चार दशक पुरानी पनडुब्बियों की विदाई और नई पनडुब्बियों की देरी ने भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. जानें क्यों घटती पनडुब्बी संख्या, धीमी निर्माण प्रक्रिया और बढ़ते क्षेत्रीय खतरे भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए एक अहम चुनौती बनते जा रहे हैं.
चार दशक की सेवा के बाद पिछले साल के आखिर में भारतीय नौसेना ने INS सिंधुघोष को सेवा से बाहर कर दिया. इसके बाद भारत के पास अब 16 पारंपरिक पनडुब्बियां (SSKs) बची हैं. यह संख्या लगभग उतनी ही है जितनी 1990 के आखिरी वर्षों में थी. तब पनडुब्बियों की भारी कमी को देखते हुए 1999 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने 30 साल का सबमरीन निर्माण कार्यक्रम मंजूर किया था.
वाइस एडमिरल ए.के. चटर्जी के बनाए 30 वर्षीय योजना में 24 पनडुब्बियों की जरूरत बताई गई थी. प्लान था कि 12 साल में दो अलग विदेशी डिजाइनों पर एक साथ छह-छह पनडुब्बियां बनाई जाएंगी. तकनीकी अनुभव बढ़ने पर बाद में देशी डिजाइन जोड़ते हुए 12 और पनडुब्बियां बननी थीं लेकिन अब तक भारत सिर्फ छह पनडुब्बियां ही शामिल कर पाया है. सरकारी उलझन, फैसलों में हिचक, लंबी टेंडर प्रक्रिया और पैसों की कमी ने आत्मनिर्भरता के लक्ष्य और नौसेना की फौरी जरूरतों के बीच फासला और बढ़ा दिया है.
30 साल में प्लान था कि जब शिशुमार क्लास (1986-1994) और सिंधुघोष क्लास (1986-2000) पनडुब्बियां रिटायर होंगी, तब भारत के पास 24 चालू पनडुब्बियां होंगी लेकिन बेड़े की लगातार कमी के चलते नौसेना ने पुरानी पनडुब्बियों को हटाने के बजाय उनका मिड-लाइफ अपग्रेड किया. फॉक्सट्रॉट क्लास इसका उदाहरण है. INS खंडेरी 21 साल बाद हटाई गई, INS कलवरी 29 साल बाद और INS खुरसुरा 31 साल बाद. शिशुमार और सिंधुघोष क्लास में आज के हिसाब से जरूरी आधुनिक तकनीक भी नहीं है. हालात यूं भी मुश्किल हो जाते हैं कि प्रॉजेक्ट-75I की पहली AIP वाली पनडुब्बी शायद 2034-2035 तक ही नौसेना में शामिल हो पाएगी. तब तक शिशुमार और सिंधुघोष क्लास की सारी पनडुब्बियों की उम्र 35 से 49 साल होगी यानी रिटायरमेंट वाली.
नौसेना अपनी पानी के नीचे वाली ताकत को मजबूत करने की बात ऐसे समय कर रही है जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की सुरक्षा सोच फिर पाकिस्तान पर ज्यादा केंद्रित होती दिख रही है. अभी जब भारत अभी AIP वाली पनडुब्बियों पर सोच ही रहा है, उसी बीच पाकिस्तान ने 17 दिसंबर को अपनी चौथी हैंगोर क्लास पनडुब्बी PNS गाजी लॉन्च कर दी.
ऐसे में जब P-75I की पहली पनडुब्बी आएगी, तब भारत के पास सिर्फ छह स्कॉर्पीन क्लास पनडुब्बियां और रूस से लीज पर ली गई चक्रा परमाणु अटैक पनडुब्बी (SSN) ही बचेंगी. अगर साल के अंत तक मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) और थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) के बीच P-75I का कॉन्ट्रैक्ट फाइनल होता है, तो पहले करीब 18 महीने डिजाइन में लगेंगे. फिर लगभग सात साल बनने में लगेंगे. यानी पहली पनडुब्बी करीब 2035 तक तैयार होगी.
2023 में MDL और उसके पुराने पार्टनर नेवल ग्रुप के बीच तीन और AIP वाली स्कॉर्पीन बनाने का समझौता इस बात का संकेत है कि नौसेना अपनी क्षमता में बड़ी कमी मान चुकी है. यह प्लान पहले नहीं था, लेकिन P-75I में भारी देरी के कारण इसे शुरू करना पड़ा. इस बार बनने वाली पनडुब्बियों में करीब 60 फीसदी देशी हिस्सा होगा- यानी पहले से दोगुना. इनकी समुद्र में टिके रहने की क्षमता ज्यादा होगी, साइज बड़ी होगी. डिजाइन ऐसी होगी कि आसानी से दिखें नहीं, और हथियार ले जाने की क्षमता भी पहले से दोगुनी होगी.
दिलचस्प है कि नौसेना अपनी पानी के नीचे वाली ताकत को मजबूत करने की बात ऐसे समय कर रही है जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की सुरक्षा सोच फिर पाकिस्तान पर ज्यादा केंद्रित होती दिख रही है. अभी जब भारत अभी AIP वाली पनडुब्बियों पर सोच ही रहा है, उसी बीच पाकिस्तान ने 17 दिसंबर को अपनी चौथी हैंगोर क्लास पनडुब्बी PNS गाजी लॉन्च कर दी. यह उसके पांच अरब डॉलर के प्रोग्राम का हिस्सा है.
अभी कोई SSN सेवा में नहीं है और चक्रा-III की लीज 2028 तक टली हुई है. इसलिए सरकार को अक्टूबर 2024 में मंजूर दो SSN के अलावा चार और की मंजूरी पर सोचना चाहिए. डिजाइन फेज शुरू हो चुका है, लेकिन अतिरिक्त मंजूरी फौरी जरूरत पूरी करने और लागत घटाने के लिए जरूरी होगी.
चीन की मदद से बनने वाली आठ पनडुब्बियों की इस योजना में चार तैयार हैं और जल्द तैनात भी हो सकती हैं. इससे पाकिस्तान की पानी के नीचे लड़ाई में ताकत बढ़ेगी और भारतीय नौसेना के एंटी-सबमरीन सिस्टम के लिए इन्हें पकड़ना मुश्किल होगा. ऑपरेशन सिंदूर के बाद, जहां भारत का ध्यान फिर पाकिस्तान पर है, वहां मजबूत पारंपरिक रोकथाम, समुद्र में दुश्मन को रोकने की क्षमता, व्यापारिक समुद्री रास्तों की सुरक्षा और किसी भी टकराव में दबाव बनाने की रणनीति बेहद जरूरी होगी.
पनडुब्बियों की कमी और पुराना होता बेड़ा साफ बताता है कि खरीद प्रक्रिया में तेजी और नए नजरिये की जरूरत है, ताकि जरूरी ऑपरेशनल लेवल बनाए रखा जा सके. सबसे पहले, P-75I का डिजाइन तय होते ही देश में समानांतर निर्माण लाइन शुरू करनी चाहिए. डिजाइन फाइनल होने में 2028 तक का समय लग सकता है. यह समय MDL और DRDO के P-76 डिजाइन प्रोग्राम के साथ मेल खाएगा.
जहां P-75I में TKMS का डिजाइन इस्तेमाल होगा, वहीं P-76 में नौसेना MDL या DRDO के किसी देशी डिजाइन को चुन सकती है. सरकार तीन-तीन पनडुब्बियों के बैच में बनाने की मंजूरी दे सकती है. बाद के बैच में जरूरत के हिसाब से TKMS की कुछ तकनीक भी जोड़ी जा सकती है. P-76 के लिए MDL और L&T सबसे उपयुक्त शिपयार्ड माने जाते हैं. अगर उत्पादन दोनों यार्ड में बांट दिया जाए्, यानी 12 में से छह-छह, तब डिलीवरी भी तेजी से हो सकती है. बड़ा ऑर्डर मिलने पर लागत भी कम हो सकती है.
P-76, तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन और चार परमाणु अटैक पनडुब्बियों के लिए मौजूदा शिपयार्ड का इस्तेमाल और विस्तार तभी संभव है जब CCS लगातार बजट दे और कॉन्ट्रैक्ट देने में खुलापन दिखाए. MDL और L&T जैसी कंपनियों का मजबूत टर्नओवर उन्हें लागत बढ़ने जैसी स्थिति संभालने लायक बनाता है.
मतलब साफ है- सिर्फ पुराने सिस्टम की उम्र बढ़ाने के बजाय सरकार को लंबे समय का बड़ा प्लान अपनाना होगा. सरकार को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप पर भी विचार करना चाहिए, खासकर P-76 में निजी कंपनियों की ज्यादा भागीदारी पर. L&T पहले एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल (ATV) प्रॉजेक्ट में अहम भूमिका निभा चुका है.
MDL अगर एक साथ P-75I और P-76 पर काम करता है तो इससे कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि उसकी समानांतर निर्माण क्षमता छह से बढ़कर 11 प्लेटफॉर्म हो चुकी है. चूंकि P-75I के लिए नई निर्माण लाइन बनानी होगी, CCS को तीन और AIP वाली स्कॉर्पीन के लिए लंबित 36,000 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट को भी मंजूरी देनी चाहिए. यह शुरुआती 50,000 करोड़ से काफी कम है. इन पनडुब्बियों के निर्माण के लिए MDL की मौजूदा स्कॉर्पीन लाइन को बड़ा करना होगा और नए डिजाइन के हिसाब से ढालना होगा.
अंत में, अभी कोई SSN सेवा में नहीं है और चक्रा-III की लीज 2028 तक टली हुई है. इसलिए सरकार को अक्टूबर 2024 में मंजूर दो SSN के अलावा चार और की मंजूरी पर सोचना चाहिए. डिजाइन फेज शुरू हो चुका है, लेकिन अतिरिक्त मंजूरी फौरी जरूरत पूरी करने और लागत घटाने के लिए जरूरी होगी. अरिहंत क्लास प्रोग्राम में इंजीनियरिंग और निर्माण में बड़ी भूमिका निभाने के कारण L&T इस काम में मदद कर सकता है. इससे कुशल कर्मचारियों को बनाए रखना भी आसान होगा-जो शिशुमार प्रॉजेक्ट के बाद एक बड़ा सबक रहा है. P-76, तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन और चार परमाणु अटैक पनडुब्बियों के लिए मौजूदा शिपयार्ड का इस्तेमाल और विस्तार तभी संभव है जब CCS लगातार बजट दे और कॉन्ट्रैक्ट देने में खुलापन दिखाए. MDL और L&T जैसी कंपनियों का मजबूत टर्नओवर उन्हें लागत बढ़ने जैसी स्थिति संभालने लायक बनाता है.
दूसरी तरफ, नौसेना की जरूरतों पर सरकार की ढिलाई और फैसलों में देरी भी बड़ी समस्या है. आखिरी सबमरीन कॉन्ट्रैक्ट 2005 में साइन हुआ था. चार साल चली P-75 बातचीत जैसी देरी बताती है कि इसे और साफ और तेज करना होगा. नवंबर 2007 में मंजूरी मिलने के बावजूद P-75 का अंतिम कॉन्ट्रैक्ट अभी तक नहीं हुआ- यह देशी पनडुब्बी प्रॉजेक्ट को लेकर सरकारी उलझन दिखाता है. इसलिए एक सक्रिय और लंबे समय का प्लान जरूरी है जिससे नौसेना अपने मिशन पूरे कर सके. वह पूरे समुद्री इलाके में लगातार मौजूद रह सके और क्षेत्र की सबसे मजबूत नौसैनिक ताकत बनी रह सके.
अरौद्रा सिंह नई दिल्ली स्थित सामरिक एवं रक्षा अनुसंधान परिषद में रिसर्च असिस्टेंट हैं
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Araudra Singh is a Research Assistant at the Council for Strategic and Defense Research, New Delhi. ...
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