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Published on Dec 20, 2025 Updated 11 Days ago

साल खत्म होने को है और 2025 में भारत की सेहत की तस्वीर साफ़ दिखती है- खाने से लेकर हवा तक, हर मोर्चे पर चिंता बनी रही. कभी जंक फूड और महँगी दवाओं पर बहस हुई तो कभी ज़हरीली हवा और इलाज की भरोसेमंदी पर सवाल उठे. पढ़िए, इस साल भारत की सेहत का हेल्थ रिवाइंड, एक नज़र में.

ज़हरीली हवा, चुनौतीपूर्ण डाइट पैटर्न: पढ़ें 2025 का हेल्थ रिवाइंड

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हर साल दिसंबर में सोशल मीडिया पर तरह-तरह के “रीवाइंड” दिखने लगते हैं- किसी ने कौन-सा गाना ज़्यादा सुना, कौन-सा वीडियो देखा या सालभर ऑनलाइन क्या किया, यह लेख उसी दिशा में है लेकिन अलग संदर्भ के साथ. इसमें 2025 के दौरान हर पखवाड़े में गूगल न्यूज़ पर “भारत” और “स्वास्थ्य” से जुड़ी खबरों को देखा गया ताकि यह समझा जा सके कि कौन-से मुद्दे बार-बार सामने आए. हालाँकि गूगल का एल्गोरिदम पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होता क्योंकि खबरें जगह,  भाषा और पहले की पसंद से प्रभावित होती हैं- फिर भी जो मुद्दे बार-बार दिखे, वे छोटे या मामूली नहीं थे. यह लेख उन्हीं दोहराए गए मुद्दों का एक संक्षिप्त रीवाइंड है जो बताता है कि 2025 में सार्वजनिक स्वास्थ्य की कौन-सी चिंताएँ बार-बार भारत के सामने आती रहीं.

“आर्थिक सर्वेक्षण में पहली बार अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा चीनी-नमक-चर्बी वाले खाद्य पदार्थों, लंबे काम के घंटे और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया गया.”


जनवरी–मार्च: भारत की स्वास्थ्य चिंताओं की शुरुआत


आर्थिक सर्वेक्षण में पहली बार अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा चीनी-नमक-चर्बी वाले खाद्य पदार्थों, लंबे काम के घंटे और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया गया. इससे यह माना गया कि जीवनशैली से जुड़ी समस्याएँ अब सिर्फ निजी मामला नहीं रहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रही हैं लेकिन इसके बाद आए केंद्रीय बजट में वही पुराने उपाय दिखे जैसे ज्यादा मेडिकल सीटें, बड़े अस्पतालों पर ज़ोर और मेडिकल टूरिज़्म को बढ़ावा. इसी दौरान महाकुंभ ने देश की व्यवस्थागत क्षमता का एक अलग ही रूप दिखाया. करोड़ों लोगों की भीड़ को संभालने के लिए सफ़ाई, निगरानी और प्रबंधन की बड़ी तैयारी की गई लेकिन पानी की गुणवत्ता को लेकर चिंता इस आयोजन के साथ लगातार बनी रही.
ब्लिंकिट का ऐप के ज़रिए एंबुलेंस सेवा शुरू करना यह दिखाता है कि अब किराने के सामान की तरह आपात सेवाओं को भी ‘ऑन-डिमांड’ बनाया जा रहा है लेकिन इसमें खतरा यह है कि आपात इलाज एक ऐसे नियमहीन क्षेत्र में चला जाए जहाँ मदद मिलने की गति और पहुँच लोगों की ज़रूरत के बजाय उनकी भुगतान क्षमता पर निर्भर होने लगे.

“नोवो नॉर्डिस्क की दवा वेगोवी के बाज़ार में आने और एलाइ लिली की मोंजारो से मुकाबले के साथ, मोटापा और डायबिटीज़ के इलाज में बड़ी दवा कंपनियों की प्रतिस्पर्धा तेज़ हो गई.”

अप्रैल से जून के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े और ताकतवर खिलाड़ियों की एंट्री हुई

नोवो नॉर्डिस्क की दवा वेगोवी के बाज़ार में आने और एलाइ लिली की मोंजारो से मुकाबले के साथ, मोटापा और डायबिटीज़ के इलाज में बड़ी दवा कंपनियों की प्रतिस्पर्धा तेज़ हो गई. इन दवाओं की कीमत आम तौर पर 15,000 से 25,000 रुपये प्रति माह है जिसे केवल गिने-चुने संपन्न लोग ही वहन कर सकते हैं. इसी दौरान अडानी समूह ने मेयो क्लिनिक के साथ मिलकर ‘अडानी हेल्थ सिटी’ की घोषणा की जिसके तहत मुंबई और अहमदाबाद में 1,000-बिस्तरों वाले अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बनाए जाने हैं. एक तरफ महँगी इंजेक्शन वाली दवाएँ हैं तो दूसरी तरफ बड़े अस्पताल और मेडिकल कॉलेज-यह दिखाता है कि भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश दो बिल्कुल अलग दिशाओं में आगे बढ़ रहा है.


जुलाई से सितंबर के बीच की चर्चा इस बात पर रही कि भारत क्या खा रहा है और वह किस पर भरोसा करता है.


भारत–ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (FTA) ने खाने की नीति और सार्वजनिक स्वास्थ्य को आमने-सामने ला खड़ा किया. इस समझौते को लेकर चिंता जताई गई कि ब्रिटेन से आने वाली चॉकलेट, सॉफ्ट ड्रिंक और ज्यादा चीनी-वसा वाले खाद्य पदार्थ (HFSS) सस्ते या बिना शुल्क के मिलने लगेंगे जिससे भारतीय बच्चों के बीच पहले से बढ़ रही अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाने की समस्या और गंभीर हो सकती है. इसके लिए मेक्सिको का उदाहरण दिया गया जहाँ NAFTA के बाद मीठे उत्पादों की बाढ़ आ गई और मोटापा व डायबिटीज़ तेजी से बढ़े. इसी दौरान, सीबीएसई ने स्कूलों में ‘शुगर बोर्ड’ लगाने का आदेश दिया, जिन पर रोज़ाना कितनी चीनी ठीक है और आम खाने-पीने की चीज़ों में कितनी चीनी होती है,  यह बताया जाता है. एक तरफ़ विदेशी और घरेलू कंपनियों के ऐसे उत्पाद आसानी से उपलब्ध हैं और FTA से और ब्रांड आ सकते हैं; वहीं दूसरी तरफ़ सरकार स्कूलों में बच्चों को यही समझाने की कोशिश कर रही है कि ये चीज़ें मोटापे की समस्या कैसे बढ़ाती हैं.

“भारत–ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (FTA) ने खाने की नीति और सार्वजनिक स्वास्थ्य को आमने-सामने ला खड़ा किया.”


एक निजी कंपनी ने मुंबई में 2,000 बिस्तरों वाला एक बड़ा ‘मेडिकल सिटी’ प्रोजेक्ट पेश किया जिसमें अपना मेडिकल कॉलेज भी होगा और विदेशी डॉक्टरों के काम करने की बात कही गई. ये पहलें दिखाती हैं कि अब स्वास्थ्य शिक्षा और इलाज का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे कुछ निजी कंपनियों के हाथों में जाता जा रहा है. जिन परियोजनाओं को सामाजिक निवेश बताया जा रहा है, वे असल में स्वास्थ्य बाजार में इन कंपनियों की पकड़ भी मजबूत कर रही हैं. इन बड़े निवेशों के बीच मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में जहरीली खांसी की दवा से बच्चों की मौत ने एक कड़वी सच्चाई सामने रखी. स्थानीय स्तर पर बिक रही दवा में जहरीला रसायन मिला था जिसके बाद WHO की चेतावनी, राज्य में प्रतिबंध और छापों से खराब निगरानी और जांच व्यवस्था उजागर हुई. ज़मीनी स्तर पर दिखने वाले विवाद अलग-अलग लग सकते हैं लेकिन असल मुद्दा संस्थाओं पर भरोसे का है. अगस्त में आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली सरकार के बीच टकराव ने यह सवाल खड़ा किया कि किसका खतरा ज्यादा अहम है-रोज़ाना कुत्तों के काटने और रेबीज़ से जूझ रहे लोग या कुत्ता कल्याण से जुड़े समूह. आखिरकार अदालत को अपने शुरुआती रुख में नरमी लानी पड़ी.


अक्टूबर-दिसंबर: स्वास्थ्य की परीक्षा के महीने


दिल्ली की सर्दियों की धुंध यह दिखाती है कि भारत की स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था अब भी उलटे तरीके से काम करती है. हर साल अक्टूबर–नवंबर में वही हालात दोहराए जाते हैं-अदालतों के आदेश, पटाखों पर आंशिक रोक, आपात कदम और बेहद खराब वायु गुणवत्ता लेकिन समस्या का हल साल भर की तैयारी से नहीं, बल्कि संकट आने पर तात्कालिक उपायों से किया जाता है. इसमें दिल्ली के लोग भी पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हैं. एक तरफ़ सरकार शहरी मतदाताओं और किसानों, दोनों को नाराज़ न करने की राजनीति से जूझती है तो दूसरी तरफ़ पड़ोसी राज्यों में पराली जलाना और ईंट-भट्टों जैसी समस्याएँ बनी रहती हैं. नतीजा यह है कि हर साल वही आपात स्थिति लौट आती है-जिसकी ज़िम्मेदारी किसी एक की नहीं, लेकिन असर सब पर पड़ता है.

“दिल्ली की सर्दियों की धुंध यह दिखाती है कि भारत की स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था अब भी उलटे तरीके से काम करती है.”


इसी दौरान अपोलो टेलीहेल्थ से जुड़ा वेतन विवाद यह दिखाता है कि स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सुरक्षा कितनी कमजोर है. टेली-कंसल्टेशन के लिए डॉक्टरों को बहुत कम भुगतान और कॉल मिस होने पर जुर्माने जैसे नियम बताते हैं कि कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म इलाज को नहीं, बल्कि मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं. साल के अंत में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ पर हुई बहस से यह संकेत मिला कि अब काम और निजी जीवन की सीमाओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है. भले ही यह कानून तुरंत सभी स्वास्थ्यकर्मियों को सुरक्षा न दे, लेकिन संसद में इसकी चर्चा यह दिखाती है कि काम के दबाव को लेकर सोच बदल रही है.


2026 में किस बात की असली परीक्षा होगी


पूरे साल एक ही तरह की चिंताएँ बार-बार सामने आती रहीं-लोग जिस हवा में सांस लेते हैं, जो खाना खाते हैं, और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मौजूद जोखिम. इन खतरों से निपटने की ज़िम्मेदारी ज़्यादातर आम लोगों और परिवारों पर डाल दी गई. इसी के साथ यह भी साफ़ हुआ कि स्वास्थ्य व्यवस्था को संभालने वाला कामकाजी वर्ग एक तरफ़ कमी से जूझ रहा है और दूसरी तरफ़ आसानी से नज़रअंदाज़ भी किया जा रहा है. वहीं, स्वास्थ्य ऐसा क्षेत्र बना रहा जहाँ पूँजी, तकनीक और कूटनीति तेज़ी से आगे बढ़ती रहीं.
2026 की ओर देखते हुए सवाल यह नहीं है कि भारत नई स्वास्थ्य योजनाएँ शुरू करेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह पुरानी कमियों को दूर कर पाएगा. हवा की गुणवत्ता, जंक फूड पर नियम, मेडिकल शिक्षा और डिजिटल स्वास्थ्य जैसी योजनाएँ पहले से मौजूद हैं. असली परीक्षा यह होगी कि क्या ये योजनाएँ सिर्फ़ कागज़ी घोषणाओं से आगे बढ़कर लोगों के लिए सचमुच सुरक्षा का काम करेंगी. अगर 2026 के अंत में फिर से ‘रीवाइंड’ किया गया, तो उम्मीद यही होगी कि वही समस्याएँ दोहराई न जाएँ और स्वास्थ्य व्यवस्था भरोसे, नियमों और रोज़मर्रा की सुरक्षा पर टिकी हो.


के.एस. उपलब्ध गोपाल ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (Observer Research Foundation) में हेल्थ इनिशिएटिव के साथ एसोसिएट फ़ेलो हैं.

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