क्या म्यूनिख में अमेरिका ने यूरोप को सच में डराया या बस नरमी दिखा दी? जानें 17–19 फरवरी को हुए मार्को रुबियो के भाषण में छिपा संदेश और ट्रांसअटलांटिक रिश्तों की असली चुनौती.
मार्को रुबियो का म्यूनिख में मेल-मिलाप वाला स्वर एक परिचित संदेश को ही म्यूनिख संबोधन में नरमी दिखी पर रुबियो का संदेश वही रहा. जिसने यूरोप के प्रति वाशिंगटन की कड़ी होती अपेक्षाओं को दोहराया और बढ़ती ट्रांसअटलांटिक खाई को उजागर किया.
ठीक एक वर्ष पहले, 2025 के म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस (MSC) में, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने उसी मंच बायरिशर हॉफ होटल से यूरोप को झकझोर देने वाला भाषण दिया था. उन्होंने यूरोप पर लोकतांत्रिक मूल्यों से पीछे हटने, व्यापक प्रवासन से सांस्कृतिक पहचान के क्षरण, और “अंदरूनी खतरे” को महाद्वीप के लिए सबसे बड़ा जोखिम बताने का आरोप लगाया था.
रुबियो ने अपने भाषण में रूस या चीन का कोई जिक्र नहीं किया और यूक्रेन का केवल एक बार उल्लेख किया. स्थिति को और जटिल बनाते हुए, वे म्यूनिख से हंगरी और स्लोवाकिया गए, जहाँ जनवादी, यूरोपीय संघ-विरोधी और रूस-समर्थक सरकारें सत्ता में हैं.
स्वाभाविक रूप से, इस वर्ष के 62वें म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस की कार्यवाही पर ट्रांसअटलांटिक संबंधों की छाया गहराई रही, विशेषकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड संबंधी दावों के संदर्भ में. लेकिन वेंस के टकरावपूर्ण भाषण के विपरीत, इस वर्ष अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहीं अधिक सौम्य स्वर अपनाया. जोरदार तालियों के बीच, रुबियो ने अमेरिका के यूरोप के साथ ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख किया और साझा सांस्कृतिक विरासत तथा ईसाई बंधनों की ओर संकेत किया. उन्होंने अमेरिका को ‘यूरोप की संतान’ बताया और साझा नियति तथा परस्पर जुड़े भविष्य पर बल दिया.
फिर भी, भाषण का सार-भले ही उसे अधिक कूटनीतिक ढंग से पेश किया गया ताकि यूरोप को कुछ राहत मिले-मूलतः वही रहा. रुबियो के कई वक्तव्य ट्रम्पवादी दृष्टिकोण का सीधा प्रतिबिंब थे. यूरोप के ‘सभ्यतागत लोप’ पर चिंता जताने से लेकर उसकी प्रवासन और जलवायु नीतियों की आलोचना तक, भाषण की वैचारिक नींव सीधे मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) की सोच से ली गई थी और स्पष्ट रूप से यूरोप के अतिदक्षिणपंथी विचारों की गूँज थी, जो कई प्रमुख यूरोपीय संघ सदस्य देशों में सत्तारूढ़ मध्यमार्गी नेताओं के विपरीत जाती है.
वैश्विक ‘पुनरुत्थान और पुनर्स्थापन’ में अमेरिका की अगुवाई की इच्छा पर ज़ोर देते हुए, रुबियो ने साथ मिलकर काम करने और ट्रांसअटलांटिक सहयोग को पुनर्जीवित करने की तत्परता जताई, लेकिन अमेरिकी शर्तों पर और अमेरिकी मूल्यों की विशिष्ट अवधारणा के आधार पर-जिसके अनुसार यूरोप को स्वयं को ढालना होगा. प्रवासन और जलवायु नीतियों पर उनकी आलोचना और ‘सभ्यतागत क्षरण’ की बात फिर से MAGA सोच से प्रेरित थी और यूरोपीय अतिदक्षिणपंथी तर्कों को दोहराती थी.
रुबियो के कई वक्तव्य ट्रम्पवादी दृष्टिकोण का सीधा प्रतिबिंब थे. यूरोप के ‘सभ्यतागत लोप’ पर चिंता जताने से लेकर उसकी प्रवासन और जलवायु नीतियों की आलोचना तक, भाषण की वैचारिक नींव सीधे मेक अमेरिका ग्रेट अगेन की सोच से ली गई थी और स्पष्ट रूप से यूरोप के अतिदक्षिणपंथी विचारों की गूँज थी,
यह भाषण यूरोप के अतिदक्षिणपंथी वर्गों में स्वाभाविक रूप से गूंजा. यूरोप से अपनी रक्षा की जिम्मेदारी अधिक उठाने का आग्रह करते हुए, रुबियो ने संघर्ष समाधान में संयुक्त राष्ट्र की निष्प्रभाविता का संकेत दिया और बहुपक्षीय नियम-आधारित व्यवस्था से अमेरिका के पीछे हटने को रेखांकित किया. ये विचार केवल भाषण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि 2025 के अंत में जारी अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति जैसे दस्तावेजों में भी दर्ज हैं, जिसे सामरिक और अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केंद्र ने ‘यूरोप के लिए वास्तविक, पीड़ादायक, चौंकाने वाली चेतावनी’ बताया.
2026 की MSC रिपोर्ट ‘विनाश के कगार पर’ के अनुसार, दरारें बुनियादी हैं: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अमेरिकी रणनीति-और उसे सहारा देने वाले मानदंड और संस्थान-विघटित किए जा रहे हैं, और उनके साथ वह ट्रांसअटलांटिक साझेदारी भी, जो इन्हीं नींवों पर टिकी थी. उल्लेखनीय है कि रुबियो ने अपने भाषण में रूस या चीन का कोई जिक्र नहीं किया और यूक्रेन का केवल एक बार उल्लेख किया. स्थिति को और जटिल बनाते हुए, वे म्यूनिख से हंगरी और स्लोवाकिया गए, जहाँ जनवादी, यूरोपीय संघ-विरोधी और रूस-समर्थक सरकारें सत्ता में हैं.
यह भाषण ट्रांसअटलांटिक संबंधों को सुधारने या दोबारा शुरू करने की कोशिश नहीं था, बल्कि मार्को रुबियो ने इसके जरिए डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन की यूरोप के प्रति सोच और अपेक्षाओं को दोहराया. गठबंधन में मतभेद सिर्फ भाषणों या रक्षा खर्च के मुद्दों तक सीमित नहीं हैं. दोनों पक्ष अब संस्कृति, मुक्त व्यापार, यूक्रेन युद्ध, प्रवासन, जलवायु संकट और बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका जैसे मुद्दों पर भी अलग-अलग रुख अपनाते दिख रहे हैं.
यह साफ है कि अमेरिका अपनी वैश्विक भूमिका को नए सिरे से संतुलित कर रहा है और उसका नेतृत्व अब ज्यादा शर्तों और अनिश्चितता के साथ जुड़ गया है. ऐसे में यूरोप के लिए बेहतर होगा कि वह केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय हालात के संकेतों को समझें और रक्षा निवेश, रक्षा उत्पादन और जिम्मेदारी साझा करने की नीति को गंभीरता से आगे बढ़ाए. इससे नाटो में यूरोपीय भागीदारी मजबूत होगी और व्यापक ट्रांसअटलांटिक साझेदारी को भी सहारा मिलेगा. साथ ही, यूरोपीय संघ के सदस्य देशों को आपसी मतभेद कम कर आर्थिक सुधार, गहरा एकीकरण और नियमों में ढील जैसे कदम आगे बढ़ाने होंगे, ताकि संबंध साझा हितों के आधार पर अधिक संतुलित रूप में टिके रह सकें.
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यूरोप से एक स्वतंत्र भू-राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने का आग्रह किया. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने रूसी खतरों का मुकाबला करने के लिए आर्कटिक और हाई नॉर्थ में युद्धपोत तैनात करने की योजनाओं पर जोर दिया और शक्ति को ‘इस युग की मुद्रा’ बताया.
रुबियो के भाषण से पहले, जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने बढ़ती ट्रांसअटलांटिक खाई को ‘असुविधाजनक सत्य, बताया और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अंत का गंभीर पूर्वानुमान व्यक्त किया. फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यूरोप से एक स्वतंत्र भू-राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने का आग्रह किया. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने रूसी खतरों का मुकाबला करने के लिए आर्कटिक और हाई नॉर्थ में युद्धपोत तैनात करने की योजनाओं पर जोर दिया और शक्ति को ‘इस युग की मुद्रा’ बताया. इस बीच, नाटो ने आर्कटिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक नया ढांचा घोषित किया. ये संकेत उत्साहजनक हैं, फिर भी कई यूरोपीय नेता गंभीर घोटालों और घरेलू चुनौतियों से जूझ रहे हैं. स्टार्मर के मामले में, उदाहरण के तौर पर, ऐसी रिपोर्ट हैं कि डाउनिंग स्ट्रीट में उनके दिन गिने-चुने हो सकते हैं.
यूरोप को संतोष के बजाय कार्रवाई, बयानबाज़ी के बजाय परिणाम, और ठोस निर्णयों की आवश्यकता है. साथ ही, यदि उसे सामरिक स्वायत्तता पर अपने वादों को निभाना है, तो आंतरिक एकजुटता और स्थिर नेतृत्व भी अनिवार्य होगा.
शाइरी मल्होत्रा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सामरिक अध्ययन कार्यक्रम की उप निदेशक हैं.
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Shairee Malhotra is Deputy Director - Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. Her areas of work include Indian foreign policy with a focus on ...
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