कुर्दों को दशकों तक हाशिए पर रखा गया लेकिन अब वो शांति की पहल, बहुलतावाद और रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से पश्चिम एशिया के राजनीतिक भविष्य को फिर से तय करने में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं.
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इस साल वसंत ऋतु के दौरान 11 दिनों की छोटी सी अवधि में कुर्द समुदाय ने दिखा दिया कि आज के समय में उन्हें पश्चिम एशिया में प्रमुख किरदार के रूप में गिना जा सकता है. ध्यान देने की बात है कि कुर्दों के नेता अब्दुल्ला ओकलान के द्वारा 27 फरवरी 2025 को 'शांति और लोकतांत्रिक समाज के लिए अपील' के साथ-साथ कुर्दों के कमांडर मज़लूम आबदी के द्वारा 10 मार्च 2025 को सीरिया की अंतरिम सरकार के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर एक ऐसे क्षेत्र में आशा की किरण है जो युद्ध और अस्थिरता से परेशान है. ये न केवल लगातार युद्ध और संकट से जुड़ी राजनीतिक बयानबाज़ी की पृष्ठभूमि में, बल्कि 5 करोड़ से ज़्यादा कुर्दों को हाशिए पर रखने और उनके नरसंहार की 100 साल पुरानी नीति के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है. ओकलान की अपील और सीरिया पर इसका प्रभाव, इस क्षेत्र में जारी मूलभूत बदलाव को दिखाता है. इसलिए ये समझना महत्वपूर्ण है कि कैसे तुर्किए, सीरिया, इराक़ और ईरान में कुर्द समुदाय अक्सर अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय किरदारों के लिए ज़बरन अदृश्य होने की स्थिति से पसंदीदा साझेदार के रूप में बदलने में सफल हुआ है.
कुर्दों को वंचित करके पश्चिम एशिया को जानबूझकर अस्थिर रखा गया
पश्चिम एशिया के लिए प्रथम विश्व युद्ध क्षेत्रीय शक्ति का दूरगामी नुकसान पहुँचाया. इसकी वजह से ब्रिटेन और फ्रांस का वर्चस्व कायम होने में मदद मिली. साइक्स-पाइकोट समझौता (1916), सेवर्स की संधि (1920) और लोसाने की संधि (1923) ऑटोमन साम्राज्य के दर्जन से ज़्यादा देशों में विभाजित होने में प्रमुख मील के पत्थर थे. सत्ता पर पारंपरिक ऑटोमन-तुर्क के दावे काफी हद तक एनेटोलिया और कुर्दिस्तान के उत्तरी हिस्से तक सीमित थे. वहीं अरब जगत छोटे-छोटे देशों के समूह में बंट गया. पश्चिम एशिया की नई व्यवस्था में ईरान ने भौगोलिक रूप से एकीकृत स्थान बनाए रखा लेकिन राजनीतिक रूप से सीमित था. इस तरह तुर्कों, अरबों और फारस की खाड़ी के लोगों—ऐतिहासिक रूप से तीन प्रमुख किरदार—ने 20वीं सदी के पश्चिम एशिया में जगह बनाई, भले ही फ्रांस-ब्रिटेन के हितों ने इसे सख्ती से तय किया.
पश्चिम एशिया के लिए प्रथम विश्व युद्ध क्षेत्रीय शक्ति का दूरगामी नुकसान पहुँचाया. इसकी वजह से ब्रिटेन और फ्रांस का वर्चस्व कायम होने में मदद मिली. साइक्स-पाइकोट समझौता (1916), सेवर्स की संधि (1920) और लोसाने की संधि (1923) ऑटोमन साम्राज्य के दर्जन से ज़्यादा देशों में विभाजित होने में प्रमुख मील के पत्थर थे.
दूसरी तरफ कुर्दों को न सिर्फ आधिकारिक दर्जे से वंचित किया गया बल्कि उनकी मातृभूमि को तुर्किए, सीरिया, इराक़ और ईरान में बांट दिया गया. इस पुनर्गठित क्षेत्रीय व्यवस्था में नए-नए बने तुर्क, अरब और फारसी राष्ट्र-राज्यों को काबू में रखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के द्वारा कुर्दों को दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया.
20वीं सदी की शुरुआत में कुर्दिश समाज की सामंती और जनजातीय संरचना ने राष्ट्रीय एकता में रुकावट डाली और उन्हें औपनिवेशिक ताकतों की फूट डालो और राज करो की चाल के प्रति कमज़ोर बना दिया. इसके बावजूद, इन्हीं बातों ने हैसियत की कमी और नरसंहार के विरुद्ध एक दृढ़ प्रतिरोध को भी सहारा दिया. तुर्किए गणराज्य—जो नए पश्चिम एशिया में यूरोप के हितों को लागू करने/क्रियान्वयन में मुख्य भूमिका निभा रहा था- पहला देश था जिसने कुर्दों के प्रतिरोध का सामना किया. नए देश बने तुर्की के कुर्द समुदाय वाले क्षेत्र में शेख़ सईद विद्रोह (1925), अग्री विद्रोह (1926, 1927, 1930) और देरसिम विद्रोह (1937/1938) उस समय की ताज़ा स्थापित यथास्थिति के ख़िलाफ़ वास्तव में लगातार चली कुर्द बगावत के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक हैं. तुर्किए ने इसका जवाब क्रूर सैन्य अभियानों, व्यवस्थित तरीके से निर्वासन के माध्यम से कुर्दिश लोगों को सामूहिक सज़ा और उनके सामाजिक नेताओं को फांसी देकर दिया. कई दशकों तक ज़बरदस्ती का सहारा लेकर चुप्पी बनाए रखी गई जबकि कुर्दों को वंचित रखने और उन्हें वोट का अधिकार न देने की समस्या बनी हुई थी. इसी तरह का नीतिगत पैटर्न इराक़, सीरिया और ईरान में भी सामने आया जिससे वहां कुर्दों की तरफ से नई बगावत की संभावना लगातार बनी रही.
स्थिर पश्चिम एशिया के लिए कुर्दों को मान्यता बुनियाद है
व्यवस्थात्मक युद्ध, निष्कासन और आत्मसात्करण (एसिमिलेशन) की एक शताब्दी के बावजूद कुर्द आबादी पश्चिम एशिया की राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिशीलता में एक मज़बूत ताकत बनी हुई है. इस सामर्थ्य की जड़ में इस क्षेत्र में कुर्दों का सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक महत्व है. इसलिए कुर्द लोगों की वर्तमान भूमिका और महत्वाकांक्षा की व्याख्या करने के लिए उनकी ऐतिहासिक आत्म-धारणा को समझना महत्वपूर्ण है.
कुर्दों ने हमेशा पड़ोस में रहने वाले तुर्किए, ईरान और अरब समाज के साथ काफी हद तक शांतिपूर्ण संबंध बरकरार रखे हैं.
कुर्द अपनी सांस्कृतिक जड़ें लगभग 12,000 साल पहले ऊपरी मेसोपोटामिया में हुई कृषि क्रांति से जोड़ते हैं. नवपाषाणकालीन उपलब्धियां- जैसे कि कृषि, पशुपालन, ग्रामीण संस्कृति- और मातृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था आज भी कुर्दों की संस्कृति की विशेषता बनी हुई हैं. कुर्दिस्तान के पहाड़ी इलाके न केवल उपजाऊ मिट्टी और पर्याप्त जल स्रोत बल्कि विदेशी ताकतों के द्वारा हमले की स्थिति में पीछे हटने के लिए रणनीतिक जगह भी प्रदान करते थे. व्यापार के महत्वपूर्ण रास्तों पर अपनी प्रमुख स्थिति, समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों और भू-रणनीतिक स्थिति के कारण कुर्दिस्तान ने विदेशी शक्तियों की तरफ से कई हमलों को झेला है. पांच हज़ार वर्ष पहले सुमेरियन सभ्यता के लोग कुर्दों के बारे में पहले से ही जानते थे और उनका हवाला ‘कुर्ती’ या ‘पहाड़ों के लोग’ के रूप में देते थे. ‘कुर्दिस्तान’ शब्द का प्रयोग लगभग 1,000 साल पहले सेल्जुक युग से होता आ रहा है. पश्चिम एशिया में दूसरे लोगों और धार्मिक समूहों के साथ अपने करीबी संबंधों के कारण कुर्दों ने इस क्षेत्र में हमेशा एक प्रमुख भूमिका निभाई है. कुर्दिस्तान में भी कुर्दों के साथ-साथ आर्मीनियाई, असिरियाई, तुर्क या अरब भी मिल सकते हैं जबकि ईसाई, सुन्नी, शिया, यज़ीदी, अलेवी या यहूदी समूह भी वहां रहते हैं. कुर्दों ने हमेशा पड़ोस में रहने वाले तुर्किए, ईरान और अरब समाज के साथ काफी हद तक शांतिपूर्ण संबंध बरकरार रखे हैं.
पहले विश्व युद्ध के बाद कुर्दों को वंचित रखने और उनके उत्पीड़न/नरसंहार की नीति ने पूरे क्षेत्र की अस्थिरता की नींव रखी. इस प्रयास में तुर्किए गणराज्य ने अग्रणी भूमिका निभाई. विशेष रूप से 1952 में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नेटो) में शामिल होने के बाद तुर्किए ने अपने भू-रणनीतिक महत्व का फायदा उठाकर पश्चिमी देशों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए. नेटो की अपनी सदस्यता का दुरुपयोग करते हुए तुर्किए ने कथित विरोधियों, विशेष रूप से कुर्द आबादी, के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन हासिल किया. राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकार की कुर्दों की मांग को अक्सर वैश्विक स्थिरता और सुरक्षा के लिए ख़तरे के रूप में पेश किया गया. इस तरह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति तक कुर्दों की पहुंच को रोका गया. लेकिन 70 के दशक से कुर्दों ने क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय- दोनों स्तरों पर पश्चिम एशिया में अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए पर्याप्त प्रगति हासिल की है. उस समय से कई घटनाओं- विशेषकर अब्दुल्ला ओकलान के द्वारा 1978 में कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (PKK) की स्थापना- ने व्यापक राजनीतिक चेतना, विशेष रूप से कुर्द महिलाओं के बीच, को प्रेरित किया है. इन घटनाक्रमों ने कुर्दों की आत्म-छवि और उनके बारे में अंतर्राष्ट्रीय धारणा में नाटकीय बदलाव लाने में भी योगदान दिया है. हाल के दिनों में कुर्दों के आत्म-रक्षा बलों के द्वारा सीरिया और इराक़ में इस्लामिक स्टेट (IS) के ख़िलाफ़ सफल लड़ाई ने इस सकारात्मक परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है.
लोकतांत्रिक पश्चिम एशिया में अपनी जगह हासिल करने के लिए कुर्द तैयार हैं
कुर्दों के लिए नई भूमिका का पहला संकेत 90 के दशक और नई शताब्दी के शुरुआती वर्षों के दौरान स्पष्ट हुआ. उस समय से तुर्किए और सीरिया के कुर्दों ने तेज़ी से पश्चिम एशिया के पुनर्गठन में ख़ुद को एक प्रमुख किरदार के रूप में स्थापित कर लिया है. ‘अरब स्प्रिंग’ के बाद सीरिया के कुर्दों ने दूसरे जातीय और धार्मिक समूहों के साथ मिलकर एक समावेशी राजनीतिक प्रणाली- डेमोक्रेटिक ऑटोनोमस एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ नॉर्थ एंड ईस्ट सीरिया (DAANES) जो सीरिया के एक स्वायत्त क्षेत्र है- की स्थापना की.
आज न केवल तुर्किए और सीरिया बल्कि पूरा पश्चिम एशिया एक पुनर्गठन की प्रक्रिया से गुज़र रहा है.
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले ने इस क्षेत्र के राजनीतिक संतुलन को महत्वपूर्ण रूप से बदल दिया है. ईरान और रूस जैसे किरदारों ने अपना प्रभाव काफी हद तक कम होते देखा है जबकि तुर्किए के इस्लामिक छद्म गठबंधन पर दबाव बढ़ गया है. इस बीच, अब्राहम अकॉर्ड और भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (IMEC) जैसे क्षेत्रीय पहलों ने तुर्किए के आर्थिक और भू-राजनीतिक असर को कम कर दिया है. आज के समय में तुर्किए पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक बदलाव को समझता है और इसलिए उसने हाल के दिनों में अपनी क्षेत्रीय नीति को फिर से दिशा देने के लिए कदम उठाए हैं. इसका उदाहरण कुर्द आबादी के साथ उसके संबंध हैं. अब्दुल्ला ओकलान की ऊपर बताई गई अपील और मज़लूम आबदी की पहल को इसी संदर्भ में समझा जा सकता है.
तुर्किए के इमराली द्वीप में बनी जेल में 26 साल तक कैद में रहने के बाद कुर्दों के नेता अब्दुल्ला ओकलान ने फरवरी के अंत में सार्वजनिक रूप से एक अपील की. इस तरह उन्होंने तुर्किए में कुर्दों से जुड़े सवाल के राजनीतिक समाधान की नींव रखी. ओकलान ने PKK को भंग करने और अपना हथियार सौंपने को कहा और इसके साथ-साथ उन्होंने ये मांग भी की कि तुर्किए की सरकार राजनीतिक और कानूनी सुधारों के ज़रिए लोकतंत्र की प्रक्रिया को तुरंत शुरू करने की पहल करे. ये साहसी राजनीतिक पहल तुर्किए, इराक़ और सीरिया में कुर्द आबादी के ख़िलाफ़ तुर्किए के युद्ध, जो 2015 से तेज़ हो रहा है, का एक यथार्थवादी शांति का विकल्प पेश करने में सफल रही. इसके नतीजतन पिछले कई महीनों से तुर्किए में एक नए लोकतांत्रिक संविधान, अब्दुल्ला ओकलान एवं हज़ारों दूसरे राजनीतिक कैदियों की रिहाई और कुर्दों के ख़िलाफ़ सैन्य अभियानों की समाप्ति को लेकर गहन चर्चा चल रही है.
सीरिया में कुर्द- जो DAANES में बड़ी ताकत हैं और उसका आत्मरक्षा बल सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्स (SDF) है- अब देश की एकता, स्थिरता और लोकतंत्र के हिसाब से प्रमुख ताकत हैं. मार्च की शुरुआत में जिस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए, वो असद सरकार के पतन के बाद देश में एक समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया के लिए सबसे यथार्थवादी आधार प्रतीत होता है. न तो दमिश्क की नई सरकार और न ही तुर्किए जैसे अनेक बाहरी किरदार इस स्थिति में हैं कि वो देश में एक स्थायी पुनर्गठन कर सकें. इसके परिणामस्वरूप DAANES की विवेकपूर्ण, समावेशी और शांतिपूर्ण राजनीतिक शैली देश के लिए आवश्यक है. इस प्रकार ये सीरिया को और टुकड़ों में बांटने और युद्ध से रोकने का उद्देश्य रखने वाले सभी सीरियाई, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हितधारकों के लिए मुख्य मध्यस्थ बन गया है. आज न केवल तुर्किए और सीरिया बल्कि पूरा पश्चिम एशिया एक पुनर्गठन की प्रक्रिया से गुज़र रहा है. कुर्दों को इस संदर्भ में प्रमुख किरदारों में से एक के रूप में अपनी भूमिका का पता है. अपनी गहरी ऐतिहासिक पहचान/ख़ुद की समझ, लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और मज़बूत राजनीतिक संगठन के आधार पर कुर्द एक स्थिर, लोकतांत्रिक और समृद्ध पश्चिम एशिया में अपना स्थान हासिल करने के लिए तैयार हैं. वो एक लोकतांत्रिक क्षेत्रीय व्यवस्था बनाने के लिए प्रतिबद्ध सभी क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय किरदारों के साथ बातचीत करने के लिए तैयार हैं.
निलोफर कोक कुर्दिस्तान नेशनल कांग्रेस (KNK) की कार्यकारी परिषद की सदस्य हैं.
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Nilüfer Koç was born on March 10, 1969, in Ardahan, northern Kurdistan (Turkey). She came to Germany in 1976 and studied political science there at ...
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