Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 20, 2026 Updated 0 Hours ago

म्यांमार के रखाइन इलाके में सक्रिय अराकान आर्मी ने हाल ही में 73 मछुआरों को रिहा कर बांग्लादेश को सौंप दिया, जानें क्यों यह घटना अहम है, क्या बिना मजबूत केंद्रीय सरकार के भी एक नया “ग्राउंड सिस्टम” उभर रहा है और क्या इससे रोहिंग्या संकट के समाधान की कोई राह निकल सकती है या नहीं.

म्यांमार में हलचल? एक रिहाई, कई सवाल

पिछले दिनों म्यांमार की अराकान आर्मी (AA) ने 73 मछुआरों को बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) के हवाले कर दिया. दो साल से अधिक समय से हिरासत में रखे इन लोगों में 66 बांग्लादेशी और 7 रोहिंग्या थे. यह अदला-बदली बाकायदा कागजी कार्रवाई, आपसी तालमेल और तयशुदा तरीकों के तहत हुई, जिसके लिए BGB और रखाइन में मौजूद सरकार में बैठे लोगों ने बात की. बता दें कि अराकान आर्मी म्यांमार के रखाइन सूबे में बांग्लादेश की सरहद के पास बड़े इलाके पर काबिज है.

मछुआरों की घर वापसी राहत की बात तो है ही, लेकिन इससे एक बड़ा इशारा यह मिलता है कि म्यांमार में बिना किसी मजबूत केंद्रीय सरकार के भी एक तरह का सिस्टम तैयार हो रहा है जो सीमा से जुड़े असली मसलों को संभाल सकता है, भले ही उसे दुनिया में सही मान्यता न मिली हो. यह मामला कुछ अहम सवाल भी खड़े करता है- क्या यह बांग्लादेश-म्यांमार सीमा के हालात में किसी बदलाव का इशारा है? और क्या इससे रोहिंग्या मसले को सुलझाने की तरफ कोई छोटा सा रास्ता निकल सकता है? 

मछुआरों की घर वापसी राहत की बात तो है ही, लेकिन इससे एक बड़ा इशारा यह मिलता है कि म्यांमार में बिना किसी मजबूत केंद्रीय सरकार के भी एक तरह का सिस्टम तैयार हो रहा है जो सीमा से जुड़े असली मसलों को संभाल सकता है, भले ही उसे दुनिया में सही मान्यता न मिली हो.

मछुआरों की वापसी के पीछे एक और बड़ी कहानी छिपी है. क्या यह रोहिंग्या संकट के समाधान की तरफ कोई छोटा सा रास्ता खोलता है, या फिर यह सिर्फ एक अलग-थलग घटना है? जवाब अभी साफ नहीं, लेकिन शुभ-संकेत जरूर मजबूत हैं.

बेवतन आबादी

रोहिंग्या मसला दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे लंबे चलने वाले इंसानी संकटों में से एक बना हुआ है. रोहिंग्या लोगों को बार-बार जगह बदलनी पड़ी, क्योंकि 1982 के म्यांमार सिटिजनशिप क़ानून के तहत उनसे नागरिकता छीन ली गई थी. 2017 में बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के बाद 7 लाख से ज्यादा रोहिंग्या रखाइन सूबे से भागने पर मजबूर हो गए. 1978 से ही रोहिंग्या शरणार्थियों को जगह दे रहा बांग्लादेश एक बार फिर उनका सबसे बड़ा ठिकाना बन गया. करीब एक दशक बाद भी यहां 12 लाख से ज्यादा रोहिंग्या हैं, जिनमें से ज्यादातर कॉक्स बाजार के आसपास बने 33 कैंपों में रहते हैं.

2017 की हिंसा के बाद जो पलायन शुरू हुआ, वह आज तक थमा नहीं है. बांग्लादेश में बसे लाखों रोहिंग्या अब भी अस्थायी जिंदगी जी रहे हैं. कैंपों की जिंदगी हर दिन एक नई चुनौती लेकर आती है. सवाल है कि इतने साल बाद भी क्या रोहिंग्याओं की जिंदगी एक अधूरी कहानी बनकर रह गए हैं?

मार्च 2025 में यूनुस संयुक्त राष्ट्र के सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस के साथ उखिया के रोहिंग्या कैंपों में गए. वहां यूनुस ने फिर दोहराया कि बांग्लादेश संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अंतरराष्ट्रीय साथियों के साथ मिलकर काम करेगा, ताकि रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी का रास्ता निकाला जा सके.

इन कैंपों में जीने और रहने के हालात आज भी बेहद मुश्किल हैं. इलाज, पानी, सफाई और सेहत से जुड़े मसले लगातार बने हुए हैं. पढ़ाई और रोजगार के मौके बहुत सीमित हैं. इसके अलावा 37,000 से ज्यादा रोहिंग्या लोगों को भासन चार नाम के एक समंदर में बने टापू पर बसाया गया है, जहां के हालात और वहां लंबे वक्त तक रहने की संभावना को लेकर काफी बहस होती रही है. वक्त के साथ हालात और खराब हुए हैं, मदद के पैसे भी कम होते गए हैं.

कोशिशें घर वापसी की

रोहिंग्या के बारे में बांग्लादेश की पॉलिसी शुरू से ही उनकी घर-वापसी की ही रही है. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के दौर में कई बार म्यांमार से बात करके रोहिंग्या की वापसी की नाकाम कोशिशें हुईं. सरकार बदलने के बाद मुहम्मद यूनुस की अगुवाई में भी ज्यादा फर्क नहीं आया. इस अंतरिम सरकार ने भी यही बात दोहराई कि रोहिंग्या का असली और टिकाऊ हल उनकी वापसी ही है. 

बांग्लादेश की पॉलिसी शुरू से साफ रही है कि रोहिंग्या की वापसी ही आखिरी हल है. लेकिन सालों की कोशिशों के बावजूद नतीजा वही ढाक के तीन पात. सवाल यह है कि क्या यह नीति सही दिशा में है, या जमीनी हकीकत अब बदल चुकी है? मार्च 2025 में यूनुस संयुक्त राष्ट्र के सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस के साथ उखिया के रोहिंग्या कैंपों में गए. वहां यूनुस ने फिर दोहराया कि बांग्लादेश संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अंतरराष्ट्रीय साथियों के साथ मिलकर काम करेगा, ताकि रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी का रास्ता निकाला जा सके. अगस्त 2025 में बांग्लादेश ने तीन दिन का एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन कराया, जिसमें संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अहम पक्ष शामिल हुए. इसका मकसद रोहिंग्या मुद्दे पर दुनिया की दिलचस्पी को फिर से जगाना था. इससे पहले नवंबर 2024 में सरकार ने खलीलुर रहमान को रोहिंग्या मसले पर एक खास जिम्मेदारी दी, ताकि वह कूटनीतिक बातचीत और पॉलिसी से जुड़े काम को संभाल सकें. 2024 से 2025 के दौरान बांग्लादेश ने रोहिंग्याओं की वापसी के लिए बातचीत तेज की.

कम होती जा रही मदद

लेकिन बांग्लादेश की कोशिशें आसान नहीं रहीं, क्योंकि दुनिया का ध्यान और फंडिंग धीरे-धीरे कम होती गई (टेबल देखें). जैसे-जैसे यह संकट लंबा खिंचता गया, वैसे-वैसे बांग्लादेश काफी हद तक अकेला पड़ता गया. खाने का राशन घटा, रहने के हालात और खराब हुए, भूस्खलन और आग जैसी घटनाएं बढ़ीं, और काम के मौके बहुत कम रह गए. इन सब वजहों से कैंपों में रहने वाले लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं. बांग्लादेश के अफसर यह भी मानते हैं कि रोहिंग्याओं की वापसी पूरी तरह म्यांमार के हालात पर निर्भर है. 

टेबल: रोहिंग्या फंडिंग का रुझान (2017–2025)

साल

मिली फंडिंग (USD)

मांगी गई रकम

कमी (फंडिंग गैप)

2017

$315 मिलियन

$434 मिलियन

$120 मिलियन

2018

$688 मिलियन

$950 मिलियन

$262 मिलियन

2019

$692 मिलियन

$921 मिलियन

$229 मिलियन

2020

$630 मिलियन

$877 मिलियन

$248 मिलियन

2021

$690 मिलियन

$943 मिलियन

$253 मिलियन

2022

$620 मिलियन

$881 मिलियन

$261 मिलियन

2023

$620 मिलियन

$876 मिलियन

$256 मिलियन

2024

$581 मिलियन

$852 मिलियन

$271 मिलियन

2025

$355 मिलियन

$935 मिलियन

$580 मिलियन

स्रोत: ISCG CXB, 2025

उलझी हुई पॉलिसी

रखाइन राज्य में बदलते हालात ने बांग्लादेश की रोहिंग्या पॉलिसी में एक नया पहलू जोड़ दिया है. अराकान आर्मी (AA) का उत्तरी रखाइन के बड़े हिस्सों कंट्रोल बढ़ा है, जहां पहले रोहिंग्या रहते थे. इन्हें मान्यता नहीं मिली है, लेकिन रोहिंग्याओं की वापसी के लिए बात इन्हीं से करनी होगी. बड़ी बात यह कि अराकान आर्मी और रोहिंग्याओं में रिश्तों में अभी भी तनाव है. भेदभाव, जबरन बेदखली और जबरन भर्ती जैसी रिपोर्टों ने इस बात पर शक पैदा कर दिया है कि क्या अराकान आर्मी एक बेवतन आबादी की सुरक्षित वापसी के लिए भरोसेमंद माहौल दे सकती है?

रखाइन में बदलती ताकतों ने रोहिंग्या मुद्दे को और पेचीदा बना दिया है. अब जिनके पास जमीन पर कंट्रोल है, वही बातचीत के केंद्र में हैं. लेकिन अराकान आर्मी और रोहिंग्याओं के बीच तनाव की खबरें इस सवाल को और गहरा करती हैं कि जब भरोसा ही कमजोर हो, तो वापसी कैसे सुरक्षित होगी?

अगर बांग्लादेश इतने बड़े पैमाने पर बेघर लोगों को पनाह देते रहना चाहता है, तो दुनिया से लगातार आर्थिक मदद भी बेहद जरूरी होगी. बांग्लादेश की नई हुकूमत के लिए अपने घरेलू मसलों और रोहिंग्या से जुड़े पहलुओं के बीच संतुलन बनाना आगे भी एक बहुत बड़ी चुनौती बना रहेगा.

बांग्लादेश की अंदरूनी सियासत भी इस पूरे मामले की दिशा को प्रभावित कर सकती है. फरवरी 2026 में तारीक रहमान की अगुवाई वाली बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी की हुकूमत ने साफ कहा कि बांग्लादेश रोहिंग्या आबादी को हमेशा के लिए अपने यहां नहीं रख सकता. हालांकि सरकार ने यह भी माना कि जब तक रखाइन में हालात बेहतर नहीं होते, तब तक रोहिंग्या लोगों को बांग्लादेश में ही रहना पड़ सकता है.

रखाइन बनाम ढाका

हाल के वक्त में अराकान आर्मी ने कुछ पहलें की हैं, मसलन नई बांग्लादेशी हुकूमत को मुबारकबाद देना और बांग्लादेशी मछुआरों की रिहाई में मदद करना. इससे लग सकता है कि बातचीत और मदद के कुछ रास्ते खुल सकते हैं. चूंकि अराकान आर्मी का इलाके पर कंट्रोल बढ़ रहा है, इसलिए मुमकिन है कि वह इन्हें चलाने के लिए बाहर से आर्थिक सहारे के रास्ते भी तलाशे.

रोहिंग्या संकट ने अब यह साफ कर दिया है कि बिना लंबी और ठोस नीति के समाधान मुमकिन नहीं है. भासन चार जैसे प्रॉजेक्ट भी अब सवालों के घेरे में हैं. वहीं बांग्लादेश भी घरेलू दबाव, अंतरराष्ट्रीय उम्मीदें और इंसानी जिम्मेदारी- इन सबके बीच फंसा हुआ है. लेकिन बांग्लादेश के लिए यह हालात एक मुश्किल और उलझा हुआ सियासी मसला बनकर सामने आया है. एक तरफ, मसले के हल के लिए रखाइन में मौजूद स्थानीय सरकार से बात करना जरूरी हो सकता है. दूसरी तरफ, उसे ऐसे लोगों को सही ठहराने से बचना होगा, जिनकी रखाइन और वहां रहने वाले रोहिंग्या लोगों पर सोच अभी साफ नहीं है.

संतुलन और लंबा इंतजार

रोहिंग्या संकट के इतने लंबे खिंचने से साफ है कि अब मजबूत और लंबे वक्त तक चलने वाली पॉलिसी चाहिए. अगर बांग्लादेश एक टिकाऊ रणनीति बनाना चाहता है तो भासन चार जैसे प्रॉजेक्टों को फिर से परखना होगा. साथ ही, अगर बांग्लादेश इतने बड़े पैमाने पर बेघर लोगों को पनाह देते रहना चाहता है, तो दुनिया से लगातार आर्थिक मदद भी बेहद जरूरी होगी. बांग्लादेश की नई हुकूमत के लिए अपने घरेलू मसलों और रोहिंग्या से जुड़े पहलुओं के बीच संतुलन बनाना आगे भी एक बहुत बड़ी चुनौती बना रहेगा.


श्रीपर्णा बनर्जी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडी प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.

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