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Published on Mar 19, 2026 Updated 1 Days ago

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच 11 मार्च को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के पास “मयूरी नारी” जहाज पर हमला हुआ—कुछ नाविक अब भी लापता हैं. ऐसे में सवाल उठता है: क्या समुद्री व्यापार के बीच नाविकों की सुरक्षा पीछे छूट रही है? जानें पूरी कहानी.

होर्मुज़ हमले के बाद सवाल: क्या सुरक्षित हैं नाविक?

11 मार्च को पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच भारत की तरफ बढ़ रहे थाईलैंड के मालवाहक जहाज मयूरी नारी पर उस समय हमला किया गया जब वो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से गुज़र रहा था. बचाव अभियान के दौरान चालक दल के 20 सदस्यों को बचा लिया गया लेकिन ये लेख लिखते समय तीन सदस्यों का पता नहीं चल पाया था. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के पास फारस की खाड़ी में भारत के झंडे वाले 28 जहाज वर्तमान में मौजूद हैं जिन पर 700 से ज़्यादा भारतीय नाविक सवार हैं. पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के तहत नौवहन महानिदेशालय (DGS) इन जहाजों पर निगरानी रखने और चिकित्सा सहायता एवं आपात प्रतिक्रिया समेत तत्काल सहायता प्रदान करने के लिए जहाज़ के प्रबंधकों, शिपिंग एजेंसियों, भारतीय दूतावासों और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रहा है. इन नाविकों और उनके परिवारों की मदद करने के लिए 24 घंटे की एक विशेष हेल्पलाइन भी उपलब्ध है. विदेशी झंडे वाले जहाजों पर काम करने वाले भारतीय चालक दल के सदस्य भी इससे प्रभावित हुए हैं. ये घटनाएं व्यापारिक जहाजों और उनके चालक दल के सामने मौजूद ख़तरे के बारे में बताती हैं. 

विश्व व्यापार का 90 प्रतिशत से बड़ा हिस्सा समुद्रों से होकर गुजरता है और नाविक इस आवागमन को संभव बनाते हैं. लगभग 20 लाख नाविक दुनिया भर के व्यापारिक जहाजों पर काम करते हैं. बदलते भू-राजनीतिक माहौल में ये समुद्री कामगार न केवल वैश्विक सप्लाई चेन के मोर्चे पर बल्कि बेहद जोखिम वाले हालात में भी खुद को अक्सर पाते हैं. असैन्य प्रोफेशनल के रूप में चुनौतीपूर्ण और अनिश्चित हालात में काम करते समय वो अपनी सुरक्षा और आजीविका पर गंभीर ख़तरे का सामना करते हैं. 

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के पास फारस की खाड़ी में भारत के झंडे वाले 28 जहाज वर्तमान में मौजूद हैं जिन पर 700 से ज़्यादा भारतीय नाविक सवार हैं. पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के तहत नौवहन महानिदेशालय (DGS) इन जहाजों पर निगरानी रखने और चिकित्सा सहायता एवं आपात प्रतिक्रिया समेत तत्काल सहायता प्रदान करने के लिए जहाज़ के प्रबंधकों, शिपिंग एजेंसियों, भारतीय दूतावासों और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रहा है.

अंतर्राष्ट्रीय समुद्री परिवहन दुनिया के सबसे विनियमित क्षेत्रों में से एक है. इसका नियामक ढांचा अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) द्वारा निर्धारित चार स्तंभों पर आधारित है जिनका उद्देश्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, पर्यावरण की रक्षा करना, ट्रेनिंग का उच्च मानक बनाए रखना और नाविकों के काम-काज की स्थिति की रक्षा करना है. प्रमुख IMO संधियों में शामिल हैं: समुद्र में जीवन की सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय संधि (SOLAS), 1974; जहाज से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम के लिए अंतर्राष्ट्रीय संधि (MARPOL) (जिस पर 1973 में हस्ताक्षर हुए थे लेकिन लागू 1978 में हुआ था); नाविकों के लिए प्रशिक्षण, प्रमाणन और निगरानी के मानकों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (जिस पर 1978 में हस्ताक्षर हुए थे और जो 1984 से लागू है); और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की समुद्री श्रम संधि (MLC), 2006. 

नाविकों के लिए कानूनी सुरक्षा 

अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL) के अनुसार जेनेवा संधि के तहत युद्ध के दौरान असैन्य कामगारों की रक्षा की जानी चाहिए. इसके अलावा MLC नाविकों के रोज़गार, काम-काज की शर्तों और कल्याण के लिए वैश्विक मानक तय करती है. 

युद्ध, समुद्री डकैती, आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता के कारण कुछ समुद्री मार्गों को विशेष रूप से ख़तरनाक माना जाता है. इन “युद्ध के ख़तरे वाले क्षेत्रों” की पहचान लॉयड ज्वाइंट वॉर कमेटी के द्वारा समुद्री यूनियन और शिपिंग समूहों की सलाह से की जाती है. जुलाई 2025 तक ज़्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़, बाब अल-मंदेब स्ट्रेट एवं दक्षिणी लाल सागर, ओमान की खाड़ी और हिंद महासागर के कुछ क्षेत्र शामिल हैं. 

अगर वो यात्रा जारी रखते हैं तो उन्हें बोनस के साथ-साथ आपात स्थिति में ख़ुद को और अपने परिवार को बचाने के लिए बीमा समेत अतिरिक्त मुआवज़े का अधिकार है. हालांकि कुछ समुद्री बीमा कंपनियों ने खाड़ी में जहाजों के लिए युद्ध के ख़तरे की कवरेज रद्द कर दी है जिससे गंभीर चिंता पैदा हो गई है क्योंकि नाविक इन सुरक्षा उपायों पर निर्भर होते हैं. 

जब जहाज इन निर्धारित क्षेत्रों के भीतर चलते हैं तो अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू किए जाते हैं. नाविकों को पहले जानकारी दी जानी चाहिए कि उनका जहाज एक ख़तरनाक क्षेत्र से गुजरने वाला है. कई श्रम समझौतों में इस बात की भी अनुमति है कि वो किसी कार्रवाई का सामना किए बिना इस यात्रा से इनकार कर सकते हैं. अगर वो यात्रा जारी रखते हैं तो उन्हें बोनस के साथ-साथ आपात स्थिति में ख़ुद को और अपने परिवार को बचाने के लिए बीमा समेत अतिरिक्त मुआवज़े का अधिकार है. हालांकि कुछ समुद्री बीमा कंपनियों ने खाड़ी में जहाजों के लिए युद्ध के ख़तरे की कवरेज रद्द कर दी है जिससे गंभीर चिंता पैदा हो गई है क्योंकि नाविक इन सुरक्षा उपायों पर निर्भर होते हैं. 

नाविकों की असली जंग

नाविक शारीरिक जोखिमों और ख़तरों से ज़्यादा चुनौतियों का सामना करते हैं. वो प्रभावित बंदरगाहों पर फंस सकते हैं, चालक दल में बदलाव में देरी के कारण उनका समझौता आगे बढ़ सकता है या अधिक जोखिम वाले माहौल में लंबे समय तक होने की वजह से मनोवैज्ञानिक तनाव झेल सकते हैं. वैसे तो मौजूदा संधियां महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय का प्रावधान करती हैं लेकिन वो इन कठोर, अप्रत्याशित स्थितियों में अलग-अलग तरह की चुनौतियों और वास्तविकताओं का हमेशा समाधान नहीं करती हैं. 

ख़तरनाक क्षेत्रों में चालक दल की देखभाल की ज़िम्मेदारी को और स्पष्टता से परिभाषित किया जाना चाहिए.  नाविकों के लिए बाहर निकलने और स्वदेश वापसी के तौर-तरीके को और अधिक बेहतर बनाया जा सकता है. राजनयिकों या सेना के विपरीत संकट के समय नाविकों की पहुंच एकीकृत अंतर्राष्ट्रीय बचाव तक आसानी से नहीं होती है. 

पिछले दिनों जहाजों के लिए युद्ध के जोखिम का बीमा वापस लेने की स्थिति में चालक दल की सुरक्षा तो बनी रह सकती है लेकिन चोट, बचाव और संबंधित दावों के लिए कवरेज अनिश्चित और प्रशासनिक रूप से मुश्किल हो सकती है. इसलिए नाविकों को इस बात की स्पष्ट सूचना मिलनी चाहिए कि बीमा में क्या-क्या शामिल है. 

समुद्री और युद्ध जोखिम की बीमा व्यवस्था के भीतर भी बीमा और मुआवज़े का ढांचा काफी अलग-अलग हो सकता है. इसके अलावा, दावे की प्रक्रिया अक्सर धीमी और जटिल होती है जिससे नाविकों के परिवारों के लिए घटना के बाद सहायता मिलना मुश्किल हो जाता है. पिछले दिनों जहाजों के लिए युद्ध के जोखिम का बीमा वापस लेने की स्थिति में चालक दल की सुरक्षा तो बनी रह सकती है लेकिन चोट, बचाव और संबंधित दावों के लिए कवरेज अनिश्चित और प्रशासनिक रूप से मुश्किल हो सकती है. इसलिए नाविकों को इस बात की स्पष्ट सूचना मिलनी चाहिए कि बीमा में क्या-क्या शामिल है. 

भारत का दृष्टिकोण

नाविकों के लिए अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूत करने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है. दुनिया में कुल नाविकों में भारतीय नागरिकों की संख्या 12 प्रतिशत है. इस तरह भारत प्रशिक्षित समुद्री कामगारों की सप्लाई करने के मामले में शीर्ष 3 देशों में है. उनकी सुरक्षा, कल्याण और अधिकारों को सुनिश्चित करना मानवीय ज़िम्मेदारी होने के साथ-साथ एक प्रमुख राष्ट्रीय हित भी है. 

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत ने प्रमुख संधियों को अपनाया है ताकि अपनी समुद्री व्यवस्था को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाया जा सके. भारत अक्टूबर 2015 में MLC में शामिल हुआ और मर्चेंट शिपिंग एक्ट, 1958 के तहत मर्चेंट शिपिंग (समुद्री श्रम) नियम, 2016 के ज़रिए इसके प्रावधानों को लागू किया. भारत ने नाविकों के पहचान दस्तावेज (संशोधित), 2003 पर ILO की संधि संख्या 185 को भी मंज़ूरी दी है जो नाविकों को दुनिया भर के बंदरगाहों के बीच सुरक्षित और कुशलतापूर्वक आवागमन में मदद करती है. 

मर्चेंट शिपिंग एक्ट, 2025 नाविकों के रोज़गार, कल्याण, सुरक्षा और मुआवज़े से जुड़े भारत के नियमों को और मज़बूत बनाता है. ये SOLAS, MARPOL, STCW और अन्य प्रमुख IMO संधियों से दायित्वों को एकीकृत करता है और नाविकों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय कल्याण बोर्ड जैसे उपायों को प्रस्तुत करता है.  

समुद्री श्रम विनियमन में मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण सहायता को जोड़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है ताकि अनिश्चित परिस्थितियों में काम करने वाले नाविकों को पूरी सुरक्षा मिल सके.

भारत नाविक कल्याण फंड, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों और नाविकों के प्रमाणपत्रों की आपसी मान्यता पर द्विपक्षीय समझौतों जैसी पहल के ज़रिए अपने समुद्री कामगारों की मदद भी करता है. IMO और हिंद महासागर में क्षेत्रीय सहयोग में सक्रिय रूप से भाग लेकर भारत मज़बूत वैश्विक नाविक सुरक्षा के लिए ज़ोर लगाने और एक सुरक्षित, निष्पक्ष एवं अधिक समर्थ समुद्री प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए अच्छी स्थिति में है. 

समुद्री सुरक्षा का नया मॉडल

जैसे-जैसे वैश्विक चुनौतियां बढ़ेंगी, वैसे-वैसे समुद्री कामगारों को अधिक ख़तरे वाली स्थिति का अनिवार्य रूप से सामना करना होगा. समुद्री व्यवस्था के लिए एक दूरदर्शी और अधिक विचारशील दृष्टिकोण में नाविकों की सुरक्षा और कल्याण को सबसे पहले जगह मिलनी चाहिए. 

तटीय देशों और नौसेना द्वारा समर्थित विश्वसनीय, मानकीकृत बचाव और स्वदेश वापसी प्रणाली भी संकट के दौरान ज़रूरी होगी. ये व्यापक समुद्री सिद्धांतों के अनुसार हो सकता है जैसे कि संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) जो 1982 में अपनाई गई और 1994 में लागू की गई. समुद्री श्रम विनियमन में मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण सहायता को जोड़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है ताकि अनिश्चित परिस्थितियों में काम करने वाले नाविकों को पूरी सुरक्षा मिल सके.


अनुषा केसकर गावंकर ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.

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Author

Anusha Kesarkar Gavankar

Anusha Kesarkar Gavankar

Dr. Anusha Kesarkar-Gavankar is Senior Fellow at the Observer Research Foundation. Her research spans the maritime economy, with a focus on sustainability, infrastructure, port-led development, ...

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