भारत से पहले अमेरिका के साथ व्यापार समझौता करके पाकिस्तान ने खुद को जीत का तमगा दे दिया है, लेकिन इस समझौते के बारीक विवरण बताते हैं कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती और इस्लामाबाद को इससे कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ है.
Image Source: Getty Images
अमेरिका के साथ हाल ही में व्यापार समझौता करने के बाद पाकिस्तान में उत्साह की जबरदस्त लहर पैदा हुई, क्योंकि इसकी शर्तें इस्लामाबाद के कट्टर प्रतिद्वंद्वी भारत और क्षेत्र के अन्य प्रतिस्पर्धी देशों के साथ अमेरिका की हो रही बातचीत की तुलना में ज़्यादा अनुकूल दिख रही थीं. मगर हक़ीक़त की जमीन पर देखें, तो यह समझौता पाकिस्तान के लिए कुछ ख़ास महत्व नहीं रखता. पाकिस्तान में शुरुआती उल्लास अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सोशल मीडिया हैंडल पर की गई पोस्ट से पैदा हुआ था, जिसमें यह घोषणा की गई थी कि पाकिस्तान के ‘विशाल तेल भंडार’ को विकसित करने में अमेरिका न सिर्फ़ मदद करेगा, बल्कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि पाकिस्तान का उत्पादित तेल उसका पड़ोसी देश भारत ख़रीदेगा.
सार्वजनिक मंचों पर जो सूचना उपलब्ध है, उसके मुताबिक, पाकिस्तान ने अमेरिका के 19 फीसदी टैरिफ़ के एवज में अमेरिका से आयात होने वाले 4,000 से अधिक उत्पादों के लिए सीमा शुल्क शून्य करने पर सहमति जताई है.
पाकिस्तान की यह खुशी उस समय और ज़्यादा बढ़ गई, जब ट्रंप ने रूस से तेल ख़रीदने पर भारत पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त जुर्माना लगाने का एलान किया, और उसी दिन पाकिस्तान के सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर को अमेरिका की दूसरी आधिकारिक यात्रा के लिए आमंत्रित किया. वैसे, अमेरिका ने 31 जुलाई, 2025 को संशोधित पारस्परिक सीमा शुल्कों से जुड़े कार्यकारी आदेश (EO) भले जारी कर दिए, लेकिन यह बात अब तक साफ़ नहीं हो सकी है कि पाकिस्तानी वार्ताकारों ने किन-किन शर्तों पर अमेरिकी समझौते पर हस्ताक्षर किए. हालांकि, अब इसकी जानकारी धीरे-धीरे बाहर आने लगी है. सार्वजनिक मंचों पर जो सूचना उपलब्ध है, उसके मुताबिक, पाकिस्तान ने अमेरिका के 19 फीसदी टैरिफ़ के एवज में अमेरिका से आयात होने वाले 4,000 से अधिक उत्पादों के लिए सीमा शुल्क शून्य करने पर सहमति जताई है. इन शर्तों में पाकिस्तान के तेल, खनिज और क्रिप्टो क्षेत्र में अमेरिकी निवेश पर रजामंदी भी शामिल है.
इसमें पाकिस्तान के ‘विशाल तेल भंडार’ के दावे पर निस्संदेह शंकाएं और चिंताएं, दोनों बनी हुई हैं. चूंकि ट्रंप की यह आदत है कि वह सामान्य व बेतुकी बातों को भी बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं, इसलिए इस पर यक़ीन करना किसी के लिए भी मुश्किल है कि पाकिस्तान के पास विशाल तेल भंडार होने की बात आई कहां से. या तो ट्रंप ने मोल-भाव की रणनीति अपनाई है और अमेरिका के लिए बेहतर शर्तें पाने के लिए दुनिया के चौथे सबसे बड़े तेल व गैस भंडार होने के पाकिस्तान के दावों पर विश्वास करने का नाटक किया है, या फिर उन्हें वाकई यह यक़ीन है कि तेल और खनिज के क्षेत्र में पाकिस्तान अगला बड़ा प्रभावशाली क्षेत्र बनने वाला है, और अमेरिकी एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) सहित तमाम स्वतंत्र विश्लेषकों के अनुमानों के विपरीत रुख़ अपनाकर उन्होंने पाकिस्तान का समर्थन करने का फैसला किया है. अब तक कोई नहीं जानता कि पाकिस्तान के तेल भंडार कब और कहां से आएंगे, लेकिन पाकिस्तानियों को अमेरिका से तेल ख़रीदने पर ज़रूर मजबूर होना पड़ा है. साफ़ है, यह समझौता कोई ‘गेम चेंजर’ नहीं है, जिसका दावा इस्लामाबाद में फ़ौज के दबाव में काम करने वाली हुकूमत के चाटुकारों ने करना शुरू किया है.
पाकिस्तान का यह लंबा इतिहास रहा है कि वह खुद को प्रचारित करने और हक़ीक़त से अधिक आकर्षक व्यापारिक प्रस्ताव दिखाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर व झूठे दावे करता रहा है.
पाकिस्तान का यह लंबा इतिहास रहा है कि वह खुद को प्रचारित करने और हक़ीक़त से अधिक आकर्षक व्यापारिक प्रस्ताव दिखाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर व झूठे दावे करता रहा है. पाकिस्तान के सियासतदानों और फ़ौजी हुक्मरानों द्वारा अक्सर इस तरह के निराधार दावे इसलिए किए जाते हैं, ताकि वे अपनी जनता को यह भरोसा दे सकें कि उनको जल्द आर्थिक राहत मिलने वाली है या फिर, सुस्त आर्थिक माहौल के बावजूद विदेशी निवेशकों का ध्यान अपने मुल्क की ओर खींच सकें. 1976 में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने एक विशाल तेल भंडार मिलने का ऐलान किया था और दावा किया था कि वह पाकिस्तान को अगले तीन वर्षों में तेल के मामले में आत्मनिर्भर बना देगा. इससे पहले, 1973 में पाकिस्तानियों ने कहा था कि सिंधु बेसिन में तेल का जो संभावित भंडार है, वह 40-45 अरब बैरल का है. बावजूद इन सबके, 50 साल बाद भी पाकिस्तान तेल का सबसे ज़्यादा आयात कर रहा है.
पाकिस्तान ने इसी तरह 2006 में भी गुमराह किया, जब उसने बताया कि थार रेगिस्तान में लिग्नाइट का इतना भंडार है कि देश को अगली सदी तक पर्याप्त बिजली मिलती रहेगी. इसका नतीजा यह निकला कि कोयला गैसीकरण परियोजना (इसमें कोयले को अधिक तापमान पर ऑक्सीजन, भाप या कार्बन डाइऑक्साइड के साथ प्रतिक्रिया कराकर सिनगैस, यानी सिंथेटिक गैस में बदला जाता है) में किया गया सारा निवेश बेकार चला गया. 2000 के दशक की शुरुआत में, तांबा को ‘नया तेल’ बना दिया गया और उम्मीद जताई गई कि यह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को आसमान पर पहुंचा देगा. हालांकि, बलूचिस्तान में सैंदक तांबा परियोजना से दो दशकों में सिर्फ़ 3 अरब डॉलर के बराबर ही फ़ायदा मिल सका है. रेको दिक परियोजना भी- जिसे पाकिस्तान का भाग्य बदलने वाली परियोजना माना गया था- बीते 37 वर्षों में केवल 74 अरब डॉलर का मुक्त नकदी प्रवाह कर सकी है, यानी सालाना 2 अरब डॉलर. ज़ाहिर है, यह इतनी बड़ी रकम नहीं है कि वह 25 करोड़ की आबादी वाले इस देश का भाग्य बदल सके और अगले 37 वर्षों में जिसकी जनसंख्या बढ़कर 40 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है. यह अफवाह भी पहले से चल रही है कि रेको दिक की प्रमुख कंपनी अपनी हिस्सेदारी का एक बड़ा हिस्सा इच्छुक निवेशकों को बेचकर इस परियोजना से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है.
इसी तरह, 2015 में तब के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने घोषणा की थी कि पंजाब के चिन्योट में लौह अयस्क और तांबे के विशाल भंडार की खोज के बाद पाकिस्तान ‘भीख का कटोरा’ लेकर घूमने वाला देश नहीं रहेगा और यह धारणा पूरी तरह बदल जाएगी. वज़ीर-ए-आज़म नवाज शरीफ और उनके भाई शहबाज शरीफ ने, जो उस समय पंजाब सूबे के मुख्यमंत्री थे, दावा किया कि लौह अयस्क की खोज में उन्हें चिन्योट में सोना और तांबा भी मिला है. इन सब दावों के पीछे वही पाकिस्तानी डा समर मुबारकमंद का हाथ था, जो कथित तौर पर दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु वैज्ञानिक होने का दावा करता है और जिसने थार कोल गैसीफिकेशन के वादे पर देश को गुमराह किया था. चिन्योट में सोने और तांबे का सपना दिखाने वाला यही व्यक्ति था. चिन्योट को रेको दिक से बड़ा भंडार बताया गया था. हालांकि, अगले कुछ हफ़्तों में ही यह बुलबुला फूट गया. वैसे भी, आर्थिक मुश्किलों के बढ़ने के साथ-साथ किसी ईश्वरीय चमत्कार या लॉटरी मिलने की चाहत भी बढ़ती जाती है.
साल 2019 में, इमरान खान ने घोषणा की कि पाकिस्तान कराची के तट पर तरल सोना (यानी तेल) खोजने वाला है और दावा किया कि पाकिस्तान के हालात जल्द ही बेहतर होने वाले हैं. हालांकि, अगले कुछ दिनों में तेल की कोई खोज न होने पर उनके सारे सपने टूट गए. इमरान के एक मंत्री फैजल वावदा ने भी अपने वज़ीर-ए-आज़म के कदम पर चलते हुए बड़े गर्व के साथ यह घोषणा की कि अगले कुछ दिनों में न सही, लेकिन कुछ ही हफ़्तों में पाकिस्तान में इतनी नौकरियां होंगी कि विदेश से लोग यहां आकर रोज़गार की तलाश करेंगे. इस दावे के छह साल बाद, स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि देश में बेरोज़गारी का स्तर ऐतिहासिक रूप से बढ़कर 22 प्रतिशत से अधिक हो गया है.
साल 2022 में इमरान खान के पद से हटने के बाद, बाद के प्रधानमंत्रियों को अत्यंत बदहाल आर्थिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. यहां तक कि पाकिस्तान दिवालिया और डिफॉल्ट भी घोषित कर दिया गया. तब उस समय के वित्त मंत्री, इशाक डार ने पूरी गर्मजोशी के साथ यह दावा किया कि पाकिस्तान दिवालिया नहीं है और उसके पास अरबों की संपत्ति है, हालांकि, वह मुंह मियां मिट्ठू के रूप में जाने जाते हैं और उन्होंने ही अपनी कथनी से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कार्यक्रमों को पटरी से उतार दिया था. एक अन्य मंत्री ने भी ज़ोर-शोर से ऐलान किया कि ‘पाकिस्तान के खनिजों का आर्थिक मूल्य 6.1 ट्रिलियन डॉलर है, जो एप्पल, अमेजन और गूगल जैसी तकनीकी दिग्गज कंपनियों की कुल संपत्ति से भी ज़्यादा है.’
इन सबके अलावा, सेना प्रमुख आसिम मुनीर भी जनता का मन बहलाने का प्रयास कर चुके हैं. 6.1 ट्रिलियन डॉलर के दावे के कुछ ही हफ़्तों के भीतर, मुनीर ने उद्योगपतियों की एक सभा में ऐलान किया कि वह बहुत जल्द अरब खाड़ी के देशों से पाकिस्तान में 100 अरब डॉलर का निवेश लाएंगे. उस वक्त वह चार सितारा जनरल थे. दो साल के बाद, उनके पास अपने इस दावे को लेकर दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है, लेकिन उन्हें पदोन्नत करके फील्ड मार्शल ज़रूर बना दिया गया है. 100 अरब डॉलर के निवेश के दावे के एक साल के बाद, पाकिस्तानी फ़ौज ने एक और कहानी बुनी और जिसने पाकिस्तान के महासागर में तेल होने के पुराने मिथक को जिंदा कर दिया. सितंबर 2024 में, पाकिस्तान द्वारा तेल और गैस भंडार की खोज के दावे फिर से किए गए और इस बार कहा गया कि यह ‘इतनी बड़ी मात्रा में है कि इसका दोहन मुल्क की नियति बदल सकता है’. दावा यह था कि वह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार है.
हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने पाकिस्तान के मित्र देशों को शेख़-चिल्ली के इन सपनों में न फंसने की चेतावनी दी थी, फिर भी ‘विशाल तेल भंडार’ होने की कहानी पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति के करीबी लोगों को सफलतापूर्वक बेची और उन्होंने इसको ख़रीदा भी. तेल के अलावा, पाकिस्तान ने अमेरिकियों को दुर्लभ खनिजों और क्रिप्टोकरेंसी का भी लालच दिया. अमेरिकियों ने कभी यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाई कि अगर पाकिस्तान के पास सचमुच इतना बड़ा संसाधन है, तो उसके ‘सदाबहार दोस्त’ और ‘स्थायी भाई’ चीन ने इस कथित विशाल संसाधनों के दोहन का गंभीर प्रयास अब तक क्यों नहीं किया, जबकि उसने यहां भारी निवेश कर रखा है?
महंगा उत्पादन और आर्थिक, राजनीतिक व सुरक्षा संबंधी अनिश्चितताएं व अशांति खरीदारों को पाकिस्तान में आने के लिए शायद ही प्रोत्साहित करेगी. ऐसे में, अमेरिका और पाकिस्तान का व्यापार किसी भी स्थिति में बढ़ने वाला नहीं है.
पाकिस्तान में अरबों डॉलर के अमेरिकी निवेश के सपने को छोड़ दें, तो व्यापार की संभावनाएं भी सिंधु नदी में कोई ख़ास हलचल नहीं मचा पाएंगी. दरअसल, कुछ रिपोर्टों से पता चलता है कि अमेरिकी वार्ताकारों ने ‘भारत कार्ड’ का इस्तेमाल करके पाकिस्तानियों को उनकी सभी मांग मानने के लिए मजबूर किया. पाकिस्तान पर भले ही 19 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया गया है, लेकिन इससे उसे अपने प्रतिस्पर्धी देशों, जैसे मिस्र, बांग्लादेश, श्रीलंका या वियतनाम की तुलना में कोई फ़ायदा नहीं मिलेगा. महंगा उत्पादन और आर्थिक, राजनीतिक व सुरक्षा संबंधी अनिश्चितताएं व अशांति खरीदारों को पाकिस्तान में आने के लिए शायद ही प्रोत्साहित करेगी. ऐसे में, अमेरिका और पाकिस्तान का व्यापार किसी भी स्थिति में बढ़ने वाला नहीं है. 2024 में दोनों देशों के बीच लगभग 7.6 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था, जिसमें पाकिस्तान 2 अरब डॉलर से थोड़ा ज़्यादा मूल्य का आयात करता था. वह लगभग 5.5 अरब डॉलर मूल्य का निर्यात करता है, जिसमें से 80 प्रतिशत उत्पाद कपास, कपड़े और परिधान होते हैं. इन उत्पादों के निर्यात में कोई उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावनाएं नाममात्र की भी नहीं हैं.
निश्चित तौर पर अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से जो उम्मीदें बनी थीं, वे अब नाउम्मीदी में बदलती जा रही हैं, लेकिन चर्चा यह भी है कि अमेरिका और पाकिस्तान एक बार फिर रणनीतिक सहयोगी बन सकते हैं. हालांकि, अभी तक ऐसा कुछ नहीं दिखा है, जिससे यह संकेत मिले कि अमेरिका जल्द ही पाकिस्तान को अपनी रक्षा सामग्रियां बेचना शुरू कर देगा या दोनों देशों के रिश्ते पिछली सदी जैसे हो जाएंगे. ट्रंप प्रशासन सस्ती कीमतों पर हथियारों की आपूर्ति करेगा, ऐसी किसी को उम्मीद नहीं है, और पाकिस्तान के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह अमेरिकी हथियारों की कीमत चुका सके. पाकिस्तान में एक और आशंका यह है कि ट्रंप प्रशासन कूटनीतिक (अब्राहम समझौता में शामिल होने) और सामरिक (ईरान) मांगे कर सकता है, जिसे पूरा करने में पाकिस्तान हिचकिचाएगा. हालांकि, अभी इस्लामाबाद और उससे भी ज़्यादा रावलपिंडी में इस बात को लेकर संतोष है कि पाकिस्तान पर अब भी ट्रंप का भरोसा बना हुआ है. अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारत-अमेरिका संबंधों को मिट्टी में मिलाते देखना उनको और ज़्यादा खुशी दे रहा है. बहरहाल, एक ऐसे देश में, जहां लोग दुश्मन देश के घरों को तबाह करने के लिए ही जीते हैं, फिर चाहे उनके खुद के घर जर्जर क्यों न हो गए हों, वहां भारत-अमेरिका संबंधों के टूटने से ज़्यादा संतोष की बात और कुछ हो भी क्या सकती है.
(सुशांत सरीन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में वरिष्ठ फेलो हैं)
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Sushant Sareen is Senior Fellow at Observer Research Foundation. His published works include: Balochistan: Forgotten War, Forsaken People (Monograph, 2017) Corridor Calculus: China-Pakistan Economic Corridor & China’s comprador ...
Read More +