भारतीय शहर अब सिर्फ देश के विकास नहीं बल्कि वैश्विक सहयोग की भी नई धुरी बन रहे हैं. सिटी डिप्लोमेसी के जरिए शहर तकनीक, निवेश और जलवायु समाधान जैसे मुद्दों पर दुनिया से सीधे जुड़ रहे हैं. पढ़ें, भारत में सिटी डिप्लोमेसी क्यों तेजी से अहम होती जा रही है.
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वैश्विक GDP का लगभग 80 प्रतिशत उत्पन्न करने वाले शहर आज वैश्विक आर्थिक परिवर्तन और भू-राजनीतिक महत्व के केंद्र में हैं. इस विकास के साथ जल, आवास, परिवहन और डिजिटल नेटवर्क जैसी अवसंरचना प्रणालियों के विस्तार और आधुनिकीकरण की चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं, जो अक्सर सामाजिक, क्षेत्रीय और आर्थिक असमानताओं के बीच सामने आती हैं. इसी कारण ‘सिटी डिप्लोमेसी‘ उप-राष्ट्रीय सहभागिता का एक महत्वपूर्ण रूप बनकर उभरी है, जिसके तहत शहर व्यापार, संस्कृति, जलवायु कार्रवाई और अवसंरचना के क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ विकसित करते हैं.
भारत में यह बदलाव पारंपरिक राज्य-केंद्रित कूटनीतिक ढाँचे से अधिक विकेंद्रीकृत और नेटवर्क-आधारित सहभागिता की ओर धीरे-धीरे लेकिन महत्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है. पैरा डिप्लोमेसी की उभरती प्रवृत्तियाँ दिल्ली–बीजिंग और अहमदाबाद–ग्वांगझोऊ जैसी सिस्टर-सिटी साझेदारियों में दिखाई देती हैं. वहीं, यूरोपीय संघ, फ्रांस और जर्मनी के सहयोग से संचालित CITIIS 2.0 जैसी बहु-स्तरीय पहलें जलवायु-लचीले शहरी विकास को बढ़ावा दे रही हैं. इसी प्रकार, स्मार्ट सिटीज मिशन और AMRUT जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों ने विभिन्न विदेशी सरकारों और संस्थाओं के साथ सहयोग को बढ़ावा दिया है, ये पहलें ‘रिलेशनल अर्बनिज्म‘ की अवधारणा से मेल खाती हैं, जो शहरों को स्थिर भौगोलिक इकाइयों के बजाय पूंजी, ज्ञान और नीतिगत आदान-प्रदान के गतिशील नेटवर्क का हिस्सा मानती है. दिल्ली–बीजिंग और अहमदाबाद–ग्वांगझोउ जैसी सिस्टर-सिटी साझेदारियाँ शहरों के वैश्विक सहयोग को दिखाती हैं. लेकिन ये प्रयास अभी बिखरे हुए हैं. सिटी डिप्लोमेसी को सफल बनाने के लिए बेहतर योजना, मजबूत संस्थाएं और लंबे समय की साझेदारियां जरूरी हैं.
वैश्वीकरण ने शासन की संरचना को मूल रूप से बदल दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्र-राज्य की एकमात्र प्रमुख भूमिका को चुनौती मिली है. यद्यपि राज्यों के पास औपचारिक संप्रभुता बनी हुई है, लेकिन बढ़ते शोध यह संकेत देते हैं कि अब बहुस्तरीय शासन का उदय हो रहा है, जिसमें अधिकार अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय स्तरों में विभाजित हो रहे हैं. इस नए ढांचे में शहरों ने स्वयं को महत्वपूर्ण राजनीतिक अभिनेताओं के रूप में स्थापित किया है, विशेषकर जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण, अवसंरचना और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी चुनौतियों से निपटने में.
शहर एक विरोधाभासी स्थिति में हैं, क्योंकि वे एक ओर वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के बड़े स्रोत हैं, तो दूसरी ओर बाढ़, अत्यधिक गर्मी और समुद्र-स्तर वृद्धि जैसे जलवायु जोखिमों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील भी हैं. इस दोहरी स्थिति ने शहरों को अंतरराष्ट्रीय जलवायु शासन में अधिक प्रत्यक्ष और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया है.
शहरी प्रशासन लोगों और अवसंरचना के सबसे निकट होने तथा सेवा वितरण की जिम्मेदारी निभाने के कारण शहरी चुनौतियों के प्रबंधन की अग्रिम पंक्ति में होते हैं. समस्याओं और नीतियों के क्रियान्वयन दोनों से यह निकटता पैराडिप्लोमेसी के उदय का कारण बनी है, जिसके तहत शहर अपने विकासात्मक और रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए सीधे अंतरराष्ट्रीय सहयोग में भाग लेते हैं.
वैश्विक मामलों में शहरों की बढ़ती भूमिका विश्व अर्थव्यवस्था में उनकी संरचनात्मक स्थिति से जुड़ी है. विद्वान सास्किया सासेन के अनुसार, वैश्विक शहर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों के प्रमुख नियंत्रण केंद्र के रूप में कार्य करते हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्यालय, उन्नत सेवा क्षेत्र, वित्तीय संस्थान और सूचना प्रवाह शहरों में केंद्रित होने के कारण शहर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आकार देने वाले रणनीतिक अभिनेता बन जाते हैं.
जलवायु संकट भी सिटी डिप्लोमेसी का एक प्रमुख प्रेरक बनकर उभरा है. शहर एक विरोधाभासी स्थिति में हैं, क्योंकि वे एक ओर वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के बड़े स्रोत हैं, तो दूसरी ओर बाढ़, अत्यधिक गर्मी और समुद्र-स्तर वृद्धि जैसे जलवायु जोखिमों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील भी हैं. इस दोहरी स्थिति ने शहरों को अंतरराष्ट्रीय जलवायु शासन में अधिक प्रत्यक्ष और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया है. शहर अब नेटवर्क, साझेदारियों और सहयोगात्मक मंचों के माध्यम से राष्ट्रीय ढांचों के साथ मिलकर जलवायु समाधान विकसित कर रहे हैं और अधिक विकेंद्रीकृत तथा नेटवर्क-आधारित वैश्विक शासन मॉडल को आगे बढ़ा रहे हैं.
सिस्टर या ट्विन-सिटी साझेदारियाँ उप-राष्ट्रीय कूटनीति के सबसे प्रमुख और व्यावहारिक रूपों में से एक हैं. ये शहरों को औपचारिक राज्य-नेतृत्व वाली भागीदारी से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय संबंध विकसित करने का अवसर देती हैं. शहर-से-शहर द्विपक्षीय संबंध उप-राष्ट्रीय कूटनीति का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जो विकासात्मक आदान-प्रदान को बढ़ावा देकर देश के शहरी उभार के बीच सॉफ्ट पावर को मजबूत करते हैं. ये साझेदारियाँ शहरों को दूसरे देशों के शहरों के साथ सीधे जुड़ने का मौका देती हैं. इससे ऐसे सहयोग बनते हैं जो ज्यादा लचीले, खास मुद्दों पर केंद्रित और जल्दी लागू किए जा सकने वाले होते हैं.
स्मार्ट सिटीज मिशन ने रॉकफेलर फाउंडेशन की ‘100 लचीले शहर‘ जैसी वैश्विक पहलों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाया है. भारत में यूरोपीय संघ समर्थित सिटीज 2.0 इसका उदाहरण है, जिसने इंदौर और कोच्चि को यूरोपीय ‘वेस्ट-टू-एनर्जी‘ मॉडल से जोड़ा है, जिससे केवल तकनीकी अपनाव ही नहीं बल्कि शासन पद्धतियों में भी सामंजस्य विकसित हुआ है.
व्यवहार में, ये साझेदारियाँ कई क्षेत्रों तक फैली हुई हैं. उदाहरण के लिए, मुंबई ने योकोहामा के साथ बंदरगाह प्रबंधन और आपदा-प्रतिरोधक क्षमता के आदान-प्रदान के लिए, लॉस एंजिल्स के साथ फिल्म और व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए, तथा बुसान के साथ दोनों उद्देश्यों के लिए ट्विन-सिटी संबंध स्थापित किए हैं. बेंगलुरु तकनीकी नवाचार केंद्रों के विकास के लिए सैन फ्रांसिस्को के साथ सहयोग करता है, जबकि दिल्ली शहरी विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए टोक्यो के साथ साझेदारी करती है और जापानी विशेषज्ञता के माध्यम से अपने स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत कर रही है. सॉफ्ट पावर के साधन के रूप में ये व्यवस्थाएँ भारतीय शहरों की गतिशीलता को प्रदर्शित करती हैं. उदाहरणस्वरूप, मुंबई की वैश्विक वित्तीय पहचान बिना किसी दबाव के निवेश आकर्षित करती है.
इन साझेदारियों का एक महत्वपूर्ण पहलू अंतर-शहरी सीख और नीतिगत गतिशीलता को बढ़ावा देना है. C40 शहर जलवायु नेतृत्व समूह जैसी संस्थागत साझेदारियाँ दिल्ली को एक ‘लर्निंग हब’ के रूप में स्थापित करती हैं, जहाँ वह न्यूयॉर्क से बाढ़-रोधी रणनीतियाँ सीखती है और दक्षिण-पूर्व एशियाई शहरों के साथ हीट एक्शन प्लान साझा करती है. स्मार्ट सिटीज मिशन ने रॉकफेलर फाउंडेशन की ‘100 लचीले शहर‘ जैसी वैश्विक पहलों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाया है. भारत में यूरोपीय संघ समर्थित सिटीज 2.0 इसका उदाहरण है, जिसने इंदौर और कोच्चि को यूरोपीय ‘वेस्ट-टू-एनर्जी‘ मॉडल से जोड़ा है, जिससे केवल तकनीकी अपनाव ही नहीं बल्कि शासन पद्धतियों में भी सामंजस्य विकसित हुआ है.
इन साझेदारियों का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष कुशल श्रम का आदान-प्रदान है. यह तकनीकी विशेषज्ञता को बढ़ावा देता है, विशेषकर स्कैंडिनेवियाई देशों जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में, जहां वर्तमान में IT, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा, निर्माण और परिवहन जैसे क्षेत्रों में कुशल श्रमिकों की भारी कमी है. यह स्थिति शहर-से-शहर साझेदारियों के भीतर संरचित, अल्पकालिक श्रम गतिशीलता और कौशल विनिमय कार्यक्रमों या ‘ग्लोबल स्किल पार्टनरशिप‘ को शामिल करने का अवसर प्रदान करती है. ऐसे आदान-प्रदान आपसी सीख को बढ़ावा देते हैं, तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करते हैं और ऐसे अंतरराष्ट्रीय श्रम संबंध तैयार करते हैं जो दोनों साझेदार शहरों को लाभ पहुंचाते हैं.
इस संदर्भ में, शहर आर्थिक कूटनीति के नए मंचों के रूप में भी उभर सकते हैं, सांस्कृतिक कूटनीति को इन आदान-प्रदानों में शामिल करने से विश्वास और अंतरराष्ट्रीय संबंध और अधिक मजबूत हो सकते हैं, जिससे अधिक सुदृढ़ और पारस्परिक रूप से लाभकारी आर्थिक कूटनीति की संभावनाएँ बढ़ती हैं. जैसे-जैसे शहर इन ज्ञान नेटवर्कों का अधिक उपयोग कर रहे हैं, अंतर-शहरी सीख सिटी डिप्लोमेसी का एक बुनियादी स्तंभ बनती जा रही है. यह शहरी शासन को दिशा देती है और यह निर्धारित करती है कि शहर वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्वयं को किस प्रकार स्थापित करते हैं.
सिटी डिप्लोमेसी अब एक ऐसे रणनीतिक साधन के रूप में उभर रही है, जिसके माध्यम से शहर स्वयं को क्षेत्रीय और वैश्विक आर्थिक व्यवस्थाओं में स्थापित कर रहे हैं. सिटी डिप्लोमेसी सिर्फ निवेश लाने तक सीमित नहीं है. यह शहरों को विदेशी निवेश, नई तकनीक और उद्योगों से जोड़कर उनकी आर्थिक पहचान मजबूत करती है. इससे शहर विकास, नवाचार और बेहतर अवसरों के केंद्र बन पाते हैं.
शहरों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण पहलू बहुपक्षीय संस्थाओं और द्विपक्षीय एजेंसियों के साथ साझेदारी के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय वित्त और तकनीकी विशेषज्ञता जुटाने की उनकी क्षमता है. ये साझेदारियाँ अवसंरचना निवेश, जलवायु वित्त और क्षमता निर्माण तक पहुँच प्रदान करती हैं, साथ ही वैश्विक मानकों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को भी बढ़ावा देती हैं. जापान भारत का एक प्रमुख अवसंरचना साझेदार है, जिसने हाल ही में शहरी परिवहन, स्वास्थ्य और कृषि से जुड़ी प्रमुख परियोजनाओं के लिए लगभग 16,420 करोड़ रुपये (करीब 174 मिलियन अमेरिकी डॉलर) का आधिकारिक विकास सहायता (ODA) ऋण देने की घोषणा की है.
भारत में सिटी डिप्लोमेसी अभी भी बिखरे हुए प्रयासों और बाहरी फंडिंग पर काफी निर्भर है. सिस्टर-सिटी साझेदारियों और वैश्विक नेटवर्कों से सहयोग बढ़ा है, लेकिन बेहतर समन्वय और लगातार प्रयासों की कमी इसकी पूरी क्षमता को सीमित करती है.
बड़े निवेशों के अलावा, अहमदाबाद–हमामात्सु सिस्टर-सिटी साझेदारी जैसी उप-राष्ट्रीय साझेदारियाँ यह दर्शाती हैं कि शहर-से-शहर कूटनीति तकनीकी आदान-प्रदान, क्षेत्रीय नवाचार और टिकाऊ अवसंरचना तथा हरित विकास की दिशा में स्थानीय स्तर पर बदलाव को कैसे बढ़ावा देती है.
जापान भारत के विकास में बड़ा साझेदार है और उसने परिवहन, स्वास्थ्य व कृषि परियोजनाओं के लिए बड़ा ऋण देने का वादा किया है. सिटी डिप्लोमेसी से कई देशों के साथ सहयोग भी बढ़ रहा है. उदाहरण के लिए, नदी प्रबंधन पर भारत–डेनमार्क साझेदारी के तहत भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान–बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (IIT-BHU), भारत सरकार और डेनमार्क सरकार के सहयोग से वाराणसी में ‘स्मार्ट लेबोरेटरी ऑन क्लीन रिवर्स‘ (SLCR) की स्थापना की गई. यह दर्शाता है कि शहरी चुनौतियों का उपयोग अंतरराष्ट्रीय शोध और नवाचार तंत्र विकसित करने के लिए कैसे किया जा सकता है. इसी प्रकार, भारत और नीदरलैंड के बीच हरित हाइड्रोजन सहयोग और नवाचार को तेज करने की साझेदारी यह दिखाती है कि शहरी विकास को डीकार्बोनाइजेशन और सर्कुलर अर्थव्यवस्था जैसी उभरती वैश्विक प्राथमिकताओं के साथ जोड़ना कितना महत्वपूर्ण होता जा रहा है.
इस प्रकार, सिटी डिप्लोमेसी आर्थिक स्थिति निर्धारण का एक बहुआयामी साधन बनकर उभरती है, सिटी डिप्लोमेसी से निवेश, तकनीक और विकास के नए अवसर मिलते हैं, लेकिन इससे असमानता और बाहरी निर्भरता बढ़ सकती है. इसलिए इसका लक्ष्य सभी के लिए मजबूत और टिकाऊ शहरी विकास होना चाहिए.
आज के परस्पर जुड़े और संकट-प्रवण वैश्विक परिदृश्य में भारतीय शहरों के लिए सिटी डिप्लोमेसी एक महत्वपूर्ण साधन बनकर उभर रही है. फिर भी, यह अभी बिखरी हुई है. भारत में सिटी डिप्लोमेसी अभी भी बिखरे हुए प्रयासों और बाहरी फंडिंग पर काफी निर्भर है. सिस्टर-सिटी साझेदारियों और वैश्विक नेटवर्कों से सहयोग बढ़ा है, लेकिन बेहतर समन्वय और लगातार प्रयासों की कमी इसकी पूरी क्षमता को सीमित करती है. इसे मजबूत करने के लिए नगर, राज्य और केंद्र सरकार के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है. साथ ही, दक्षिण–दक्षिण सहयोग बढ़ाकर शहरों को अपनी वैश्विक साझेदारियों को स्थानीय जरूरतों और विकास लक्ष्यों से जोड़ना होगा.
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Soma Sarkar is an Associate Fellow with ORF’s Urban Studies Programme. Her research interests span the intersections of environment and development, urban studies, water governance, Water, ...
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