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Published on Jan 31, 2025 Updated 3 Days ago

टैक्स और आर्थिक प्रशासन ईमानदार करदाताओं और भ्रष्ट वसूली करने वालों के बीच जंग का मोर्चा बन गए हैं. 2025 के बजट को चाहिए कि वो सभी मंत्रालयों को साथ लेकर चलने का समावेशी नज़रिया अपनाए और इस समस्या का समाधान करे.

‘वर्ष 2025 के बजट के सामने 7 विशाल चुनौतियां’

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1 फ़रवरी 2025 को सुबह 11 बजे जब वित्त मंत्री 2025 का आम बजट संसद में पेश करेंगी, तो आंकड़ों का तूफ़ान हमसे टकराएगा. ये वित्त मंत्री के तौर पर ये निर्मला सीतारमण का आठवां और NDA सरकार का (2019 और 2024 में पेश किए गए अंतरिम बजटों को मिलाकर) 14वां बजट होगा. वित्त मंत्री का भाषण एक संकेत होगा, जो उन तमाम आंकड़ों का साहसिक अभियान होगा, जो संसद के पटल पर पेश किए गए 14 दस्तावेज़ों में समाहित होंगे. अरुण जेटली और पीयूष गोयल के बाद मोदी सरकार की तीसरी वित्त मंत्री द्वारा तैयार सरकार के सीज़न 3 के दूसरे बजट को कोई किस तरह समझे जिसे तीसरे कार्यकाल वाली सरकार पेश करने जा रही है.

बजट का 1947 से 2024 तक का सफ़र

वैसे तो हर केंद्रीय बजट में एक जैसे आंकड़े होते हैं. लेकिन, उनके पीछे के बुनियादी हालात हर साल बदल जाते हैं. 1947 में वित्त मंत्री आर. के शनमुखम शेट्टी द्वारा पेश किए गए बजट में आज़ादी का जश्न मनाया गया था. 1969 में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के तौर पर इंदिरा गांधी ने जो बजट पेश किया था उसमें संपत्ति कर का दायरा बढ़ाते हुए उसमें कृषि को भी शामिल कर लिया गया था. 1973 में वित्त मंत्री वाई. बी चव्हाण ने अपने बजट में एक लाख से ऊपर की आमदनी पर निजी आयकर को बढ़ाकर 85 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा था. इस पर 40 फ़ीसद के सरचार्ज को लगाकर आयकर की दर 119 प्रतिशत की वाहियात दर तक जा पहुंचा था. 1991 में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के बजट ने प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हाराव की सरकार द्वारा शुरू किए गए आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की थी. वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के 1997 के बजट (जिसे ड्रीम बजट कहा गया) में निजी आयकर की दरों को 10, 20 और 30 प्रतिशत के ढांचे में ढालकर मज़बूती दी थी. अभी हाल ही में निर्मला सीतारमण के 2023 के बजट में चार सालों में पूंजीगत निवेश को तीन गुना बढ़ा दिया था और दूरगामी विकास दर की आधारशिला रखी थी.

 1969 में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के तौर पर इंदिरा गांधी ने जो बजट पेश किया था उसमें संपत्ति कर का दायरा बढ़ाते हुए उसमें कृषि को भी शामिल कर लिया गया था. 1973 में वित्त मंत्री वाई. बी चव्हाण ने अपने बजट में एक लाख से ऊपर की आमदनी पर निजी आयकर को बढ़ाकर 85 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा था.

निर्मला सीतारमण के लिए चुनौतियां

2025 का बजट ऐसे वक़्त में आने जा रहा है, जब भारत की अर्थव्यवस्था के सामने सात बड़ी चुनौतियां खड़ी दिख रही हैं.

  • आर्थिक सुस्ती: पहली चुनौती, 2024-25 की दूसरी तिमाही में वास्तविक GDP (सकल घरेलू उत्पाद) में आई गिरावट है, जो उससे पहले के साल की इसी तिमाही के 8.1 प्रतिशत के मुक़ाबले गिर कर केवल 5.4 फ़ीसद रह गई है. हो सकता है कि ये मामूली गिरावट दिखे. लेकिन, जब इसकी बारीक़ी से पड़ताल की जाती है, तो इसके पीछे लगातार गिरावट का एक ट्रेंड दिखता है. चार तिमाही पहले जहां विकास दर 8.6 प्रतिशत से अधिक थी, वो अब घटकर मौजूदा तिमाही में सिर्फ़ 5.4 प्रतिशत रह गई है. इससे भी बुरी बात तो ये है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की विकास दर तो ख़तरनाक स्तर तक गिर गई है: अभी ये 2.2 प्रतिशत है, जो पिछली तिमाही के 7.7 प्रतिशत की लगभग एक तिहाई और 2023-24 की दूसरी तिमाही के 14.3 प्रतिशत से तो बहुत ही कम है. दूसरे शब्दों में कहें तो 2025 के बजट को विकास की रफ़्तार तेज़ करनी होगी, ख़ास तौर से निर्माण के क्षेत्र में. अगर बजट के बाद विकास दर में उछाल नहीं आता, तो ये दस्तावेज़ उतनी हैसियत भी नहीं रखेगा, जितना डिजिटल स्पेस बजट खाएगा. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत की विकास दर 2025 में 5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो दुनिया में सबसे अधिक होगा. ये चीन की विकास दर से 2 प्रतिशत अधिक और अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और पश्चिमी एशिया से तो बहुत ही आगे होगा. ये बात सुनकर तसल्ली भले ही महसूस हो, मगर 2025 के बजट को विकास दर की रफ़्तार तेज़ करने की दिशा दिखानी होगी.
  • असामान्य स्थितियां: दूसरी चुनौती, 2024-25 की पहली छमाही में नॉमिनल GDP विकास दर 8.9 प्रतिशत रही है, जो मिली जुली तस्वीर पेश करती है. 2047 तक विकसित भारत या फिर 30 ट्रिलियन डॉलर GDP वाली अर्थव्यवस्था बनने के लिए 9.6 प्रतिशत सालाना विकास दर की ज़रूरत है. ऐसे में ये विकास दर भी लक्ष्य से पीछे है. हालांकि, इससे ये भी पता चलता है कि महंगाई अभी क़ाबू में है. ऐसे में महंगाई को बढ़ाए बिना विकास दर को रफ़्तार देना अहम होगा. निश्चित रूप से लोकतांत्रिक देशों में विकास दर में क़ुदरती तौर पर उतार चढ़ाव आता रहता है. भारत कुछ तिमाहियों तक कम विकास दर के साथ भी चल सकता है. लेकिन, शर्त ये है कि इसके साथ ही साथ दूरगामी संरचनात्मक सुधार भी किए जाएं. मसलन विनियमन के. यानी सरकारी नियमों के अनुपालन से जुड़े सुधार. अब ‘सब चलता है’ का रवैया नहीं चलने वाला है.
  • घाटे: तीसरी चुनौती ये है कि विकास दर में सुस्ती को देखते हुए निर्मला सीतारमण को ये सुनिश्चित करना ही होगा कि वित्तीय घाटा जो 2020-21 के 9.2 प्रतिशत की ऊंची दर से लगातार घटते हुए 2024-25 के बजट पूर्वानुमानों में 4.9 फ़ीसद रह गया था, वो आगे भी कम होता रहे. इससे पहले अगर विकास दर तेज़ रहती तो वित्तीय घाटे को GDP की ऊंची दर के ज़रिए बर्दाश्त किया जा सकता था. क्योंकि तेज़ विकास दर के चलते कुछ अतिरिक्त ख़र्च का बोझ सरकार उठा सकती थी. मोदी सरकार के अंतर्गत बजट का आकार पिछले एक दशक में 2.8 गुना बढ़ चुका है, जो सालाना 11.1 प्रतिशत बैठता है. ये सेंसेक्स के 9.9 प्रतिशत की विकास दर से अधिक है. विकास दर की तेज़ी से ही सरकारी व्यय की ये बढ़ोत्तरी मुमकिन हो सकी है. अब चूंकि विकास दर सुस्त हो रही है, तो सरकार को अपना ख़र्च नियंत्रित करना होगा. अच्छे वक़्तों में अपना ख़र्च बढ़ाना जितना आसान है, मुश्किल दौर में उनको कम करना उतना ही मुश्किल होता है.
  • बेकार के व्यय का एक हालिया उदाहरण तब सामने आया, जब सरकार ने 17 जनवरी 2025 को राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटिड को पुनर्जीवित करने के लिए 11 हज़ार 440 करोड़ की योजना का एलान किया. बार बार अपने क़र्ज़े चुका पाने में नाकाम रहे सरकारी संस्थान RINL की कुल क़ीमत 4,538 करोड़ की क़र्ज़ अदायगी का बोझ है. RINL किसी भी बैंक से क़र्ज़ भी नहीं ले पा रहा है. ऐसे में सवाल ये उठते हैं कि आख़िर सरकार इस बोझ बन चुकी संपत्ति को बेच क्यों नहीं पाती. उसी तरह जैसे उसने जनवरी 2022 में एयर इंडिया को बेचा था और इस तरह वो 1 फ़रवरी 2021 को घोषित की गई अपनी सामरिक विनिवेश की नीति का पालन क्यों नहीं करती? सरकार की कारोबार करने की ये धुन किस दिशा में जा रही है और इस पर लगाम कब लगेगी? आख़िर क्यों सरकार जनता की गाढ़ी कमाई के पैसों को वित्तीय तौर पर नाकाम सरकारी संस्थानों पर लुटा रही है? और राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड तो ऐसी सरकारी संस्थाओं में से एक भर है. मिसाल के तौर पर, जिस प्रक्रियाओं से यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) जैसे माध्यमों से वित्तीय कुशलताओं को बढ़ाया गया है. उसी प्रक्रिया के तहत इन नाकाम सरकारी कंपनियों, बिना अध्यापकों वाले स्कूलों, बिना डॉक्टरों वाले अस्पतालों और बिना जवाबदेही वाले प्रशासनिक ढांचे को भी समेटना चाहिए. वित्त मंत्री विकास को बढ़ावा देने और सामरिक विनिवेश के तरीक़े अपना सरकार का ख़र्च घटाने के बीच किस तरह संतुलन बनाती हैं, इस पर लोगों की बारीक़ नज़र होगी.

सरकार की कारोबार करने की ये धुन किस दिशा में जा रही है और इस पर लगाम कब लगेगी? आख़िर क्यों सरकार जनता की गाढ़ी कमाई के पैसों को वित्तीय तौर पर नाकाम सरकारी संस्थानों पर लुटा रही है?

  • राजनीतिक अर्थशास्त्र: चौथी चुनौती ये है कि जिस अर्थव्यवस्था में मुफ़्त की योजनाओं का एलान करने में एक दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ लगी है और जिनकी वजह से वैधानिक रूप से बाध्यकारी और अपरिहार्य ख़र्च बढ़ रहे हैं, ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर अहम व्यय जैसे कि रक्षा या फिर सामरिक क्षेत्रों में निवेश विवेकाधीन हो जाता है और इनसे समझौते करने पड़ते हैं. आज के दौर में जब भारत को हिंद महासागर क्षेत्र के संरक्षक के तौर पर देखा जाने लगा है, तो मुफ़्त की घोषणाएं, आर्थिक राजनीति की कोई अच्छी तस्वीर नहीं पेश करतीं. मुफ़्त बिजली और पानी से लेकर मुफ़्त में बस में सफ़र और बेरोज़गारों व महिलाओं को नक़द सहायता देने जैसे वादे करना तो आसान है. लेकिन, उनको पूरा करने की अपनी वित्तीय सीमाएं हैं. अच्छी राजनीति और अच्छी अर्थनीति अब एक दूसरे के पूरक होने के बजाय एक दूसरे के विपरीत ध्रुव बनते जा रहे हैं. केंद्र सरकार के स्तर पर इनके बीच संतुलन बनाना 2025 के बजट की एक अहम चुनौती होगी. इसके बाद राज्य भी केंद्र के दिखाए रास्ते पर चल सकते हैं.
  • टैक्स के बोझ से दबे करदाता: पांचवीं चुनौती, टैक्स के मामले में न्याय की है. जो लोग पहले से ही टैक्स का भारी बोझ उठा रहे हैं, उन पर और बोझ लादा जा रहा है. इससे भारी बोझ तले दबे मध्यम वर्ग के करदाताओं का एक नया वर्ग तैयार हो रहा है, जिसकी कोई सुनवाई नहीं है और जिसके पास बचने का कोई रास्ता भी नहीं है. वो इतने अमीर नहीं हैं कि सम्मानजनक जीवन जी सकें और न ही इतने ग़रीब हैं कि मुफ़्त की योजनाों का लाभ ले सकें और न ही वो इतने भ्रष्ट हैं कि कर के शिकंजे से बच सकें. उनकी राजनीतिक आवाज़ की भी कोई अहमियत नहीं है और इसी वजह से करदाता मध्यम वर्ग राजनीति का बोझ उठाने वाला बन गया है और उसके ऊपर टैक्स कलेक्टेड ऐट सोर्स जैसे करों का बोझ बढ़ता जा रहा है. ये अन्याय जारी रहेगा, क्योंकि करदाताओं का दायरा बढ़ाने की चर्चा राजनीति की बलि चढ़ चुकी है. आप इन मध्यमवर्गीय करदाताओं की नाराज़गी को इस तरह समझ सकते हैं कि एक तरफ़ तो उनके ऊपर टैक्स का बोझ है. फिर सरकारी सेवाएं उनकी मदद करने में नाकाम हैं, और उन पर नित नए टैक्सों का बोझ डाला जा रहा है. चूंकि जो लोग रियासत का बोझ उठाते हैं उनका सरकार में विश्वास ही GDP विकास दर की दिशा तय करता है. अब वो निराश हैं, नतीजा विकास दर भी नीचे जा रही है.
  • संपत्ति निर्माण के बिना संपत्ति का पुनर्वितरण संभव नहीं: आख़िर में अपने साथ जुड़े अन्य मंत्रालयों और विभागों के साथ 2025 के बजट को तय करना होगा कि आख़िर संपत्ति निर्माण के बग़ैर संपत्ति के पुनर्वितरण का सिलसिला आख़िर कब तक चलता रहेगा. मौजूदा राजनीतिक माहौल 1947 से 1990 के उस दमनकारी दौर की याद दिला रहा है, जब संपत्ति निर्माताओं को परजीवी की तरह देखा जाता था और उन्हें कर का बोझ लादकर और धमकाकर वसूली के ज़रिए तंग किया जाता था. डिजिटलीकरण और नोटबंदी के बावजूद भ्रष्टाचार ने वापसी की है. इंडिया बिज़नेस करप्शन सर्वे 2024 इशारा करता है कि सर्वेक्षण में शामिल 66 प्रतिशत कारोबारियों ने बताया कि पिछले 12 महीनों में उनको रिश्वत देनी पड़ी थी और इसमें से 83 प्रतिशत रक़म नक़दी के तौर पर दी गई. इनमें से 54 प्रतिशत को घूस देने के लिए मजबूर किया गया था. भ्रष्टाचार की बुनियाद ज़रूरत से अधिक और उपनिवेश युग के दौर के अनुपालन के नियम हैं. जिनको ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के ‘कारोबार करने की क़ीमत जेल’ नाम के मोनोग्राफ में बख़ूबी बयां किया गया था. इस मोनोग्राफ में ये भी सुझाया गया था कि सरकारी तंत्र और भ्रष्टाचारियों के बीच की इस कड़ी को किस तरह से तोड़ा जा सकता है. 2025 के बजट को चाहिए कि वो इस पर ध्यान दे और संबंदित मंत्रालयों को निर्देशित करे कि वो इस काम को आगे बढ़ाएं.

रिश्वत की ये रक़म अक्सर, पहले से ही काफ़ी तनख़्वाह पा रहे सरकारी कर्मचारियों की जेब में जाती है. आठवें वेतन आयोग का एलान होने के बाद उनके वेतन में और बढ़ोत्तरी होने की संभावना है, जबकि भ्रष्टाचार भी बेलगाम जारी है. ऐसे में यथास्थिति बरक़रार रखने के नाम पर कुशलता की बलि चढ़ाई जा रही है. किसी न किसी मोड़ पर इसका नकारात्मक असर भारत आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर भी पढ़ेगा. क्योंकि, अर्नेस्ट यंग और फिक्की (EY-FICCI) द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में शामिल 83 प्रतिशत लोगों ने इस बात का संकेत दिया था. भ्रष्टाचार की वजह से भारत छोड़कर जा रहे करोड़पतियों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी होगी. आप करोड़पतियों की तो बात ही भूल जाएं, औसत नागरिक भी भरोसा गंवा रहे हैं. 2021 से 2023 के दौरान 605,209 भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ दी और दुनिया के 135 अलग अलग देशों में जा बसे. इनमें अमेरिका और यूरोपीय देशों जैसे आकर्षक ठिकानों के साथ साथ अल्बानिया, बेलारूस, कोलंबिया, नाइजीरिया और यमन जैसे देश भी शामिल हैं, जहां भारत छोड़ने वालों ने पनाह ली है.

 भ्रष्टाचार की वजह से भारत छोड़कर जा रहे करोड़पतियों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी होगी. आप करोड़पतियों की तो बात ही भूल जाएं, औसत नागरिक भी भरोसा गंवा रहे हैं. 2021 से 2023 के दौरान 605,209 भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ दी और दुनिया के 135 अलग अलग देशों में जा बसे.

अब समय है कि एक तरफ़ तो संपत्ति निर्माताओं और करदाताओं और दूसरी तरफ़ संपत्ति का पुनर्वितरण करने और वसूली करने वालों के बीच एक नया सौदा तय हो. अमेरिका में डॉनल्ड जे. ट्रंप के फिर से सत्ता संभालने की वजह से इन चुनौतियों को और बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि ट्रंप अमेरिका में कारोबार करना आसान बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं और इसका भारत समेत पूरी दुनिया पर नकारात्मक असर पड़ेगा. 2025 के बजट को उस सौदे की बुनियाद रखनी होगी और संबंधित मंत्रालयों को ऐसा नेतृत्व देना होगा, जिसके पीछे वो चल सकें.

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