रहा है, जबकि ट्रंप के पहले कार्यकाल के एनएसएस में यह छह में से पांचवें स्थान पर था. राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में कहा गया है कि अमेरिका मुनरो सिद्धांत को फिर से लागू करेगा और पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका की प्रमुखता को पुनः स्थापित करेगा. पश्चिमी गोलार्ध पृथ्वी का वह आधा भाग है, जो प्राइम मेरिडियन (0 डिग्री लोंगिट्यूड) के पश्चिम और 180वीं मेरिडियन (एंटीमेरिडियन) के पूर्व में स्थित है. इसमें मुख्य रूप से उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, अटलांटिक और प्रशांत महासागर के कुछ भाग शामिल हैं, जिन्हें अक्सर सांस्कृतिक रूप से "नई दुनिया" के साथ जोड़ा जाता है. जो लोग इससे परिचित नहीं हैं, उनके लिए बता दें कि मुनरो सिद्धांत की शुरुआत 1823 में हुई थी, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने यूरोपीय शक्तियों को पश्चिमी गोलार्ध के मामलों में हस्तक्षेप ना करने की चेतावनी दी थी. नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति मुनरो सिद्धांत को "ट्रंप कोरोलरी" के रूप में उल्लेखित करती है. ये नीति, पश्चिमी गोलार्ध में इमिग्रेशन को नियंत्रित करने, नशीली दवाओं के प्रवाह को रोकने, मौजूदा साझेदारियों को मज़बूत करके और नई साझेदारियां बनाकर अमेरिकी प्रभाव का विस्तार करने के लिए नए मित्रों को शामिल करने पर केंद्रित है. एनएसएस, पश्चिमी गोलार्ध में फौरी ख़तरों से निपटने के लिए वैश्विक अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को फिर से संतुलित करने पर भी ज़ोर देती है. यह एक ऐसी घोषणा है, जो एनएसएस के पिछले संस्करणों में लगभग अकल्पनीय होती. हालांकि, नीति का ज़्यादातर ध्यान अवैध इमिग्रेशन और नशीली दवाओं के ख़िलाफ़ जंग को मज़बूत करना है. 2025 के ट्रंप कोरोलरी में चीन का वही स्थान है, जो 1823 में मूल मुनरो सिद्धांत में यूरोप के लिए था. इस अर्थ में, अमेरिका पूरे क्षेत्र में आर्थिक साझेदारी को मज़बूत करने की कोशिश करेगा, जिससे अमेरिका इस क्षेत्र के देशों की "पहली पसंद" का भागीदार बन सके.

“नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति अमेरिका के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को ‘पुनर्स्थापित’ और ‘पुनर्जीवित’ करने पर ज़ोर देती है।”

एनएसएस में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए क्या प्राथमिकताएं?

राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति की क्षेत्रीय प्राथमिकताओं की सूची में दूसरे स्थान पर हिंद-प्रशांत क्षेत्र है. चीन से अमेरिकी हितों, विशेष रूप से प्रमुख आर्थिक हितों की सुरक्षा प्राथमिकता है. एनएसएस चीन के सस्ते माल के निर्यात और पारस्परिकता और निष्पक्षता के मामले में अमेरिका का फायदा उठाने पर केंद्रित है. यह चीन द्वारा निर्देशित जबरन सब्सिडी, अनुचित व्यापारिक प्रथाओं, बौद्धिक संपदा की चोरी, आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए ख़तरों, फेंटेनाइल प्रीकर्सर्स के निर्यात और दूसरे देश में अनुचित तरीके से प्रभाव डालने वाली कार्रवाइयों का मुकाबला करने के महत्व पर ज़ोर देती है. एनएसएस हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सैन्य संघर्ष को रोकने की अनिवार्यता की भी बात करती. राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति इस क्षेत्र के साझेदारों द्वारा सामूहिक रक्षा का ज़्यादा भार उठाने और प्रथम द्वीप श्रृंखला के साझेदारों द्वारा अमेरिका को अपने बंदरगाहों और अन्य सुविधाओं तक अधिक पहुंच प्रदान करने के महत्व पर ज़ोर देती है. इस सूची में नौवहन की स्वतंत्रता की प्रमुखता भी शामिल है. एनएसएस में एक महत्वपूर्ण बात ये कही गई है कि, ट्रंप ताइवान जलडमरूमध्य में यथास्थिति में किसी भी एकतरफ़ा बदलाव का समर्थन नहीं करते और ताइवान पर अमेरिका की दीर्घकालिक "घोषणात्मक नीति" को बनाए रखते हैं. ये उन लोगों के लिए राहत की बात होनी चाहिए, जो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि ट्रंप चीन से हमले की स्थिति में ताइवान को छोड़ देंगे.


“एनएसएस में एक महत्वपूर्ण बात ये कही गई है कि, ट्रंप ताइवान जलडमरूमध्य में यथास्थिति में किसी भी एकतरफ़ा बदलाव का समर्थन नहीं करते।”

यूरोप को उसके हाल पर छोड़ दिया

ट्रंप की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के यूरोप खंड में दो मुख्य मुद्दे उभरकर सामने आए. पहला, ट्रंप भी इस धारणा पर विश्वास करते हैं कि, बड़े पैमाने पर माइग्रेशन की वजह से यूरोप "सभ्यतापूर्वक नष्ट" हो रहा है, यानी यूरोपियन सभ्यता विलुप्त हो रही है, और दूसरा यह कि यूरोपीय संघ "राजनीतिक स्वतंत्रता और संप्रभुता" के संदर्भ में यूरोप को कमज़ोर कर रहा है. इसके अलावा, ट्रंप के अनुसार, "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सेंसरशिप", "राजनीतिक विरोध का दमन" और "राष्ट्रीय पहचान और आत्मविश्वास का ख़त्म होना" एक ऐसे यूरोप की तरफ ले जा रहे हैं कि, आज से 20 साल बाद यूरोप "पहचाने जानने लायक नहीं" रहेगा. एनएसएस का तर्क है कि, आत्मविश्वास की इस कथित कमी ने रूस के संदर्भ में यूरोप की सामरिक स्थिरता को सीधे तौर पर प्रभावित किया है. एनएसएस ना सिर्फ अमेरिका में, बल्कि यूरोप में भी सांस्कृतिक मुद्दों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताता है. दूसरी बात, यूरोप खंड में नाटो का एकमात्र उल्लेख रक्षा खर्च को लेकर नहीं बल्कि किसी दूसरे मुद्दे पर है. यह उस कथित ख़तरे से संबंधित है कि, कुछ नाटो सदस्य देशों में गैर-यूरोपीय लोग बहुसंख्यक आबादी में तब्दील होते जा रहे हैं. इसके बारे में एनएसएस का कहना है कि, ऐसी स्थिति में अमेरिका के लिए ये ज़रूरी नहीं है कि वो नाटो चार्टर को उसी नज़र से देखें, जैसे उस पर मूल रूप से हस्ताक्षर करते समय देखा गया था. नाटो को एक निरंतर विस्तारित होते गठबंधन के रूप में देखने की धारणा को समाप्त करने और "वास्तविकता को रोकने" पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है. ऐसा लग रहा है कि आगे चलकर नाटो की "बंद दरवाजे वाली" नीति को समर्थन दिया जाएगा, यानी नाटो का अब और विस्तार नहीं किया जाएगा.

“राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में कहा गया है कि अमेरिका मोनरो सिद्धांत को फिर से लागू करेगा और पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका की प्रमुखता को पुनः स्थापित करेगा।”

ट्रंप की नीति में भारत कहां है?

भारत का ज़िक्र एनएसएस में कई बार होता है, हालांकि आमतौर पर व्यापक रणनीतिक प्राथमिकताओं के हिस्से के रूप में. ट्रंप एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम और शांति को बढ़ावा देने का श्रेय लेते हैं. यह बयान उन्होंने पहले भी दिया है, और मई में हुए भारत-पाकिस्तान गतिरोध के बाद से ये उनके और मोदी के बीच तनाव का विषय बन गया है. एनएसएस भारत को पश्चिमी गोलार्ध में अपनी स्थिति मज़बूत करने और अफ्रीका में महत्वपूर्ण खनिजों के संबंध में एक संभावित साझेदार के रूप में भी संदर्भित करता है. इसके अलावा वो, भारत के साथ संबंधों को बेहतर बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर देता है, जिससे उसे क्वाड ढांचे के माध्यम से हिंद-प्रशांत सुरक्षा में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके. जो लोग इस बात से चिंतित थे कि, क्वाड अपने मूल उद्देश्य से भटक रहा है, उनके लिए यह एक सकारात्मक संकेत हो सकता है. फिर भी, अगर ट्रंप प्रशासन क्वाड को उस रणनीतिक महत्व के स्तर तक बढ़ाने का इरादा रखता है, जिसको वो वाकई हक़दार है, तो इस पर अभी काफ़ी काम करना बाकी है.


रचेल रिज़ो ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में सीनियर फेलो हैं.

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