Author : Arya Roy Bardhan

Expert Speak India Matters
Published on Dec 09, 2025 Updated 4 Days ago

हाल ही में भारतीय अर्थव्यवस्था में एक दिलचस्प घटना घटी. भारत की जीडीपी विकास दर 8.2 प्रतिशत रही लेकिन आईएमएफ ने आंकड़ों की गुणवत्ता को “C” ग्रेड दिया. इससे भारत की जीडीपी विकास दर की सत्यता पर सवाल उठे. आखिर सच क्या है? इस लेख से समझिए.

जीडीपी बढ़ी फिर भी ग्रेड “C”! जानें भारत पर IMF की रिपोर्ट का सच

आज भारत दुनिया की उन चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जो 7–8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, फिर भी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भारत के जीडीपी डेटा की गुणवत्ता पर “C” ग्रेड दिया है. यह विरोधाभास कई लोगों को हैरान कर सकता है, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर के आंकड़े पर सवाल उठा सकता है लेकिन इसे अविश्वास के तौर पर नहीं बल्कि एक तकनीकी ऑडिट के रूप में देखा जाना चाहिए. असली कहानी यह है कि आईएमएफ कर्मचारियों ने भारत में जीडीपी मापने के तरीके में विशिष्ट कमज़ोरियों की पहचान की है. खास बात ये है कि भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने पहले ही उस ढांचे की कमज़ोरियों को दूर करना शुरू कर दिया है.

  • 8.2% ग्रोथ के बावजूद IMF का ‘C’ ग्रेड—डेटा गुणवत्ता पर सवाल।
  • IMF ने भारत के GDP मापन ढांचे में विशिष्ट कमज़ोरियाँ चिन्हित कीं।  
  • MoSPI ने पहले ही पहचानी गई कमज़ोरियों पर सुधार शुरू कर दिया है।

आईएमएफ ने वास्तव में क्या कहा?

2025 के आर्टिकल IV रिपोर्ट में, आईएमएफ विभिन्न सांख्यिकीय प्रणालियों को कवरेज़, निरंतरता, आवृत्ति, समयबद्धता और सूक्ष्मता के आधार पर ग्रेड देता है. ग्रेड देने के लिए राष्ट्रीय खातों, मूल्य, सरकारी वित्त, बाहरी क्षेत्र, और मौद्रिक एवं वित्तीय डेटा को भी ध्यान में रखा जाता है. भारत के राष्ट्रीय खातों को कुल मिलाकर C ग्रेड मिला, कवरेज़ के लिए C, सूक्ष्मता के लिए B, और आवृत्ति और समयबद्धता के लिए A ग्रेड मिला. अन्य क्षेत्रों (मूल्य, वित्तीय, बाहरी, वित्तीय) में ज़्यादार में B ग्रेड मिला है.

“आईएमएफ ने भारत के राष्ट्रीय खातों को कुल मिलाकर C ग्रेड दिया, कवरेज़ के लिए C, सूक्ष्मता के लिए B, और आवृत्ति और समयबद्धता के लिए A ग्रेड मिला.”

 

आईएमएफ के वर्तमान 2011-12 जीडीपी श्रृंखला में चार ठोस कमज़ोरियों को उजागर किया है. पहला, जीडीपी की गणना के लिए 2011-12 का आधार वर्ष और मूल्य संरचना जो तरीका अब पुराना या आउटडेटेड हो चुका है. दूसरा, एक डिफ्लेटर के रूप में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) का उपयोग और एकल अवमूल्यन पर भारी निर्भरता, क्योंकि भारत के पास उचित उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) और दोहरा अवमूल्यन ढांचा नहीं है. डिफ्लेटर एक ऐसा आर्थिक उपकरण है जिसे आर्थिक आंकड़ों से महंगाई दर को अलग करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. मौजूदा कीमत और असली कीमत में अंतर पता करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है. तीसरा, उत्पादन पक्ष और व्यय पक्ष से मापी गई जीडीपी के बीच बड़े और परिवर्तनीय अंतर, जो व्यय डेटा और अनौपचारिक क्षेत्र की कवरेज़ में कमज़ोरियों को दिखाते हैं. चौथा, मौसमी समायोजित तिमाही जीडीपी का अभाव और सीमित विसंगति, जिससे उच्च-आवृत्ति विश्लेषण कठिन हो जाता है. यह लेख इन कमियों को दूर करने के लिए पहले से लागू किए गए और आवश्यक कदमों की पहचान और उनकी व्याख्या करने की कोशिश करता है.

 

आउटडेटेड आधार वर्ष: 2022-23 में आधार वर्ष को अपडेट करना

2011-12 को आधार वर्ष के रूप में उपयोग करने का मतलब है कि जीडीपी की मात्रा की गणना अभी भी उन कीमतों और संरचनात्मक पैटर्नों के आधार पर मान ली जाती हैं जो एक दशक से भी ज़्यादा पुरानी है. एक आउटडेटेड आधार वर्ष का मतलब है कि वास्तविक जीडीपी बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए लासपइरिस भार अब वर्तमान उत्पादन और व्यय संरचना को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं. अगर उच्च-विकास वाले क्षेत्रों का भार कम है और घटते क्षेत्रों का भार अधिक है तो यह विकास अनुमान को पक्षपाती बना सकता है.

“आईएमएफ के वर्तमान 2011-12 जीडीपी श्रृंखला में चार ठोस कमज़ोरियों को उजागर किया है—आउटडेटेड आधार वर्ष, डब्ल्यूपीआई पर निर्भरता, उत्पादन–व्यय जीडीपी अंतर, और मौसमी समायोजित तिमाही जीडीपी का अभाव.”

 

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने पहले ही राष्ट्रीय खातों के आंकड़ों पर एक सलाहकार समिति (एसीएनएएस) का गठन किया है. इस कमेटी की अध्यक्षता प्रोफेसर बीएन गोलदार कर रहे हैं. समिति का काम राष्ट्रीय खातों के पूर्ण आधार वर्ष का नए सिरे से संयोजन करने के लिए मार्गदर्शन करना है. अब नया आधार वर्ष 2022-23 है, और एक नई जीडीपी श्रृंखला 27 फरवरी 2026 को जारी की जाएगी. यही आधार वर्ष औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के लिए भी अपनाया जा रहा है. इसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में संशोधनों के अनुरूप किया जा रहा है, जिससे प्रमुख व्यापक संकेतकों में स्थिरता बनी रहे. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि आईएमएफ ने जिन कमज़ोरियों के आधार पर भारत के जीडीपी के आंकड़ों को “C” ग्रेड दिया है, उन्हें पहले से ही सीधे संबोधित किया जा रहा है. असली परीक्षा कार्यान्वयन की होगी. इसके सफल कार्यान्वयन के लिए पारदर्शी दस्तावेज़ीकरण, ऐतिहासिक श्रृंखला का पीछे की ओर अनुमान, और स्पष्ट संचार करना होगा, ताकि नीति निर्माता और बाज़ार जीडीपी डेटा में हुए बदलावों की सही व्याख्या कर सकें.

 

डिफ्लेटर्स, थोक बनाम उत्पादक मूल्य सूचकांक, और सिंगल बनाम डबल डिफ्लेशन

वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद को मूल्य सूचकांक द्वारा नाममात्र मूल्य संवर्धन को घटाकर पता किया जाता है. हालांकि, सही तरीका यह है कि, ये उत्पादन और मध्यवर्ती इनपुट दोनों के लिए उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) पर आधारित होना चाहिए, और डबल डिफ्लेशन का उपयोग करना चाहिए, एक डिफ्लेटर आउटपुट के लिए और दूसरा इनपुट के लिए. भारत में, कई उद्योगों के लिए थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) का इस्तेमाल उत्पादक मूल्य सूचकांक के प्रॉक्सी के रूप में किया गया है, और अक्सर इसे सिंगल डिफ्लेटर के रूप में लागू किया जाता है. इससे वास्तविक मूल्य संवर्धन के आंकड़ों में गलती हो सकती है, विशेषकर तब जब इनपुट और आउटपुट की कीमतें, समय चक्र के दौरान अलग-अलग बढ़ती हों.

 

इस मामले में, आईएमएफ का अपना परिशिष्ट जारी करना सुधार के लिए काफ़ी सकारात्मक है. आईएमएफ कहता है कि, आधार वर्ष बदलने (रीबेसिंग) की परियोजना स्पष्ट रूप से “सिंगल डिफ्लेशन के उपयोग को कम करने, वॉल्यूम एक्सट्रपलेशन का इस्तेमाल करने वाली गतिविधियों की संख्या बढ़ाने या, जहां संभव हो, वहां डबल डिफ्लेशन करने” का लक्ष्य रखती है. आईएमएफ ने आंकड़ों में कमियां सुधारने के लिए सप्लाई-यूज टेबल फ्रेमवर्क के इस्तेमाल की बात भी कही है. यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि, आईएमएफ का क्षमता विकास कार्यक्रम इस मामले में भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय को समर्थन दे रहा है, जिससे वो सप्लाई-यूज टेबल, मौसमी समायोजन और बेहतर डिफ्लेशन प्रथाओं का इस्तेमाल कर सके.

“अब नया आधार वर्ष 2022-23 है, और एक नई जीडीपी श्रृंखला 27 फरवरी 2026 को जारी की जाएगी.”

 

एक उत्पादक मूल्य सूचकांक संरचना पर पिछले कई साल से काम चल रही है. एक सरकारी कार्यसमूह ने पहले ही थोक मूल्य सूचकांक से उत्पादक मूल्य सूचकांक के ढांचे की ओर स्थानांतरित होने की सिफारिश की थी. इस कार्य समूह का मानना था कि, उत्पादक मूल्य सूचकांक अवधारणात्मक रूप से राष्ट्रीय खातों की जरूरतों के ज़्यादा करीब है. आर्टिकल IV रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि, अब एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया गया है, जो पीपीआई पर काम करेगा, और उन क्षेत्रों में जहां डब्ल्यूपीआई पहले से ही एक्स-फैक्टरी कीमतों के करीब है, वहां थोक और उत्पादक मूल्य सूचकांक के बीच का अंतर छोटा हो सकता है.

 

उत्पादन बनाम व्यय जीडीपी और अनौपचारिक क्षेत्र

आदर्श रूप से, उत्पादन के आधार पर जीडीपी (उद्योगों में मूल्य संवर्द्धन का योग) और व्यय के आधार पर जीडीपी (C+I+G+X–M) मेल खाना चाहिए. अगर इसमें थोड़ा-बहुत सांख्यिकीय अंतर है, तो ये मान्य है, लेकिन जब अंतर बड़े, अस्थिर या एकतरफा होते हैं, तो यह दिखाता है कि, कुछ खर्च या कुछ उत्पादन छूट रहा है. ऐसा अक्सर अनौपचारिक सेवाओं की खपत, छोटे निर्माण, या भंडार में बदलाव के मामले में होता है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के चर्चा पत्र में ठीक यही बात की जा रही है कि, वास्तविक-क्षेत्र और अनौपचारिक पक्ष में इन कवरेज़ गैप को कैसे कम किया जाए.

 

वर्तमान श्रृंखला में, असंगठित गैर-कृषि उद्यमों को पुराने बेंचमार्क सर्वेक्षण और अनुमान के आधार पर “प्रभावी श्रम इनपुट” पद्धति के माध्यम से संभाला जाता है. नई श्रृंखला में, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय इसकी बजाय प्रति कार्यकर्ता मूल्य संवर्धन के लिए असंगठित क्षेत्र उद्यमों (एएसयूएसई) के वार्षिक सर्वेक्षण डेटा का उपयोग करेगा, जबकि कार्यबल के लिए पीरियोडिक श्रमबल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) डेटा का इस्तेमाल किया जाएगा. इससे एक दशक पुराने आधार वर्ष से अनुमान लगाने की बजाय असंगठित क्षेत्र के लिए वार्षिक सकल मूल्य संवर्धन (जीवीए) के अनुमान तैयार होंगे.

 

एमजीटी-7 और एमजीटी-7ए फॉर्म्स का इस्तेमाल बहु-गतिविधि वाली कंपनियों को अलग-अलग उद्योग-आधारित गतिविधियों में विभाजित करने के लिए किया जा रहा है, जबकि पहले सभी मूल्य संवर्धन को किसी एक प्रमुख गतिविधि को आवंटित किया जाता था. एमजीटी-7 और एमजीटी-7A फॉर्म्स के ज़रिए रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज़ के पास सालाना रिटर्न दाखिल किया जाता है और ये अनिवार्य होता है. एमजीटी-7 बड़ी कंपनियों के लिए होता है, जबकि एमजीटी-7A वन पर्सन कंपनी या उन छोटी कंपनियों को भरना होता, जिनकी पेड-अप कैपिटल 4 करोड़ से ज़्यादा नहीं होती और पिछले वित्तीय वर्ष का सालाना टर्नओवर 40 करोड़ से ज़्यादा ना हो. सक्रिय लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (एलएलपी) का ढांचा अब पूरी तरह से जीडीपी अनुमान में शामिल किया जा रहा है. इसमें "योगदान की जिम्मेदारी" के आधार पर स्केलिंग की जाती है, ताकि रिटर्न फाइल ना करने वालों को भी शामिल किया जा सके. कृषि, वानिकी, और मत्स्य पालन में इनपुट-आउटपुट अनुपात को विशेष संस्थानों (सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट, सेंट्रल इनलैंड फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट, इंडियन ग्रासलैंड एंड फॉडर रिसर्च इंस्टीट्यूट) द्वारा किए गए समर्पित अध्ययनों का इस्तेमाल करके अपडेट किया जा रहा है. इसका फायदा ये है कि, इससे पुराने फिक्स्ड अनुपात को हटाया जा रहा है, जो कुछ मामलों में 1950 के दशक तक पुराना है. सामान्य सरकारी क्षेत्र में अब स्वायत्त निकायों और स्थानीय सरकारों का बेहतर कवरेज़ दी जाती है. लोकेशन-वाइज़ ड्रॉइंग और डिस्बर्सिंग ऑफिसर (डीडीओ) डेटा राज्यों को सीधे आवंटन करने की सुविधा देता है.

“भारत का पहला राष्ट्रीय घरेलू आय सर्वेक्षण 2026 में जारी किया जाएगा, जो घरेलू आय और उनके वितरण का प्रत्यक्ष अनुमान देगा.”

 

इसमें एक और संरचनात्मक चीज जोड़ने की योजना बनाई गई है. भारत का पहला राष्ट्रीय घरेलू आय सर्वेक्षण 2026 में जारी किया जाएगा, जो घरेलू आय और उनके वितरण का प्रत्यक्ष अनुमान देगा. ये उपभोग और रोजगार सर्वेक्षणों की पूरक होगा. घरेलू आय और व्यय का जीडीपी के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए ये सर्वेक्षण बहुत महत्वपूर्ण होगा.

 

मौसमी रूप से समायोजित जीडीपी और आंकड़ों की सटीकता 

मौसमी समायोजन के बिना, वास्तविक तस्वीर को मौसमी पैटर्न से अलग करना मुश्किल है, जैसे कि त्योहारी सीज़न में बिक्री में बढ़ोतरी हो जाती है, जबकि मानसून में मंदी. निवेश और तिमाही आंकड़ों का सीमित क्षेत्रीय विवरण यह विश्लेषण करने में बाधा डालता है कि, कौन से क्षेत्र पूंजीगत व्यय चक्र को चला रहे हैं, और क्या सार्वजनिक निवेश निजी निवेश को 'क्राउडिंग इन' कर रहा है. क्राउडिंग इन का मतलब सार्वजनिक निवेश से निजी निवेश का भी बढ़ना होता है. आईएमएफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि, क्षमता विकास पहले ही मौसमी समायोजन और प्रसार प्रथाओं को कवर कर चुका है. आईएमएफ के विशेषज्ञ मौसमी समायोजित अनुमान और बेहतर बेंचमार्किंग तकनीकों को विकसित करने में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की मदद कर रहे हैं,  और ये आधार वर्ष बदलने की परियोजना का हिस्सा है.

 

अर्थव्यवस्था को स्पष्ट रूप से गैर-वित्तीय निगमों, वित्तीय निगमों, सामान्य सरकार, परिवार और घरों की सेवा करने वाले गैर-लाभकारी संस्थानों (एलपीआईएसएच) में विभाजित किया गया है, जैसा कि 2008 की राष्ट्रीय खाता प्रणाली (एसएनए-2008) में किया गया है. कॉर्पोरेट डेटा को अब उद्योग गुणा आकार वर्ग के आधार पर वर्गीकृत किया गया है, जिससे गैर-फाइलरों को संभालने के लिए ज़्यादा टार्गेटेड मल्टीप्लायर उपलब्ध हैं. इस प्रणाली में, उद्योगों और आकार के अनुसार पूंजी सघनता में अंतर को स्वीकार किया गया है. वित्तीय क्षेत्र का सकल मूल्य संवर्धित उत्पादन 9 उप-क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, जिसमें गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए STRBI और MCA-21 जैसे समृद्ध डेटा सेट का उपयोग किया गया है. इसके अलावा लोन देने वाले साहूकारों, पेंशन फंडों और बीमा सहायक संस्थाओं का अधिक विस्तृत अध्ययन किया गया है. ये बदलाव संस्थागत क्षेत्र खातों की विश्लेषणात्मक क्षमता को बढ़ाते हैं और समय के साथ निवेश, बचत और बैलेंस शीट का तेज़ और समृद्ध विभाजन संभव बनाते हैं.

 

आईएमएफ के “C”  ग्रेड के क्या सबक?

आईएमएफ ने राष्ट्रीय खातों के लिए जो “C”  ग्रेड दिया है, नीति निर्माताओं के लिए उसे तकनीकी चेतावनी के रूप में पढ़ना सबसे बेहतर है, क्योंकि ये वर्तमान सुधारों की दिशा को बड़े पैमाने पर मान्यता देता है. आईएमएफ की रिपोर्ट पुराने आधार वर्ष, थोक मूल्य सूचकांक पर अधिक निर्भरता, एकल मंहगाई में कमी, अनौपचारिक और व्यय पक्ष की अपूर्ण कवरेज़ की आलोचना करती है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय का चर्चा पत्र और व्यापक आधार-वर्ष सुधार, विशेष रूप से इन्हीं मुद्दों को ठीक करने के लिए डिज़ाइन किया गया है. 2022-23 आधार वर्ष, समृद्ध डेटा स्रोत (MCA-21, ASUSE, PLFS), क्षेत्र-वार इनपुट-आउटपुट अपडेट, और मंहगाई और मौसमी समायोजन में आईएमएफ की सहायता से किए जा रहे सुधारों के माध्यम से इन कमियों को दूर किया जा सकता है.

 

भारत के विकास की कहानी इतनी वास्तविक है कि, अब इसे उसके योग्य मापदंड प्रणाली की ज़रूरत है. इसे सही ढंग से तैयार करना सिर्फ आईएमएफ को प्रभावित करने का लक्ष्य नहीं होना चाहिए. इसका मक़सद भारतीय नीति निर्माताओं, फर्मों और नागरिकों को उनकी अपनी अर्थव्यवस्था की एक अधिक स्पष्ट और ईमानदार तस्वीर देना होना चाहिए. अगर सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के चर्चा पत्रों में सुझाए गए सुधारों को कठोरता, पारदर्शिता और गति के साथ लागू किया जाता है, तो इससे देश का ही भला होगा. इस बात की भी उम्मीद की जा सकती है कि, अगली बार जब आईएमएफ भारत की जीडीपी को ग्रेड देगा तो ये B या A होगी, पूरी तरह तार्किक और मज़बूत.


आर्य रॉय बर्धन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में जूनियर फेलो हैं.

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