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यूक्रेन–रूस युद्ध का लंबा खिंचना कोई संयोग नहीं है बल्कि बदलती युद्ध परिस्थितियों का परिणाम है. दरअसल, तेज़ जीत की रूसी योजना, ज़मीनी प्रतिरोध, यूक्रेन की तैयारी और पश्चिमी समर्थन के सामने विफल हो गई जिससे युद्ध एक लंबे क्षरण संघर्ष में बदल गया.
रूस डोनबास क्षेत्र पर अब तक सीमित और बेहद धीमी प्रगति ही कर पाया है. हालाँकि कुछ रिपोर्टों में यह दावा किया जा रहा है कि रूसी सेनाएँ पोक्रोव्स्क के क़रीब पहुँच गई हैं लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि उनकी बढ़त छोटे इलाकों तक सिमटी हुई है और उसे हासिल करने में भी काफ़ी समय, संसाधन और भारी नुकसान झेलना पड़ा है. यह स्थिति रूस की सैन्य रणनीति और उसकी वास्तविक क्षमताओं के बीच के अंतर को उजागर करती है. यदि 2014 से 2025 तक के पूरे रूस–यूक्रेन युद्ध को समग्र रूप से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि रूस को वह तेज़ और निर्णायक जीत कभी नहीं मिली जिसकी उम्मीद उसने शुरुआती दौर में की थी. इसके बजाय यह संघर्ष धीरे-धीरे एक लंबे समय तक चलने वाले क्षरण युद्ध (war of attrition) में बदल गया, जहाँ लक्ष्य तेज़ इलाक़ा जीतना नहीं बल्कि यूक्रेन की सैन्य क्षमता, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सहनशक्ति को धीरे-धीरे कमजोर करना बन गया.
“यदि 2014 से 2025 तक के पूरे रूस–यूक्रेन युद्ध को समग्र रूप से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि रूस को वह तेज़ और निर्णायक जीत कभी नहीं मिली जिसकी उम्मीद उसने शुरुआती दौर में की थी.”
चार साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद रूस की सैन्य उपलब्धियाँ रणनीतिक रूप से सीमित ही कही जा सकती हैं. 2014 में हालात बिल्कुल अलग थे- तब रूस ने क्रीमिया और डोनबास के कुछ हिस्सों पर लगभग बिना किसी बड़े सैन्य प्रतिरोध के कब्ज़ा कर लिया था. उस समय यूक्रेन की सेना कमजोर थी, राजनीतिक अस्थिरता चरम पर थी और रूसी सेना को स्थानीय अलगाववादी समूहों का सक्रिय समर्थन प्राप्त था.
लेकिन 2022 के बाद तस्वीर बदल गई. यूक्रेन की सैन्य तैयारी बेहतर हुई, पश्चिमी देशों से हथियार, खुफिया जानकारी और आर्थिक समर्थन मिला और स्थानीय आबादी का प्रतिरोध कहीं अधिक संगठित व दृढ़ रहा. नतीजतन, रूस की प्रगति अब धीमी, महंगी और अनिश्चित हो गई है. यही कारण है कि डोनबास जैसे अहम क्षेत्र में भी रूस को हर किलोमीटर आगे बढ़ने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ रही है जिससे यह युद्ध उसकी अपेक्षा से कहीं अधिक जटिल और लंबा साबित हुआ है.
2014 में जब रूस ने क्रीमिया और डोनबास के डोनेट्स्क व लुहांस्क के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा किया, तब यूक्रेन की ओर से बहुत कम विरोध हुआ. रूसी सेना के समर्थन से रूस-समर्थक अलगाववादियों ने इन इलाकों पर नियंत्रण कर लिया. यह रणनीति इसलिए सफल रही क्योंकि यूक्रेनी सुरक्षा बेहद कमजोर थी. सीमित लक्ष्य रणनीति में हमला करने वाला पक्ष उन क्षेत्रों पर जल्दी कब्ज़ा करता है जहाँ विरोध सबसे कम होता है जिससे बड़े और खूनखराबे वाले युद्ध से बचा जा सकता है. 2014 से 2022 के बीच यूक्रेन इन क्षेत्रों को वापस लेने में सफल नहीं हो पाया. इस दौरान रूस इन इलाकों का “रक्षक” बन गया, जो सीमित लक्ष्य रणनीति का ही हिस्सा होता है. यही वह दौर था जब यूक्रेन के खिलाफ रूस की सैन्य रणनीति सबसे प्रभावी रही. हालाँकि, इस अवधि में यूक्रेन ने ज़मीनी वायु रक्षा (GBAD), साइबर सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से निपटने की तैयारी मजबूत की जिससे आगे चलकर उसे फायदा मिला.
“चार साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद रूस की सैन्य उपलब्धियाँ रणनीतिक रूप से सीमित ही कही जा सकती हैं.”
यूक्रेन को जल्दी झुकाने के लिए रूस ने ब्लिट्जक्रिग (तेज़ युद्ध) की कोशिश की लेकिन योजना और अमल दोनों ही कमजोर रहे. इस रणनीति के तहत रूस ने विशेष बलों और साइबर हमलों के ज़रिए यूक्रेन की राजधानी कीव पर तेज़ी से कब्ज़ा करने की कोशिश की. उद्देश्य था यूक्रेन की कमान और नियंत्रण प्रणाली को तोड़कर राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को अलग-थलग करना. हालाँकि संचार नेटवर्क पर हमला करना रणनीतिक रूप से सही था लेकिन रूस यूक्रेन की साइबर तैयारी और लचीलेपन को समझ नहीं पाया. खास तौर पर स्टारलिंक इंटरनेट सेवा ने यूक्रेन को रूसी साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के बावजूद संचार बनाए रखने में मदद की. इसके अलावा, रूस ने वायु शक्ति का प्रभावी उपयोग नहीं किया और ज़मीनी बलों पर अधिक निर्भर रहा. मजबूत यूक्रेनी रक्षा और पश्चिमी देशों की सहायता के कारण रूस की तेज़ जीत की योजना असफल हो गई.
“यूक्रेन को जल्दी झुकाने के लिए रूस ने ब्लिट्जक्रिग (तेज़ युद्ध) की कोशिश की लेकिन योजना और अमल दोनों ही कमजोर रहे.”
2014 से 2022 के बीच कीव ने अपने साइबर और संचार नेटवर्क को पहले से अधिक मज़बूत और लचीला बनाया. इससे रूस के शुरुआती साइबर हमलों का सामना करने में यूक्रेन को मदद मिली लेकिन यह तैयारी पश्चिमी देशों की बड़ी मदद के बिना ज़्यादा समय तक टिक नहीं सकती थी. रूस के साइबर हमलों को नाकाम करने में अमेरिका और नाटो की भूमिका अहम रही. अमेरिकी साइबर कमांड ने रूस के खिलाफ रक्षात्मक और आक्रामक साइबर अभियान चलाए, जिससे रूस की तेज़ जीत (ब्लिट्जक्रिग) की योजना कमजोर पड़ गई. कई विश्लेषण रूस-यूक्रेन युद्ध की तुलना इज़राइल-ईरान संघर्ष से करते हैं लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि यूक्रेन को पश्चिमी देशों से तुरंत सहायता मिली जबकि ईरान को रूस और चीन से वैसी मदद नहीं मिली. युद्ध के शुरुआती दौर में यूक्रेन ने “डिफेंस इन डेप्थ” रणनीति अपनाई जिसमें कुछ इलाक़े छोड़कर मज़बूत तैयार रक्षा मोर्चों पर लड़ाई लड़ी जाती है. खारकीव जैसे शहरों के आसपास मज़बूत ज़मीनी और वायु रक्षा, ड्रोन और प्रभावी सैन्य रणनीति ने रूसी सेना को भारी नुकसान पहुँचाया. इसके अलावा, ब्लिट्जक्रिग के लिए तेज़ी और वायु शक्ति बहुत ज़रूरी होती है लेकिन रूस ने ज़मीनी सेना और तोपखाने पर ज़्यादा भरोसा किया. अपनी बड़ी वायु शक्ति के बावजूद रूस वायु श्रेष्ठता हासिल नहीं कर पाया क्योंकि उसके पास दुश्मन की वायु रक्षा को दबाने (SEAD) का अनुभव और सही योजना नहीं थी. यही कारण रहा कि रूस की तेज़ जीत की रणनीति असफल हो गई.
Table 1: Military Balance in February 2022
| Capabilities | Ukraine | Russia |
| Active Personnel | 209,000 | 900,000 |
| Reserve Personnel | 900,000 | 2,000,000 |
| Artillery | 2,040 | 7,571 |
| Armoured vehicles | 12,303 | 30,122 |
| Tanks | 2,596 | 12,420 |
| Attack Helicopters | 34 | 544 |
| Fighter/attack aircraft | 98 | 1,511 |
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1. US$ 61.7 billion, 2. 11.4 percent |
Source: Author’s compilation from SIRPI (2020), Global Firepower (2022) and (IISS 2021)
ब्लिट्जक्रिग में असफल होने के बाद रूस ने अपनी युद्ध-रणनीति में बुनियादी बदलाव किया और तेज़, निर्णायक हमले की जगह एक लंबे, थकाऊ और संसाधन-आधारित क्षरण युद्ध को अपनाया. शुरुआती चरण में कीव पर तेज़ी से कब्ज़ा करने की योजना विफल होने के बाद मॉस्को इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यूक्रेन को तुरंत झुकाना संभव नहीं है. इसके बाद रूस ने युद्ध को लंबा खींचने, मोर्चों को स्थिर रखने और समय के साथ यूक्रेन की सैन्य व आर्थिक क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर करने की नीति अपनाई.
“ब्लिट्जक्रिग में असफल होने के बाद रूस ने अपनी युद्ध-रणनीति में बुनियादी बदलाव किया और तेज़, निर्णायक हमले की जगह एक लंबे, थकाऊ और संसाधन-आधारित क्षरण युद्ध को अपनाया.”
डोनबास में अवदीवका और पोक्रोव्स्क जैसी लड़ाइयाँ इस बदली हुई रणनीति की स्पष्ट मिसाल हैं. यहाँ रूस ने तेज़ घेराबंदी या गहरे ब्रेकथ्रू की बजाय निरंतर गोलाबारी, सीमित अग्रिम बढ़त और भारी दबाव की रणनीति अपनाई. इसका उद्देश्य बड़े इलाक़े एक झटके में जीतना नहीं बल्कि यूक्रेनी सेना को लगातार नुकसान पहुँचाकर उसे पीछे हटने या संसाधन झोंकने के लिए मजबूर करना है. यह तरीका धीमा ज़रूर है, लेकिन रूस इसे टिकाऊ मानता है.
जनवरी 2024 से रूस के पास युद्ध की “पहल” (initiative) मानी जा रही है, यानी वह यह तय कर रहा है कि लड़ाई कहाँ और किस तीव्रता से होगी. सैन्य शब्दों में पहल का अर्थ होता है दुश्मन को अपनी चालों पर प्रतिक्रिया करने के लिए मजबूर करना, न कि उसे अपने एजेंडे पर खेलने देना. इसके बावजूद रूस किसी बड़े और जोखिम भरे तेज़ हमले से बच रहा है, क्योंकि ऐसा करना उसके लिए भारी नुकसान और रणनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकता है.
यह सतर्कता रूस की सैन्य परंपरा के अनुरूप है. ऐतिहासिक रूप से रूसी युद्ध-सिद्धांत तेज़ और चौंकाने वाले हमलों से अधिक, गहराई, धैर्य और संसाधनों की प्रचुरता पर आधारित रहा है. रूसी सैन्य सोच में समय को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति रही है-जहाँ दुश्मन की सहनशक्ति को धीरे-धीरे परखा और तोड़ा जाता है, बजाय एक ही झटके में निर्णायक वार करने के.
द्वितीय विश्व युद्ध की तरह ही आज भी रूस एक तरह की “स्टीमरोलर रणनीति” पर चल रहा है- जहाँ भारी तोपखाने, मानवबल और औद्योगिक संसाधनों के सहारे धीरे-धीरे दबाव बनाया जाता है. यह रणनीति दिखने में धीमी और महंगी लग सकती है लेकिन इसका लक्ष्य यूक्रेन को तुरंत हराना नहीं बल्कि उसे लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में थका देना है. इसी वजह से डोनबास की लड़ाइयाँ तेज़ जीत से ज़्यादा, एक लंबे और अनिश्चित युद्ध की कहानी बयान करती हैं.
यह युद्ध अब एक लंबी और थकाऊ लड़ाई बन चुका है. रूस की रणनीति सीमित लक्ष्यों से शुरू होकर असफल ब्लिट्जक्रिग और फिर क्षरण युद्ध तक पहुँच गई है. रूस ने न तो अपनी पूरी सैन्य क्षमता का सही इस्तेमाल किया और न ही यह अनुमान लगाया कि यूक्रेन को पश्चिमी देशों से कितनी मज़बूत सहायता मिलेगी. इसी वजह से रूस एक लंबे क्षरण युद्ध में फँस गया है. रूस-यूक्रेन युद्ध से भारत के लिए भी अहम सबक हैं. दोनों देशों ने ड्रोन का व्यापक उपयोग किया है लेकिन कोई भी वायु श्रेष्ठता हासिल नहीं कर पाया. भारतीय वायु सेना प्रमुख ए.पी. सिंह के अनुसार, भारी और सटीक हमलों के लिए मानव चालित वायु शक्ति अब भी ज़रूरी है. ड्रोन सहायक भूमिका निभा सकते हैं लेकिन वे मानव चालित विमानों की जगह नहीं ले सकते. अंत में, रूस द्वारा अपने ही युद्ध में पाँचवीं पीढ़ी के विमानों के सीमित उपयोग को देखते हुए, भारत को रूस से ऐसे विमानों की ख़रीद पर सावधानी बरतनी चाहिए.
कार्तिक बोम्माकांति ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (Observer Research Foundation) में सीनियर फ़ेलो हैं.
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Kartik is a Senior Fellow with the Strategic Studies Programme. He is currently working on issues related to land warfare and armies, especially the India ...
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