आज की दुनिया में देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और वैश्विक मुद्दों पर सहमति पहले जितनी मजबूत नहीं रही. ऐसे दौर में यह समझना जरूरी है कि बहुपक्षवाद कैसे बदल रहा है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ मतभेदों के बावजूद सहयोग को कैसे बनाए रख सकती हैं.
आज की दुनिया में देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और वैश्विक मुद्दों पर सहमति भी पहले की तरह मजबूत नहीं रही है. ऐसी स्थिति में बहुपक्षवाद का भविष्य किसी एक महाशक्ति के वर्चस्व को फिर से स्थापित करने में नहीं है. इसके बजाय आवश्यकता ऐसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की है जो मतभेद और प्रतिस्पर्धा के माहौल में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकें. इन संस्थानों को इस तरह विकसित करना होगा कि वे विभिन्न देशों के हितों को संतुलित करते हुए संवाद और सहयोग के लिए मंच प्रदान करें. यदि वैश्विक संस्थाएँ विवादों के बावजूद समस्याओं के समाधान में भूमिका निभाती हैं, तो बहुपक्षवाद मजबूत बना रह सकता है और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अधिक स्थिर बन सकती है.
बहुपक्षवाद समाप्त नहीं हो रहा है; बल्कि उस पर लगातार चुनौती दी जा रही है. जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने जनवरी में चेतावनी दी थी-’वैश्विक समस्याओं का समाधान किसी एक शक्ति के आदेश देने से नहीं होगा और न ही दो शक्तियों द्वारा दुनिया को प्रतिद्वंद्वी प्रभाव क्षेत्रों में बाँट देने से.’ उनकी यह चेतावनी एक दुविधा को उजागर करती है: दुनिया को अभी भी साझा संस्थानों की आवश्यकता है, लेकिन बड़ी शक्तियां इस बात पर लगातार असहमत हैं कि इन संस्थानों को कौन आकार देगा, कौन-से नियम लागू होंगे और संप्रभुता किस हद तक सामूहिक नियंत्रण के लिए सीमित की जाएगी.
संस्थानों को इस तरह विकसित करना होगा कि वे विभिन्न देशों के हितों को संतुलित करते हुए संवाद और सहयोग के लिए मंच प्रदान करें. यदि वैश्विक संस्थाएँ विवादों के बावजूद समस्याओं के समाधान में भूमिका निभाती हैं, तो बहुपक्षवाद मजबूत बना रह सकता है और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अधिक स्थिर बन सकती है.
म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन से पहले अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ‘पुरानी दुनिया समाप्त हो चुकी है और हम भू-राजनीति के एक नए युग में जी रहे हैं,’ जिसमें सहयोगियों को अपनी भूमिका पर फिर से विचार करना होगा. लेकिन यह ‘नया युग’ उन्हीं संस्थानों के भीतर उभर रहा है जो शक्ति के एक अलग संतुलन के लिए बनाए गए थे. 1945 के बाद की वैश्विक व्यवस्था-विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और बाद में स्थापित विश्व व्यापार संगठन-ने उस समय के शक्ति संतुलन को संस्थागत रूप दिया था, जो आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से पूरी तरह मेल नहीं खाता. उभरती अर्थव्यवस्था और विकासशील देश क्रय-शक्ति के आधार पर वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 61 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं, फिर भी अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में उनके वोट, सीटों और एजेंडा-निर्धारण की शक्ति में केवल सीमित वृद्धि हुई है.
ये असंतुलन केवल पश्चिम और पूर्व के बीच का विभाजन नहीं हैं; वे स्वयं पश्चिम के भीतर बढ़ती दरारों को भी दिखाते हैं. यूरोपीय संघ दशकों के एकीकरण और युद्धोत्तर राजनीतिक परंपरा से प्रभावित है, जहाँ सामान्यतः बल प्रयोग की बजाय बातचीत, कानून और संस्थागत सीमाओं को प्राथमिकता दी जाती रही है. इसलिए यूरोप अक्सर शक्ति के उपयोग को अमेरिका से अलग दृष्टिकोण से देखता है. लेकिन संप्रभुता, प्रवासन, प्रौद्योगिकी विनियमन और रूस-चीन नीति को लेकर मतभेद दिखाते हैं कि पश्चिमी एकता को स्वाभाविक मान लेना उचित नहीं है. आज यूरोपीय संघ के भीतर साझा नीतियाँ बनाना कठिन हो गया है, क्योंकि कुछ सदस्य देश अधिक स्पष्ट भू-राजनीतिक रुख की मांग कर रहे हैं. व्यवहार में यह वही पुराना प्रश्न फिर सामने लाता है जिसे अक्सर हेनरी किसिंजर से जोड़ा जाता है-’यूरोप में मैं किसे फोन करूँ‘
‘पूर्व’ भी एक जैसा नहीं है. भारत और चीन की रणनीति अलग-अलग है और एशिया के देशों का चीन के प्रति रवैया भी भिन्न है. उदाहरण के लिए, वियतनाम अक्सर ऐसी नीति अपनाता है जिसमें वह एक तरफ सहयोग करता है और दूसरी तरफ संतुलन बनाए रखता है. फिलीपींस में भी चीन के प्रति नीति समय-समय पर बदलती रही है-राष्ट्रपति एक्विनो के समय कानून और अमेरिका के साथ गठबंधन पर जोर था, दुतेर्ते के दौर में चीन के प्रति नरम रुख दिखा, जबकि मार्कोस जूनियर के समय फिर से 2016 के दक्षिण चीन सागर फैसले और अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग पर जोर दिया गया. दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश इसी तरह संतुलित नीति अपनाते हैं, यानी वे किसी एक देश के साथ स्थायी रूप से नहीं जुड़ते बल्कि कई देशों के साथ संबंध बनाकर अपने हित सुरक्षित रखते हैं.
यूरोपीय संघ दशकों के एकीकरण और युद्धोत्तर राजनीतिक परंपरा से प्रभावित है, जहाँ सामान्यतः बल प्रयोग की बजाय बातचीत, कानून और संस्थागत सीमाओं को प्राथमिकता दी जाती रही है. इसलिए यूरोप अक्सर शक्ति के उपयोग को अमेरिका से अलग दृष्टिकोण से देखता है.
यदि शक्ति का वितरण बदल गया है, तो सहयोग की भाषा भी बदल गई है. अब व्यावहारिक चुनौती यह नहीं है कि अमेरिकी प्रभुत्व पर आधारित उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को फिर से बनाया जाए या दुनिया को बंद गुटों में बँट जाने दिया जाए. असली चुनौती यह है कि ऐसा बहुपक्षवाद विकसित किया जाए जो रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भी काम कर सके-संस्थानों को अवरुद्ध करने की प्रवृत्ति को कम करे और समस्या-समाधान के लिए अधिक अवसर प्रदान करे. इसका अर्थ है कि बहुपक्षवाद को इस धारणा पर नहीं बनाया जा सकता कि सभी देशों में सहमति होगी; बल्कि उसे प्रतिस्पर्धा के बीच भी चलने के लिए तैयार करना होगा. लक्ष्य आदर्श सामंजस्य नहीं, बल्कि ऐसे सुरक्षा-नियंत्रण तंत्र (गार्डरेल्स) बनाना है-जो गलत आकलन को कम करें, संवाद के रास्ते खुले रखें और संस्थानों के मूल कार्यों की रक्षा करें.
इस प्रकार एक प्रभावी बहुपक्षवाद को तीन काम एक साथ करने होंगे-वैधता बढ़ाना, कार्यक्षमता बनाए रखना और प्रतिस्पर्धा की तीव्रता को कम करना. भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि वैधता और प्रभावशीलता एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. इस वर्ष की शुरुआत में भारत-यूरोपीय संघ के संयुक्त वक्तव्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के सम्मान’ को साझा प्राथमिकता बताया और कहा कि समकालीन चुनौतियों से निपटने के लिए वैश्विक संस्थानों में सुधार आवश्यक है. वैधता अब केवल एक आदर्श नहीं रही; यह ठोस सवालों में दिखाई देती है. किसे सीट मिलती है, किसे वोट मिलता है और किसकी प्राथमिकताएँ एजेंडा तक पहुँचती हैं.
इस मुद्दे पर वैश्विक दक्षिण की आवाज़ लगातार मजबूत होती जा रही है. उदाहरण के लिए, अफ्रीकी संघ के एक हालिया बयान में कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के लगभग 80 वर्ष बाद भी 1.4 अरब आबादी और 55 देशों वाला अफ्रीका सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट से वंचित है-जो न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि परिषद की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है.
ब्रेटन वुड्स संस्थानों में भी वैधता की समस्या स्पष्ट रूप से दिखती है-जैसे कोटा और मतदान के सूत्र, कार्यकारी बोर्डों पर प्रभाव और शीर्ष पदों के चयन की अनौपचारिक परंपराएँ. छोटे-मोटे सुधारों के बावजूद यह धारणा बनी हुई है कि बड़े निर्णय अब भी पुराने शक्ति-संतुलन के अनुसार लिए जाते हैं.
इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या ये संस्थान अभी भी प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं. सार्वभौमिक संस्थान अभी भी आवश्यक हैं, लेकिन अक्सर उनसे वही काम करने की अपेक्षा की जाती है जिसे महाशक्ति राजनीति कठिन बना देती है. बड़े मंचों पर विवादित मुद्दे अक्सर अटक जाते हैं, इसलिए सहयोग अब छोटे और विषय-विशेष समूहों-जैसे बहुपक्षीय मानक समझौते, क्षेत्रीय वित्तीय व्यवस्था और तकनीकी गठबंधनों-के माध्यम से आगे बढ़ रहा है.
देश कम से कम कुछ बुनियादी सिद्धांतों और मानकों पर सहमति बना सकते हैं, जैसे प्रौद्योगिकी के उपयोग में सुरक्षा सुनिश्चित करना, निर्णयों में पारदर्शिता बनाए रखना और संस्थानों व कंपनियों की जवाबदेही तय करना. ऐसे न्यूनतम साझा मानक पूरी राजनीतिक सहमति के बिना भी वैश्विक स्तर पर जोखिमों को कम करने में मदद कर सकते हैं.
प्रतिस्पर्धा की तीव्रता को कम करना सबसे नाजुक चुनौती है. ‘गार्डरेल्स’ या सुरक्षा-नियंत्रण तंत्र का अर्थ यहाँ भरोसा नहीं, बल्कि ऐसी प्रक्रियाएँ है जो गलतफहमी और टकराव की संभावना कम करें-जैसे संकट के समय नियमित संवाद व्यवस्था, विवादित क्षेत्रों में टकराव-नियंत्रण तंत्र और साइबर हमलों, अंतरिक्ष परिसंपत्तियों तथा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए समझौते.
आज के प्रतिस्पर्धात्मक दौर में पूर्व-पश्चिम सहयोग संभव है, लेकिन सीमित और व्यावहारिक रूप में. जलवायु परिवर्तन इसका स्पष्ट उदाहरण है, जहां घोषणाओं से अधिक महत्वपूर्ण है वास्तविक परिणाम, जैसे वित्तीय सहायता, साझा रिपोर्टिंग मानक और वास्तविक अनुकूलन परियोजनाएँ.
प्रौद्योगिकी का क्षेत्र आज वैश्विक सहयोग के लिए सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण माना जाता है. अलग-अलग देशों के हित, सुरक्षा चिंताएँ और तकनीकी प्रतिस्पर्धा इतनी अधिक है कि एक पूरी तरह एकीकृत वैश्विक व्यवस्था बनाना फिलहाल मुश्किल दिखाई देता है. फिर भी कुछ स्तर पर सहयोग संभव है. देश कम से कम कुछ बुनियादी सिद्धांतों और मानकों पर सहमति बना सकते हैं, जैसे प्रौद्योगिकी के उपयोग में सुरक्षा सुनिश्चित करना, निर्णयों में पारदर्शिता बनाए रखना और संस्थानों व कंपनियों की जवाबदेही तय करना. ऐसे न्यूनतम साझा मानक पूरी राजनीतिक सहमति के बिना भी वैश्विक स्तर पर जोखिमों को कम करने में मदद कर सकते हैं.
इन प्रयासों से पूर्ण सफलता की कोई निश्चित गारंटी नहीं है. फिर भी इससे यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान समय में बहुपक्षवाद की वास्तविक परीक्षा उसके क्रियान्वयन में है. केवल भाषणों और घोषणाओं से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि क्या बहुपक्षीय संस्थाएँ बढ़ती प्रतिस्पर्धा और तनाव के बीच भी प्रभावी ढंग से काम कर सकती हैं. यदि वे सीमित ही सही, लेकिन व्यावहारिक सहयोग को संभव बनाती हैं और देशों के बीच संवाद बनाए रखती हैं, तो यही बहुपक्षवाद की सबसे बड़ी सफलता मानी जाएगी.
नीना साजिक बंजा लुका विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर हैं.
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Nina Sajić is a Professor at the Institute of Political Science at the University of Banja Luka, where her academic focus encompasses international relations and ...
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