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Published on May 18, 2026 Updated 1 Days ago

समुद्र अब सिर्फ व्यापार और मछली पकड़ने तक सीमित नहीं रहा बल्कि विकासशील देशों की नई आर्थिक उम्मीद बनता जा रहा है. इसी बदलाव के केंद्र में हैं ब्लू बॉन्ड, जो समुद्री विकास, तटीय रोजगार और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर नई आर्थिक कहानी लिख रहे हैं. जानिए, कैसे यह मॉडल ग्लोबल साउथ के लिए भविष्य का बड़ा सहारा बन सकता है.

क्या है ब्लू बॉन्ड और क्यों बढ़ रही है इसकी चर्चा?

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ब्लू बॉन्ड समुद्र से जुड़े सतत विकास के लिए वित्त जुटाने का एक विश्वसनीय माध्यम बनकर उभरे हैं. इनमें समुद्री संरक्षण, जलवायु लचीलापन और व्यापक ब्लू इकोनॉमी (नीली अर्थव्यवस्था) जैसे क्षेत्र शामिल हैं. वर्ष 2025 के मध्य तक वैश्विक स्तर पर ब्लू बॉन्ड जारी करने का कुल मूल्य 15.25 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में दोगुने से अधिक है और सतत बॉन्ड की सभी श्रेणियों में सबसे तेज वृद्धि को दर्शाता है. फिर भी, इसका वास्तविक विस्तार अभी सीमित बना हुआ है. व्यापक सतत बॉन्ड बाजार में ब्लू बॉन्ड की हिस्सेदारी केवल 0.24 प्रतिशत है, जिससे यह बाजार अभी छोटा और बिखरा हुआ दिखाई देता है.

2030 तक अनुमानित 70 अरब अमेरिकी डॉलर के बाजार तक पहुँचने के लिए आपूर्ति और मांग-दोनों पक्षों की समस्याओं का एक साथ समाधान करना होगा. आपूर्ति पक्ष में निवेश के लिए तैयार परियोजनाओं की कमी, संस्थागत और तकनीकी क्षमता की कमजोरियाँ तथा अधिक ऋण जोखिम की धारणा ब्लू बॉन्ड जारी करने में बाधा बनी हुई हैं. जबकि घरेलू पूंजी के बड़े स्रोत अब भी उपयोग से बाहर हैं. इसलिए ब्लू बॉन्ड की पूरी क्षमता को सामने लाने के लिए बाजार संरचना, जोखिम कम करने की व्यवस्था और स्थानीय पूंजी जुटाने में समन्वित सुधार आवश्यक होंगे.

ब्लू बॉन्ड बाजार

ब्लू बॉन्ड ऐसे ऋण साधन हैं, जिनसे प्राप्त धन का उपयोग केवल समुद्र और समुद्री पारिस्थितिकी से जुड़े सकारात्मक परियोजनाओं में किया जाता है. ये ग्रीन बॉन्ड का एक उप-भाग हैं. इन्हें मुख्य रूप से तीन प्रकार की संस्थाएँ जारी करती हैं- पहला, सेशेल्स और फिजी जैसे संप्रभु देश; दूसरा, एशियाई विकास बैंक (ADB), नॉर्डिक इन्वेस्टमेंट बैंक (NIB) और कोरिया एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक (KEXIM) जैसे बहुपक्षीय विकास बैंक और वित्तीय संस्थान; तथा तीसरा, Orsted जैसी कॉरपोरेट कंपनियां.

ब्लू बॉन्ड का पैसा समुद्र और पर्यावरण को लाभ पहुंचाने वाली परियोजनाओं में लगाया जाता है. लेकिन ऐसी परियोजनाएँ तैयार करने के लिए तकनीक, विशेषज्ञता और शुरुआती निवेश की जरूरत होती है, जो कई विकासशील देशों में कम होती है. साथ ही, सही निगरानी और पारदर्शिता की कमी के कारण निवेशकों का भरोसा भी सीमित रहता है.

इन तीनों श्रेणियों में जोखिम को संरचित और वितरित करने का तरीका अलग-अलग होता है. संप्रभु सरकारें वित्तीय गारंटी पर निर्भर करती हैं, जबकि विकास बैंक अपनी मजबूत क्रेडिट रेटिंग के आधार पर बड़े पैमाने पर निजी पूंजी आकर्षित करते हैं. दूसरी ओर, कॉरपोरेट संस्थाएँ बाजार के विश्वास और ESG (पर्यावरण, सामाजिक और सुशासन) मानकों पर निर्भर रहती हैं.

2024 में मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका (MENA) क्षेत्र में डीपी वर्ल्ड द्वारा जारी 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर के ब्लू बॉन्ड तथा इंडोनेशिया के परिणाम-आधारित कोरल बॉन्ड जैसी नई पहलें इस क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं. भौगोलिक दृष्टि से, यद्यपि एशिया-प्रशांत (APAC) क्षेत्र लंबे समय तक ब्लू बॉन्ड गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है, लेकिन 2025 में लैटिन अमेरिका, कैरेबियाई क्षेत्र, उत्तरी अमेरिका, यूरोप और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा भी उल्लेखनीय बॉन्ड जारी किए गए. यह बढ़ती क्षेत्रीय विविधता दर्शाती है कि बाजार में भागीदारी और जारीकर्ताओं की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है.

आपूर्ति की समस्याएं  

समुद्री वित्त में बढ़ती रुचि के बावजूद, ग्लोबल साउथ में संप्रभु ब्लू बॉन्ड बाजार का आपूर्ति पक्ष अब भी गंभीर रूप से सीमित है. इसमें मुख्य रूप से तीन आपस में जुड़ी समस्याएं सामने आती हैं. ब्लू बॉन्ड का पैसा समुद्र और पर्यावरण को लाभ पहुंचाने वाली परियोजनाओं में लगाया जाता है. लेकिन ऐसी परियोजनाएँ तैयार करने के लिए तकनीक, विशेषज्ञता और शुरुआती निवेश की जरूरत होती है, जो कई विकासशील देशों में कम होती है. साथ ही, सही निगरानी और पारदर्शिता की कमी के कारण निवेशकों का भरोसा भी सीमित रहता है. ब्लू बॉन्ड जारी करना सामान्य ऋण जारी करने की तुलना में कहीं अधिक विशेषज्ञता की मांग करता है. इसके लिए धन उपयोग ढांचे ,प्रभाव निगरानी प्रणाली और रिपोर्टिंग मानकों का पालन करना पड़ता है, जो अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार संघ (ICMA) या क्लाइमेट बॉन्ड इनिशिएटिव के मानकों पर आधारित होते हैं. सेशेल्स का ब्लू बॉन्ड इस मॉडल की संभावनाओं और सीमाओं-दोनों को दर्शाता है. यह केवल विश्व बैंक की 50 लाख अमेरिकी डॉलर की आंशिक गारंटी और ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी (GEF) के 50 लाख डॉलर के रियायती ऋण की सहायता से संभव हो पाया, जिससे इसकी उधारी लागत 6.5 प्रतिशत से घटकर 2.8 प्रतिशत रह गई.

ग्लोबल साउथ में अधिकांश सरकारी और निजी उधारकर्ताओं की क्रेडिट प्रोफाइल निवेश-योग्य स्तर से नीचे होती है या उनके पास ऐसी क्रेडिट रेटिंग नहीं होती जो उन्हें अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों तक स्वतंत्र पहुंच दिला सके. मछली पालन कंपनियों, एक्वाकल्चर फर्मों और बंदरगाह संचालकों जैसे कॉरपोरेट तथा उप-सरकारी जारीकर्ताओं के लिए यह समस्या सीमित संपार्श्विक और कमजोर घरेलू पूंजी बाजारों के कारण और बढ़ जाती है. मजबूत क्रेडिट रेटिंग और परियोजनाओं को बड़े स्तर पर जोड़ने की क्षमता रखने वाले बहुपक्षीय विकास बैंक (MDBs) फिलहाल स्वाभाविक जारीकर्ता बन सकते हैं, लेकिन उनकी भूमिका केवल अस्थायी पुल की तरह है, स्थायी समाधान नहीं.

केवल बॉन्ड जारी करने के मानकों में सुधार करके इन बाधाओं को दूर नहीं किया जा सकता. जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक अच्छी तरह से डिज़ाइन किए गए ब्लू बॉन्ड भी उन निवेशकों तक नहीं पहुंच पाएंगे जो वास्तव में उनमें निवेश कर सकते हैं.

ब्लू बॉन्ड जैसे वित्तीय साधन तो मौजूद हैं, लेकिन उन्हें सफल बनाने के लिए जरूरी बाजार व्यवस्था और संस्थागत समर्थन अभी कमजोर हैं. इसलिए निवेश सही जगह तक नहीं पहुंच पाता. उभरते बाजारों में निष्क्रिय निवेश - जिसमें निवेशक अलग-अलग बॉन्ड चुनने के बजाय बाजार सूचकांक का अनुसरण करते हैं - ने सूचकांक संरचना को अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है. इसके साथ ही, किसी देश की संप्रभु क्रेडिट रेटिंग यह तय करती है कि उस देश के उधारकर्ता कितनी पूंजी तक पहुँच बना सकते हैं. केवल बॉन्ड जारी करने के मानकों में सुधार करके इन बाधाओं को दूर नहीं किया जा सकता. जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक अच्छी तरह से डिज़ाइन किए गए ब्लू बॉन्ड भी उन निवेशकों तक नहीं पहुंच पाएंगे जो वास्तव में उनमें निवेश कर सकते हैं.

घरेलू पूंजी: ब्लू बॉन्ड की छिपी ताकत  

हालांकि घरेलू पूंजी उपलब्ध है, लेकिन यदि सरकारें नियमित रूप से संप्रभु बॉन्ड जारी नहीं करतीं और संस्थागत निवेशकों को प्रोत्साहित करने वाली विश्वसनीय नीतियाँ नहीं बनातीं, तो सतत बॉन्ड बाजार धीरे-धीरे विकसित होते हैं.

उदाहरण के लिए, थाईलैंड द्वारा लगातार संप्रभु बॉन्ड जारी करने से बाजार में विश्वसनीयता बढ़ी और घरेलू संस्थानों ने ESG आधारित निवेश पोर्टफोलियो अपनाने शुरू किए. दूसरी ओर, कई देशों में पर्याप्त संस्थागत पूंजी होने के बावजूद उसे ब्लू बॉन्ड जैसे सतत बॉन्ड में लगाने की व्यवस्था अभी कमजोर है.

अफ्रीकी देशों-बोत्सवाना, केन्या, नामीबिया, नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका-में पेंशन फंड की कुल संपत्ति अब 500 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो चुकी है. नाइजीरिया के हालिया सुधार लगभग 60 करोड़ अमेरिकी डॉलर के वैकल्पिक निवेश प्रवाह को खोल सकते हैं. वहीं चिली के निजी पेंशन फंड ने अवसंरचना परियोजना बॉन्ड के माध्यम से यह दिखाया है कि उचित नीतिगत ढाँचा होने पर घरेलू संस्थागत पूंजी सतत बॉन्ड बाजारों को मजबूत आधार दे सकती है.

विस्तार के लिए समाधान  

ब्लू बॉन्ड को सफल बनाने के लिए बाजार व्यवस्था, सही नियम और पूंजी जुटाने में मिलकर सुधार करने की जरूरत है.

मौजूदा ब्लू बॉन्ड बाजार और समुद्र पर निर्भर विकासशील देशों की वास्तविक वित्तीय जरूरतों के बीच अब भी बड़ा अंतर है. इस कमी को दूर करने के लिए स्पष्ट नियम, मजबूत संस्थागत सहयोग और बेहतर सूचकांक व्यवस्था में बड़े सुधार जरूरी होंगे, ताकि ब्लू बॉन्ड वास्तव में ग्लोबल साउथ की जरूरतों को बड़े स्तर पर पूरा कर सकें.

2025 में BNP Paribas ने ब्लू बॉन्ड को समुद्र और जल से जुड़े निवेश सूचकांक के साथ जोड़ा. लेकिन अभी तक अलग ब्लू बॉन्ड सूचकांक नहीं बना है. ऐसा सूचकांक बनने से बड़े संस्थागत निवेशकों के लिए इस बाजार में निवेश करना आसान होगा. भविष्य में ब्लू बॉन्ड बढ़ाने में कंपनियों की बड़ी भूमिका हो सकती है. लेकिन इसके लिए सस्ती दरों पर कर्ज और भरोसेमंद वित्तीय सहायता जरूरी है. ADB और IFC जैसी संस्थाएँ समुद्री कारोबार से जुड़ी कंपनियों को मदद देकर इस बाजार को मजबूत बना सकती हैं. विदेशी मुद्रा में कर्ज लेने से नुकसान का खतरा बढ़ता है, जबकि स्थानीय मुद्रा में उधारी ज्यादा सुरक्षित होती है. थाईलैंड के बहत आधारित ब्लू बॉन्ड ने घरेलू निवेशकों की मजबूत भागीदारी दिखाई.

भारत दिखाता है कि ब्लू बॉन्ड जैसे समाधान कैसे लागू किए जा सकते हैं. मत्स्य क्षेत्र करोड़ों लोगों को रोजगार देता है और GIFT City सतत वित्त व नए बॉन्ड बाजार को मजबूत बना रहा है. वर्ष 2024 में GIFT City की अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (IFSCA) ने 14 अरब अमेरिकी डॉलर के ग्रीन, सोशल, सस्टेनेबिलिटी और सस्टेनेबिलिटी-लिंक्ड बॉन्ड पंजीकृत किए. आज ब्लू बॉन्ड बाजार छोटा है, जबकि समुद्र से जुड़े विकासशील देशों को बहुत अधिक वित्त की जरूरत है. इसलिए बेहतर नियम, मजबूत संस्थागत सहयोग और सही निवेश व्यवस्था जरूरी है. भारत को तटीय सुरक्षा, मत्स्य पालन और समुद्री विकास के लिए अलग ब्लू फाइनेंस व्यवस्था बनानी चाहिए. SEBI और NaBFID मिलकर ऐसा ब्लू बॉन्ड ढाँचा तैयार कर सकते हैं, जो भारतीय तटीय क्षेत्रों और मत्स्य क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार हो.

ब्लू बॉन्ड एकमात्र ऐसी सतत ऋण श्रेणी है, जिसकी वृद्धि 2021 से लगातार बिना रुके जारी रही है. हाल के वर्षों में इनके जारी होने की मात्रा का दोगुना होना यह संकेत देता है कि यह बाजार अब एक नए मोड़ पर पहुँच सकता है. फिर भी, मौजूदा ब्लू बॉन्ड बाजार और समुद्र पर निर्भर विकासशील देशों की वास्तविक वित्तीय जरूरतों के बीच अब भी बड़ा अंतर है. इस कमी को दूर करने के लिए स्पष्ट नियम, मजबूत संस्थागत सहयोग और बेहतर सूचकांक व्यवस्था में बड़े सुधार जरूरी होंगे, ताकि ब्लू बॉन्ड वास्तव में ग्लोबल साउथ की जरूरतों को बड़े स्तर पर पूरा कर सकें.


प्रिया नोरोन्हा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.
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Author

Priya Miriam Noronha

Priya Miriam Noronha

Priya Noronha is a Research Assistant with ORF’s Oceans Initiative. Her work focuses on Blue Finance and Ocean Economics, exploring the financial architecture, market mechanisms, and ...

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