Author : Ramanath Jha

Expert Speak Urban Futures
Published on Apr 08, 2026 Updated 1 Hours ago

‘द लाइन’ सऊदी अरब का एक बहुत बड़ा सपना है- एक ऐसा भविष्यवादी शहर जो तेल पर निर्भरता कम करने के लिए बनाया जा रहा है लेकिन यह सपना अभी कागज़ों से आगे बढ़ने में संघर्ष कर रहा है. लेख के जरिए समझें बढ़ती लागत, देरी और अनिश्चित हालात ने इसे ऐसा बना दिया है जहाँ बड़े वादों और ज़मीनी सच्चाई के बीच फर्क साफ दिखने लगा है.

सऊदी का मेगा प्रोजेक्ट ‘द लाइन’- जानिए पूरी कहानी

लगभग एक दशक पहले, 2017 में, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने देश की पहली भविष्यवादी, पूरी तरह स्वचालित मेगा-डेवलपमेंट परियोजना नियोम की योजना शुरू की. इस हाई-टेक पहल की शुरुआती लागत लगभग 500 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 45.5 लाख करोड़ रुपये) आंकी गई थी. सऊदी अरब की कठोर जलवायु को देखते हुए, NEOM के लिए तबुक प्रांत को चुना गया, जहाँ तापमान अपेक्षाकृत मध्यम रहता है-सर्दियों में लगभग 4°C और गर्मियों में करीब 39°C. इसका उद्देश्य इस परियोजना को अंतरराष्ट्रीय निवेशकों, व्यवसायों और उच्च-आय वाले व्यक्तियों के लिए अधिक आकर्षक बनाना था.

सऊदी प्रशासन शायद अमेरिका–इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष का पूरी तरह अनुमान नहीं लगा पाया, जो अब खाड़ी क्षेत्र तक फैल चुका है. इस संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और तेल आपूर्ति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, साथ ही दुबई और दोहा जैसे क्षेत्रीय केंद्रों पर भी असर डाला है, जिसका NEOM के भविष्य पर प्रभाव पड़ सकता है.

हालांकि, परियोजना में हुई भारी देरी और लागत बढ़ने से इसकी अवधारणा पर सवाल उठे हैं. साथ ही, सऊदी प्रशासन शायद अमेरिका–इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष का पूरी तरह अनुमान नहीं लगा पाया, जो अब खाड़ी क्षेत्र तक फैल चुका है. इस संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और तेल आपूर्ति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, साथ ही दुबई और दोहा जैसे क्षेत्रीय केंद्रों पर भी असर डाला है, जिसका NEOM के भविष्य पर प्रभाव पड़ सकता है.

‘द लाइन’ का विज़न

इस परियोजना का सबसे चर्चित हिस्सा ‘द लाइन’ था-एक अनोखा, शून्य-कार्बन शहर, जिसे 170 किमी लंबी और केवल 200 मीटर चौड़ी रेखीय बस्ती के रूप में डिजाइन किया गया था, जहाँ 90 लाख लोगों को बसाने की योजना थी. इस परियोजना में अत्याधुनिक बुनियादी ढांचा और विश्वस्तरीय जीवन गुणवत्ता की कल्पना की गई थी, जिसमें उन्नत शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ और मनोरंजन सुविधाएं शामिल थीं, साथ ही एक सुविचारित पर्यावरणीय ढांचा भी बनाया गया था. पूरे शहर को ‘नो प्राइवेट व्हीकल’ ज़ोन के रूप में सोचा गया था, जिसमें फ्री-ट्रेड व्यवस्था, अलग कर प्रणाली और ऐसा शासन मॉडल शामिल था जो अंतरराष्ट्रीय, बहुसांस्कृतिक और उदार आबादी को आकर्षित कर सके.

‘द लाइन’ का इंफ्रास्ट्रक्चर तीन स्तरों में योजनाबद्ध था-ऊपरी स्तर पैदल चलने के लिए, पहला भूमिगत स्तर बुनियादी ढांचे के लिए, और सबसे निचला स्तर परिवहन के लिए. इस परिवहन प्रणाली को 500 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से पूरे शहर में चलने के लिए डिजाइन किया गया था, जिससे लोग लगभग 20 मिनट में किसी भी स्थान तक पहुँच सकें. इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य सऊदी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से हटाकर अन्य क्षेत्रों में विकसित करना था, खासकर रियल एस्टेट क्षेत्र में.

इस परियोजना में अत्याधुनिक बुनियादी ढांचा और विश्वस्तरीय जीवन गुणवत्ता की कल्पना की गई थी, जिसमें उन्नत शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ और मनोरंजन सुविधाएं शामिल थीं, साथ ही एक सुविचारित पर्यावरणीय ढांचा भी बनाया गया था. पूरे शहर को ‘नो प्राइवेट व्हीकल’ ज़ोन के रूप में सोचा गया था, जिसमें फ्री-ट्रेड व्यवस्था, अलग कर प्रणाली और ऐसा शासन मॉडल शामिल था जो अंतरराष्ट्रीय, बहुसांस्कृतिक और उदार आबादी को आकर्षित कर सके.

इतनी उन्नत तकनीकों से युक्त इस भविष्यवादी शहर के लिए भारी वित्तीय निवेश की आवश्यकता थी. साथ ही, परियोजना के कई हिस्सों के लिए जमीन पर कोई पहले से मौजूद उदाहरण नहीं था. इसलिए यह परियोजना न केवल महत्वाकांक्षी थी, बल्कि काफी साहसिक भी थी.

क्या हैं चुनौतियां?  

जैसा कि बड़े मेगा-प्रोजेक्ट्स में अक्सर होता है, ‘द लाइन’ भी बीच में धीमी पड़ती दिख रही है और इसमें काफी देरी हो रही है. इसके अलावा, परियोजना का दायरा भी काफी सीमित हो गया है. वर्तमान में निर्माणाधीन पहला चरण केवल 2.4 किमी लंबा है, जो कुल योजना का लगभग 1.5% है. इस छोटे हिस्से को भी अलग-अलग भागों में बनाया जा रहा है ताकि इसे चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जा सके.

सरकार ने अभी तक आधिकारिक रूप से परियोजना को छोटा करने की घोषणा नहीं की है, और ऐसा करना उसकी छवि के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है. हालांकि, विभिन्न रिपोर्ट्स से संकेत मिलता है कि अब प्राथमिकताएँ AI-आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे डेटा सेंटर, की ओर शिफ्ट हो सकती हैं. इसलिए 2026 में होने वाले विकास पर खास नजर रखी जाएगी.

शुरुआत में 500 अरब डॉलर की लागत वाली इस परियोजना की कुल लागत अब कुछ अनुमानों के अनुसार 8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गई है. बढ़ती कंसल्टेंसी फीस और निर्माण लागत के कारण इसे छोटा करने पर विचार किया जा रहा है. कई विदेशी सलाहकारों और आर्किटेक्ट्स पर यह आरोप है कि उन्होंने कुछ अनपरीक्षित विचारों की व्यावहारिकता पर पर्याप्त सवाल नहीं उठाए. वित्तीय सलाहकारों ने भी इन महत्वाकांक्षी योजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता को लेकर खुलकर चिंता नहीं जताई.

परियोजना का दायरा भी काफी सीमित हो गया है. वर्तमान में निर्माणाधीन पहला चरण केवल 2.4 किमी लंबा है, जो कुल योजना का लगभग 1.5% है. इस छोटे हिस्से को भी अलग-अलग भागों में बनाया जा रहा है ताकि इसे चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जा सके.

चूँकि यह परियोजना ज़मीन पर दिखाई देने वाली प्रगति और विदेशी निवेशकों के भरोसे पर निर्भर है, इसलिए देरी निवेशकों के विश्वास को कमजोर कर सकती है. यदि पहले के सऊदी मेगा-प्रोजेक्ट्स से सबक लिया जाता, तो शायद अधिक सतर्क रणनीति अपनाई जाती. उदाहरण के लिए, 2017 में 200 गीगावॉट क्षमता वाले दुनिया के सबसे बड़े सोलर प्रोजेक्ट की योजना बनाई गई थी, लेकिन वह अपने मूल पैमाने पर पूरी नहीं हो सकी. इसी तरह, दुनिया के सबसे बड़े होटल ‘अबराज कुदाई’ की परियोजना को कई बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ा, जिनमें वित्तीय समस्याएं और एक निर्माण दुर्घटना शामिल थी, जिसमें कथित तौर पर 107 लोगों की मौत हो गई. 

इसके अलावा, इसके बाद प्रगति रुक गई और इसका अंतिम स्वरूप अब भी अनिश्चित बना हुआ है. लगभग 2008 के आसपास, सऊदी अरब ने Jeddah Tower की घोषणा के साथ वैश्विक गगनचुंबी इमारतों की दौड़ में प्रवेश किया, जिसे उस समय की सबसे ऊँची इमारत Burj Khalifa से लगभग 180 मीटर अधिक ऊँचा बनाने का लक्ष्य रखा गया था और 2016 तक पूरा करने की योजना थी, लेकिन इसका निर्माण अभी भी जारी है. इन सभी परियोजनाओं में वित्तीय सीमाएँ एक बड़ी बाधा रहीं. ये परियोजनाएँ ‘द लाइन’ की तुलना में कहीं छोटी और पारंपरिक थी, फिर भी इन्हें गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

गीगा-प्रोजेक्ट मॉडल की हकीकत

इन परिणामों के संदर्भ में ‘द लाइन’ की धीमी प्रगति और इसके छोटे होते दायरे को पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता. इतने बड़े और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स आमतौर पर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में कम ही शुरू किए जाते हैं, जहाँ कई हितधारक, विस्तृत नियामकीय प्रक्रियाएँ, प्रतिस्पर्धी बोली प्रणाली और संस्थागत जाँच-पड़ताल निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, साथ ही चुनावी जवाबदेही भी महत्वपूर्ण होती है. इसके विपरीत, अधिक केंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्थाएँ कुछ मामलों में तेज़ निर्णय और कार्यान्वयन संभव बनाती हैं, हालांकि इसके साथ अपने जोखिम और सीमाएँ भी होती हैं.

हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत 500 अरब अमेरिकी डॉलर के बजट के साथ हुई थी, लेकिन ‘द लाइन’ और व्यापक नियोम पहल में भारी लागत वृद्धि देखी गई है, और कुछ अनुमान इसे 8 ट्रिलियन डॉलर तक बताते हैं.

अगर काम, तकनीक और खर्च पर ठीक से नजर न रखी जाए, तो आगे चलकर दिक्कतें बढ़ सकती हैं. कम जांच होने से काम सुधारना भी मुश्किल हो जाता है. साथ ही, खाड़ी क्षेत्र में चल रहा तनाव निवेशकों के भरोसे को कम कर सकता है. जो लोग पहले निवेश करना चाहते थे, वे अब अनिश्चितता के कारण अपने फैसले बदल सकते हैं.

बड़े पैमाने के गीगा-प्रोजेक्ट्स अक्सर अत्यधिक केंद्रीकृत निर्णय-प्रक्रिया से जुड़े होते हैं. इसकी मूल प्रकृति स्पष्ट है-सत्ता शीर्ष स्तर पर केंद्रित होती है, जिससे तेज़ मंजूरी और सरल कार्यान्वयन संभव होता है. ऐसे में सरकार आसानी से ज्यादा पैसा और संसाधन जुटा लेती है, जिससे बड़े प्रोजेक्ट्स में निवेश करना संभव होता है. ये प्रोजेक्ट्स सिर्फ विकास के लिए नहीं होते, बल्कि दुनिया को अपनी ताकत दिखाने और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए भी होते हैं. ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स देश की बड़ी सोच और उसकी दुनिया में पहचान को भी दिखाते हैं. दुनिया भर की गगनचुंबी इमारतें इसका अच्छा उदाहरण हैं. उदाहरण के लिए, Burj Khalifa को दुनिया की सबसे ऊँची इमारत बनाने के उद्देश्य से बनाया गया था, जो संयुक्त अरब अमीरात की वैश्विक पहचान को दर्शाता है. ध्यान देने योग्य है कि इसकी ऊपरी 244 मीटर ऊँचाई (लगभग 29%) मुख्य रूप से एक शिखर (spire) है, जिसका व्यावहारिक उपयोग सीमित है.

ऐसी व्यवस्थाओं में, बड़े प्रोजेक्ट्स से जुड़ी सावधानी पूर्ण जाँच-जैसे भौतिक व्यवहार्यता, वित्तीय क्षमता और संस्थागत या सार्वजनिक परामर्श-हमेशा समान रूप से नहीं होती, खासकर जब शीर्ष स्तर पर अंतिम निर्णय ले लिए जाते हैं. इसके परिणामस्वरूप जोखिम, समझौते और सीमाओं पर व्यवस्थित चर्चा के लिए पर्याप्त संस्थागत स्थान नहीं मिल पाता. कुछ मामलों में व्यवहार्यता से जुड़ी चिंताएं खुलकर सामने नहीं आतीं, विशेषकर जब पेशेवर या संगठनात्मक दबाव मौजूद हों.

इन हालात में ऐसी तकनीकें भी जोड़ी जा रही हैं जो अभी पूरी तरह परखी नहीं गई हैं. खासकर नियोग और ‘द लाइन’ में कई चीजें बहुत ज्यादा कल्पना जैसी लगती हैं. अगर काम, तकनीक और खर्च पर ठीक से नजर न रखी जाए, तो आगे चलकर दिक्कतें बढ़ सकती हैं. कम जांच होने से काम सुधारना भी मुश्किल हो जाता है. साथ ही, खाड़ी क्षेत्र में चल रहा तनाव निवेशकों के भरोसे को कम कर सकता है. जो लोग पहले निवेश करना चाहते थे, वे अब अनिश्चितता के कारण अपने फैसले बदल सकते हैं.

इसलिए सऊदी सरकार को नियोम की योजना-जैसे उसका आकार, काम करने का तरीका और निवेश-फिर से सोचना पड़ सकता है. हालांकि, इसे पूरी तरह बंद करने की संभावना कम है, लेकिन इसका भविष्य अभी साफ नहीं दिख रहा है.


रामनाथ झा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक विशिष्ट फेलो हैं.
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Dr. Ramanath Jha is Distinguished Fellow at Observer Research Foundation, Mumbai. He works on urbanisation — urban sustainability, urban governance and urban planning. Dr. Jha belongs ...

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