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समुद्र की लहरों में छिपा एक हरित ख़ज़ाना भारत के भविष्य की कहानी बदल सकता है. बिना ज़मीन, मीठे पानी और खाद के उगने वाला समुद्री शैवाल पोषण, रोज़गार और जलवायु सुरक्षा-तीनों का समाधान पेश करता है. लेख से समझें कि ब्लू इकॉनमी की अगली छलांग खेतों से नहीं, समुद्र से क्यों आ सकती है.
Image Source: Pexels
जिस तेजी से दुनिया भर में समुद्री शैवाल (सीवीड) का उत्पादन बढ़ रहा है. भारत को उतने ही अवसर अपनी ब्लू इकॉनमी, पोषण सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों को मज़बूत करने के मिल रहे हैं.
समुद्री शैवाल का वैश्विक उत्पादन साल 2000 के बाद से तीन गुना बढ़कर 2020 में 3.24 करोड़ टन तक पहुँच गया, जिसकी कुल कीमत लगभग 13.3 अरब अमेरिकी डॉलर आंकी गई. वैश्विक उत्पादन में एशिया की हिस्सेदारी 97 प्रतिशत है, जिसमें चीन की ऑफशोर खेती, मशीनी प्रसंस्करण और बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन की प्रमुख भूमिका है. समुद्री शैवाल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बिना खाद, एंटीबायोटिक, मीठे पानी और बड़ी भूमि के बेहद तेज़ी से उगता है. इसकी वृद्धि दर ज़मीनी पौधों की तुलना में लगभग दस गुना अधिक होती है जिससे बहुत कम क्षेत्र में भी समान मात्रा में जैव-द्रव्यमान प्राप्त किया जा सकता है. इसके साथ ही यह जल की गुणवत्ता सुधारता है, कार्बन अवशोषण बढ़ाता है, महासागर के अम्लीकरण को कम करता है और पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद करता है.
पोषण के लिहाज़ से समुद्री शैवाल बेहद समृद्ध है. इसमें ऐसे जैव-सक्रिय तत्व पाए जाते हैं जिनमें जीवाणुरोधी, विषाणुरोधी, एंटीऑक्सीडेंट, कैंसर-रोधी, सूजन-रोधी और मधुमेह-रोधी गुण होते हैं. इसमें आवश्यक विटामिन, 54 से अधिक जैव-उपलब्ध सूक्ष्म खनिज और उच्च प्रोटीन मात्रा होती है. यही कारण है कि इसका उपयोग खाद्य, पशु-आहार, दवा और कॉस्मेटिक उद्योगों में तेजी से बढ़ रहा है. यह राष्ट्रीय पोषण और स्वास्थ्य अभियानों जैसे मध्याह्न भोजन योजना, पोषण संवर्धन और महिलाओं-बच्चों के लिए पोषक तत्व अनुपूरण में भी अहम भूमिका निभा सकता है. भोजन के अलावा, समुद्री शैवाल का उपयोग जलीय कृषि में पशु-आहार, आश्रय और जल गुणवत्ता सुधारक के रूप में भी किया जाता है. चीन और जापान के बाद अब यूरोप में भी इसका उत्पादन बढ़ रहा है. नॉर्वे 2030 तक 80 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य लेकर चल रहा है और उसने 2023 में समुद्री शैवाल उद्योग को अपने फिश एक्सपोर्ट एक्ट में शामिल कर लिया है.
यह राष्ट्रीय पोषण और स्वास्थ्य अभियानों जैसे मध्याह्न भोजन योजना, पोषण संवर्धन और महिलाओं-बच्चों के लिए पोषक तत्व अनुपूरण में भी अहम भूमिका निभा सकता है. भोजन के अलावा, समुद्री शैवाल का उपयोग जलीय कृषि में पशु-आहार, आश्रय और जल गुणवत्ता सुधारक के रूप में भी किया जाता है.
लंबी तटरेखा और समृद्ध समुद्री संसाधनों के बावजूद भारत वैश्विक समुद्री शैवाल उत्पादन में एक प्रतिशत से भी कम योगदान देता है. इसके पीछे बिखरी हुई प्रशासनिक व्यवस्था, अस्थिर बाज़ार और कमजोर बुनियादी ढांचा जैसी चुनौतियां हैं. हालांकि, वैश्विक रुझानों को देखते हुए भारत अब एक समग्र नीति ढाँचा तैयार कर रहा है ताकि समुद्री शैवाल की खेती को अर्थव्यवस्था और पोषण लक्ष्यों से जोड़ा जा सके.
भारत की समुद्री शैवाल अर्थव्यवस्था मज़बूत नीतिगत समर्थन के साथ तेज़ी से बढ़ सकती है. वर्तमान में इसका मूल्य 300-500 करोड़ रुपये आँका जाता है और सरकार ने 2030 तक 97 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य रखा है. इस दिशा में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY 2020) के तहत 640 करोड़ रुपये, टीआईएफएसी की सीवीड मिशन (2021) और राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) सहित कई संस्थानों की पहल अहम हैं. यह क्षेत्र लगभग 40,000 तटीय परिवारों को सहारा देता है और रोज़गार व आय सृजन की बड़ी संभावना रखता है.
आकलनों के अनुसार, 128 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश भारत में कपाफाइकस समुद्री शैवाल की खेती को 26,000 हेक्टेयर तक बढ़ा सकता है जिससे 96 मिलियन डॉलर का राजस्व और एक लाख से अधिक पूर्णकालिक रोज़गार सृजित हो सकते हैं. समुद्री शैवाल की खेती पारंपरिक जलीय कृषि की तुलना में कहीं अधिक लाभकारी साबित हो सकती है. संशोधित राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति (2018) में भी इसे जैव-इथेनॉल उत्पादन के लिए एक संभावित कच्चे माल के रूप में पहचाना गया है.
भारत की समुद्री शैवाल अर्थव्यवस्था मज़बूत नीतिगत समर्थन के साथ तेज़ी से बढ़ सकती है. वर्तमान में इसका मूल्य 300-500 करोड़ रुपये आँका जाता है और सरकार ने 2030 तक 97 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य रखा है.
वैश्विक स्तर पर समुद्री शैवाल आधारित खाद्य उद्योग का आकार लगभग 5 अरब डॉलर है. इसके अलावा अगर, केराजीनन और अन्य यौगिकों का उपयोग दवाओं, सौंदर्य प्रसाधनों और कृषि उत्पादों में बड़े पैमाने पर हो रहा है. यूनिलीवर, सिप्ला, द बॉडी शॉप, बीएएसएफ और गोदरेज एग्रोवेट जैसी कंपनियां इन उत्पादों का इस्तेमाल कर रही हैं. भारत में भी ज़ेरोसर्कल जैसे स्टार्टअप समुद्री शैवाल से बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक विकसित कर रहे हैं.
फिर भी, इन सभी संभावनाओं के बावजूद भारत का समुद्री शैवाल उद्योग अभी अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर पाया है. उचित नीतियों, बेहतर बुनियादी ढांचे और तटीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के साथ यह क्षेत्र न केवल आर्थिक विकास को गति दे सकता है बल्कि पोषण सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन और समावेशी विकास का भी मजबूत आधार बन सकता है.
2030 तक 97 लाख टन समुद्री शैवाल उत्पादन का लक्ष्य तब तक केवल काग़ज़ी सपना ही बना रहेगा, जब तक भारत इससे जुड़ी कई सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का समाधान नहीं करता. इनमें बाज़ार से कमजोर जुड़ाव, किसानों की सीमित आय के स्रोत, बिखरी हुई मूल्य श्रृंखला और एक सुव्यवस्थित शासन ढांचे का अभाव शामिल है. फिलहाल समुद्री शैवाल से जुड़ी जिम्मेदारियाँ कई मंत्रालयों में बंटी हुई हैं जिनके नियम और प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं.
भारत में कपाफाइकस समुद्री शैवाल की खेती की एक बड़ी सीमा यह है कि इसका ध्यान केवल एक ही उत्पाद-जैसे कैरेजीनन या बायोफ्यूल-पर केंद्रित है. इससे किसानों और उद्यमियों पर आर्थिक जोखिम बढ़ता है. बांग्लादेश जैसे देशों में भी यही स्थिति देखने को मिलती है. इसके विपरीत, अल्गिया कंपनी और उतारी सीवीड सहकारी संस्था जैसे मॉडल बायोफ्यूल, खाद्य, पशु-आहार, दवा और न्यूट्रास्यूटिकल जैसे कई उत्पादों से आय के स्रोत विकसित करते हैं. ऐसे विविध मॉडल को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए समन्वित शासन, आधुनिक बुनियादी ढांचे, अनुसंधान-नवाचार और स्थिर बाज़ार पर आधारित नीति ढांचे की आवश्यकता है.
समुद्री शैवाल क्षेत्र के लिए ऐसा शासन तंत्र चाहिए जो बुनियादी ढांचे, नवाचार, वित्त और समुदाय विकास को एक साथ जोड़े. ओडिशा के सफल अनुभवों से सीख लेते हुए 384 तटीय क्षेत्रों में खेती के विस्तार के लिए राज्य-विशेष नीतियाँ बनानी होंगी, जो स्थानीय सामाजिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप हों. खेती के क्षेत्रों, स्थायी एंकरिंग प्रणालियों और स्थानीय समुदायों के लिए स्पष्ट नियम तय करने होंगे. इसमें उद्योग, स्थानीय समुदाय और सरकार-तीनों की भागीदारी ज़रूरी है. साथ ही, शैवाल-आधारित खाद्य और जैव-सक्रिय उत्पादों के लिए गुणवत्ता, प्रसंस्करण और बाज़ार से जुड़े नियमों वाला अलग नियामक ढाँचा भी जरूरी है. इसके लिए विभिन्न मंत्रालयों के बीच मज़बूत समन्वय अनिवार्य होगा.
2030 के लक्ष्य को पाने के लिए समुद्री शैवाल की खेती को ऑफशोर और बड़े पैमाने पर जलवायु-सहिष्णु डिज़ाइनों के साथ बढ़ाना होगा. बेहतर कटाई-बाद तकनीक, प्रसंस्करण इकाइयाँ और विकेंद्रीकृत कोल्ड-चेन सुविधाएँ विकसित करनी होंगी. इसके लिए तय खेती क्षेत्र, उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की नर्सरी, जलवायु-रोधी किस्में, संग्रह केंद्र, भंडारण और खेत से कारखाने तक की लॉजिस्टिक व्यवस्था मज़बूत करनी होगी. सीएसआईआर-सीएसएमसीआरआई, एनआईओटी और आईसीएआर-सीएमएफआरआई जैसे संस्थानों को बेहतर किस्मों और मूल्य संवर्धन तकनीकों के लिए लगातार वित्तीय सहायता दी जानी चाहिए. तटीय समुदायों, विशेषकर महिलाओं को बाँस, जाल और रस्सियों जैसे सस्ते व उपयुक्त उपकरण उपलब्ध कराना भी ज़रूरी है.
नवाचार को बढ़ावा देने के लिए विशेष फंड, शोध अनुदान और उद्योग-शिक्षा सहयोग जरूरी है. साथ ही, डेटा-आधारित व्यवस्था के तहत खेती स्थलों को जियो-टैग करना और उत्पादन को ट्रैक करना उपयोगी होगा.
मानक मूल्य निर्धारण के अभाव, आयात कीमतों पर निर्भरता और बाय-बैक व्यवस्था के कारण समुद्री शैवाल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव होता है, जिससे किसानों की आय अस्थिर रहती है. न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी व्यवस्था, निर्यात नियमों में ढील, जैव-सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन उपाय बाज़ार को स्थिर बना सकते हैं. गुणवत्ता और उत्पादन पर नज़र रखने के लिए मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन प्रणाली (MRV) भी जरूरी है. तटीय क्षेत्रों में मूल्य संवर्धन क्लस्टर, सूक्ष्म उद्यम, प्रसंस्करण केंद्र और स्टार्टअप्स में निवेश से बाज़ार को मजबूती मिलेगी.
भारत में उच्च-मूल्य समुद्री शैवाल उत्पाद बनाने की क्षमता सीमित बुनियादी ढाँचे के कारण बाधित है. वैज्ञानिक तरीकों से की गई खेती यह दिखा चुकी है कि इससे तटीय समुदायों को 25,000–30,000 रुपये मासिक आय मिल सकती है. इसके लिए तनाव-रोधी किस्मों, जलवायु-सहिष्णु फार्म डिज़ाइन और सही स्थान चयन पर ज़ोर देना होगा. हाइड्रोडायनेमिक मॉडलिंग और परिवहन अध्ययन जैसे उपकरण जलवायु जोखिम कम कर सकते हैं. नवाचार को बढ़ावा देने के लिए विशेष फंड, शोध अनुदान और उद्योग-शिक्षा सहयोग जरूरी है. साथ ही, डेटा-आधारित व्यवस्था के तहत खेती स्थलों को जियो-टैग करना और उत्पादन को ट्रैक करना उपयोगी होगा.
समुद्री शैवाल क्षेत्र को समावेशी और टिकाऊ बनाने के लिए तटीय समुदायों की भागीदारी सबसे अहम है. युवाओं और महिलाओं के लिए कौशल विकास और तकनीकी प्रशिक्षण की विशेष योजनाएँ बनानी होंगी. ओडिशा की चिलिका झील में प्रशिक्षित महिलाओं के समूहों ने यह दिखाया है कि सीमित क्षेत्र में भी अच्छी आय संभव है. स्वयं सहायता समूहों, सहकारी संस्थाओं और समुदाय-आधारित मॉडलों के ज़रिये स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन केंद्र विकसित किए जा सकते हैं. पीएमएमएसवाई जैसी योजनाएं और आयात दिशा निर्देश सही दिशा में कदम हैं. सही नीतियों और समुदाय-आधारित विकास के साथ भारत अपनी समुद्री शैवाल उद्योग की पूरी क्षमता को खोल सकता है. यह न केवल आर्थिक विकास को गति देगा बल्कि पोषण सुरक्षा, जलवायु लचीलापन और ब्लू इकॉनमी में समावेशी विकास का मजबूत आधार भी बनेगा.
पूर्णिमा वी बी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
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