भारतीय उच्च शिक्षा लंबे समय से नियमों और निरीक्षणों के बोझ में जकड़ी रही है जबकि एनईपी 2020 ने एक सरल और भरोसेमंद नियामक व्यवस्था का वादा किया था. संसद में वीबीएसए विधेयक 2025 के पेश होने के साथ यह लेख उसी वादे की वास्तविक परीक्षा और उसके निहितार्थों को समझने का प्रयास कर रहा है.
अगस्त, 2025 में दक्षिणी अफ़्रीका नेता जूलियस मालेमा ने एक साहसिक विचार दोहराया- पूरा अफ़्रीका एक हो; एक ही राष्ट्रपति, मुद्रा, सेना और संसद. उनका तर्क था- अमेरिका की तरह ही 'संयुक्त अफ़्रीका' एक वैश्विक महाशक्ति बन सकता है. आज यह विचार बेशक काफ़ी मुश्किल जान पड़ता है लेकिन यह न तो नया है और न ही असंभव. अलबत्ता, अफ़्रीका के राजनीतिक इतिहास में इसकी जड़ें काफ़ी गहरी हैं और यह एकीकरण सिर्फ़ राजनीति में नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था में भी हो सकता है, ख़ास तौर से अफ़्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (AfCFTA) में.
‘संयुक्त राज्य अफ़्रीका’ का विचार 1950 के दशक से चला आ रहा है, जब उप-सहारा अफ़्रीका में आज़ादी पाने वाला पहला देश घाना बना. इसके पहले राष्ट्रपति क्वामे नक्रूमा ने अपने पहले भाषण में कहा कि घाना की स्वतंत्रता ‘तब तक अर्थहीन है, जब तक पूरा अफ़्रीका आज़ाद नहीं हो जाता’. उन्होंने न केवल राजनीतिक आज़ादी बल्कि महाद्वीपीय एकता का भी आह्वान किया था.
1958 में नक्रूमा ने राजधानी अक्रा में अखिल अफ़्रीकी जन सम्मेलन आयोजित किया जिसमें महाद्वीप और प्रवासी समुदायों के प्रतिनिधियों के सामने उन्होंने कई प्रस्ताव रखे जैसे- एक साझा विदेश नीति, सीमा के आर-पार बेरोकटोक व्यापार, सामंजस्यपूर्ण शासन प्रणाली और सबसे महत्वपूर्ण, अफ़्रीकी देशों का अपने पुराने औपनिवेशिक शासकों के बजाय आपस में अधिक व्यापार करना.
हालांकि, तमाम प्रयासों के बावजूद नक्रूमा का सपना अधूरा रहा. 1963 में अफ़्रीकी एकता संगठन (OAU) का गठन ज़रूर हुआ और इसने अंगोला, मोज़ाम्बिक और जिम्बाब्वे जैसे देशों के मुक्ति संघर्षों में बहुमूल्य मदद भी की लेकिन यह संगठन, विशेष रूप से शीत युद्ध के दौरान, एकजुट अफ़्रीका की आवाज़ उठाने में नाकाम रहा.
AfCFTA (2019) 1.3 अरब लोगों के लिए ‘एक बाज़ार’ बनाने और 2035 तक अतिरिक्त $450 अरब आय की क्षमता रखता है—यह खंडित अर्थव्यवस्थाओं को एकीकृत आर्थिक गुट में बदलने का माध्यम बन सकता है।
बाद में, लीबियाई नेता मुअम्मर गद्दाफ़ी ने अफ़्रीकी एकता संगठन (OAU) के शासनाध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में अफ़्रीकी एकता की बात फिर से उठाई. 9 सितंबर, 1999 को, सिरते सम्मेलन में उन्होंने सीमाविहीन ‘संयुक्त राज्य अफ़्रीका’ का अपना विचार साझा किया जिस कारण 2002 में अफ़्रीकी संघ (AU) के गठन में मदद मिली. इसका उद्देश्य महाद्वीपीय सहयोग को मज़बूत और आधुनिक बनाना था. गद्दाफ़ी ने ‘एक अफ़्रीकी सरकार’ की भी वकालत की लेकिन इस मसले पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद आगे बढ़ने की बात कही गई. हालांकि, 2011 में गद्दाफ़ी की मृत्यु से एकजुट अफ़्रीका की परिकल्पना फिर से धूमिल हो गई.
राजनीतिक तौर पर ‘एक अफ़्रीका’ की कल्पना भले ही दूर की बात लगे लेकिन आर्थिक एकीकरण संभव है और इस दिशा में काम हो भी रहा है. इस लिहाज़ से AU की स्थापना के बाद सबसे महत्वाकांक्षी पहल है, अफ़्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (AfCFTA), जिस पर 2019 में सहमति बनी. इसका उद्देश्य 1.3 अरब लोगों के लिए ‘एक बाज़ार’ बनाना और 2035 तक अतिरिक्त 450 अरब डॉलर की आमदनी पैदा करना है.
धीमी प्रगति के कारण—राजनीतिक संशय, कमज़ोर बुनियादी ढांचा और नौकरशाही अड़चनें—AfCFTA की रफ्तार घटाती हैं; 2034 से पहले पूर्ण शुल्क-उन्मूलन कठिन दिखता है।
AfCFTA ऐसा शक्तिशाली माध्यम है जो अफ़्रीका को खंडित अर्थव्यवस्थाओं के समूह से एक एकजुट आर्थिक गुट बना सकता है. यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो यह नक्रूमा की एक बड़ी चिंता का समाधान कर सकता है जो है- अफ़्रीका का बाहरी देशों में कच्चा माल निर्यात करने पर निर्भर रहना, न कि अफ़्रीकी देशों के बीच आपसी व्यापार को मज़बूत बनाना. सीमा शुल्क कम करने, नियमों में तालमेल बनाकर और वस्तुओं व सेवाओं की मुक्त आवाजाही की व्यवस्था करके AfCFTA सही मायने में एकीकृत अफ़्रीकी अर्थव्यवस्था की नींव रखता है.
हालांकि, इसकी गति धीमी रही है. 2025 तक, अफ़्रीकी संघ के 55 सदस्य देशों में से 48 ने इसे स्वीकार किया है और सीमा शुल्क को पूरी तरह से ख़त्म करना 2034 से पहले संभव नहीं दिखता. राजनीतिक संशय, कमज़ोर बुनियादी ढांचा और नौकरशाही अड़चनें इसमें प्रमुख रुकावटें हैं.
जाहिर है, अफ़्रीकी नेताओं को ठोस प्रयास करने होंगे. पहला, महाद्वीप की मौजूदा चुनौतियों को दूर करने के आवश्यक कदम के रूप में उन्हें एकजुटता की ओर बढ़ना होगा. इसी तरह, उन्हें यह भी समझना होगा कि व्यापार, इन्फ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा और नवाचार के लिए एकीकृत नज़रिया आवश्यक है.
विजन को एक्शन में बदलने के लिए प्रतीकात्मक कूटनीति से आगे बढ़कर महाद्वीपीय संस्थान, परिवहन-ऊर्जा गलियारे, शिक्षा और नवाचार में निवेश अनिवार्य है।
प्रतीकात्मक समझौतों की तलाश में एक से दूसरे देशों में भागने के बजाय, अफ़्रीकी नेताओं को अपनी ऊर्जा महाद्वीपीय संस्थान और बुनियादी ढांचे के निर्माण में लगानी चाहिए. आज इस महाद्वीप को सीमा-पार परिवहन गलियारे, ऊर्जा संचार प्रणालियां, हरित औद्योगिक पार्क और बेहतरीन क्षेत्रीय विश्वविद्यालय चाहिए. इन परियोजनाओं के लिए विदेशी निवेश की ज़रूरत पड़ सकती है लेकिन उनका एजेंडा अफ़्रीकी नेतृत्व वाला ही रहना चाहिए.
अपनी एकजुटता को बढ़ावा देने और संप्रभुता की रक्षा करने के लिए, इन देशों को अफ़्रीकी संघ को अंतरराष्ट्रीय सहयोग का पहला मंच बनाना चाहिए. 2020 में अफ़्रीकी संघ की सभा ने फ़ैसला (नंबर- 762 (XXXIII)) लिया कि बाहरी साझेदारी सम्मेलनों में प्रतिनिधिमंडल सीमित किए जाएंगे ताकि लागत घट सके, गरिमा को प्रोत्साहन मिले और सामूहिक सक्रियता मज़बूत हो सके. मगर इसकी बड़े पैमाने पर अनदेखी की गई. आज भी यहां के नेता बड़ी संख्या में टोक्यो, बीजिंग और वाशिंगटन जाते हैं, वह भी अधिक उत्साह के साथ.
इन सबसे AU की विश्वसनीयता कमज़ोर होती है. इसके बजाय, इस संघ को महाद्वीपीय शिखर सम्मेलन बुलानी चाहिए जिसमें विश्व नेताओं को अफ़्रीका में आमंत्रित किया जाए ताकि वे महाद्वीप के साथ उसकी अपनी शर्तों पर बातचीत कर सकें.
AfCFTA भरोसा, क्षमता और परस्पर निर्भरता को मज़बूत कर सकता है; यही आधार आगे चलकर राजनीतिक एकीकरण को जन-मांग में बदल सकता है—पहले बाज़ार, फिर राजनीति।
AfCFTA अधिक एकजुट अफ़्रीका की नींव बन सकता है. अफ़्रीकी देशों के बीच परस्पर निर्भरता को बढ़ावा देकर यह आपसी विश्वास, संस्थागत क्षमता और आर्थिक मज़बूती के प्रयास करता है. ये एकीकरण के बुनियादी तत्व माने जा रहे हैं.
हालांकि, इसके लिए कुछ अतिरिक्त काम भी करने होंगे जैसे- देशों को डिजिटल ढांचे में निवेश करना होगा, सीमा प्रक्रियाओं को व्यवस्थित बनाना होगा और स्थानीय उत्पादन को प्राथमिकता देनी होगी. पूरे अफ़्रीका में युवा उद्यमिता, नवाचार संबंधी माहौल और अखिल अफ़्रीकी निवेश मंचों को बढ़ावा देना होगा. रोज़गार निर्माण और लोगों तक सस्ती वस्तुओं व सेवाओं की बेहतर पहुंच भी सुनिश्चित करनी होगी. यह सब होने के बाद ही राजनीतिक रूप से एकजुट अफ़्रीका का विचार केवल एक नेता का सपना नहीं बल्कि जनता की मांग बन पाएगा.
(समीर भट्टाचार्य ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं)
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Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing global ...
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