ट्रम्प 2.0 की ओर से भारत पर लगाए गए टैरिफ को चीन अपने लिए बड़ा अवसर मान रहा है. चीनी रणनीतिकार इसे अमेरिका और भारत की साझेदारी में पड़ी दरार का फायदा उठाने, भारत-पाकिस्तान के बीच "जुड़ाव" को फिर से सक्रिय करने और एशिया में बीजिंग के वर्चस्व को बढ़ाने के मौक़े के रूप में देखते हैं.
यह चाइना क्रॉनिकल्स सीरीज़ का 178वां लेख है.
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार के मसले पर तनातनी जारी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से 6 अगस्त को भारतीय वस्तुओं पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने के ऐलान के बाद से वाशिंगटन डी.सी. और नई दिल्ली के बीच व्यापार को लेकर तकरार गहरी हो गई है. ज़ाहिर है कि राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही 31 जुलाई को भारत पर 25 प्रतिशत आयात शुल्क घोषित कर चुके हैं और यह ताज़ा वृद्धि इसके अतिरिक्त है. यानी अमेरिका की ओर से भारत पर थोपा गया कुल टैरिफ अब 50 प्रतिशत हो गया है.
भारत और अमेरिका की बीच हालिया व्यापारिक गतिविधियों पर नज़र रखने वाले चीनी पर्यवेक्षकों के अनुसार राष्ट्रपति ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद जब वे टैरिफ को लेकर दुनिया भर में दबाव बना रहे थे, तब भारत उनके साथ नज़दीकी बनाने वाला पहला देश था.
चीनी रणनीतिकारों के मुताबिक़ अमेरिका और भारत के बीच अचानक टैरिफ के मुद्दे पर बढ़े इस तनाव के पीछे जहां टैरिफ को लेकर अमेरिका के साथ बातचीत में भारत की ओर से अपनया गया सख़्त नज़रिया ज़िम्मेदार है, वहीं ट्रंप 1.0 और ट्रंप 2.0 के दरम्यान अमेरिका की बदलती प्राथमिकताएं भी ज़िम्मेदार हैं. भारत और अमेरिका की बीच हालिया व्यापारिक गतिविधियों पर नज़र रखने वाले चीनी पर्यवेक्षकों के अनुसार राष्ट्रपति ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद जब वे टैरिफ को लेकर दुनिया भर में दबाव बना रहे थे, तब भारत उनके साथ नज़दीकी बनाने वाला पहला देश था. डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद ग्रहण करने के तुरंत बाद फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाशिंगटन का दौरा किया था. इतना ही नहीं, भारत सरकार ने अमेरिका से आयात किए जाने वाले कुछ सामानों पर टैरिफ में कमी का भी ऐलान किया, ताकि भारत के बाज़ारों में इन अमेरिकी उत्पादों की आसान पहुंच स्थापित हो जाए. ऐसा करने के पीछे भारत की मंशा यह थी कि शायद इससे अमेरिका की ओर से लगाए जाने वाले टैरिफ में उसे रियायत मिलेगी. चीनी विशेषज्ञों के मुताबिक़ भारत की ओर से अमेरिकी उत्पादों के लिए इन "एकतरफा रियायतों" का ट्रंप प्रशासन पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा और राष्ट्रपति ट्रंप लगातार अपने बयानों में भारत को सबसे अधिक टैरिफ वसूलने वाला देश कहते रहे. इसके साथ ही ट्रंप ने यह भी कहा कि बहुत अधिक आयात शुल्क की वजह से अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत में व्यापार करना बेहद मुश्किल होता जा रहा है.
चीनी रणनीतिकारों ने अमेरिकी टैरिफ को लेकर भारत और चीन के नज़रिए की तुलना करते हुए दावा किया है कि बीजिंग ने टैरिफ से जुड़ी वाशिंगटन की धमकियों और उसके वर्चस्व स्थापित करने के रवैये का डटकर मुक़ाबला किया और राष्ट्रपति ट्रंप के सामने झुका नहीं. इसी का नतीज़ा है कि रणनीतिक तौर पर अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध फिलहाल ठहर सा गया है. हक़ीक़त यह है कि ट्रंप 1.0 के दौरान जब अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड को लेकर तनाव बढ़ा था, तभी चीन ने दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर अपना पूरा नियंत्रण बनाने की कोशिशें शुरू कर दी थीं. चीन के इस क़दम का मकसद व्यापार वार्ता के दौरान महत्वपूर्ण खनिजों पर अमेरिकी आपूर्ति-श्रृंखला की अत्यधिक निर्भरता का लाभ उठाना था.
बीजिंग के रणनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा ज़ोरों पर है कि ट्रंप 2.0 में राष्ट्रपति ट्रंप अपने पहले कार्यकाल से एकदम उलट हैं और वर्तमान में उनकी प्राथमिकताएं भी अलग हैं और दूसरे देशों के साथ अमेरिकी साझेदारियों को भी वे संतुलन बनाते हुए बदलना चाहते हैं. चीनी विशेषज्ञों के मुताबिक़ अपने पहले कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को बहुत चढ़ाया था और वाशिंगटन की हिंद-प्रशांत रणनीति को तेज़ी से आगे बढ़ाते हुए विश्व पटल पर भारत की स्थिति को "एकतरफा तौर पर मज़बूत" करने का प्रयास किया था. चीनियों के अनुसार ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में भारत की ओर झुकाव और उसकी वैश्विक स्थिति को सशक्त करने की अपनी रणनीतिक की वजह से ही वर्ष 2018 में इस्लामाबाद को दी जाने वाली अमेरिकी सैन्य मदद पर रोक लगा दी थी. तब ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया था कि पाकिस्तान अपनी ज़मीन से दुनिया में दहशत फैलाने वाले आतंकवादियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने में हीलाहवाली कर रहा है, इसलिए उसे दी जाने वाली सैन्य सहायता रोक दी गई है. उस समय राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि वाशिंगटन ने एक दशक से ज़्यादा वक़्त तक पाकिस्तान को 33 बिलियन अमेरिकी डॉलर की मदद मुहैया कराई और बदले में उसे झूठ और धोखे के अलावा कुछ नहीं मिला. तब ट्रंप ने यह भी कहा था कि इस्लामाबाद उन आतंकवादियों को अपने यहां पनाह दे रहा है, जिन्हें अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में तलाश कर रहा है.
चीनी रणनीतिकारों का कहना है कि उस दौरान मोदी सरकार ने पाकिस्तान को अलग-थलग किए जाने वाले घटनाक्रम को अमेरिका के साथ भारत की कूटनीतिक जीत बताया और इसका ख़ूब प्रचार भी किया था. हालांकि, उस समय की एक सच्चाई यह भी थी की ट्रंप 1.0 के दौरान अमेरिका का भारत के साथ इतना लगाव मुख्य रुप से सुरक्षा और राजनीति पर ही केंद्रित था, लेकिन नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच व्यापार को लेकर तनातनी तब भी क़ायम थी. यह अलग बात है कि उस समय इसे ज़्यादा तवज्जो नहीं दी गई. चीनियों के अनुसार बाइडेन के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद भी यह सिलसिला चलता और वाशिंगटन का नई दिल्ली के साथ एकतरफा लगाव टेक्नोलॉजी व इकोनॉमी जैसे दूसरे क्षेत्रों में बढ़ गया. इसकी एक वजह यह थी बाइडेन को विरासत में भारत के साथ व्यापारिक मुद्दे नहीं मिले थे, इसलिए उन्होंने भी इन पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया और दूसरे क्षेत्रों में भारत के साथ रिश्ते बढ़ाने में जुटे रहे. चीनी रणनीतिकारों का कहना है कि वाशिंगटन में अमेरिका की ओर से भारत के प्रति एकतरफा लगाव दिखाए जाने और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदले हालातों में भारत को लेकर सोच एवं उसके साथ रिश्तों में आए बदलाव को लेकर ज़बरदस्त बहस छिड़ी हुई है. चीनी गलियारों में मज़ाक के तौर पर कहा जा रहा है कि अमेरिका के लिए भारत की कोई औकात नहीं है, वह बस उसे अपने हितों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है.
अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप भारत के साथ अपने पुराने रवैये को पूरी तरह से बदलना चाहते हैं और इसीलिए उन्होंने भारत के साथ रिश्तों में व्यापार असंतुलन को सबसे अधिक प्रमुखता दी है.
कुल मिलाकर चीनी विशेषज्ञों का मानना है कि अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप भारत के साथ अपने पुराने रवैये को पूरी तरह से बदलना चाहते हैं और इसीलिए उन्होंने भारत के साथ रिश्तों में व्यापार असंतुलन को सबसे अधिक प्रमुखता दी है. चीनियों को लगता है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और भारत के बीच बढ़ती यह तल्खी कई गंभीर चुनौतियां सामने ला सकती है.
सबसे पहले तो चीनी विश्लेषकों को लगता है कि व्यापार वार्ताओं के दौरान अमेरिका के सामने भारत ज़्यादा झुकेगा नहीं, ख़ास तौर पर कृषि से जुड़े मुद्दों पर तो मोदी 3.0 के अमेरिका के सामने झुकने की संभावना बेहद कम है. चीनियों का कहना है कि कृषि का मुद्दा मोदी सरकार के राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ा हुआ है और वो इस पर कतई समझौता नहीं कर सकती है. भारत की हमेशा से यह नीति रही है और वो एग्रीकल्चर सेक्टर को दूसरे देशों के लिए खोलने के दबाव का पुरज़ोर विरोध करता है.
चीनियों के मुताबिक़ दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि अमेरिकी रणनीतिक गलियारों में भारत और पाकिस्तान के साथ रिश्तों का मुद्दा फिर से उठने लगा है. आने वाले दिनों में यह मसला नई दिल्ली और वाशिंगटन के रिश्तों में दरार बढ़ाने वाला साबित होगा. ख़ास तौर पर जबकि भारत खुद को चीन के बराबर मानता है, ऐसे में नई दिल्ली और वाशिंगटन के संबंधों की तल्खी और बढ़ेगी.
चीनी रणनीतिकारों के मुताबिक़ भारत-अमेरिका संबंधों में रोड़ा अटकाने वाली तीसरी बड़ी बात यह हो सकती है कि नई दिल्ली को काबू में करने के लिए ट्रंप प्रशासन इस्लामाबाद के साथ अपनी बढ़ती नज़दीकी को एक लीवर के रूप में इस्तेमाल कर सकता है. ऐसा करके अमेरिका टैरिफ को कम करने के लिए भारत पर दबाव बना सकता है और उसे रियायतें देने के लिए मज़बूर कर सकता है.
आख़िर में चीनी विश्लेषकों का कहना है कि भविष्य में भारत के सॉफ्ट पावर स्टेटस को भी झटका लग सकता है. उनका मानना है कि अमेरिका और भारत के रिश्तों में सॉफ्ट पावर एक अहम कड़ी है. भारतीय पेशेवरों का अमेरिका में दबदबा है और अमेरिकी इमीग्रेशन नीतियों में इसके चलते भारतीयों को प्रमुखता दी जाती है. इसके पीछे अमेरिका के सामाजिक और सार्वजनिक क्षेत्रों में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की उपलब्धियां भी एक बड़ी वजह है. लेकिन जिस प्रकार से अमेरिका में इमीग्रेशन एक विवादास्पद राजनीतिक मुद्दा बन गया है और लगातार तूल पकड़ता जा रहा है, उसे देखते हुए भारत के इस सॉफ्ट पावर का भविष्य भी बेहतर नहीं दिखाई दे रहा है. बीजिंग के गलियारों में यह भी चर्चा है कि जिस तरह से अमेरिका लगातार अपनी आव्रजन नीति को कड़ा कर रहा है और ट्रंप के समर्थकों का एक धड़ा जिस प्रकार से भारतीय प्रवासियों और पेशेवरों पर हमलावर है, साथ ही उन्हें तमाम समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहा है, उससे भारत की इस सॉफ्ट पावर इमेज को झटका लग सकता है.
बीजिंग के रणनीतिकारों के बीच हालांकि इस बात को लेकर एक राय नहीं है कि अगर भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में दरार पैदा होती है, तो उसका चीन पर क्या और कैसा असर पड़ेगा. यानी यह चीन के लिए लाभकारी या नुक़सानदेह होगा, इसके लिए एकमत नहीं है. चीन की एक दक्षिणपंथी वेबसाइट गुआंचा में छपे एक लेख में कहा गया है कि ट्रंप 1.0 के दौरान अमेरिका ने भारत के साथ साझेदारी में रणनीतिक भरोसा क़ायम करने के लिए राजनीकित तौर पर काफ़ी कुछ किया था, जबकि ट्रंप 2.0 के दौरान अमेरिका ने भारत के साथ व्यापार असंतुलन को प्रमुखता देते हुए टैरिफ के मुद्दे को ज़बरदस्त तरीक़े से तूल दिया है. लेख के मुताबिक़ इसे पूर्व में भारत के साथ रिश्तों में नज़दीकी से अमेरिका को जो लाभ हुए थे, उन पर असर पड़ सकता है, साथ ही इन बदलावों से कहीं न कहीं चीन को फायदा मिल सकता है.
लेख के मुताबिक़ इसे पूर्व में भारत के साथ रिश्तों में नज़दीकी से अमेरिका को जो लाभ हुए थे, उन पर असर पड़ सकता है, साथ ही इन बदलावों से कहीं न कहीं चीन को फायदा मिल सकता है.
दूसरी बड़ी बात यह है कि बीजिंग अमेरिका के अपने पक्के साझीदारों के साथ बिगड़ते संबंधों के कारण ख़ूशी से फूला नहीं समा रहा है. ज़ाहिर है कि जापान और भारत देखा जाए तो अमेरिका के मज़बूत साझेदार हैं और ये दोनों ही देश क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग यानी क्वाड के सदस्य हैं, साथ ही दोनों पर ही ट्रंप 2.0 के टैरिफ की ज़बरदस्त मार पड़ी है. जापानी प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा संसद में चर्चा के दौरान अमेरिकी टैरिफ को राष्ट्रीय संकट तक बता चुके हैं. बीजिंग के रणनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि अगर क्वाड के सदस्य अमेरिका के इस रवैये को लेकर एकजुट नहीं होते हैं, तो इससे चीन को एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने का मौक़ा मिल जाएगा और वो ऐसा ज़रूर करेगा.
तीसरी बड़ी बात यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में पाकिस्तान के तेल भंडार को संयुक्त रूप से विकसित करने को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था. ट्रंप ने यह भी कहा था कि हो सकता है कि इस्लामाबाद आने वाले दिनों में नई दिल्ली को तेल बेचने लगे. ट्रंप के इस बयान के बाद चीनी विश्लेषकों ने चेताया है कि यह राष्ट्रपति ट्रंप की चाल भी हो सकती है, क्योंकि वे ऐसा करके भारत-पाकिस्तान को नज़दीक आने के लिए मज़बूर कर सकते हैं और कहीं न कहीं इसका मकसद इस क्षेत्र में चीन के ख़िलाफ़ एक बड़ा गठजोड़ बनाना हो सकता है.
चौथ, चीनी रणनीतिकारों ने बार-बार इस ओर इशारा किया है कि नई दिल्ली ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और क्वाड जैसे समूहों के साथ सक्रियता से जुड़ा हुआ है और यह कहीं न कहीं विरोधाभासों को ज़ाहिर करता है. नई दिल्ली के इस विरोधाभासी रवैये और रणनीतिक स्वायत्तता को बीजिंग मंदारिन भाषा के मुहावरे "ज़ुउयोउ-फेंगयुआन" [左右逢源] का सटीक उदाहरण बताता है. इस चीनी मुहावरे का मतलब है 'दोनों पक्षों से लाभ उठाने की कोशिश'. बीजिंग का मानना है कि मौज़ूद हालातों में नई दिल्ली की इस रणनीतिक बढ़त पर रोक लग सकती है और इसके चलते भारत राजनयिक तौर पर अलग-थलग पड़ सकता है. चीन को लगता है कि राजनयिक तौर पर अलग-थलग पड़ने का ये डर भारत को किसी एक पक्ष को चुनने के लिए मज़बूर करेगा.
आख़िर में, चीनी रणनीतिकारों को यह भी लगता है कि भारत वर्तमान में जिस तरह से रणनीतिक तौर पर चीन के साथ आर्थिक रिश्तों को मज़बूत करने को प्राथमिकता दे रहा है, यह कहीं न कहीं राष्ट्रपति ट्रंप से मिले झटके का ही नतीज़ा है. ज़ाहिर है कि मौज़ूदा दौर में भारत चीनी निवेश पर लगे प्रतिबंधों में रियायत देने के बारे में सोच रहा है, साथ ही 31 अगस्त से 1 सितंबर के बीच चीन में होने वाली शंघाई सहयोग संगठन के नेताओं के शिखर सम्मेलन की तैयारियां भी ज़ोर-शोर से कर रहा, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी के भी हिस्सा लेने की प्रबल संभावना है. इन परिस्थितियों और घटनाक्रमों के मद्देनज़र नई दिल्ली को बेहद सतर्क रहने की ज़रूरत होगी और इस पर ध्यान देना होगा कि कहीं बीजिंग भारत के साथ आर्थिक रिश्तों की बहाली और सीमा से जुड़े मुद्दों पर बातचीत के दौरान वाशिंगटन और नई दिल्ली के रिश्तों की दरकती दीवार से उपजे हालातों का फायदा न उठा पाए.
कल्पित ए. मानकीकर ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में फेलो हैं.
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Kalpit A Mankikar is a Fellow with Strategic Studies programme and is based out of ORFs Delhi centre. His research focusses on China specifically looking ...
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