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दुनिया की राजनीति में इन दिनों एक नया शब्द गूंज रहा है- ‘जी-2’, यानी अमेरिका और चीन की संभावित साझेदारी. ट्रंप ने बुसान में शी जिनपिंग से मुलाकात को इसी नाम से जोड़कर इसे बड़े बदलाव का संकेत बना दिया लेकिन क्या दो महाशक्तियाँ सच में दुनिया की दिशा तय कर सकती हैं या यह सिर्फ राजनीति का एक और शोर है?
मौजूदा दौर में किसी भी वैश्विक चर्चा का ज़िक्र होते ही सबसे पहले जी-2 (दो देशों का समूह) के बीच भू-राजनीतिक समझौते का ध्यान आता है. ये ना सिर्फ पुराने विचार की याद दिलाता है बल्कि एक आगामी बदलाव की ओर इशारा भी करता है. पहले जी-2 का नाम आते ही सोवियत संघ और अमेरिका की याद आती थी, अब सोवियत संघ की जगह चीन ने ले ली है. हालांकि, वर्तमान विश्व की दो सबसे बड़ी शक्तियों, चीन और अमेरिका के बीच इसे लेकर कोई समन्वित कूटनीतिक घोषणा से नहीं हुई है. इसके बजाए, ये शब्द अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक सोचे-समझे संदेश के माध्यम से फिर से सामने आया. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा की कि “जी-2 देश जल्द ही मीटिंग कर सकते हैं”. ट्रंप के इस बयान को एक सामान्य बयान मानने की बजाए एक रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए. दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में शी जिनपिंग के साथ मुलाकात को ट्रंप ने 'जी-2' देशों के बीच बातचीत कहा. ऐसा कहकर ट्रंप ने इसे वैश्विक व्यवस्था में एक संभावित बदलाव के तौर पर पेश किया. ट्रंप इस बयान के ज़रिए ये कहना चाह रहे थे कि अब दुनिया में मौजूदा अनिश्चितता के बीच अमेरिकी और चीन में ही वैश्विक व्यवस्था को नया आकार देने की क्षमता है.
ट्रंप के इस ऐलान के बाद हुआ बुसान शिखर सम्मेलन किसी ठोस, संरचनात्मक बदलाव की बजाए नाटकीय प्रदर्शन और लेन-देन संबंधी समझौते ज़्यादा दिखे. चीन ने बड़े पैमाने पर अमेरिकी सोयाबीन खरीद को फिर से शुरू करने के लिए सहमति जताई, इससे ट्रंप के कृषि आधार को लाभ होगा. दूसरी तरफ, अमेरिका ने चीन को कुछ चुनिंदा चीजों पर शुल्क में राहत की पेशकश की. इसके अलावा कुछ उच्च-स्तरीय तकनीकी निर्यात नियंत्रणों पर लचीलापन दिखाने का संकेत दिया. वहीं चीन ने अमेरिकी उद्योगों के लिए फेंटानाइल रसायन और रेअर अर्थ धातुओं की आपूर्ति पर सहयोग का भी वादा किया. हालांकि, इन घोषणाओं के अलावा, बुसान शिखर सम्मेलन से कोई नई संस्थागत प्रतिबद्धता, सिद्धांत या संघर्ष-प्रबंधन तंत्र सामने नहीं आया. ट्रंप जिस तरह की राजनीति करते हैं, उसी तरह की चीजें इस शिखर सम्मेलन में सामने आईं. किसी दीर्घकालिक समाधान की बजाए यहां हुए एलान पहले से तय समझौते लग रहे थे.
“ट्रंप के इस बयान को एक सामान्य बयान मानने की बजाए एक रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए.”
जी-2 के विचार में एक ट्रंपियन ट्विस्ट है. ट्रंप की घोषणा के बारीकियों को समझने के लिए हमें 2005 में वापस जाना होगा, जब अर्थशास्त्री सी. फ्रेड बर्गस्टेन ने पहली बार जी-2 का विचार पेश किया. बर्गस्टेन ने इसे 'दो देशों का कॉकस' कहा. आसान शब्दों में इसे वैश्विक आर्थिक मुद्दों पर अमेरिका-चीन समन्वय का एक तंत्र कहा जा सकता है. बर्गस्टेन ने जी-2 का विचार तब पेश किया था, जब चीन उभर रहा था और वैश्विक असंतुलन बढ़ रहा था. बर्गस्टेन ने लिखा कि अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली दो आर्थिक दिग्गजों के सहयोग के बिना अपने आप को स्थिर नहीं कर सकती. उनका प्रस्ताव विचारधारात्मक होने के बजाए व्यावहारिक था. इसमें ना तो किसी राजनीतिक गुट की बात थी, ना ही कोई बड़ा गठबंधन. बर्गस्टेन के द्वारा दिया गया जी-2 का विचार एक कार्यात्मक व्यवस्था थी, जो वित्तीय असंतुलन से लेकर वैश्विक व्यापार अस्थिरता जैसे संकटों का समाधान करने में सक्षम हो. 2008–2009 की वैश्विक मंदी के दौरान इस विचार को और तेज़ी मिली, क्योंकि नीति निर्माता निजी तौर पर ये स्वीकार करने लगे कि अमेरिका और चीन का सहयोग वैश्विक विकास को मज़बूत करने के लिए ज़रूरी था. हालांकि, 2010 के दशक में जैसे-जैसे भू-राजनीतिक अविश्वास गहरा हुआ, ये अवधारणा मुख्यधारा से गायब हो गई. अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता और टकराव ने जी-2 के विचार को पीछे धकेल दिया. अब ट्रंप द्वारा फिर से जी-2 शब्द का इस्तेमाल करना महत्वपूर्ण है. इसके पीछे एक ऐतिहासिक विचार है, जो अमेरिका की सहयोग की आशा को उसकी स्वघोषित विशिष्टता के साथ जोड़ता है.
चीन की ओर ट्रंप के स्पष्ट झुकाव के बावजूद, वो वैश्विक मंच पर अपनी जी-2 घोषणाओं से मनमाफिक लक्ष्य हासिल करने में सफल नहीं हो पाए. ट्रंप का बयान सिर्फ बीते वक्त को याद करने वाला नहीं, बल्कि जानबूझकर दिया गया संकेत है. ट्रंप इस बात को ऐसे पेश करना चाहते हैं, जिससे उन्हें एक नए विश्व व्यवस्था के निर्माता के रूप में देखा जाए. ट्रंप के लिए, बुसान सम्मेलन एक ऐसा मंच था, जिसका उद्देश्य अपने राजनीतिक आधार को घर लौटकर जीत का संकेत देना था. ट्रंप अपने समर्थकों को ये दिखाना चाहते थे कि वो बुसान से बड़ी जीत हासिल कर वापस आए हैं. इसके बाद, जी-2 का प्रस्ताव भी एक ऐसा कदम था, जिससे ट्रंप ये दिखा सकें कि जटिल बहुपक्षीय व्यवस्था से दूर जाने का वक्त आ गया है. ट्रंप ऐसा वैश्विक शासन चाहते हैं, जहां द्विध्रुवीय दुनिया में वो प्रभुत्व हासिल कर सकें.
जी-2 का विचार चीन को लुभाता भी है, लेकिन सतर्क भी करता है. प्रतीकात्मक रूप से ये विचार चीन को वैश्विक समानता देता है, जिसका उसे लंबे समय से इंतज़ार था. चीन चाहता था कि, उसे भी अमेरिका की टक्कर की महाशक्ति माना जाए. हालांकि, इसके साथ ही चीन की ये भी कोशिश है कि, वो बहुत ज़्यादा लालची न लगे, विशेष रूप से अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंधों और संरचनात्मक प्रतिबंधों को देखते हुए, वो सतर्कता बरत रहा है. इसलिए ये आश्चर्य की बात नहीं है कि, बुसान में चीन का व्यवहार संयमित दिखाई दिया, जबकि चीन की कूटनीति में उसकी शक्ति का असर दिखने लगा है. बुसान में दोनों महाशक्तियों ने एक दूसरे को बराबरी में रखकर बातचीत की, टकराव वाले मुद्दों को नजरअंदाज किया. इसने भी वैश्विक व्यवस्था से जुड़े निर्णय लेने में चीन की स्थिति को और मज़बूत किया. फिर भी, शी जिनपिंग के लिए बुसान एक आकर्षण था, क्योंकि ये आर्थिक विकास का रास्ता प्रदान करता है. अगर अमेरिका ने टैरिफ घटा दिए, तो चीन तकनीकी और कृषि सम्बंधित सुनिश्चित रास्तों के साथ-साथ खनिज अनुबंध भी सुरक्षित कर लेता. ऐसा होने पर चीन का घरेलू बाजार स्थिर हो जाता, क्योंकि अभी वो घरेलू मोर्चे पर कई आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है.
“बुसान शिखर सम्मेलन से कोई नई संस्थागत प्रतिबद्धता, सिद्धांत या संघर्ष-प्रबंधन तंत्र सामने नहीं आया.”
हालांकि, चीन ने जी-2 को एक व्यवहार्य संस्थागत पुनर्गठन के रूप में स्वीकार ना करने का फैसला सोच-समझ कर किया है. चीन के आधिकारिक बयान में “मुख्य देशों के रूप में जिम्मेदारी” और “परस्पर लाभकारी सहयोग” की बात कही गई है. ऐसी भाषा से बचा गया है, जो जो क्षेत्रीय विभाजन या संस्थागत द्विध्रुवीयता की ओर इशारा करती. शायद चीन ज़्यादा जिम्मेदारी, निगरानी और अपेक्षाओं के साथ आने वाली अधिक केंद्रीकरण के ख़तरों को समझता है, और इसके लिए वो अभी तैयार नहीं हो सकता. ऐतिहासिक रूप से भी देखें तो, चीन को ज़्यादा लाभ तब हुए हैं, जब अस्पष्टता की स्थिति रही. अमेरिका के साथ चीन कोई भी पहल तब करता है, जब उसे फायदा हो, जबकि ग्लोबल साउथ के साथ चीन अपनी समानांतर आर्थिक साझेदारियां विकसित करना जारी रखता है.
अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली में बदलाव हो रहा है, और ये हकीक़त आज पहले से कहीं ज़्यादा प्रासंगिक है. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं टूट रही हैं, आर्थिक संरक्षणवाद बढ़ रहा है, और वैश्विक संस्थाएं दबाव में हैं. ऐसे में जी-2 की पुनर्जीवित करने की ट्रंप की कोशिश एक दीर्घकालिक रणनीति की बजाए द्विपक्षीय शॉर्टकट ज़्यादा लग रही है. ट्रंप ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जिसमें कम से कम अमेरिका के प्रभुत्व को कायम रखा जा सके. फिर भी, एक वास्तविक मूल्यांकन से पता चलता है कि ये अवधारणा संरचनात्मक रूप से नाजुक है, क्योंकि इसमें कई विरोधाभास हैं. जी-2 का विचार अमेरिका-चीन संबंधों में ताइवान, उन्नत प्रौद्योगिकी पर निर्भरता, उच्च व्यापार, आर्थिक एवं सैन्य क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा जैसे गहरी द्विपक्षीय विरोधाभासों को नहीं सुलझा सकता. साझा रणनीतिक उद्देश्य के नज़रिए से भी देखें, तो आज अमेरिका और चीन के बीच द्विपक्षीय गतिशीलता का कोई संस्थागत आधार नहीं है. अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप प्रशासन अपने पुराने सहयोगियों और भागीदारों के प्रति भी उदार नहीं रहा है. चीन के साथ सहयोग पर ज़ोर देते हुए ट्रंप फिलहाल इस अनुमानित धारणा के साथ आगे बढ़ रहे हैं कि, गठबंधनों का महत्व कम है. दूसरी ओर, चीन भी ये नहीं दिखाना चाहता कि उसी वैश्विक वैधता अमेरिका के रहमोकरम पर निर्भर है. कुछ क्षेत्रों में तो चीन अब अमेरिका से भी आगे निकल चुका है.
हालांकि, ट्रंप ने बुसान सम्मेलन की तारीफ की, लेकिन चीन ने सतर्क दृष्टिकोण अपनाया, लेकिन दुनिया के ज्यादातर देशों ने जी-2 के इस तमाशे को संदेह की नजर से देखा. एशिया और यूरोप में अमेरिकी सहयोगियों ने इस कदम को संभावित रूप से अस्थिर करने वाला माना, खासकर आर्थिक दृष्टिकोण से. अगर अमेरिका पुराने गठबंधनों की तुलना में द्विपक्षीयता को प्राथमिकता देता है, तो इससे बहुपक्षीय संस्थागत ढांचों के कमज़ोर होने का ख़तरा है. उन क्षेत्रों के लिए तो ज़्यादा ही ज़ोखिम है, जो पहले से ही दबावपूर्ण चीनी कूटनीति से जूझ रहे हैं. इसका एक उदाहरण इंडो-पैसेफिक क्षेत्र है, यहां अमेरिका के सहयोगी देशों के लिए, अमेरिका और चीन के बीच कोई भी द्विपक्षीय समझौता नकारात्मक परिणाम लेकर आएगा. इंडो-पैसेफिक क्षेत्र में, इस तरह का बदलाव जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के बीच स्थापित गठबंधन नेटवर्क को बाधित करने का ज़ोखिम रखता है. इससे क्षेत्रीय संतुलन की विश्वसनीयता भी कमज़ोर हो सकती है. बहुपक्षवाद के युग में, जी-2 संस्थागत अधिकारों को कम कर सकता है. महत्वपूर्ण फैसले लेने में अमेरिका और चीन की ताक़त बढ़ जाएगी और बहुपक्षीय संस्थाओं की शक्ति जी-2 देशों के सामने गिरवी रखने का ख़तरा पैदा हो जाएगा. आर्थिक दृष्टिकोण से भी, वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच लेन-देन पर आधारित आपूर्ति श्रृंखलाएं इंडो-पैसिफिक देशों के लिए प्रतिकूल साबित हो सकती है. इससे भारत जैसे उभरते बाजारों में औद्योगिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. ग्लोबल साउथ के देशों के भीतर भी, अमेरिका-चीन गठजोड़ नई तरह का निर्भरता का संकट पैदा कर सकता है. इन देशों के सामने किसी एक को चुनने की मज़बूरी पैदा हो जाएगी.
“जी-2 का विचार अमेरिका-चीन संबंधों में गहरी द्विपक्षीय विरोधाभासों को नहीं सुलझा सकता.”
भारत के नज़रिए से ये बहुत महत्वपूर्ण है. जी-2 की घोषणा ने लंबे समय से मौजूद चिंताओं को और मज़बूत किया. इसमें कोई शक नहीं कि भारत तेजी से आर्थिक विकास कर रहा है, इसके बावजूद कुछ ज़ोखिम बने हुए हैं. अगर अमेरिका और चीन वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए द्विपक्षीय शॉर्टकट अपनाते हैं, तो भारत को किनारे कर दिया जाएगा. इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और महत्वपूर्ण खनिजों में भारत काफ़ी हद तक चीनी आयात पर निर्भर है. ऐसे में अगर आपूर्ति श्रृंखला को लेकर भारत को शामिल किए बिना कोई फैसला लिया जाता है तो, भारत के लिए बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है. चीन पर प्रौद्योगिकी दबाव को कम करने की ट्रंप की जल्दबाजी भारत की उस महत्वाकांक्षा को भी कमजोर करती है, जिसमें वो खुद को एक विश्वसनीय वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना चाह रहा है. रणनीतिक रूप से, अमेरिका-चीन में गर्मजोशी भारत की इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के समीकरणों को जटिल बनाती है. इसमें क्वाड के भविष्य के रोडमैप योजना में अनिश्चितता शामिल है.
“अगर अमेरिका और चीन वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए द्विपक्षीय शॉर्टकट अपनाते हैं, तो भारत को किनारे कर दिया जाएगा.”
अमेरिका और चीन के बीच जी-2 समझौते की व्यावहारिकता पर बहस और विवाद हो सकता है, लेकिन ट्रंप की कार्रवाईयों ने बाकी देशों में एक असंतोष की भावना तो पैदा कर ही दी है. याल्टा सम्मेलन का युद्धोत्तर प्रभाव का विभाजन, शीत युद्ध की द्विध्रुवीयता, और 1970 के दशक के तेल संकट ने द्विध्रुवीय विश्व के ज़ोखिमों को दिखाया है. ऐसे में जी-2 जैसी प्रस्तावित रणनीतिक साझेदारी ये दिखाती है कि, महाशक्तियों के बीच होने वाले किसी भी समझौते में छोटे देशों के हितों की अनदेखी की जाती है. हालांकि, किसी भी मजबूत जी-2 दृष्टिकोण को दीर्घकालिक आर्थिक परिवर्तनों के साथ संतुलित करना ज़रूरी है. 2050 तक, वैश्विक शक्ति की संरचना राजनीतिक दृष्टिकोण से कम और आर्थिक ताकत, जनसांख्यिकी, तकनीकी क्षमता और बाज़ार आकार में मौलिक संरचनात्मक परिवर्तनों से ज़्यादा प्रभावित होगी. पीडब्ल्यूसी प्रोजेक्ट्स (चित्र-1) के अनुसार, 2020 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा, भारत खरीद शक्ति समानता (पीपीपी) के हिसाब से दूसरे स्थान पर होगा, जबकि अमेरिका तीसरे स्थान पर गिर सकता है. गोल्डमैन सैक्स द्वारा किए गए समान मॉडलिंग भी यही क्रम सुझाते हैं, जो एक स्थायी जी-2 की बजाए एक उभरती हुई त्रिध्रुवीय आर्थिक संरचना की संभावना को दिखाते हैं.
स्रोत: PWC
ये अनुमान दिखाते हैं कि अमेरिकी-चीन की द्विध्रुवीय दुनिया वाली व्यवस्था एक असंतुलित अवधारणा है. दुनिया अब इस व्यवस्था से आगे बढ़ चुकी है. 21वीं सदी में चीन का उदय निसंदेह एक महत्वपूर्ण घटना है, लेकिन पिछले कुछ समय से चीन की विकास की रफ्तार धीमी हो रही है. चीन की जनसांख्यिकी में गिरावट, उत्पादकता संबंधी चिंताएं, और ज़रूरत से ज़्या औद्योगिक क्षमता उसकी प्रभुत्व की राह में रुकावटें पैदा करेंगी. जहां तक अमेरिका की बात है, वो अभी भी नवाचार और पूंजी बाज़ार का अगुआ देश है, लेकिन बूढ़ी होती जनसंख्या, राजनीतिक विखंडन, और वैश्विक प्रतिबद्धताओं का रणनीतिक बोझ उठाना उसके लिए मुश्किल साबित हो रहा है. इसके विपरीत, भारत की प्रगति एक युवा कार्यबल और बढ़ते उपभोग पर आधारित है. सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल शासन जैसे उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में भारत तेज़ी से विकास कर रहा है. इस संदर्भ में देखें तो, बुसान में जी-2 का उभार सिर्फ एक क्षण अल्पकालिक संक्रमण के दौर को दिखाता है, ये नए वैश्विक व्यवस्था के भविष्य के लिए किसी नींव की रूपरेखा नहीं है.
विवेक मिश्रा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में डिप्टी डायरेक्टर हैं.
प्रकृति चौधरी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.
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Vivek Mishra is Deputy Director – Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. His work focuses on US foreign policy, domestic politics in the US, ...
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Prakreeti Chaudhary is a Research Intern at the Observer Research Foundation. ...
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