कनाडा-जापान-फ्रांस की उभरती साझेदारी बताती है कि कैसे ये देश चीन के प्रभुत्व और अमेरिका के व्यापारिक दृष्टिकोण से परे क्रिटिकल मिनरल की भू-राजनीति को नया आकार दे रहे हैं.
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पिछले दशक के ज़्यादातर समय में क्रिटिकल मिनरल की कूटनीति दो देशों के दृष्टिकोण से निर्धारित हुई: या तो चीन के साथ जुड़िए (जिसका खनन, रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग में दबदबा है), नहीं तो अमेरिका की व्यापारिक सोच के पीछे खड़े हो जाइए. दो देशों वाला ये दृष्टिकोण अब टूट रहा है. G7 के भीतर कनाडा, जापान और फ्रांस के बीच एक नया त्रिकोण बन रहा है जो इस साझा सोच से प्रेरित है कि चीन के खनिज प्रभुत्व और अमेरिका की लेन-देन वाली औद्योगिक नीति पर अत्यधिक निर्भरता से रणनीतिक कमज़ोरी पैदा होती है. इससे जो बन रहा है वो न तो अमेरिका विरोधी गठबंधन है, न ही पारंपरिक अर्थ में चीन विरोधी गुट. ये मध्यम शक्तियों का एक प्रयास है जिसका उद्देश्य रणनीतिक स्वायत्तता के ज़रिए सप्लाई चेन को मज़बूत बनाना है.
फरवरी 2026 में अमेरिका ने कुछ चुनिंदा साझेदारों के बीच क्रिटिकल मिनरल के लिए एक व्यापार समझौते का प्रस्ताव दिया. लेकिन इसका पालन करने के बदले कनाडा, जापान और फ्रांस ने समानांतर व्यवस्था बनाने की शुरुआत की जो उन्हें नीति के मामले में अधिक लचीलापन और रणनीतिक कुशलता के लिए अधिक गुंजाइश प्रदान करेगी.
इस गठबंधन की जड़ें कनाडा-जापान के बीच महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में सहयोग पर आधारित है. जापान को अपने ऑटो उद्योग, बैटरी और सेमीकंडक्टर सेक्टर के लिए लिथियम, ग्रेफाइट, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ जैसे खनिजों तक विश्वसनीय पहुंच आवश्यक थी. उधर कनाडा के पास भरपूर मात्रा में खनिजों का भंडार तो था लेकिन उसे पूंजी, तकनीक और दीर्घकालिक ख़रीदार की आवश्यकता थी. दोनों के बीच साझेदारी रणनीतिक रूप से समझदारी भरी थी: जापान जहां चीन के खनिजों पर अपनी निर्भरता कम कर सकता था, वहीं कनाडा केवल कच्चे माल के निर्यातक से आगे बढ़कर अधिक क़ीमती स्वच्छ तकनीक की सप्लाई चेन से जुड़ सकता था.
ये दलील ठोस परियोजनाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी. कनाडा के क्यूबेक में मौजूद नोव्यू मोंडे ग्रेफाइट (NMG) की मेटाविनी खदान द्विपक्षीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरी है. इस परियोजना को पैनासोनिक एनर्जी एवं मित्सुई एंड कंपनी जैसी जापानी कंपनियों का साथ मिला. साथ ही कनाडा की सरकार द्वारा समर्थित फंडिंग की मदद मिली. इसका लक्ष्य स्पष्ट था: उत्तरी अमेरिका में सबसे बड़ी एकीकृत ग्रेफाइट सुविधा का निर्माण ताकि चीन की ग्रेफाइट रिफाइनिंग पर निर्भरता कम करते हुए बैटरी उत्पादन में मदद किया जा सके. कनाडा ने इस परियोजना को G7 की सप्लाई चेन को विविध बनाने के प्रयासों के हिस्से के रूप में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया.
हालांकि 2025-26 तक रणनीतिक विमर्श का रुख बदल गया था. चुनौती केवल चीन पर निर्भरता की नहीं थी बल्कि अमेरिका की औद्योगिक नीति को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बारे में भी थी. अमेरिका के द्वारा संरक्षणवादी व्यापार उपायों की वापसी के साथ अमेरिका के नेतृत्व में एक खनिज गुट बनाने के प्रयासों से उसको सहयोगियों में बेचैनी पैदा हुई. फरवरी 2026 में अमेरिका ने कुछ चुनिंदा साझेदारों के बीच क्रिटिकल मिनरल के लिए एक व्यापार समझौते का प्रस्ताव दिया. लेकिन इसका पालन करने के बदले कनाडा, जापान और फ्रांस ने समानांतर व्यवस्था बनाने की शुरुआत की जो उन्हें नीति के मामले में अधिक लचीलापन और रणनीतिक कुशलता के लिए अधिक गुंजाइश प्रदान करेगी.
यहीं से फ्रांस ने इस समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. कनाडा से उलट फ्रांस के पास खनिज का महत्वपूर्ण भंडार नहीं है. लेकिन प्रोसेसिंग, औद्योगिक फंडिंग की अपनी क्षमताओं और रेयर अर्थ की रिफाइनिंग के लिए यूरोपीय बुनियादी ढांचे का निर्माण करने की बढ़ती इच्छा के कारण फ्रांस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. मार्च 2026 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की टोक्यो यात्रा के दौरान जापान और फ्रांस ने रेयर अर्थ के क्षेत्र में सहयोग के लिए नए समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते में डिस्प्रोसियम और टर्बियम- इलेक्ट्रिक गाड़ियों, सेमीकंडक्टर और रक्षा तकनीकों के लिए आवश्यक- जैसे भारी रेयर अर्थ पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया. महत्वपूर्ण बात ये है कि जापान ने भविष्य की मांग का लगभग 20 प्रतिशत फ्रांस के समर्थन वाली परियोजनाओं जैसे कि केयरमैग से हासिल करने का वादा किया है.
कनाडा के भंडार को देखते हुए इस त्रिपक्षीय गठबंधन में उसका योगदान सबसे महत्वपूर्ण है. कनाडा ने ख़ुद को एक व्यापक खनिज इकोसिस्टम की बुनियाद के रूप में स्थापित करने की लगातार कोशिश की है. 2025 में कनाडा की G7 अध्यक्षता के दौरान शुरू G7 क्रिटिकल एक्शन प्लान के तहत कनाडा ने बाज़ार, फंडिंग के तौर-तरीकों और खपत के समझौतों पर ज़ोर दिया. अक्टूबर 2025 तक कनाडा ने नौ देशों के साथ 26 निवेश और साझेदारी के समझौतों की घोषणा की जिनमें जापान और फ्रांस शामिल हैं. इस तरह कनाडा ने खनन और रिफाइनिंग में निवेश के रूप में अरबों डॉलर के अवसरों को खोला.
ख़बरों के मुताबिक चीन के रेयर अर्थ पर जापान की निर्भरता 90 प्रतिशत से घटकर लगभग 60 प्रतिशत हो गई है. इसका कारण ऑस्ट्रेलिया एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में निवेश, रिसाइक्लिंग तकनीक और अब कनाडा एवं फ्रांस के साथ साझेदारी है. इस तरह ये त्रिकोणीय ढांचा जापान की व्यापक जोखिम-मुक्त होने की रणनीति का विस्तार है, न कि कोई अचानक नीतिगत बदलाव.
इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि कनाडा ने एक ऐसे मॉडल की वकालत शुरू कर दी जिसे अधिकारियों ने “ख़रीदारों के क्लब” का मॉडल बताया है. ये क्रिटिकल मिनरल की कूटनीति में महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक था. कीमतों पर चीन को हावी होने देने या अमेरिका को बाज़ार की संरचना तय करने की अनुमति देने के बदले कनाडा ने गैर-चीनी सप्लायर के लिए मांग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विश्वसनीय साझेदारों के बीच समन्वित खरीदारी का प्रस्ताव रखा. इस तरह की व्यवस्था क्रिटिकल मिनरल के बाज़ार में एक प्रमुख चुनौती का समाधान करने में मदद करेगी क्योंकि चीन के सप्लायर अक्सर कीमत में कमी करके वैकल्पिक खदान परियोजनाओं को व्यावसायिक रूप से अव्यावहारिक बना देते हैं.
जापान ने इस रवैये का ज़ोरदार समर्थन किया क्योंकि ये उसके पुराने आर्थिक सुरक्षा के सिद्धांतों से मिलता है. जापान के ख़िलाफ़ 2010 में चीन की रेयर अर्थ पाबंदी के बाद से जापान ने आक्रामक रूप से आपूर्ति में विविधता लाने की नीति अपनाई है. ख़बरों के मुताबिक चीन के रेयर अर्थ पर जापान की निर्भरता 90 प्रतिशत से घटकर लगभग 60 प्रतिशत हो गई है. इसका कारण ऑस्ट्रेलिया एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में निवेश, रिसाइक्लिंग तकनीक और अब कनाडा एवं फ्रांस के साथ साझेदारी है. इस तरह ये त्रिकोणीय ढांचा जापान की व्यापक जोखिम-मुक्त होने की रणनीति का विस्तार है, न कि कोई अचानक नीतिगत बदलाव.
हालांकि इसके बावजूद चुनौतियां बनी हुई हैं. खनन परियोजनाओं को पर्यावरण के मामले में विरोध का सामना करना पड़ता है, स्थानीय लोग उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते हैं और इनकी लागत बहुत ज़्यादा होती है. लेकिन इसके बावजूद तीनों देश कहीं अधिक महत्वाकांक्षी प्रयास कर रहे हैं. ये G7 के भीतर आज चल रहे सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रयोगों में से एक साबित हो सकता है.
प्रतनाश्री बसु ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
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Pratnashree Basu is an Associate Fellow with the Strategic Studies Programme. She covers the Indo-Pacific region, with a focus on Japan’s role in the region. ...
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