रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में महाराष्ट्र देश के अग्रणी राज्य के रूप में उभरा है. जिस प्रकार से महाराष्ट्र में डिफेंस सेक्टर की प्रगति के लिए नीतिगत क़दम उठाए गए हैं, उन्हें देखते हुए राज्य में रक्षा और एयरोस्पेस विनिर्माण क्षमताओं के विस्तार की ज़बरदस्त संभावनाएं दिखाई दे रही हैं.
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भारत में कई राज्यों की सरकारें पिछले कुछ वर्षों में अपने राज्यों में निजी सेक्टर की डिफेंस एंड एयरोस्पेस कंपनियों को आकर्षित करने में पूरी ताक़त से जुटी हुई हैं और उनके अनुकूल बुनियादी ढांचा तैयार करने को प्राथमिकता दे रही हैं. निजी रक्षा कंपनियों को अपने राज्य में लाने की राज्य सरकारों की बढ़ती दिलचस्पी एक लिहाज़ से सही भी है, क्योंकि इससे बड़े निवेश आकर्षित करने, रोज़गार सृजन, उच्च-स्तरीय तकनीकों से रूबरू होने और नागरिक क्षेत्रों में तकनीकी हस्तांतरण और समग्र विकास के अवसर उत्पन्न होते हैं. देश में जैसे-जैसे रक्षा विनिर्माण सेक्टर लगातार विकसित हो रहा है, वैसे-वैसे एक प्रतिस्पर्धात्मक माहौल भी देखने को मिल रहा है. इतना ही नहीं, भविष्य में इसमें और बढ़ोतरी होगी, यानी राज्य सरकारें स्वदेशी और विदेशी रक्षा कंपनियों को अपने राज्य में आकर्षित करने के लिए एक-दूसरे से होड़ करती नज़र आएंगी.
महाराष्ट्र की बात की जाए, तो यह एक ऐसा राज्य है, जो रक्षा और एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बाक़ी राज्यों की तुलना में बहुत आगे है. महाराष्ट्र ने पिछले साल कई निजी रक्षा कंपनियों से निवेश जुटाया है. बताया गया है कि मैक्स एयरोस्पेस एंड एविएशन प्राइवेट लिमिटेड ने महाराष्ट्र सरकार के साथ नागपुर में हेलीकॉप्टर विनिर्माण इकाई लगाने के लिए आठ वर्षों में 8,000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश के लिए एक समझौता किया है. डिफेंस सेक्टर की एक और बड़ी निजी कंपनी पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज ने भी इससे पहले महाराष्ट्र में एक ऑप्टिक्स पार्क स्थापित करने का ऐलान किया था और इसके लिए राज्य सरकार के साथ समझौता किया है. इस समझौते के मुताबिक पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज राज्य में वर्ष 2028 से अगले दस वर्षों के दौरान 12,000 करोड़ रुपये का निवेश करेगी. निजी डिफेंस कंपनी इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड ने भी नागपुर में एक डिफेंस और एयरोस्पेस प्रोजेक्ट लगाने के लिए जनवरी 2025 में महाराष्ट्र सरकार के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते के तहत लगभग 12,700 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा और कई अलग-अलग रक्षा उत्पादों का निर्माण किया जाएगा.
मैक्स एयरोस्पेस एंड एविएशन प्राइवेट लिमिटेड ने महाराष्ट्र सरकार के साथ नागपुर में हेलीकॉप्टर विनिर्माण इकाई लगाने के लिए आठ वर्षों में 8,000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश के लिए एक समझौता किया है.
महाराष्ट्र में केवल इन निजी डिफेंस कंपनियों ने ही अपनी विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने के लिए राज्य सरकार से समझौता नहीं किया है, बल्कि रक्षा क्षेत्र से जुड़े तमाम स्टार्टअप्स और एमएसएमई ने भी राज्य में अपने उद्यम स्थापित करने में रुचि दिखाई है. ये स्टार्टअप्स और छोटी कंपनियां या तो मानवरहित अंडरवाटर सिस्टम, ड्रोन्स, छोटे हथियारों, रक्षा उपकरण निर्माण जैसे विशेष क्षेत्रों में काम कर रही हैं, या फिर बड़ी डिफेंस कंपनियों के लिए ज़रूरी साज़ो-सामान निर्मित करने में जुटी हैं. भारत में पिछले कुछ वर्षों में डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर से जुड़े नियम-क़ानूनों में तेज़ी से सुधार हुआ है और इन्हें लचीला बनाया गया है. इसके मद्देनज़र महाराष्ट्र ने व्यापक स्तर पर अपनी तैयारियां की हैं और इस लिहाज़ से देखा जाए तो महाराष्ट्र रक्षा और एयरोस्पेस विनिर्माण सेक्टर में आ रही तेज़ी का लाभ उठाने के लिए अपनी कमर कस रहा है. कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र में इसके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है और वह इसमें दूसरे राज्यों से बेहतर स्थिति में है. हालांकि, महाराष्ट्र में जो तैयारी की जा रही है उसे निर्बाध तरीक़े से चालू रखना चाहिए, साथ ही इसके लिए आवश्यक बदलावों पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए. यानी राज्य सरकार को जहां डिफेंस सेक्टर में रणनीतिक लिहाज़ से महत्वपूर्ण बड़ी निजी रक्षा कंपनियों को आकर्षित करने पर फोकस होना चाहिए, वहीं उभरती टेक्नोलॉजियों और साइबर-भौतिक प्रणालियों यानी डिफेंस सेक्टर से संबंधित सॉफ्टवेयर और नेटवर्किंग से जुड़े ऐसे स्टार्टअप्स को भी प्रमुखता देनी चाहिए, जो भविष्य की ज़रूरतों के मुताबिक़ अत्याधुनिक रक्षा उत्पाद विकसित करने में संलग्न हो.
महाराष्ट्र की ऐसी कई ख़ासियतें हैं, जो उसे डिफेंस और एयरोस्पेस विनिर्माण सेक्टर में अग्रणी रखने का काम करती हैं. इन परिस्थितियों में स्पष्ट होता है कि ये खूबियां राज्य के लिए अपने रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को विस्तार देने में बेहद लाभदायक हैं. सबसे प्रमुख तो यह है कि महाराष्ट्र भारत के पश्चिमी तट पर स्थित राज्य है और इस वजह से यह भारत के 50,000 करोड़ रुपये के महत्वाकांक्षी डिफेंस एक्सपोर्ट के लक्ष्य को पूरा करने में अपना योगदान देने के लिए बेहद अच्छी स्थिति में है. इन परिस्थितियों में स्पष्ट होता है कि जिस प्रकार से वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है और मध्य पूर्व से लेकर पूर्वी यूरोप तक जंग छिड़ी हुई है, इन हालातों में दुनिया में रक्षा उपकरणों और हथियारों की भारी मांग है. महाराष्ट्र इस मांग को पूरा करने में उल्लेखनीय भूमिका निभा सकता है.
नीतिगत लिहाज़ से देखा जाए तो महाराष्ट्र के पास एक एयरोस्पेस और रक्षा विनिर्माण नीति 2018 है. इस नीति में रक्षा विनिर्माण के लिए इसके व्यापक दृष्टिकोण, विस्तृत कार्य योजना, सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली वित्तीय एवं तमाम दूसरी सहायता के बारे में विस्तार से बताया गया है. इतना ही नहीं महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थित ऐसी है कि उसके पास एक बड़ा समुद्री तट है, जिससे उसके पास अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और यूरोप के उभरते रक्षा बाज़ारों तक पहुंच स्थापित करने लिए सुगम कनेक्टिविटी का भी बेहतर विकल्प मौज़ूद है. इसके अलावा, महाराष्ट्र का नवनिर्मित समृद्धि एक्सप्रेसवे नागपुर के आसपास के क्षेत्रों को सीधे मुंबई के बंदरगाह से जोड़ता है, जो भविष्य में राज्य में स्थापित रक्षा विनिर्माण इकाइयों के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है.
समझना होगा कि सिर्फ़ विनिर्माण इकाइयों की स्थापना से ही काम नहीं चलेगा, महाराष्ट्र सरकार को रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर में राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर किस तरह के उत्पादों की मांग ज़्यादा है, ख़रीदार किन हथियारों और सैन्य साज़ो-सामान में दिलचस्पी ले रहे हैं, इसके बारे में विस्तृत आकलन कराने के बारे में भी सोचना होगा.
महाराष्ट्र के पुणे और मुंबई जैसे शहर उभरती प्रौद्योगिकियों के बड़े हब के रूप में जाने जाते हैं. इन शहरों में बड़ी तादाद में अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काम करने वाले स्टार्टअप्स, व्यावसायिक संस्थान और प्रौद्योगिकी संस्थान मौज़ूद हैं. नेशनल मिशन फॉर इंटरडिसिप्लिनरी साइबर फिजिकल सिस्टम्स के अंतर्गत मुंबई के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में एक टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब स्थापित किया गया है. इसके अलावा पुणे में आयुध अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान जैसी रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) प्रयोगशालाएं हैं, वहीं नासिक में एक बड़ी फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोडक्शन यूनिट है. डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के लिहाज़ से देखा जाए तो महाराष्ट्र पहले से ही देश का अग्रणी राज्य बना हुआ है. राज्य में भारत फोर्ज लिमिटेड और लार्सन एंड टुब्रो प्रिसिजन इंजीनियरिंग एंड सिस्टम्स जैसी बड़ी इंजीनियरिंग कंपनियां स्थापित हैं. ये कंपनियां रक्षा विनिर्माण में निजी सेक्टर की अगुवाई कर रही हैं. पुणे स्थित निजी डिफेंस कंपनी भारत फोर्ज लिमिटेड कई रक्षा उपकरणों और सैन्य साज़ो-सामान के निर्माण में जुटी हुई हैं, जिनमें उन्नत तोपों, सैन्य वाहनों, मानवरहित हवाई वाहनों यानी ड्रोन्स का विकास और विनिर्माण शामिल है. वहीं पुणे के पास स्थित निजी सेक्टर की कंपनी वालचंदनगर इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में उल्लेखनीय योगदान दिया है.
वैसे तो महाराष्ट्र में रक्षा और एयरोस्पेस विनिर्माण के क्षेत्र में काफ़ी कुछ किया जा रहा है, लेकिन इस प्रगति को और रफ़्तार देने के लिए राज्य में रणनीतिक तैयारी करनी होगी, तभी इस सेक्टर में हो रही वृद्धि का लाभ उठाया जा सकता है. उदाहरण के तैर पर एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ आंध्र प्रदेश सरकार ने अपनी नई एयरोस्पेस एवं रक्षा नीति 4.0 में ऐसे गलियारों की पहचान की है, जो एयरोस्पेस एवं डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग से संबंधित सहयोगी सेक्टरों पर फोकस करेंगे और रक्षा उत्पादों के विनिर्माण को प्रोत्साहित करेंगे. अगर महाराष्ट्र की बात की जाए तो वहां की सरकार ने पहले ही राज्य में इसी तरह के विशेष डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब स्थापित करने के लिए ख़ास ज़िलों की पहचान कर ली है. लेकिन यह भी समझना होगा कि सिर्फ़ विनिर्माण इकाइयों की स्थापना से ही काम नहीं चलेगा, महाराष्ट्र सरकार को रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर में राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर किस तरह के उत्पादों की मांग ज़्यादा है, ख़रीदार किन हथियारों और सैन्य साज़ो-सामान में दिलचस्पी ले रहे हैं, इसके बारे में विस्तृत आकलन कराने के बारे में भी सोचना होगा. इन परिस्थितियों में स्पष्ट होता है कि अगर राज्य सरकार इस दिशा में क़दम उठाती है, तो इससे राज्य में अलग-अलग क्षेत्रों में मांग के मुताबिक़ विशेष तरह की रक्षा उत्पादन इकाइयों को स्थापित करने में मदद मिलेगी. यानी ऐसे डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब स्थापित करने में सहूलियत होगी, जो भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से पहुंच में सुगम होंगे और वर्तमान विनिर्माण व नवाचार इकोसिस्टम के अलावा वहां मौज़ूद प्रतिभा और विशेषज्ञता का पूरा फायदा उठा पाएंगे.
महाराष्ट्र ने जनवरी 2025 में दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में कई रक्षा कंपनियों के साथ समझौते किए थे. देखा जाए तो यह डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर के लिहाज़ से महाराष्ट्र को एक सबसे मुफीद जगह साबित करने के लिए रणनीतिक क़दम था. इस फोरम में यूरोपीय देशों को बताया गया है कि महाराष्ट्र में रक्षा उद्योग कितनी तेज़ी से विकसित हो रहा है. इन परिस्थितियों में स्पष्ट होता है कि यूरोपीय देशों के रक्षा बजट और ख़र्च में लगातार अच्छी-ख़ासी बढ़ोतरी हो रही है और ऐसे में विश्व आर्थिक मंच महाराष्ट्र के लिए एक बेहतरीन अवसर था. एक और अहम बात यह है कि अगर महाराष्ट्र रक्षा उद्योग से जुड़ी क्षमताओं का अच्छी तरह से प्रचार करे, तो निश्चित रूप से वह रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर की दुनिया की दिग्गज कंपनियों और बड़े रक्षा ख़रीदारों को अपने यहां आकर्षित करने में और अधिक सफलता हासिल कर सकता है. कहने का मतलब है कि इससे राज्य में रक्षा क्षेत्र में वैश्विक निवेश और साझेदारियों में ख़ासी बढ़ोतरी दर्ज़ की जा सकती है. उदाहरण के तौर पर 2025 के पेरिस एयर शो में तमिलनाडु और तेलंगाना राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया था. अगर राज्य सरकारें वैश्विक स्तर पर अपनी भागीदारी को बढ़ाती हैं, तो उन्हें कहीं न कहीं रक्षा एवं एयरोस्पेस क्षेत्रों में अपने-अपने राज्यों की काबिलियत और ताक़त को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का मौक़ा तो मिलता ही है, साथ ही इससे राज्य सरकारों को यह भी पता चलता है कि वैश्विक स्तर पर डिफेंस इंडस्ट्री की क्या ज़रूरतें हैं और किस तरह के रक्षा उत्पादों की मांग है. इन परिस्थितियों में स्पष्ट होता है कि जब इन सारी चीज़ों की गहराई से जानकारी हासिल होती है, तो इससे राज्य सरकारों को उसी के मुताबिक़ अपनी नीतियों को बदलने और उन्हें लागू करने में आसानी होती है. यह कहीं न कहीं राज्यों को अपने रक्षा विनिर्माण सेक्टर के विस्तार में भी मददगार साबित होता है. सशस्त्र बल राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिताओं और आयोजनों की मेजबानी में रक्षा और एयरोस्पेस उद्योग से जुड़ी चुनिंदा कंपनियों के साथ सहयोग कर रहे हैं. इस तरह के आयोजन भी महाराष्ट्र जैसे राज्यों के लिए बेहद कारगर साबित हो सकते हैं, क्योंकि ऐसे आयोजनों में शामिल होने से उन्हें रक्षा क्षेत्र की नई तकनीक़ों और स्टार्टअप्स के बारे में जानकारी मिलती है और पता चलता है कि किसके साथ सहयोग और साझेदारी से राज्य को लाभ होगा.
महाराष्ट्र को नागपुर, नासिक, छत्रपति संभाजीनगर और अहिल्यानगर जैसे शहरों को रक्षा एवं एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग के रूप में पेश करने के लिए एक समर्पित प्लेटफॉर्म भी बनाना चाहिए. ऐसा करने से न केवल इन शहरों की रक्षा विनिर्माण से जुड़ी ख़ासियतों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा
महाराष्ट्र को अपने रक्षा उद्योग की प्रगति के लिए भारत में और देश से बाहर वैश्विक स्तर पर बड़े डिफेंस एवं एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म्स पर अपनी आधिकारिक मौज़ूदगी को व्यापक स्तर पर बढ़ाना होगा. इतना ही नहीं, महाराष्ट्र में आने वाले दिनों में अब जो भी इन्वेस्टमेंट समिट होनी हैं, उनमें डिफेंस सेक्टर में राज्य की वर्तमान क्षमताओं, साथ ही आने वाले दिनों में रक्षा एवं एयरोस्पेस सेक्टर में बढ़ने वाली क्षमताओं पर विस्तित चर्चा करनी चाहिए. इसके अलावा, महाराष्ट्र को नागपुर, नासिक, छत्रपति संभाजीनगर और अहिल्यानगर जैसे शहरों को रक्षा एवं एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग के रूप में पेश करने के लिए एक समर्पित प्लेटफॉर्म भी बनाना चाहिए. ऐसा करने से न केवल इन शहरों की रक्षा विनिर्माण से जुड़ी ख़ासियतों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा, बल्कि रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों को इन शहरों में आकर्षित करने में भी सफलता मिलेगी. इसके अलावा, ऐसा करने से दुनिया भर के डिफेंस टेक्नोलॉजिस्ट और रक्षा विशेषज्ञों की दिलचस्पी भी इन शहरों में बढ़ेगी. इतना ही नहीं, महाराष्ट्र सरकार को राज्य में रक्षा उद्यमों की स्थापना में तेज़ी लाने के लिए दुनिया के प्रमुख तकनीक़ी संस्थानों में काम करने वाले शोधकर्ताओं तक पहुंच बढ़ाने के लिए व्यापक स्तर पर कोशिश करनी चाहिए और इसके लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए.
महाराष्ट्र ने रक्षा एवं एयरोस्पेस्ट सेक्टर को मज़बूती प्रदान करने के लिए कई क़दम उठाए हैं. महाराष्ट्र डिफेंस एंड एयरोस्पेस वेंचर फंड जैसी पहलों से ख़ासी कामयाबी भी हासिल हुई है. ऐसे में सरकार को इन पहलों की सफलताओं और उपलब्धियों का इस्तेमाल संभावित रक्षा निवेशकों और राज्य-आधारित स्टार्टअप्स व एमएसएमई के साथ बातचीत के दौरान करना चाहिए. इसके अलावा, महाराष्ट्र को डिफेंस सेक्टर में अपनी विशेषज्ञता और अनुसंधान एवं विकास क्षमताओं को सशक्त करने के लिए केंद्र सरकार से सहयोग लेना चाहिए. यानी केंद्र सरकार के तहत चलाए जा रहे राष्ट्रीय इनोवेशन कार्यक्रमों के साथ महाराष्ट्र को अपनी क्षमताओं का सामंजस्य स्थापित करना चाहिए और सहयोग की संभावनाएं तलाशनी चाहिए. इन परिस्थितियों में स्पष्ट होता है कि केंद्र सरकार की ओर से जो भी नेशनल इनोवेशन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, उनमें से कुछ पहलें अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों के साथ स्टार्टअप्स का गठजोड़ करने में मददगार साबित हो रही हैं. उदाहरण के तौर पर केंद्र सरकार के MEITY ग्लोबल स्टार्टअप ब्रिज प्रोग्राम ने भारत के आईजी ड्रोन्स और बेल्जियम के वॉक्सेलसेंसर्स के बीच सहयोग स्थापित करने में मदद की है. यदि महाराष्ट्र सरकार भी नीति स्तर पर इस तरह की पहलों में भागीदार बनता है और उनका लाभ उठाता है, तो इससे राज्य में स्थापित डिफेंस एवं एयरोस्पेस स्टार्टअप्स के लिए नए-नए अवसर बन सकते हैं. इतना ही नहीं, सरकारी स्तर पर शुरू की गईं इस तरह की पहलें न केवल उभरती प्रौद्योगिकियों में विशेषज्ञता रखने वाले युवाओं और प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं, बल्कि राज्य में संचालित हो रहे डिफेंस सेक्टर के स्टार्टअप्स एवं निजी क्षेत्र की रक्षा एवं एयरोस्पेस कंपनियों द्वारा किए जाने वाले नवाचारों को बड़ा मंच प्रदान करने में भी मददगार साबित हो सकते हैं.
संकेत सुधीर कुलकर्णी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में फेलो रह चुके हैं.
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Sanket Sudhir Kulkarni was Fellow at ORF's Mumbai Centre. Sanket's primary area of interest is studying geopolitics of energy trade. Also, Sanket closely monitors patterns ...
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