Author : Bassant Hassib

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 05, 2026 Updated 4 Days ago

मध्य पूर्व की सरकारों का मुख्य लक्ष्य राष्ट्रीय तकनीकी ज्ञान का विकास होना चाहिए, ताकि क्षमताओं को मजबूत किया जा सके और डिजिटल संप्रभुता सुरक्षित की जा सके. 

साइबर हमले, एआई खतरे और सूचना युद्ध—क्या मध्य पूर्व तैयार है?

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यह लेख 'रायसीना एडिट 2026' श्रृंखला का हिस्सा है।


साइबरस्पेस की सुरक्षा केवल आईसीटी (ICT) नेटवर्क और प्रणालियों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उन खतरों को भी शामिल किया जाता है जो व्यक्तिगत सुरक्षा, डिजिटल अधिकारों और ऑनलाइन स्थानों की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं. साइबर सुरक्षा खतरों को केवल उपकरणों और नेटवर्क तक अनधिकृत पहुँच-जैसे हैकिंग, डीडीओएस (DDoS) हमले, स्पाइवेयर और डेटा चोरी-तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि ऑनलाइन गतिविधियों से होने वाली हानियों को भी इसमें शामिल किया जाता है. इनमें डॉक्सिंग, साइबर बुलिंग, घृणास्पद भाषण, साइबर उगाही, उत्पीड़न, सेंसरशिप, भ्रामक सूचना, पक्षपाती एआई प्रणालियाँ और इंटरनेट बंदी जैसी समस्याएँ शामिल हैं.

मध्य पूर्व (ME), विशेष रूप से गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) देशों में तेज़ डिजिटलकरण के कारण सरकार और अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर साइबर जोखिम बढ़ गए हैं.

साइबर सुरक्षा को अब केवल तकनीकी समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह एक व्यापक कानूनी और सामाजिक मुद्दा भी बन चुकी है. डिजिटल तकनीकों के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर खतरों का प्रभाव सीधे व्यक्तियों, संस्थानों और समाज पर पड़ता है. इसलिए साइबर सुरक्षा का दायरा केवल कंप्यूटर नेटवर्क या तकनीकी प्रणालियों की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें डिजिटल अधिकारों की रक्षा, ऑनलाइन सुरक्षा और सामाजिक प्रभावों को भी शामिल किया जाता है. यह दृष्टिकोण इस बात को भी रेखांकित करता है कि साइबर सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल सरकार या पारंपरिक राज्य सुरक्षा संस्थानों तक सीमित नहीं है. इसमें निजी क्षेत्र की कंपनियों, तकनीकी संगठनों और नागरिक समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

मध्य पूर्व में साइबर (अ)सुरक्षा का परिदृश्य

मध्य पूर्व (ME), विशेष रूप से गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) देशों में तेज़ डिजिटलीकरण के कारण सरकार और अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर साइबर जोखिम बढ़ गए हैं. पहला, पारंपरिक साइबर खतरे-जैसे रैनसमवेयर, वित्तीय धोखाधड़ी और हैक्टिविज़्म-व्यक्तियों, कंपनियों और सरकारी संस्थाओं को निशाना बना रहे हैं. उदाहरण के तौर पर ओमान और यूएई में बैंकिंग डेटा चोरी, मोबाइल बैंकिंग ऐप्स को निशाना बनाने वाले मैलवेयर, और रैनसमवेयर हमलों में तेज़ वृद्धि देखी गई है. केवल यूएई में ही 2024 में रैनसमवेयर हमलों में 32 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें दूरसंचार कंपनी एतिसलात (अब e&) पर कथित हमला प्रमुख मामलों में से एक था, जिसे लॉकबिट रैनसमवेयर समूह से जोड़ा गया.

दूसरा, उन्नत स्थायी खतरे (APT) - जो अक्सर राज्य समर्थित होते हैं - क्षेत्र के लिए बड़ा साइबर सुरक्षा जोखिम बन चुके हैं. ऊर्जा, सरकारी और सुरक्षा क्षेत्रों को निशाना बनाकर कई साइबर जासूसी और विनाशकारी हमले किए गए हैं. ईरान को उसके परमाणु प्रतिष्ठानों पर हुए साइबर हमलों के बाद एक महत्वपूर्ण साइबर खतरे के रूप में देखा जाने लगा है. ईरान से जुड़े साइबर अभियानों को डेटा नष्ट करने वाले हमलों, बुनियादी ढाँचे में व्यवधान और रैनसमवेयर अभियानों से जोड़ा गया है, जिनका उद्देश्य आर्थिक लाभ के साथ राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता पैदा करना भी होता है.

मध्य पूर्व (ME), विशेष रूप से गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) देशों में तेज़ डिजिटलकरण के कारण सरकार और अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर साइबर जोखिम बढ़ गए हैं.

तीसरा, मध्य पूर्व में साइबर सुरक्षा सूचना नियंत्रण और शासन सुरक्षा से भी गहराई से जुड़ी हुई है. सरकारें निगरानी, सामग्री नियंत्रण और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के नियमन को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करती हैं. सोशल मीडिया एक ऐसा मंच बन गया है जहाँ राजनीतिक कार्यकर्ता, असंतुष्ट, उग्रवादी समूह और राज्य सभी सक्रिय हैं, जिसके कारण व्यापक निगरानी और सेंसरशिप बढ़ी है. हाल के संघर्षों, विशेष रूप से गाजा में, हैक्टिविज़्म, डीडीओएस हमले, इंटरनेट बंदी, एआई आधारित भ्रामक सूचना, डीपफेक और बड़े पैमाने पर डॉक्सिंग अभियानों में वृद्धि हुई है, जिससे निजी तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठते हैं.

चौथा, एआई-संचालित और अर्ध-स्वायत्त हथियारों से जुड़े उभरते साइबर खतरे क्षेत्रीय सुरक्षा की प्रकृति को बदल रहे हैं. राज्य और गैर-राज्य दोनों प्रकार के अभिनेता एआई आधारित सैन्य तकनीकों का उपयोग बढ़ा रहे हैं, जिससे हैकिंग, हेरफेर, जासूसी और विदेशी तकनीक पर निर्भरता के कारण संप्रभु नियंत्रण खोने जैसे नए जोखिम पैदा हो रहे हैं.

पाँचवाँ, व्यक्तिगत स्तर पर तकनीक-सहायक लैंगिक हिंसा (TF-GBV) महिलाओं और एलजीबीटीक्यू+ समुदाय को अधिक प्रभावित करती है. इसमें कैटफिशिंग, सेक्सटॉर्शन, रिवेंज पोर्नोग्राफी, एआई द्वारा बनाए गए डीपफेक और संवेदनशील डेटा की चोरी या लीक जैसी घटनाएँ शामिल हैं. मध्य पूर्व में सामाजिक कलंक, कठोर लैंगिक मानदंड और ऐसे कानूनी ढाँचे जो अक्सर पीड़ितों को ही दोषी ठहराते हैं, इन समस्याओं को और गंभीर बना देते हैं.

इन रुझानों से संकेत मिलता है कि यदि ठोस और समन्वित नीति कदम नहीं उठाए गए, तो मध्य पूर्व में साइबर सुरक्षा जोखिम और बढ़ सकते हैं.

कार्यात्मक कार्ययोजना 

मध्य पूर्व की सरकारों का मुख्य लक्ष्य राष्ट्रीय तकनीकी ज्ञान का विकास होना चाहिए, ताकि क्षमताओं को मजबूत किया जा सके और डिजिटल संप्रभुता सुरक्षित की जा सके. इसके लिए बहु-स्तरीय डिजिटल रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें सरकार, निजी तकनीकी कंपनियाँ और नागरिक समाज-राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर-सक्रिय रूप से शामिल हों.

इस रणनीति के प्रमुख कदम हैं:

पहला, साइबर सुरक्षा, एआई और क्वांटम तकनीक में शिक्षा में निवेश करके राष्ट्रीय क्षमता और स्थानीय विशेषज्ञता विकसित करना; अनुसंधान एवं विकास संस्थानों, नवाचार केंद्रों और डिजिटल स्टार्टअप को अनुदान तथा कर प्रोत्साहन देना; और सार्वजनिक क्षेत्र में डिजिटल साक्षरता व साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण को बढ़ावा देना.

दूसरा, महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना और साइबर सुरक्षा उपकरणों का घरेलू उत्पादन बढ़ाना किसी भी देश की डिजिटल संप्रभुता और सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है. इससे विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम होती है और स्थानीय जरूरतों तथा चुनौतियों के अनुरूप समाधान विकसित किए जा सकते हैं. यदि देश अपनी तकनीकी क्षमताओं को स्वयं विकसित करता है, तो वह साइबर खतरों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है. इसके लिए सरकार, निजी क्षेत्र और तकनीकी संस्थानों के बीच मजबूत सार्वजनिक-निजी साझेदारी को बढ़ावा देना जरूरी है. साथ ही ऐसा नियामक और व्यावसायिक वातावरण तैयार करना चाहिए जो नवाचार, अनुसंधान और सुरक्षित तकनीक के विकास को प्रोत्साहित करे. इससे स्थानीय उद्योग मजबूत होंगे और साइबर सुरक्षा ढांचा भी अधिक सक्षम बनेगा.

मध्य पूर्व की सरकारों का मुख्य लक्ष्य राष्ट्रीय तकनीकी ज्ञान का विकास होना चाहिए, ताकि क्षमताओं को मजबूत किया जा सके और डिजिटल संप्रभुता सुरक्षित की जा सके. 

तीसरा, उद्योगों को साइबर लचीलापन विकसित करना चाहिए, ताकि हमलों के बावजूद आवश्यक सेवाएँ जारी रह सकें, प्रतिष्ठा और विश्वास सुरक्षित रहे और आर्थिक नुकसान कम हो. इसमें डेटा बैकअप, कर्मचारियों का प्रशिक्षण, सुरक्षा परीक्षण, और आपातकालीन प्रतिक्रिया अभ्यास शामिल हैं. चौथा, नागरिक समाज के सहयोग से डिजिटल अधिकार, डेटा सुरक्षा, कानूनी जागरूकता और साइबर सुरक्षा पर सामुदायिक स्तर की पहल को बढ़ावा देना. पाँचवाँ, राष्ट्रीय कानूनों को अधिक मानव-केंद्रित बनाना, ताकि असहमति को दबाने के बजाय साइबर अपराध और डिजिटल नागरिकों के खिलाफ खतरों पर ध्यान दिया जा सके. साइबर शासन में नागरिक समाज की भागीदारी पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत कर सकती है. छठा, क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना-संयुक्त साइबर सैन्य अभ्यास, साइबर खतरा खुफिया साझाकरण, राष्ट्रीय CERT संस्थाओं के बीच सहयोग और एक क्षेत्रीय CERT की स्थापना की दिशा में प्रयास. सातवाँ, साइबरस्पेस में राज्य की जिम्मेदारी और एआई के नैतिक उपयोग से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों को विकसित करना. इसके लिए साइबर कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय मंचों-जैसे संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञ समूह और इंटरनेट गवर्नेंस फोरम-में सक्रिय भागीदारी आवश्यक है.

आठवाँ, साइबर सुरक्षा नीतियों में लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल करना आज के डिजिटल युग में अत्यंत आवश्यक हो गया है. साइबरस्पेस में महिलाओं और लैंगिक अल्पसंख्यकों को अक्सर ऑनलाइन उत्पीड़न, ट्रोलिंग, डॉक्सिंग, डीपफेक और अन्य प्रकार की तकनीक-सहायित हिंसा का सामना करना पड़ता है. नीति निर्माण में लैंगिक समझ को शामिल करने से ऑनलाइन वातावरण अधिक सुरक्षित, समावेशी और न्यायपूर्ण बन सकता है. इसके लिए तकनीकी नियमों और डिजिटल नीतियों को लैंगिक रूप से संवेदनशील बनाना जरूरी है. साथ ही नागरिक समाज संगठनों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिए ताकि विभिन्न समुदायों की आवाज़ नीति निर्माण में शामिल हो सके. तकनीकी कंपनियों को भी ऐसे सुरक्षा तंत्र और प्लेटफॉर्म डिजाइन विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए जो उपयोगकर्ताओं के अधिकारों और गरिमा की रक्षा करें. इसके अतिरिक्त, कानून प्रवर्तन एजेंसियों को लैंगिक साइबर अपराधों की पहचान और उनसे निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण प्रदान करना भी आवश्यक है.


डॉ. बसंत हसीब, मिस्र में यूरोपीय विश्वविद्यालयों (ईयूई) के लंदन विश्वविद्यालय कार्यक्रम (एलएसई) में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं.

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