सऊदी अरब अब किसी एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय कई देशों के साथ संतुलित संबंध बना रहा है. जानें कैसे ब्रिक्स और ओपेक+ के जरिए वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति मज़बूत कर रहा है.
तेज़ी से बहुध्रुवीय होती वैश्विक व्यवस्था में सऊदी अरब ने अपनी विदेश नीति को नए सिरे से ढाला है. अब वह किसी एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय कई देशों के साथ संतुलित संबंध बनाने की रणनीति अपना रहा है जिसे बहु-संरेखण कहा जाता है. 2023 में दिए एक साक्षात्कार में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने स्पष्ट किया कि रियाद आर्थिक विकास और मध्य पूर्व में स्थिरता के लिए दुनिया के सभी प्रमुख खिलाड़ियों के साथ काम करने को तैयार है. इससे सऊदी अरब अपनी पारंपरिक पश्चिमी साझेदारियों से आगे बढ़कर नए विकल्प तलाश रहा है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के नियो-रियलिस्ट दृष्टिकोण से देखा जाए तो बहुध्रुवीय दुनिया मध्य शक्तियों जैसे सऊदी अरब को अधिक रणनीतिक स्वतंत्रता देती है.
ब्रिक्स का मुख्य उद्देश्य वैश्विक संस्थाओं में सुधार कर और विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाकर एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करना है. ये लक्ष्य सऊदी अरब की बहु-संरेखण नीति और आर्थिक रणनीति से मेल खाते हैं. सऊदी अरब और ब्रिक्स देशों के बीच गैर-डॉलर मुद्राओं में व्यापार को बढ़ाने में भी साझा रुचि है, जिससे उसकी आर्थिक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ सकता है.
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के नियो-रियलिस्ट दृष्टिकोण से देखा जाए तो बहुध्रुवीय दुनिया मध्य शक्तियों जैसे सऊदी अरब को अधिक रणनीतिक स्वतंत्रता देती है. ये लक्ष्य सऊदी अरब की बहु-संरेखण नीति और आर्थिक रणनीति से मेल खाते हैं.
हालांकि सऊदी अरब अभी ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य नहीं है, लेकिन 2023 में हुए 15वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में उसे ब्रिक्स+ में शामिल होने का निमंत्रण मिला. इस दौरान सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने कहा कि “सऊदी अरब मध्य पूर्व में ब्रिक्स समूह का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.” 2022 में ब्रिक्स देशों के साथ सऊदी अरब का कुल द्विपक्षीय व्यापार 160 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक था.
ब्रिक्स समूह सदस्य देशों की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत का पालन करता है. ब्रिक्स की उभरती अर्थव्यवस्थाएँ सऊदी अरब को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भूमिका बढ़ाने के कई अवसर देती हैं. चीन, भारत और रूस जैसे देशों के साथ सहयोग करके सऊदी अरब अपने अर्थव्यवस्था विविधीकरण के लक्ष्य को आगे बढ़ा सकता है. इससे पश्चिमी देशों पर उसकी अत्यधिक निर्भरता भी कम होगी और दक्षिण-दक्षिण सहयोग में उसकी भूमिका मजबूत होगी.
सऊदी अरब मध्य पूर्व में स्थिरता के लिए क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के साथ संवाद और मध्यस्थता को भी प्राथमिकता दे रहा है. 2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान के बीच कूटनीतिक संबंध बहाल हुए, जो 2016 से टूटे हुए थे. यह दिखाता है कि क्षेत्रीय विवादों में गैर-पश्चिमी देशों की भूमिका बढ़ रही है. 2026 में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता भी सऊदी अरब को अपने क्षेत्रीय लक्ष्यों को ब्रिक्स की बहुध्रुवीय सोच से जोड़ने का अवसर दे सकती है.
ओपेक+ सऊदी अरब की ऊर्जा कूटनीति का एक अहम आधार बना हुआ है. 2016 में ओपेक ने कुछ गैर-ओपेक तेल उत्पादक देशों के साथ मिलकर ओपेक+ का गठन किया, जिसका उद्देश्य वैश्विक तेल बाज़ार को स्थिर रखना था. आज ओपेक+ दुनिया के लगभग 59 प्रतिशत तेल उत्पादन को नियंत्रित करता है.
सऊदी अरब अमेरिका के साथ सुरक्षा और सैन्य सहयोग बनाए रखता है, लेकिन साथ ही बदलती वैश्विक राजनीति को देखते हुए नए साझेदार भी तैयार कर रहा है. इसलिए ब्रिक्स और ओपेक+ में उसकी भागीदारी को पश्चिम-विरोधी नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय दुनिया में अपनी स्थिति मज़बूत करने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए.
ओपेक+ की राजनीति सऊदी अरब को अपने पारंपरिक पश्चिमी सहयोगियों से स्वतंत्र होकर रूस जैसे गैर-पश्चिमी देशों के साथ साझेदारी बनाने का अवसर देती है. हाल के वर्षों में सऊदी अरब ने कई बार अमेरिकी दबाव के बावजूद स्वतंत्र निर्णय लिए हैं. उदाहरण के तौर पर, 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने तेल उत्पादन बढ़ाने का आग्रह किया, लेकिन सऊदी अरब ने ओपेक+ के साथ मिलकर उत्पादन घटाने का फैसला किया, जिससे तेल की कीमतें बढ़ीं. रियाद ओपेक+ के ढांचे के माध्यम से मास्को के साथ लगातार सहयोग करता रहा है, ताकि वैश्विक तेल और प्राकृतिक गैस बाज़ार को स्थिर रखा जा सके और अपने ऊर्जा हितों की रक्षा की जा सके. चूँकि रूस और सऊदी अरब दोनों ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की स्थिर कीमतों पर निर्भर हैं, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ गिरावट दोनों अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करती है. यह निर्णय उसकी स्वतंत्र आर्थिक नीति के अनुरूप था.
सऊदी अरब ओपेक+ मंच के ज़रिये रूस के साथ मिलकर वैश्विक तेल और गैस बाज़ार में स्थिरता बनाए रखने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है. दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएँ बड़े पैमाने पर ऊर्जा निर्यात पर निर्भर हैं, विशेष रूप से कच्चे तेल से होने वाली आय पर. हाल के वर्षों में यह सहयोग केवल तेल तक सीमित नहीं रहा है. ऊर्जा क्षेत्र में बदलते वैश्विक रुझानों और भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए दोनों देश अपने सहयोग का दायरा बढ़ा रहे हैं. तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) को एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक ईंधन के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें आपसी निवेश और तकनीकी सहयोग की संभावनाएं बढ़ी हैं. इसके अलावा, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग पर ज़ोर दिया जा रहा है, ताकि ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूत किया जा सके और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित हो.
अपने व्यापक विदेश नीति लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सऊदी अरब एक लचीली और व्यावहारिक रणनीति अपना रहा है. ब्रिक्स और ओपेक+ जैसे मंच उसे उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ संबंध गहरे करने और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में निर्णायक भूमिका बनाए रखने में मदद करते हैं. यह रणनीति किसी एक शक्ति गुट के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय संतुलन बनाए रखने पर आधारित है. सऊदी अरब अमेरिका के साथ सुरक्षा और सैन्य सहयोग बनाए रखता है, लेकिन साथ ही बदलती वैश्विक राजनीति को देखते हुए नए साझेदार भी तैयार कर रहा है. इसलिए ब्रिक्स और ओपेक+ में उसकी भागीदारी को पश्चिम-विरोधी नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय दुनिया में अपनी स्थिति मज़बूत करने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए.
कबीर तनेजा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, मिडिल ईस्ट के कार्यकारी निदेशक हैं.
सूर्य प्रकाश नौतियाल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन विभाग में डॉक्टरेट के छात्र हैं.
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Kabir Taneja is the Executive Director of the Observer Research Foundation’s Middle East office. He previously focused on India’s relations with the Middle East (West ...
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Surya Prakash Noutiyal is a doctoral candidate at the School of International Studies, Jawaharlal Nehru University. ...
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