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Published on Apr 07, 2025 Updated 0 Hours ago

हाल के दिनों में सितंबर 2023 में दूसरे अमेरिका-पैसिफिक आईलैंड फोरम समिट के दौरान बाइडेन प्रशासन ने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने, आर्थिक विकास को बढ़ावा देने, और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार लाने के मक़सद से 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर देने का वादा किया.

प्रशांत महासागर (पैसिफिक) में शांति स्थापित करने की परिकल्पना!

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ये लेख रायसीना फाइल्स 2025 सीरीज़ का हिस्सा है.


प्रशांत महासागर, जिसे अक्सर शांत जल का एक विशाल विस्तार माना जाता है, एक ऐसा क्षेत्र है जो वैश्विक भू-राजनीति, पर्यावरण की चुनौतियों और सांस्कृतिक कूटनीति के चौराहे पर स्थित है. इस क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और 14 द्वीपीय देश- कुक आईलैंड, माइक्रोनेशिया के संघीय राज्य, पापुआ न्यू गिनी, समोआ, टोंगा साम्राज्य, न्यू आईलैंड, फिजी गणराज्य, किरिबाती गणराज्य, मार्शल आईलैंड गणराज्य, नौरू गणराज्य, पलाऊ गणराज्य, वनुआतू गणराज्य, सोलोमन आईलैंड और तुवालू- शामिल हैं और ये प्राकृतिक संसाधनों, असाधारण भाषाई और सांस्कृतिक विविधता से संपन्न है. ये सामरिक रूप से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक भी है जो बढ़ते आर्थिक अवसरों, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और जलवायु परिवर्तन के कारण अस्तित्व पर उत्पन्न ख़तरों के बीच नाज़ुक संतुलन बनाए रखता है.

जैसे-जैसे ये क्षेत्र तेज़ आर्थिक गिरावट, जिसका कारण आंशिक रूप से कोविड-19 महामारी है, के दौर से उबर रहा है, वैसे-वैसे कई पैसिफिक देश विकास को तेज़ करने में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.[1] ये देश जलवायु, स्वास्थ्य और आर्थिक झटकों को लेकर संवेदनशील बने हुए हैं जिसके कारण सप्लाई चेन में कमी आ रही है, महंगाई बढ़ रही है और विकास बाधित हो रहा है. जिस समय दुनिया की बड़ी शक्तियां अपने प्रभाव के लिए होड़ में लगी हैं और द्वीपीय देश पर्यावरण से जुड़े अभूतपूर्व ख़तरों का सामना कर रहे हैं, उस समय पैसिफिक में शांति की तलाश इतनी ज़रूरी कभी नहीं रही.

ये लेख दलील देता है कि पैसिफिक में स्थायी शांति के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है- ऐसा दृष्टिकोण जो सहयोग को बढ़ावा देता हो, संघर्षों को कम करता हो और पारंपरिक एवं गैर-पारंपरिक- दोनों तरह की सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करता हो. चूंकि वैश्विक मंच पर पैसिफिक की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है, ऐसे में यहां स्थायी शांति बनाए रखना न सिर्फ यहां के द्वीपीय देशों की ज़िम्मेदारी है बल्कि पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी.

भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ता सैन्यीकरण

प्रशांत क्षेत्र भू-राजनीतिक मुकाबले का एक केंद्र बिंदु बन गया है, विशेष रूप से अमेरिका-चीन दुश्मनी के संदर्भ में. दोनों वैश्विक शक्तियां अपना असर बढ़ाने के लिए होड़ में शामिल हैं. इस उद्देश्य को देखते हुए प्रशांत के द्वीप सैन्य अड्डों, आर्थिक गलियारों और रणनीतिक जहाज़ के रास्तों के लिए  महत्वपूर्ण स्थान के रूप में काम कर रहे हैं.[2]

अमेरिका लंबे समय से पैसिफिक को अपने सामरिक हितों के लिए महत्वपूर्ण जगह के रूप में समझता रहा है जिसके कारण वो जहाज़ के रूट को सुरक्षित करने और सैन्य तैनाती पर ध्यान देता रहा है. विशेष रूप से दक्षिणी प्रशांत को लंबे समय से अमेरिका के आस-पास के हिस्से के रूप में देखा जाता रहा है. ये एक ऐसा क्षेत्र है जहां अमेरिका के सहयोगी ऑस्ट्रेलिया का दबदबा है.[3] 2022 में अमेरिका ने अमेरिका-पैसिफिक साझेदारी रणनीति की घोषणा की. ये पैसिफिक के साथ सहयोग को मज़बूत करने की एक रणनीति थी जो जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने, परमाणु अप्रसार, समुद्री सुरक्षा और कोविड-19 महामारी के बाद की आर्थिक बहाली समेत साझा लक्ष्यों के द्वारा निर्देशित थी. पहले के वर्षों में पैसिफिक को सहायता में कमी करने के बाद सितंबर 2022 में तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पैसिफिक के द्वीपों के लिए 10 वर्षों के दौरान 810 मिलियन अमेरिकी डॉलर के सहायता पैकेज का एलान किया.[4] अमेरिकी सरकार ने अवैध ढंग से मछली पकड़ने पर नियंत्रण के लिए समर्थन का भी संकल्प लिया. अमेरिकी तटरक्षक बल स्थानीय क्षमताओं को मज़बूत करने में सहायता कर रहा है, विशेष रूप से पापुआ न्यू गिनी (PNG)[i] में. जलवायु पर काम करने वाली परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त 130 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि आवंटित की गई.[5]

चीन सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार चीन ने 70 के दशक से पैसिफिक में 100 से अधिक सहायता परियोजनाओं की फंडिंग की है, 200 से अधिक बार सामानों के ज़रिए सहायता की है और लगभग 10,000 स्थानीय पेशेवरों को प्रशिक्षित किया है.  लोवी इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के अनुसार 2008 और 2020 के बीच चीन ने पैसिफिक को लगभग 3.148 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता मुहैया कराई.  

इससे पहले फरवरी 2022 में 30 साल के अंतराल के बाद अमेरिका ने सोलोमन आईलैंड में अपना दूतावास फिर से खोला. उसी साल अमेरिका ने ऐतिहासिक रक्षा एवं सुरक्षा समझौते के साथ सुरक्षा संबंधों को मज़बूती दी. अमेरिका ने अवैध ढंग से मछली पकड़ने पर रोक के लिए मदद का भी भरोसा दिया. ये प्रयास 2020 में हस्ताक्षरित अमेरिका-फिजी व्यापार एवं निवेश संधि (TIFA) को आगे ले जाते हैं. TIFA अमेरिका और फिजी की सरकार के बीच व्यापार एवं निवेश के मुद्दों पर संवाद के लिए एक रणनीतिक ढांचा और सिद्धांत प्रदान करती है. उस समय से फिजी पैसिफिक आईलैंड का इकलौता देश बन गया है जो 14 सदस्यों वाली अमेरिका की आर्थिक पहल इंडो-पैसिफिक आर्थिक रूप-रेखा (IPEF) में शामिल हो गया है.

हाल के दिनों में सितंबर 2023 में दूसरे अमेरिका-पैसिफिक आईलैंड फोरम समिट के दौरान बाइडेन प्रशासन ने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने, आर्थिक विकास को बढ़ावा देने, अवैध ढंग से मछली पकड़ने का मुकाबला करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार लाने के उद्देश्य वाली परियोजनाओं और गतिविधियों के मक़सद से 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर और प्रदान करने के लिए कांग्रेस के साथ काम करने का वादा किया.[6] उसी साल अमेरिका ने पापुआ न्यू गिनी के साथ एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए जिसका लक्ष्य इस द्वीपीय देश की रक्षा क्षमताओं को मज़बूत करना और भविष्य में अमेरिकी सेना को यहां तैनात करने के लिए अनुमति हासिल करना था. अमेरिका ने इस क्षेत्र के नेताओं के साथ संवाद का विस्तार करने की भी कोशिश की जिसके तहत 2023 में पहली बार पैसिफक लीडर्स समिट की मेज़बानी की.

इस बीच चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और प्राकृतिक संसाधनों की महत्वाकांक्षा से प्रेरित बढ़ती मौजूदगी ने क्षेत्रीय ताकतों के बीच चिंता पैदा की है. वैसे तो पैसिफिक आईलैंड का क्षेत्र लंबे समय से चीन के भू-रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण रहा है लेकिन अधिक सहायता, विकास, सुरक्षा सहयोग और कूटनीति के माध्यम से हाल के वर्षों में चीन ने पैसिफिक के साथ अपनी भागीदारी में बढ़ोतरी की है. ऐसा करके चीन का लक्ष्य निम्नलिखित परस्पर जुड़े लक्ष्यों को प्राप्त करना है: इस क्षेत्र तक नौसैनिक पहुंच हासिल करना, ताइवान के ख़िलाफ़ कूटनीतिक जीत हासिल करना, पैसिफिक देशों के विशाल आर्थिक क्षेत्रों में मछली पकड़ने एवं समुद्रतल के खनन का अधिकार सुरक्षित करना और चीन के प्रवासियों की भी सुरक्षा करना.[7] इसके साथ-साथ चीन पैसिफिक आईलैंड के ज़्यादातर देशों के लिए सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है. अधिक व्यापक रूप से कहें तो चीन ने BRI के ढांचे के भीतर पैसिफिक में उल्लेखनीय निवेश किया है और पैसिफिक के एक प्रमुख विकास साझेदार के रूप में उभरा है. चीन सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार चीन ने 70 के दशक से पैसिफिक में 100 से अधिक सहायता परियोजनाओं की फंडिंग की है, 200 से अधिक बार सामानों के ज़रिए सहायता की है और लगभग 10,000 स्थानीय पेशेवरों को प्रशिक्षित किया है.[8] लोवी इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के अनुसार 2008 और 2020 के बीच चीन ने पैसिफिक को लगभग 3.148 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता मुहैया कराई.[9]

इसके अलावा चीन ने पैसिफिक में बुनियादी ढांचे की कई परियोजनाओं का निर्माण किया जिसके लिए पैसों का इंतज़ाम उसने अपने कर्ज़ के ज़रिए किया.[ii][10] इनमें से ज़्यादातर परियोजनाओं के लिए फंड चीन के प्राथमिक नीतिगत बैंक यानी चीन के आयात-निर्यात बैंक और चाइना डेवलपमेंट बैंक ने दिया. ये ऐसी परियोजनाएं थीं जिनके लिए दूसरे देश या दान देने वाले संस्थान फंड देने में सक्षम नहीं रहे या नहीं चाहते थे.

चीन ने इस क्षेत्र के कई देशों में उदार छात्रवृत्ति कार्यक्रम और प्रशिक्षण की सुविधा भी प्रदान की है.  इसके साथ-साथ चीन ने छह कन्फ्यूशियस संस्थानों की भी स्थापना की है. पिछले दशक में कई उच्चस्तरीय कूटनीतिक दौरे, जिनमें दो बार राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यात्रा शामिल है, इस क्षेत्र में चीन की दिलचस्पी को उजागर करते हैं. 2022 में सोलोमन आईलैंड के साथ चीन के सुरक्षा समझौते[iii], जिसमें पुलिस सहयोग शामिल है, को एक रणनीतिक घुसपैठ के रूप में देखा गया है. इसी तरह फरवरी 2025 में ये घोषणा भी है कि कुक आईलैंड के प्रधानमंत्री चीन के साथ संबंधों को मज़बूत करने के लिए बीजिंग का दौरा करेंगे. इन दोनों घटनाक्रमों ने अमेरिका और उसके सहयोगियों से अधिक भागीदारी को बढ़ावा दिया है.[11]

ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसी क्षेत्रीय शक्तियों ने भी पैसिफिक की भू-राजनीति को निर्धारित करने में निर्णायक भूमिका अदा की है. ऐतिहासिक रूप से पैसिफिक को अपना इलाका समझने वाले ऑस्ट्रेलिया ने फालेपिली यूनियन जैसी पहल के माध्यम से तुवालू के साथ नेतृत्व बनाए रखने की कोशिश की है. ये पहल रेज़िडेंसी के बदले तुवालू के सुरक्षा समझौतों में ऑस्ट्रेलिया को वीटो पावर देती है. हालांकि तुवालू के राजनीतिक बदलाव के बीच समझौते का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है.[12] ये पैसिफिक में गठबंधन की अनिश्चितता को उजागर करता है. 2024 के अंत में पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन आईलैंड और नौरू के साथ बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर करके ऑस्ट्रेलिया ने क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधों को मज़बूत किया.[13] इस बीच न्यूज़ीलैंड ने एक संतुलित दृष्टिकोण पर ज़ोर दिया है और चीन एवं अमेरिका- दोनों के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाते हुए क्षेत्रीय स्थिरता की वकालत की है.[14] 

बहुपक्षीय स्तर पर क्वॉड (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत) और ऑकस (अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और UK) जैसे सुरक्षा समझौतों ने इस क्षेत्र का और अधिक सैन्यीकरण कर दिया है. परमाणु से लैस पनडुब्बियों और आधुनिक सैन्य हथियारों की आशंका ने हथियारों की रेस तेज़ होने के बारे में बहस छेड़ दी है जिससे दीर्घकालीन स्थिरता को लेकर चिंता बढ़ गई है.[15]

पैसिफिक के देशों में घरेलू राजनीति जटिलता की एक और परत जोड़ती है. उदाहरण के तौर पर, फिजी के लिए चीन और पश्चिमी ताकतों के बीच संतुलन बनाना मुश्किल बना हुआ है. ये स्थिति उस समय है जब 2022 में प्रधानमंत्री के रूप में सितिवेनी राबुका सत्ता में लौट चुके हैं जो ऑस्ट्रेलिया के साथ संबंधों में संभावित सुधार का संकेत है.[iv][16] इसी तरह वनुआतू की राजनीतिक अस्थिरता ने बाहरी ताकतों के लिए पारंपरिक नेताओं को अपने पक्ष में करने का अवसर उत्पन्न किया है जो भू-राजनीतिक दुश्मनी को और गहरा करता है.[17]

इस उथल-पुथल भरी स्थिति में पैसिफिक द्वीप महाशक्तियों के मुकाबले से निपटने और ज़रूरी घरेलू मुद्दों का समाधान करने की दोहरी चुनौती का सामना करते हैं. इस क्षेत्र का सामरिक महत्व सुनिश्चित करता है कि भू-राजनीतिक तनाव उसके भविष्य की एक निर्णायक विशेषता बना रहेगा जिसका स्थानीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा- दोनों के लिए परिणाम होगा.

स्थानीय दबाव: संप्रभुता और आत्मनिर्णय

पैसिफिक में शांति की खोज संप्रभुता और आत्मनिर्णय के जटिल अंतर्संबंध के कारण और भी मुश्किल हो गई है. पैसिफिक आईलैंड के कई देश बड़ी ताकतों के बाहरी क्षेत्र (ओवरसीज़ टेरिटरी) बने हुए हैं. ये राजनीतिक और सामाजिक तनाव उत्पन्न करता है जो क्षेत्रीय स्थिरता को चुनौती देता है.

न्यू कैलेडोनिया इन संघर्षों का उदाहरण है. पैसिफिक में फ्रांस की बढ़ती सैन्य मौजूदगी के बीच[18] इस क्षेत्र ने अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर बार-बार अशांति का सामना किया है. 2023 में फ्रांस सरकार, न्यू कैलेडोनिया के वफादारों और कनाकी स्वतंत्रता आंदोलन के हितों में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास गतिरोध की स्थिति में पहुंच गया. इसके बाद फ्रांस के द्वारा विवादित संवैधानिक बदलावों को लागू करने के फैसले- जिसमें ज़्यादा गैर-स्थानीय निवासियों को शामिल करने के लिए मतदाता सूची का विस्तार शामिल है- ने तनाव में और बढ़ोतरी की. वैसे तो इन फैसलों का उद्देश्य राजनीतिक स्थिति को स्थिर करना था लेकिन इससे स्वतंत्रता समर्थक समूहों और फ्रांस के वफादारों के बीच विभाजन और गहरा हो गया जिससे शांति के प्रयास कमज़ोर हुए हैं.[19]

गैर-पारंपरिक सुरक्षा ख़तरे: चुनौतियां या शांति के लिए प्रेरक?

पर्यावरण में बदलाव को लेकर पैसिफिक आईलैंड के देश सबसे संवेदनशील देशों में से हैं. यहां समुद्र के बढ़ते स्तर, अधिक तापमान, बारिश के पैटर्न में बदलाव, महासागरीय अम्लीकरण और जलवायु से जुड़ी चरम स्थितियों की बारंबरता और तीव्रता में बढ़ोतरी का अनुभव किया जाता है.[20] पश्चिमी उष्णकटिबंधीय प्रशांत के कुछ हिस्सों में समुद्र के स्तर में लगभग 10 से 15 सेंटीमीटर (4 से 6 इंच) बढ़ोतरी हुई है जो 1993 से मापी गई वैश्विक दर का लगभग दोगुना है. इस बीच उष्णकटिबंधीय प्रशांत में समुद्र का स्तर लगभग 5 से 10 सेंटीमीटर (2 से 4 इंच)[v][21] बढ़ गया है. इसके साथ-साथ बढ़ते समुद्र के स्तर का नतीजा 80 के दशक से तटीय इलाकों में बार-बार बाढ़ आने के रूप में निकला है. गुआम में साल में दो की जगह 22 बार; कुक आईलैंड के पेनरहिन में साल में पांच की जगह 43 बार; मार्शल आईलैंड गणराज्य के माजुरो में साल में दो की जगह 20 बार; फ्रेंच पोलिनेशिया के पपीटे में साल में पांच की जगह 34 बार और अमेरिकन समोआ के पागो पागो में शून्य की जगह 102 बार उल्लेखनीय बढ़ोतरी है.[22]

पहले से ही सीमित संसाधनों और बुनियादी ढांचे से जूझ रहे पैसिफिक आईलैंड के देश खेती की ज़मीन, घर और पूरे समुदायों के नष्ट होने के साथ-साथ अपनी ज़मीन से आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संपर्क ख़त्म होने का सामना कर रहे हैं.   अध्ययनों से पता चलता है कि ये देश साल 2100 तक रहने के लायक शायद नहीं रहेंगे. इस तरह 6,00,000 लोग बिना किसी देश के जलवायु शरणार्थी बन जाएंगे

पर्यावरण से जुड़े ये बदलाव न केवल द्वीपीय देशों के भौतिक अस्तित्व को ख़तरे में डालते हैं बल्कि उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिरता को भी जिसका असर देशों की सीमा के पार भी होता है. समुद्र का बढ़ता स्तर और प्राकृतिक आपदाएं कृषि योग्य भूमि को नष्ट कर रही हैं, लोगों को विस्थापित कर रही है और बुनियादी ढांचे को बर्बाद कर रही हैं. पहले से ही सीमित संसाधनों और बुनियादी ढांचे से जूझ रहे पैसिफिक आईलैंड के देश खेती की ज़मीन, घर और पूरे समुदायों के नष्ट होने के साथ-साथ अपनी ज़मीन से आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संपर्क ख़त्म होने का सामना कर रहे हैं.[vi][23] अध्ययनों से पता चलता है कि ये देश साल 2100 तक रहने के लायक शायद नहीं रहेंगे. इस तरह 6,00,000 लोग बिना किसी देश के जलवायु शरणार्थी बन जाएंगे.[24]

इसका परिणाम भौतिक विस्थापन से आगे तक है और इससे जल सुरक्षा, खाद्य प्रणाली और आजीविका को ख़तरा होगा. महासागर का बढ़ता तापमान मछली पकड़ने के पारंपरिक तौर-तरीकों- जो पैसिफिक आईलैंड की कई अर्थव्यवस्थाओं की बुनियाद है- में रुकावट डाल रहा है. ताज़ा पानी की सप्लाई भी ख़तरे में है. किरिबाती में खारे पानी ने लोगों को आयातित बोतलबंद पानी पर निर्भर रहने को मजबूर कर दिया है. ये दबाव हाशिए पर मौजूद समूहों, जिनमें महिलाएं, देसी समुदाय और ग्रामीण जनसंख्या शामिल हैं, पर बहुत ज़्यादा प्रभाव डालते हैं जिससे सामाजिक और आर्थिक असमानताओं में बढ़ोतरी होती है.[25] इसकी बहुत ज़्यादा आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ती है. उल्लेखनीय है कि 2015 में वनुआतू को पाम चक्रवाती तूफान की वजह से अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 70 प्रतिशत गंवाना पड़ा था. इसके बाद आए तूफानों के कारण वनुआतू को अपनी GDP का 12 प्रतिशत और गंवाना पड़ा.[26]

जलवायु परिवर्तन की वजह से ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है और ये क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को कमज़ोर करता है. समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी और बेहद ख़राब मौसम के ख़तरों के कारण विस्थापन ज़मीन के अधिकारों और पुनर्वास को लेकर विवादों में बढ़ोतरी करता हैं. मछली के भंडार और ताज़ा पानी जैसे घटते संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा सामाजिक अशांति और अलग-अलग देशों के बीच तनाव और बढ़ा सकता है.

वास्तव में पर्यावरण से जुड़ी अस्थिरता और संघर्ष की आशंका के बीच संबंध से इनकार नहीं किया जा सकता. ये शांति निर्माण के प्रयासों की संकल्पना और कार्यान्वयन में आमूलचूल बदलाव को ज़रूरी बनाता है. चूंकि जलवायु से जुड़ी चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं, ऐसे में क्षेत्रीय स्थिरता के प्रमुख घटक के रूप में पर्यावरण से जुड़े आयामों को शामिल करने के लिए पारंपरिक सुरक्षा ढांचे में बदलाव करना चाहिए. इसके लिए शांति निर्माण की पहल में जलवायु सामर्थ्य को जोड़ने की आवश्यकता है ताकि आर्थिक विकास, सुरक्षा सहयोग और पर्यावरण से जुड़ी स्थिरता का एक साथ समाधान किया जा सके. पैसिफिक आईलैंड फोरम जैसे क्षेत्रीय संगठनों को जलवायु अनुकूलन और प्रवासन प्रबंधन को प्राथमिकता देनी चाहिए जबकि क्वॉड और यूरोपियन यूनियन (EU) जैसे संगठनों वाली अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां तकनीकी और वित्तीय समर्थन मुहैया करा सकती हैं. समुद्र के बढ़ते स्तर, संसाधनों की कमी और चरम मौसमी घटनाओं जैसी पर्यावरण से जुड़ी अस्थिरता के मूल कारणों का समाधान किए बिना पैसिफिक में शांति के प्रयास अधूरे और अस्थिर बने रहेंगे.

सामर्थ्य तैयार करने के लिए बहु-स्तरीय दृष्टिकोण और स्थानीय, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय प्रयासों को जोड़ने की आवश्यकता होती है. क्षमता निर्माण और सभी लोगों को शामिल करके निर्णय लेने के माध्यम से समुदायों को सशक्त करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सीमा पार की चुनौतियों से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग को मज़बूत करना. समावेशी और सहयोगात्मक रणनीतियों के माध्यम से ही प्रशांत क्षेत्र पर्यावरण और सुरक्षा ख़तरों के जटिल अंतर्संबंधों का सामना कर सकता है और इस तरह एक स्थिर एवं शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण कर सकता है.

नई चुनौतियों का समाधान: आगे के लिए एक तालमेल वाला रास्ता

पैसिफिक के लोगों को पर्यावरण से जुड़ी आपदाओं के कारण बढ़ते ख़तरों के अनुसार ख़ुद को बदलने के लिए तुरंत समर्थन की आवश्यकता है क्योंकि इन आपदाओं से उनकी भलाई, आजीविका और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे ख़तरे में हैं. भौगोलिक अलगाव और आर्थिक असुरक्षा, जैसे कि विदेश से भेजे गए पैसे और विदेशी सहायता पर निर्भरता, इन चुनौतियों को बढ़ाती हैं और इस तरह क्षेत्र की विशेष आवश्यकताओं के अनुसार नई और सहयोगात्मक नीति की आवश्यकता पर ज़ोर देती है.

मुश्किल चुनौतियों का समाधान करने के लिए क्षेत्रीय प्रयास महत्वपूर्ण हैं. नवंबर 2023 में पैसिफिक आईलैंड फोरम के नेताओं की 52वें बैठक के दौरान जलवायु गतिशीलता पर प्रशांत क्षेत्रीय ढांचे को मंज़ूर किया गया. ये एक ऐतिहासिक पहल है जो सरकारों, समुदायों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को जलवायु से संबंधित विस्थापन से निपटने में रास्ता दिखाने के लिए तैयार की गई है.[27] ये ढांचा लोगों के अधिकारों और गरिमा को सुरक्षित रखने के महत्व पर ज़ोर देता है- चाहे वो उसी जगह रहने को पसंद करें, स्वेच्छा से दूसरी जगह जाएं या जाने के लिए मजबूर होना पड़े.[vii]

ये प्रयास उस समय जलवायु गतिशीलता का समाधान करने में पैसिफिक के सक्रिय रवैये को उजागर करते हैं जब ये क्षेत्र सीमित संसाधनों और क्षमता के साथ जूझ रहा है. इन सफलताओं को आगे बढ़ाकर और क्षेत्रीय तालमेल को बढ़ावा देकर पैसिफिक इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे दूसरे असुरक्षित क्षेत्रों के लिए एक उदाहरण स्थापित कर सकता है.

इसके अलावा पैसिफिक के नेताओं ने प्रशांत सामर्थ्य केंद्र (पैसिफिक रिज़िलिएंस फैसिलिटी) के लिए अपने समर्थन को दोहराया है. 2021 में स्थापित ये सुविधा केंद्र स्थानीय जलवायु अनुकूलन की परियोजनाओं को फंड देने के लिए सदस्यों के द्वारा प्रबंधित एक सामुदायिक वित्तपोषण की प्रणाली है.[28] ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और अमेरिका के द्वारा किए गए प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए समान विचार वाले साझेदार जैसे कि जापान, भारत और अन्य देश इस सुविधा का समर्थन करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. उदाहरण के लिए, जापान आपदा को झेल सकने वाले बुनियादी ढांचे[29] में अपनी विशेषज्ञता के ज़रिए योगदान कर सकता है जबकि भारत उभरती तकनीक में अपनी क्षमताओं का लाभ उठा सकता है.[30]

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से प्रेरित जलवायु निगरानी और पूर्वानुमान प्रणाली जैसी उभरती तकनीक का इस्तेमाल प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (अर्ली वॉर्निंग सिस्टम) और आपदा तैयारी को सुधारने में किया जा सकता है. इस तरह का तालमेल न केवल इस सुविधा केंद्र की परिचालन क्षमता को मज़बूत करेगा बल्कि जलवायु से जुड़े ख़तरों का समाधान करने में इनोवेशन को भी बढ़ावा देगा.

जलवायु सुरक्षा की साझा चुनौतियों का समाधान करने के लिए मज़बूत अंतर-क्षेत्रीय इंडो-पैसिफिक प्रयास भी आवश्यक है. पैसिफिक और व्यापक इंडो-पैसिफिक में क्षेत्रीय संगठन जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न ख़तरों का जवाब देने के लिए समन्वय के उद्देश्य से एक साझा जलवायु परिवर्तन कार्य समूह की स्थापना कर सकते हैं. 

जलवायु सुरक्षा की साझा चुनौतियों का समाधान करने के लिए मज़बूत अंतर-क्षेत्रीय इंडो-पैसिफिक प्रयास भी आवश्यक है. पैसिफिक और व्यापक इंडो-पैसिफिक में क्षेत्रीय संगठन जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न ख़तरों का जवाब देने के लिए समन्वय के उद्देश्य से एक साझा जलवायु परिवर्तन कार्य समूह की स्थापना कर सकते हैं. दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संघ (आसियान) और इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन (IORA) जैसे संस्थान, जिन्होंने पहले ही जलवायु परिवर्तन और सुरक्षा के इर्द-गिर्द बढ़ती चिंताओं को स्वीकार किया है, पैसिफिक आईलैंड फोरम (PIF)[31] और अलायंस ऑफ स्मॉल आईलैंड स्टेट्स (AOSIS)[32] जैसे पैसिफिक आधारित संगठनों के साथ तालमेल कर सकते हैं. इस तरह की साझेदारी जानकारी साझा करने, डेटा के आदान-प्रदान और उभरती तकनीकों, क्लाइमेट मॉडलिंग और जोखिम की स्थिति की योजना के लिए पायलट प्रोग्राम के कार्यान्वयन में सहायक हो सकती है. संसाधनों और विशेषज्ञता को इकट्ठा करके ये संगठन प्रशांत क्षेत्र की विशेष असुरक्षा के लिए उपयुक्त इनोवेटिव समाधान विकसित कर सकते हैं.

इसके अलावा इन पहल को आगे बढ़ाने में क्वॉड एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. क्वॉड जलवायु परिवर्तन और शमन पैकेज (Q-CHAMP) और समुद्री क्षेत्र जागरूकता के लिए हिंद-प्रशांत साझेदारी (IPMDA)[33] जैसे मौजूदा कार्यक्रमों को आगे बढ़ाते हुए क्वॉड पैसिफिक में जलवायु सुरक्षा का समाधान करने के लिए एक विशेष कार्य समूह की स्थापना कर सकता है. इस क्षेत्र में प्रमुख दान देने वाले देश के रूप में क्वॉड के सदस्य आपदा सामर्थ्य, जलवायु अनुकूलन और स्थिर विकास के प्रयासों में सहायता करने के लिए अच्छी स्थिति में हैं. अपने सामूहिक संसाधनों और तकनीकी क्षमताओं का लाभ उठाकर क्वॉड पैसिफिक आईलैंड के देशों की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए नए कार्यक्रमों जैसे कि AI आधारित जलवायु निगरानी प्रणाली या समुदाय आधारित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को शुरू करने में मदद कर सकता है.[34]

इसके साथ-साथ EU और संयुक्त राष्ट्र समेत अंतरराष्ट्रीय और बहुपक्षीय संगठन भी अतिरिक्त समर्थन प्रदान करने में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं. जलवायु वित्त, क्षमता निर्माण और टिकाऊ विकास में अपने व्यापक अनुभव के आधार पर ये संस्थान क्षेत्रीय प्रयासों में मदद कर सकते हैं और प्रशांत क्षेत्र की जलवायु चुनौतियों को लेकर एक समन्वित वैश्विक प्रतिक्रिया सुनिश्चित कर सकते हैं. एक साथ मिलकर ये तालमेल वाली पहल जलवायु परिवर्तन और सुरक्षा के एक-दूसरे से जुड़े मुद्दे का समाधान करने के लिए एक मज़बूत ढांचा तैयार करती है जो पैसिफिक के लिए एक अधिक समर्थ और टिकाऊ भविष्य सुनिश्चित कर सकता है.

Endnotes


[1] Anne-Marie Schleich, “Pacific Island Countries, China and the US: Recent Geopolitical Trends,” RSIS Commentary, November 27, 2023, https://www.rsis.edu.sg/rsis-publication/rsis/pacific-island-countries-china-and-the-us-recentgeopolitical- trends/.

[2] “U.S.-China Competition in the Indo-Pacific,” RAND Corporation, https://www.rand.org/paf/projects/ us-china-competition.html; Moses Sakai, “Does the Pacific Islands Remain: US-China Competition?,” Pacific Forum, January 11, 2024, https://pacforum.org/publications/pacnet-2-can-the-pacific-islands-remain-friends-to-all-amid-uschina- competition/.

[3] Pankaj Jha, “China-US Rivalry in the Pacific: An Indian Perspective,” Asia-Pacific Leadership Network, November 24, 2022, https://www.apln.network/analysis/commentaries/china-us-rivalry-in-the-pacific-an-indianperspective.

[4] Steve Holland, David Brunnstrom, and Kirsty Needham, “Biden Makes New Pledges to Pacific Island Leaders as China’s Influence Grows,” Reuters, September 26, 2023, https://www.reuters.com/world/us-recognize-independence-two-small-pacific-nationsbiden- 2023-09-25/; “Sogavare Thanks US for Aligning Commitment to Forum 2050 Strategy,” Solomon Times, October 4, 2022, https://www.solomontimes.com/news/sogavare-thanks-us-for-aligning-commitment-to-forum-2050- strategy/12219.

[5] Schleich, “Pacific Island Countries, China and the US: Recent Geopolitical Trends”

[6] “U.S. to Recognize Independence of Two Small Pacific Nations,” Reuters, September 25, 2023, https://www.reuters.com/world/us-recognize-independence-two-small-pacific-nationsbiden- 2023-09-25/

[7] Schleich, “Pacific Island Countries, China and the US: Recent Geopolitical Trends”

[8] Denghua Zhang, “China’s Influence as a Pacific Donor,” The Lowy Interpreter, October 31, 2022, https://www.lowyinstitute.org/the-interpreter/china-s-influence-pacific-donor.

[9] Alexandre Dayant et al., “Pacific Aid Map,” Lowy Institute, https://pacificaidmap.lowyinstitute.org/.

[10] Alexandre Dayant and Riley Duke, “China’s Shifting Pacific Engagement – Loud and Brash to ‘Small but Beautiful’,” The Lowy Interpreter, November 28, 2023, https://www.lowyinstitute.org/publications/china-s-shifting-pacific-engagement-loud-brash-smallbeautiful.

[11]  Sakai, “Does the Pacific Islands Remain: US-China Competition?”; Lai-Ha Chan and Pak K. Lee, eds., China-US Great-Power Rivalry: The Competitive Dynamics of Order-Building in the Indo-Pacific (London: Routledge, 2024), https://doi.org/10.4324/9781003392958.

[12] Kathryn Paik, “Looking Ahead: Next Steps in the Pacific,” Center for Strategic and International Studies, January 27, 2025, https://www.csis.org/analysis/looking-ahead-next-steps-pacific.

[13] Paulo Aguiar, “Australia Ramps Up Strategic Engagement in the Pacific,” Geopolitical Monitor, January 7, 2025, https://www.geopoliticalmonitor.com/australia-ramps-up-strategic-engagement-in-the-pacific/.

[14] Sakai, “Does the Pacific Islands Remain: US-China Competition?”

[15] Chan and Lee, China-US Great-Power Rivalry: The Competitive Dynamics of Order-Building in the Indo- Pacific

[16] Pankaj Jha, “China-US Rivalry in the Pacific: An Indian Perspective,” Asia-Pacific Leadership Network, November 24, 2022, https://www.apln.network/analysis/commentaries/china-us-rivalry-in-the-pacifican- indian-perspective

[17] Sakai, “Does the Pacific Islands Remain: US-China Competition?”; Paik, “Looking Ahead: Next Steps in the Pacific”; Tess Newton Cain, “Stagnant and Faltering Self-Determination Efforts in the Pacific,” East Asia Forum, February 5, 2024, https://eastasiaforum.org/2024/02/06/stagnant-and-faltering-self-determination-efforts-in-thepacific/.

[18] Jan Kohout, “France Wants Increased Military Presence and a New Status for New Caledonia,” Australian Broadcasting Corporation, July 27, 2023, https://www.abc.net.au/radio/programs/pacific-beat/france-wants-increased-military-presenceand- a-new-status-for-new-caledonia/10248016

[19] Cain, “Stagnant and Faltering Self-Determination Efforts in the Pacific”

[20] “Climate Change Information for the Pacific,” CSIRO, https://www.csiro.au/en/research/environmental-impacts/climate-change/pacific-climate-changeinfo

[21] World Meteorological Organization, “Climate Change Transforms Pacific Islands,” August 27, 2024, https://www.wmo.int/press-release/climate-change-transforms-pacific-islands.

[22] World Meteorological Organization, “Climate Change Transforms Pacific Islands”

[23] Anna Elzbieta Kolendo, “Beyond Climate Science: Cultural Loss in the Pacific Islands,” Earth.org, March 20, 2023, https://earth.org/climate-change-pacific-islands/.

[24] Amélie Bottollier-Depois, “As Oceans Rise, Are Some Nations Doomed to Vanish?,” Physics.org, October 10, 2022, https://phys.org/news/2022-10-oceans-nations-doomed.html.

[25] Pacific Islands Forum, “Pacific Resilience Facility,” http://forumsec.org/pacific-resilience-facility; Rebekah Ramsay, Lachlan McDonald, and John Cox, “Listening to the First Responders of Climate Change: The Social Dimensions of Climate Change in the Pacific,” World Bank Blogs, May 10, 2023, https://blogs.worldbank.org/en/eastasiapacific/listening-first-responders-climate-change-socialdimensions- climate-change-pacific.

[26] Darshana M. Baruah, Satyendra Prasad, and Denghua Zhang, “How Chinese Financing Shapes the Pacific,” Carnegie China, February 8, 2024, https://carnegieendowment.org/posts/2024/02/how-chinese-financing-shapes-the-pacific?lang=en.

[27] Pacific Islands Forum Secretariat, Pacific Regional Framework on Climate Mobility, Suva, Pacific Islands Forum Secretariat, 2024, https://www.forumsec.org/2024-pacific-regional-framework-climate-mobility; Pacific Regional Framework on Climate Mobility, Pacific Islands Forum, November 10, 2023, https://forumsec.org/publications/pacific-regional-framework-climate-mobility.

[28] Pacific Islands Forum, “Pacific Resilience Facility”

[29] Imad N. Fakhoury, Megumi Muto, and Sameh Wahba, “Japan and the World Bank: Working Together to Build Resilient Infrastructure,” World Bank Blogs, September 21, 2022, https://blogs.worldbank.org/en/ppps/japan-and-world-bank-working-together-build-resilientinfrastructure; Daniel Aldrich, “What Japan Can Teach the World About Disaster Risk Reduction,” East Asia Forum, August 20, 2024, https://eastasiaforum.org/2024/08/20/what-japan-can-teach-the-world-about-disaster-riskreduction/; Government of Japan, Ministry of Foreign Affairs, “Disaster Prevention,” https://www.mofa.go.jp/policy/disaster/21st/2.html.

[30] Purushottam Kaushik, Harsh Sharma, and Ayushi Sarna, “AI for India 2030: A Blueprint for Inclusive Growth and Global Leadership,” World Economic Forum, January 22, 2025, https://www.weforum.org/stories/2025/01/ai-for-india-2030-blueprint-inclusive-growth-globalleadership/; “India Emerges as a Global Leader Across Key Sectors in 2024,” Economic Times, December 31, 2024, https://economictimes.indiatimes.com/news/india/india-emerges-as-a-global-leader-across-keysectors- in-2024/articleshow/116824301.cms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campaign=cppst.

[31] Pacific Islands Forum, “2050 Strategy for the Blue Pacific Continent,” January 16, 2025, https://forumsec.org/2050

[32] Kate Clayton, “Operationalising the Quad: Maritime Security and Climate Change in the Indo-Pacific,” United States Studies Center, University of Sydney, October 23, 2024, https://www.ussc.edu.au/maritime-security-and-climate-change-in-the-indo-pacific.

[33] Government of Australia, Department of the Prime Minister and Cabinet, “Indo-Pacific Partnership for Maritime Domain Awareness,” Quad Leaders’ Summit 2023, https://www.pmc.gov.au/resources/quad-leaders-summit-2023/indo-pacific-partnership-maritimedomain- awareness.

[34] Clayton, “Operationalising the Quad: Maritime Security and Climate Change in the Indo-Pacific”
Notes

[i] Illegal, unreported and unregulated (IUU) fishing is one of the biggest threats to achieving a sustainable ocean future. A 2009 study conservatively estimates that up to 26 million tonnes of fish are caught illegally each year, accounting for 1 in every 5 fish sold at market. In the Pacific islands, the figure goes as high as US$333 million yearly in IUU tuna alone. For countries such as PNG, where the fishing industry plays a crucial role in the country’s economy and food security, IUU fishing is an existential threat. With a coastline stretching over 16,093 kilometres, PNG’s waters cover more than 2.4 million sq km and are home to some of the most productive tuna fisheries in the world.

[ii] For instance, looking at Chinese aid pledges to the Solomon Islands demonstrate Beijing’s willingness to finance such projects. According to Zhang (2022), these include a US$53 million national sports stadium, a National University dormitory complex (US$21.4 million), a comprehensive medical centre at the National Referral Hospital, and 161 mobile phone towers (US$66 million).

[iii] As Szadziewski and Smith (2023) note, in 2019, the government of Manasseh Sogavare, the then-Prime Minister of the Solomon Islands decided to “switch” diplomatic relations from Taiwan to China. Following this, in 2022, his government signed a controversial security agreement with Beijing.

[iv] Former Commodore Frank Bainimarama seized power in Fiji in 2006, leading to a series of events that would eventually see Australia and New Zealand slap sanctions on him and other senior officials. The period immediately after the coup d’état saw heavy-handed media censorship and frequent attacks on his political opponents. At one point, police in Fiji accused Australia and New Zealand of being involved in an alleged plot to assassinate Bainimarama, a claim both countries denied. See: https://www.abc.net.au/news/2019-09-15/frank-bainimaramas-journey-from-coupleader- to-climate-crusader/11500186. In October 2023, Australia and Fiji signed the Fiji-Australia Vuvale Partnership, building on the previous partnership signed in 2019. It is a broad-ranging and comprehensive partnership supporting deeper people-to-people, economic and security links.

[v] In comparison, the average global mean sea level rise increased by around 3.4 millimetres during the same period. See: https://www.wmo.int/press-release/climate-change-transforms-pacific-islands.

[vi] Some 67 percent of all infrastructure in Pacific Island countries lie within a mere 500 metres of the coast, making them highly susceptible to climate change impacts. The situation is particularly dire for the Maldives, Tuvalu, the Marshall Islands, Nauru, and Kiribati. See: https://www.ipcc.ch/report/ar6/wg2/chapter/chapter-15/.

[vii] It underscores that staying in place should remain a fundamental priority, with planned relocation—defined as the voluntary movement of communities away from high-risk areas—treated as a measure of last resort. The region has already demonstrated leadership in this area, with countries like Fiji and Vanuatu pioneering national policies on planned relocation.

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